नीतिवचन 26:7

लंगड़े की टांगे एक सी नहीं होती है : सो मूर्खों के मुंह में दृष्टान्त ऐसा ही है।

चलने, दौड़ने, या नाचने का प्रयास करता हुआ एक लंगड़ा अति दयनीय दृश्य है। उसके पैर एक समन्वयित जोड़ी के समान काम नहीं करते। लम्बाई, ताकत, या समन्वय में बराबर न होने के कारण, उसकी चाल असंगत, विरोधाभासी, बिगड़ी हुई, और बिना किसी लाभ की होती है। लंगड़े को नाचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए।

इसी प्रकार, बुद्धि सिखाने के लिए एक दृष्टान्त या नीतिवचन उपयोग करनेवाला मूर्ख व्यक्ति असंगत, विरोधाभासी, बिगड़ा हुआ, और बिना किसी लाभ का होता है। राजा सुलैमान इस नीतिवचन के द्वारा मूर्खों के विषय में एक और अभियोग की शिक्षा देता है (नीति. 26:1-12)। मूर्खों को शिक्षक होने का प्रयास नहीं करना चाहिए।

दृष्टान्त और नीतिवचन बुद्धिमानों की गूढ़ उक्तियाँ या कथन हैं (नीति. 1:5-6; भजन 78:2)। वे थोड़े से शब्दों में तीव्र बल के साथ बुद्धि सिखाने के लिए सावधानीपूर्वक तैयार किये गए माध्यम हैं। उन्हें प्रतिदिन के जीवन से लिया जाता है, जिनका एक लाक्षणिक अर्थ होता है और उसकी व्याख्या करने और समझाने के लिए कौशल और समझ की ज़रूरत होती है। आग्रह और चुनौती के लिए रोचक उपमा व रूपक-अलंकारों के उपयोग से बनाये जाकर, वे एक मूर्ख की समझ के बाहर हैं, क्योंकि वह बिना समझ या बिना बुद्धि का मनुष्य है।

मूर्खों को सिखाया जाना चाहिए; उन्हें शिक्षक नहीं बनना चाहिए। मूर्खों को सुनना चाहिए; उन्हें बोलना नहीं चाहिए। इस कारण, उनकी बकबक के लिए उन्हें एक सार्वजनिक मंच का सम्मान नहीं दिया जाना चाहिए (नीति. 26:1, 8)। और उन्हें अनदेखा या बुद्धिमान मनुष्यों की फटकार से चुप कराना चाहिए (नीति. 26:4-5)। मूर्खों के साथ व्यवहार करने के लिए यह परमेश्वर का नियम है, और आप को इसका निरन्तर पालन करना चाहिए (2 तीमु. 2:16, 23; तीतुस 3:9)।

सहज-बुद्धि और आत्मिक समझ की उनकी घटी उन्हें किसी भी अधिकार से वंचित करती है कि परमेश्वर के वचन की गहरी बातों को उनके मुंह में लें। उनके पापमय जीवन की आदतें और धार्मिक मामलों का दूषित विवेचन उसकी पवित्र बातों को छूने से उन्हें प्रतिबन्धित करते हैं। उनका भला होगा और उन पर अधिक दया की दृष्टी की जायेगी, यदि वे अपना मुँह बन्द रखे (नीति. 17:28)।

परन्तु मूर्खों के लिए अपना मुंह बन्द रखना और इसके बजाए सुनना और सीखना असम्भव है – अवश्य ही वे अपनी अज्ञानता के कारण बकबक करते हैं – क्योंकि यह एक मूर्ख का प्रमुख चिन्ह है (नीति. 15:2; सभो. 5:3; 10:3, 12-14)। मूर्खों को पहचानना सरल है : आपको बस इतना करना है कि जो सबसे अधिक बोल रहा है उसको बोलते सुने। अतः मंच और आसन दोनों में मूर्ख व्यर्थ ही परमेश्वर का वचन लेते हैं और बुद्धि सिखाने का प्रयास करते हैं।

एक मूर्ख सोचता है कि शब्दों की ध्वनि और अर्थ बराबर हैं – उन्हें किसी व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं है – इसी तरह लंगड़ा उलझन और झूठी शिक्षा में लड़खड़ाता है। एक मूर्ख की दृष्टी में ध्वनि का तीखापन बहुत अच्छा है। वह विवाद करता है कि, शब्दों के संदर्भ या आत्मिक आशय के बारे में क्यों चिन्ता की जाये: वह कहता हैं -बाइबल का अर्थ वही है जो ये कहती है, और जो कहती है वही इसका अर्थ है। वह पास्टर का भिन्न रूप से पढ़ने का काम और किसी शास्त्रलेख का अर्थ परिभाषित करना नहीं जानता और न समझता (नहे. 8:8; सभो. 8:1; 2 पतरस 1:20)।

एक मूर्ख सोचता है कि पढ़ना और अध्ययन करना दोनों एक जैसे ही हैं – वह मान लेता है कि सोचना और अध्ययन करना दोनों समान हैं – अतः लंगड़ा उचित तैयारी न करने के कारण गिरता जाता है। हर एक को अपना-अपना मत रखना चाहिए, वह तर्क प्रस्तुत करता है : हम सभी परमेश्वर की सन्तान हैं, और हमारे पास ‘आत्मा’ है कि सत्य की परिभाषा करके उसे सिखायें। उसके पास परिश्रम से अध्ययन के लिए न तो परमेश्वर-प्रदत्त अभिरूचि है, और न वह धर्म-सैद्धान्तिक लज्जा से अपने को बचाने के लिए कठोर परिश्रम के लिए समय देता है (नीति. 15:28; 1 तीमु. 3:2; 4:13-15; 2 तीमु. 2:15; तीतुस 1:9)।

एक मूर्ख उसका मुंह चौड़ा खोलता और धर्मसिद्धान्त व सार-तत्व के विषय में डकार लेता है – परन्तु उसका जीवन धर्मशास्त्र के उन अंशों से कभी मेल नहीं खाता जिनका वह उपयोग करता है – अतः लंगड़ा लड़खड़ाता और पाखण्ड की गन्दी नाली में गिरता है। वह कुछ लोगों को ऊँचे स्वर में विश्वास के अंगीकार और बुद्धि के द्वारा धोखा देता है, परन्तु यीशु मसीह उसके ढोंग को ‘न्याय के दिन’ प्रगट करेगा (मत्ती 7:21-23)। वह शिक्षक के रूप में अपने मुख्य कर्तव्य को पूरा करने में विफल रहता है – अर्थात् सत्य का एक उदाहरण होना (1 तीमु. 4:12, 16; तीतुस 2:7)।

क्या ये नीतिवचन अक्षरशः सच है? जब तक कि आप ने मूर्ख को आध्यात्मिकता का चोला पहने एक श्रेष्ठगीत या अच्छे सामरी के दृष्टान्त के साथ न सुना हो, तब तक आप जान नहीं सकते कि एक नाचता हुआ लंगड़ा कितना हास्यास्पद हो सकता है। जब तक कि आप एक निधि को इकट्ठा करनेवाले मूर्ख को नीतिवचनीय शब्दों ‘‘जहाँ दर्शन नहीं है, वहाँ लोग निरंकुश/नाश हो जाते हैं’’ का दुरुपयोग करते और तोड़ते-मरोड़ते न सुनें, तब तक आप एक विकलांग की मूढ़ता के ख़तरे को पूरी तरह समझ नहीं पायेंगे जिसे तराजू के संतुलन से मापा जाता है। यह नीतिवचन सचमुच ही अक्षरशः सच है।

पाठक, आप यहाँ कौन-से सबक सीख सकते हैं? सुनने में तत्पर और बोलने में धीमे बनो (याकूब 1:19)। एक शिक्षक होने के लिए उतावली मत करों, क्योंकि वे अधिक बड़ा दण्ड पायेंगे (याकूब 3:1)। चुप रहना सुनहरा है, ख़ासकर तब यदि परमेश्वर या मनुष्यों ने आप को एक शिक्षक होने के लिए नहीं बुलाया हो (इब्रा. 5:4)। सुनिश्चित करें कि आपका जीवन आपके शब्दों से ऊँची आवाज़ में सिखाता है (मत्ती 23:14-15)। परमेश्वर द्वारा बुलाये गए शिक्षकों के लिए कृतज्ञ रहें, और उनके अधीन हो जाएं, क्योंकि आप को सिखाने के लिए यह परमेश्वर का साधन है।

प्रभु यीशु मसीह लंगड़ा नहीं था। उसके पैर एक समान और बहुत मजबूत थे। संसार के इतिहास में बुद्धि के सबसे महानतम् शिक्षक के रूप में वह आदर्श रूप से उपयुक्त था। दृष्टान्तों और नीतिवचनों के उसके विवेकी उपयोग और व्याख्या असाधारण थे। वह सुलैमान से भी महान था। सिखाने में उसका कौशल और सामर्थ्य लोगों को अचरज में कंपकंपा देता था और वे प्रश्न पूछने का साहस नहीं कर पाते थे (मत्ती 7:28-29; 22:46; लूका 4:22; यूहन्ना 7:46)। उसके नाम की महिमा करों।

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