नीतिवचन 26:12
यदि तू ऐसा मनुष्य देखे जो अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनता हो, तो उससे अधिक आशा मूर्ख ही से है।
क्या कोई मनुष्य मूर्ख से भी बदतर हो सकता है? हाँ, ऐसा घमंडी मनुष्य जो सोचता है कि वही सही है! एक मूर्ख भोला होता है, फिर भी उसके लिए आशा है कि उसमें कुछ आसान बातों को सीखने की क़ाबलियत हो। उपहास करनेवाले मनुष्य के लिए बहुत कम आशा होती है, क्योंकि वह इतना घमंडी होता है कि उसे सुधारा नहीं जा सकता। आप उसकी मदद कैसे करेंगे? वह पूरा आश्वस्त रहता है कि उसमें कोई दोष या कमियाँ नहीं हैं।
आत्म-विश्वास (अर्थात् परमेश्वर पर भरोसा रखने के बजाए खुद पे यकीन करना) और आत्म-धार्मिकता (खुद को दूसरों से श्रेष्ठ समझना) विनाशकारी हैं। ये दोनों दुर्गुण मनुष्य को उसके ही दिल और दिमाग की अकड़ में, जो खुद मिथ्याभिमान में हैं, जकड़ लेते हैं, क्योंकि उसे लगता ही नहीं कि उसकी सोच और युक्तियाँ गलत हो सकती हैं। वह अपने अहंकार में बुद्धिमानों की सलाह को नज़रअंदाज़ कर देता है और उनकी नहीं सुनता, चाहे उनके विचार कितने ही योग्य क्यों न हो। ऐसी मूर्खता से सुरक्षा केवल तब मिलती है जब व्यक्ति खुद को छोटा समझकर अपने आत्मभिमान और खुद पर यकीन करने की अपनी घमण्डी सोच को त्याग देता है।
मूर्ख और बुद्धि के बीच केवल एक ही दीवार होती है – अज्ञान। परन्तु मूर्ख जो अपनी अकड़ में होता है, उसके और बुद्धि के बीच दो दीवारें हैं – अज्ञान और आत्म-भ्रम। उसके लिए सबसे पहले यह सीखना ज़रूरी है कि वह कुछ नहीं जानता, जो बुद्धि और ज्ञान की पाठशाला का सबसे कठिन सबक है, और यह सबक आमतौर पर केवल कड़ी सजा से ही सीखा जाता है। जो भी मनुष्य अपनी ग़लत सोच में जितना अधिक आश्वस्त होता है, उसकी हालत उतनी ही अधिक अज्ञानी और खतरनाक होती है।
यहोवा चाहता है कि आप ऐसे लोगों पर विचार करें। आप इन अकड़बाज़ और मग़रूर दुष्टों को देखकर सीख सकते हैं। वे ऐसा मान बैठते हैं कि वे पैदायशी बुद्धिमान हैं, और इसलिए वे कभी असल में बुद्धिमान नहीं बन पाएंगे। उन्हें यह तक नहीं पता कि ज्ञान क्या, या बुद्धि क्या होती है, उसे प्राप्त करने की महत्वाकांक्षा और माध्यम की जानकारी होना तो दूर की बात हैं।
अकड़बाज़ होने का अर्थ है अपने और अपनी क़ाबलियत को लेकर ऊँची और मग़रूर सोच रखना। यह अभिमान और अहंकार है। नया नियम इसे ढीठ और घमण्ड का पाप कहता है (2 तीमु 3:4)। यह शैतान का अभिशाप है (1 तीमु 3:6), जिसने खुद को इंतन बड़ा समझ लिया था कि उसने परमेश्वर से ही ईश्वर बनने की प्रतिस्पर्धा करना चाहा।
इस नीतिवचन में, “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनने” की जड़ आपके अपने विचारों में है। एक बार जब आपको विश्वास हो जाए कि आप एक महान विचारक हैं और आपके विचार बिलकुल सही हैं, फिर आपको कौन सिखा या समझा सकता है? आप इसी सोच में अपने बिस्तर पर जाते हैं और सुबह उसी सोच के साथ उठते भी हैं – आपकी राय बाकी सब लोगों से श्रेष्ठ है। आप धोखा खा रहे हैं, और आपके लिए कोई आशा नहीं।
इसका इलाज सिर्फ़ यह है कि आप नम्र होकर एक दीन मन से यह मान लें कि अब आप एक बच्चे से भी कम जानते हैं और किसी भी मूल्यवान विषय को सीखने के लिए आप पूरी तरह से परमेश्वर और उसके वचन पर निर्भर हैं। इस नीतिवचन में बुद्धिमानी की सीख यह है कि जो लोग अपने को बुद्धिमान समझकर दूसरों का ठट्ठा करते हैं, उन्हें पहचानें और उनसे दूर ही रहें। उनके लिए कोई आशा नहीं, इसलिए उन्हें सिखाने में अपना समय और उर्जा बर्बाद न करें। उन्हें अपने आस-पास भी भटकने मत दों (नीतिवचन 22:10)।
दुनिया में एकमात्र परम सत्य बाइबल है, लेकिन जो मनुष्य अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान बनता है वह बाइबल को भी कोई मूल्य नहीं देता है। उसने खुद को यकीन दिला दिया है कि बाइबल मूर्खतापूर्ण है, यह कि वह बीते ज़माने की पुस्तक है जिससे कोई आशा नहीं की जा सकती है, या यह कि उसे कुछ धार्मिक कट्टरपंथियों ने लिखा था। और अगर मान लो कि वे उसपर विश्वास करने का दावा करते भी हैं तौभी वे विवाद करेंगे कि उन्हें छोड़ बाकी सब लोग उसकी गलत व्याख्या करते हैं: केवल वे ही वास्तव में परमेश्वर के मन (दिमाग) को समझते हैं। वे अपने विचारों से इतने प्रेम करते हैं कि वे परमेश्वर या उसके नियुक्त राजदूतों से कोई सुधार या फटकार स्वीकार नहीं करेंगे।
सोचो और समझो कि किस प्रकार यह नीतिवचन हमारे सामने आज के शिक्षकों, समाचार-मीडिया और मनोरंजन जगत की तस्वीर प्रस्तुत करता है जिसे हम और आप स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। जब सीखने की बात आए तो उनका फूला हुआ अहंकार, जनमत को प्रभावित कर अपनी विचारधारा को मनवाने की उनकी शक्ति और सामाजिक स्थान ये सब बातें उन्हें सत्य से घृणा रखने और उसे दुत्कारने के लिए प्रेरित करती हैं। इसलिए परमेश्वर ने उन्हें ऐसा अंधा कर दिया है कि उनमें बुनियादी बुद्धि और मौलिक ज्ञान तक नहीं है, जैसा कि उन्हें देखनेवाले बुद्धिमानों की नज़रों में उनके निष्क्रिय जीवन प्रमाणित करते हैं (1 कुरिन्थ 1:19-20; 3:18-20)।
वे अपने अहंकारी भ्रमित मन में कल्पना करते हैं कि मनुष्य का विकास बंदरों से हुआ है, जिनकी पैदाइश एक ऐसे सलि के जन्तुओं से हुई थी जो आकाशीय गैसों के आकस्मिक विस्फोट से निकले थें। क्या बुद्धिमत्ता है! क्या गौरवशाली सोच है! क्या उपलब्धि है! स्वर्ग का परमेश्वर उनकी सोच को “अशुद्ध बकवाद” और “ऐसा विज्ञान जिसे भूल से ज्ञान कहा जाता है” कहकर उनका मज़ाक उड़ाता है (1 तीमु 6:20)। वे विज्ञान को अपनी बुद्धि मानते हैं, और अपनी बुद्धि को विज्ञान समझते हैं। उनसे अधिक आशा तो मूर्ख ही से है।
परन्तु परमप्रधान परमेश्वर को उनकी अहंकारी मूर्खता से कोई प्रसन्नता नहीं होती है। वह उनकी अज्ञानता पर हंसता है क्योंकि वह जानता है कि उनके दण्ड का दिन आने ही वाला है, लेकिन जब वे उस सत्य को मानने से इनकार करते हैं जो उसने उन्हें प्रकट किया है तो वह प्रसन्न नहीं होता (भजन 2:4-5; 37:13; नीतिवचन 1:24-27)। वह उनके मनों को अंधकारमय कर देता है और उनसे उस सामान्य ज्ञान को भी छीन लेता है यौन सम्बन्ध केवल एक पुरुष और एक स्त्री के बीच होता है, ताकि वे आपस में ही पुरुष पुरुष के साथ और औरत औरत के साथ अनुचित यौन विकृति करे जो उसकी दृष्टि में उनके अधर्म के लिए सही दण्ड है।
वह उन्हें जंगली जानवरों के भी नीचले स्तर पर ला रखता है कि वे एक-दूसरे को यौन रूप से अशुद्ध कर दें (रोमियों 1:18-27)। धर्मी जन पौलुस से सहमत होंगे कि उनकी यह नीच यौन-विकृति उनके लिए उचित प्रतिफल है। क्या उन्हें शर्म आती है? बिलकुल नहीं! वे इसकी महिमा करते हैं, इसे बढ़ावा देते हैं और इसकी रक्षा के लिए क़ानून बनवाते हैं (नीतिवचन 5:23; 26:11; भजन 49:13)। वे यह नहीं समझ पाते कि उनके रचयिता ने उन्हें ढूंढ लिया है और उन्हें शापित कर दिया है।
ऐसे लोगों की पहचान करना ही इस नीतिवचन का पहला सबक है। जब आप मूर्खों से मिलते हैं, तो आप उन्हें उनकी मूर्खता के लिए डांटते हैं ताकि वे अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनना छोड़ दें (नीतिवचन 26:5)। लेकिन जब आपको एहसास होता है कि वे वे ही अहंकारी निन्दक हैं जिनके विषय में यह नीतिवचन उल्लेख कर रहा है, तो भला यही होगा कि आप उन्हें उनकी दुष्ट कल्पनाओं पर छोड़ दें (नीतिवचन 26:4; 9:7-8)। उन्हें ज्यादा भाव देना, सम्मान देना या उनसे बहस करना किसी लाभ का नहीं, बल्कि खतरनाक है (मत्ती 7:6)। जैसा कि यीशु ने कहा, वे अंधे मार्गदर्शक हैं और अंधा यदि अंधे को मार्ग दिखाए, तो दोनों ही गड़हे में गिर पड़ेंगे (मत्ती 15:14)।
बच्चों को शुरू से ही सिखाया जाना चाहिए कि वे कुछ नहीं जानते और जो युवा हाँ उन्हें भी यह समझाना ज़रूरी है कि वे भी अधुरा ही जानते हैं। उनके आत्मसम्मान के बारे में चिंता न करें, क्योंकि जन्म के समय से ही वे नरक की इन अभिलाषाओं के वश में हैं (2 तीमु 3:2)। वे इस दुनिया में सम्मान से रहित और हर सद्गुण में कंगाल की अवस्स्था में आये थे, और तीस वर्ष की आयु तक पहुँचने से पहले वे इससे अधिक आगे नहीं बढ़ पाएंगे। उन्हें सिखाएं कि सच्ची शिक्षा, सच्ची बुद्धि और सच्चा ज्ञान पाने के लिए खुद को नम्र कर के अज्ञानी होना आवश्यक है। जो मनुष्य यह मान लेता है कि वह कुछ नहीं जानता, समझ लो कि वह ज्ञान के निकट ही है। ऐसे व्यक्ति को सिखाया जा सकता है, और जल्दी सीखता भी है।
बच्चों को यह सिखाना ज़रूरी है कि पूर्ण और परम सत्य और परम ज्ञान केवल बाइबल में ही है, और केवल माता-पिता और वृद्ध धार्मिक मनुष्ययों के पास ही सुनने लायक ज्ञान होता है। उन्हें यह सिखाना ज़रूरी है कि आज के रॉक स्टार्स और फिल्म स्टार्स, स्पोर्ट्स स्टार्स और विक्षिप्त बुद्धिजीवी मूर्खों से भी बदतर हैं, क्योंकि मूर्ख लोग परमेश्वर, सरकार और धार्मिकता के विरुद्ध किसी नफरती विद्रोही का षडयंत्र नहीं रचते हैं।
इस नीतिवचन का दूसरा सबक यह है कि आप अपनी दृष्टि में बुद्धिमान बनने से बचें। पौलुस ने चेतावनी दी, “अपनी दृष्टि में बुद्धिमान न हो” (रोमियों 12:16)। सुलैमान के जैसा नम्र बने जिसने यहोवा से कहा, “मैं छोटा लड़का–सा हूँ जो भीतर बाहर आना जाना नहीं जानता” (1 राजा 3:7)। दाऊद के समान बनें, जिसने कहा, ” हे यहोवा, न तो मेरा मन गर्व से और न मेरी दृष्टि घमण्ड से भरी है; और जो बातें बड़ी और मेरे लिये अधिक कठिन हैं, उनसे मैं काम नहीं रखता” (भजन 131:1)।
प्रिय पाठक, अपने बारे में उनके जैसीं ही नम्र और छोटी सोच रखों। यह आपको बहुत परेशानी से बचाएगा। परमेश्वर के वचन के सामने मन की दीनता, नम्रता और टूटी हुई आत्मा के साथ थरथराएं और कांपें (यशायाह 57:15; 66:2; याकूब 4:10)। खुद पर यकीन मत रखों और न ही अपने विचारों पर। अपने हर मकसद पर संदेह करों। अपनी हर राय पर सवाल उठाएं। अपने प्रत्येक विचार को पवित्र शास्त्र के सत्य से जोड़कर उसकी वैधता को जाने। व्यर्थ विचारों से घृणा रखें, खासकर यदि वे आपके अपने हों (भजन 119:13; यिर्म 17:9)।
वह जो सोचता है कि उसे सब पता है वह अब भी खुद को उतना नहीं जानता जितना उसे अब तक जान लेना चाहिए था (1 कुरिन्थ 8:2)। यदि आप बुद्धिमान बनना चाहते हैं, तो आपको मूर्ख बनकर शुरुआत करनी होगी (1 कुरिन्थ 3:18)। अधुरा ज्ञान खतरनाक है, क्योंकि यह मानव मन को घमण्ड से फुला देता है (1 कुरिन्थ 8:1)। सच्चा ज्ञान यह पहचानना और स्वीकार करना है कि आप कुछ भी नहीं जानते हैं। ऐसी शुरुआत से, आप बुद्धि और ज्ञान को आसानी से प्राप्त कर सकते हैं और आप प्राप्त करेंगे भी।
इस नीतिवचन का उल्लंघन करने की परीक्षा बहुत बड़ी है, क्योंकि “मनुष्य का सारा चालचलन अपनी दृष्टि में तो ठीक होता है” (नीतिवचन 21:2; 16:2, 25)। एकमात्र सुरक्षा यह है कि आप अपने मूर्खतापूर्ण विचारों को परमेश्वर के अचूक वचन की गिरफ़्त में लाएं और उस वचन के द्वारा उनका आलोचनात्मक परिक्षण होने दें (भजन 119:128; यशा 8:20)। मूर्ख, तेरे दाहिने हाथ में मिथ्या है या नहीं है यह तू कैसे जानेगा (यशा 44:20)? अपने विचारों को परमेश्वर के प्रेरित धर्मग्रंथों की ज्योति में लेकर आ, तो तू अपनी मूर्खता को स्पष्ट रूप से देख पाएगा और उसे मानना सीखेगा।
उसके बाद सलाहकारों की बहुतायत में जो सुरक्षा है उसके महत्व को समझना ज़रूरी है (नीतिवचन 11:14; 15:22; 24:6), लेकिन जो उपहास करता है उस पर उन सात अच्छे लोगों की शिक्षा का भी कोई असर नहीं पड़ता जो उसके सामने तार्किक बातों और उनके नतीजों को उजागर करते हैं (नीतिवचन 26:16)। चाहे आप कोई भी कारण बताएं, वह खुद को सही ठहराने के लिए हर तरह के रास्ते का आविष्कार कर लेगा। यह एक भयानक बुराई है जिससे आपको बचना चाहिए और जो जो इस बिमारी से संक्रमित हुएं हैं उन सभी लोगों से बचना चाहिए।
बोलने में जल्दबाज़ी करने वाला मनुष्य मूर्ख से भी बदतर होता है (नीतिवचन 29:20), क्योंकि वह सिर्फ़ अपना मुँह फाड़कर अपनी अज्ञानता भौंकना चाहता है (नीतिवचन 15:28)। वह दूसरों से कुछ भी सीखने के बजाय दूसरों को खुद की बातें सुनाना ज्यादा पसंद करता है। अमीर लोग भी अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान होते हैं (नीतिवचन 28:11), क्योंकि उन्होंने कुछ हद तक सफलता हासिल की होती है, वे खुद को बहुत-सी परेशानियों से बाहर निकाल पाते हैं, और जीवन के अगल अलग पड़ावों में खुद को गरीबों से ऊपर पाते हैं। इन दोनों मनुष्यों की ओर देखें, और ज्ञान सीखें।
अब, प्रिय पाठक, यह ज़रूरी है कि आप अपनी आध्यात्मिक मूर्खता पर भी विचार करें। यीशु ने लौदीकिया की कलीसिया को कड़ी फटकार लगाई क्योंकि वह अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान होने लगी थी, और उसने कलीसिया को चेतावनी दी कि उसे मसीह की कितनी आवश्यकता थी जबकि न्याय का दिन आने पर है (प्रकाशितवाक्य 3:17-22)। आत्मा ने इस कलीसिया से जो कहा आपको उस पर ध्यान देना चाहिए और आध्यात्मिक आत्मनिर्भरता के किसी भी विचार को तुरन्त त्याग दें।
जो लोग खुद को धर्मी समझते हैं वे स्वर्ग के महिमामय परमेश्वर की नाक में धूएँ व उस आग के समान हैं जो दिन भर जलती रहती है। आत्म-धार्मिकता क्या है? यह कहना कि, “हट जा, मेरे निकट मत आ, क्योंकि मैं तुझ से पवित्र हूँ” (यशा 65:5)। यह बड़ा भाई था जो उड़ाऊ पुत्र की वापसी के जश्न से खफ़ा हो गया था (लूका 15:25-32)। ऐसा कोई भी विचार आत्म-धार्मिकता है जो कहता है “मैं पापियों में सबसे बड़ा नहीं हूँ (1 तीमु 1:15)।
यीशु मसीह ने उस अहंकारी फरीसी की भर्त्सना कीं जो अपनी ही दृष्टि में बुद्धिमान बन रहा था और जिसने खुद को चूंगी लेनेवाले से धर्मी माना (लूका 18:9-14)। उसने यह कहते हुए उन सब धार्मिक ढोंगियों को जो अपनी दृष्टि में बुद्धिमान थें, फटकारा कि वेश्याएँ उनसे पहले स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर चुकी हैं (मत्ती 21:31)। प्रिय पाठक, आपके प्राण के लिए अहंकारी आत्म-धार्मिकता से अधिक खतरनाक कुछ भी नहीं है। इसे उत्कट और परिपूर्ण घृणा के साथ बैर रखें। सातवें आसमान से निचे उतरो, और दीन बनों!
वह जो यीशु के पास निराश्रित, नग्न और कंगाल बन कर आता है, वह स्वर्ग में अनंतकाल का धन और आनन्द पाएगा। जो लोग अपने धार्मिकता के कामों पर घमंड करते हैं, उन्हें बाहर कर दिया जाएगा। भजनकार के साथ नम्रतापूर्वक और ईमानदारी से कहें कि, “मैं अपने हाथ में कुछ भी नहीं लाता, बस तेरे क्रूस से लिपटता हूँ।” यीशु ने कहा, “जो कोई मेरे पास आएगा उसे मैं कभी न निकालूँगा” (यूहन्ना 6:37)।
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