नीतिवचन 23:5

धन-सम्पत्ति चंचल होती है, पलक झपकते वह हाथ से निकल जाती है; मानो उसको पंख उग आते हैं, और वह गरुड़ के समान तीव्र गति से आकाश की ओर उड़ जाती है।

साबुन के बुलबुले को इतनी टकटकी लगाकर क्यों देखें? वह पलक झपकते हो हवा में तैरकर गायब हो जाएगा। आप इतने मूर्ख तो नहीं हैं, नहीं न? यदि आप अमीर बनना चाहते हैं, या अमीर बनने की योजना भी बना रहें हैं, या अमीर बनने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहें हैं, तो आप मूर्खता में आकर साबुन के बुलबुले पर भरोसा कर रहे हैं!

सुलैमान सबसे पहले नीतिवचन 23:4 में अमीर बनने के पीछे भागनेवालों की मूर्खता की निंदा करता है, फिर वह इस बात का एक गंभीर और विवेकपूर्ण कारण बताता है कि आखिर क्यों हमें इस मूर्खतापूर्ण लक्ष्य का पीछा नहीं करना है। उसकी इस सुन्दर सीख पर सोचकर देखें और बुद्धिमान बनें। कोई व्यक्ति अपना जीवन उस चीज़ को पाने में क्यों बर्बाद करें जो केवल एक भ्रम है? मानव स्वभाव, अर्थशास्त्र के नियम और परमेश्वर का दण्ड शीघ्र ही और निश्चित रूप से आपसे सारा धन को छीन लेंगे।

इस नीतिवचन के ब्योरेवार विवरण पर विचार करें। इसकी आलंकारिक या रूपक-निहित भाषा और कहावती शब्दावली पर ध्यान दें। क्या इसकी भाषा ऐसा सुझाव देती है कि आप अपनी आंखों की पुतलियां निकालकर उन्हें फेंक दें? नहीं, क्या यह सिखाती है कि पैसे को पंख लगते हैं और वह तेजी से और शक्तिशाली ढंग से उड़कर वहाँ पहुँच जाता है जहाँ परमेश्वर का निवासस्थान है? नहीं, यह एक नीतिवचन है। सुलैमान द्वारा प्रयुक्त ईश्वर-प्रेरित भाषालंकार धन की व्यर्थता के बारे में बड़ी खूबसूरती से चेतावनी देते हैं।

यदि आप इस नीतिवचन का बारीकी से अध्ययन करते हैं तो आप को इसमें मनुष्य की आर्थिक स्वतंत्रता पाने की मूर्खतापूर्ण लालसा नजर आएगी। सुलैमान ने औरतों और शराब की लत के विषय सावधानी का इशारा दिया (नीतिवचन 6:25; 23:31), और इस नीतिवचन में वह धन की इच्छा या वासना के विषय सावधानी का इशारा दे रहा है। बहुत-से लोग तो ऐसे हैं जो अपने जीवन में कभी धन अर्जित नहीं कर पाते हैं। धन दिखाई तो देता है, उसकी अभिलाषा की जाती है, उसे पाने के लिए होड़ लग जाती है, उसे पाने की उम्मीद की जाती है और यहां तक कि उसे गिना भी जाता है; लेकिन जितनी तीव्र गति से यह दिखाई देता है, उतनी ही तीव्र गति से गायब भी हो जाता है। धन और रुपयों की इस चर्चा में जो एक ही बात अटल है, वह सुलैमान की यह सीख है – धन एक भ्रम है!

केवल अमीर बनने के लिए अपना पूरा जीवन कड़ी मेहनत में लगा देने से आपका जीवन सिर्फ़ बर्बाद हो जाता है, जैसा कि बाइबल के दृष्टांत में उस मूर्ख ने सीखा, जब उसने आवाज सुनी, समय की नहीं जिसे लोग पिता समझते हैं, बल्कि महान और भयानक परमेश्वर की, जिसने कहा, “हे मूर्ख! इसी रात तेरा प्राण तुझ से ले लिया जाएगा; तब जो कुछ तू ने इकट्ठा किया है वह किसका होगा?” (लूका 12:16-21). यीशु ने सिखाया, “घात करने के बाद जिसको नरक में डालने का अधिकार है, उसी से डरो; हाँ, मैं तुम से कहता हूँ, उसी से डरो” (लूका 12:4-5)।

आप धन को अपने साथ नहीं ले जा सकते (अय्यूब 1:21; 1 तीमु 6:7), और कई ऐसी बातें हैं जो आपसे आपका धन छीन ले जाएँगी, जो कि आपको सीखना अवश्य है। आप इस दुनिया में नंगे नग्न आए थे, और वैसे ही इस दुनिया से चले जाओगे। स्वर्ग के उस न्यायाधीश के सामने जो आपकी प्रतीक्षा कर रहा है, आपकी कोई सफलता या धन काम नहीं आएगा। केवल संतोष सहित भक्ति ही महान लाभ है, और इसके साथ एक महान प्रतिज्ञा जुड़ी है, अर्थात अनंतकाल का जीवन (1 तीमु 6:6; 4:8)!

केवल अमीर बनने के लिए ही जीने का विचार इतना हास्यास्पद है कि परमेश्वर ने इसे झूठ घोषित किया। उसने कहा कि नीच लोग तो सचमुच अस्थाई हैं, लेकिन उसने यह भी कहा कि बड़े लोग मिथ्या ही हैं, सफल पुरुष भ्रम हैं (भजन 62:9)। यदि दोनों को एक साथ तौला जाए तो वे वायु से भी हल्के हैं!

मृत्यु तो आपको पूरी तरह से नग्न और बेसहारा छोड़ ही देगी, परन्तु इसके अलावा यह भी गौर करें कि, धन-सम्पत्ति गरुड़ के समान तीव्र गति से कैसे उड़ जाती है और पलक झपकते ही गायब हो जाती है? नीतिवचन की पुस्तक और बाकी बाइबल में और भी ईश्वर-प्रेरित चेतावनियाँ हैं यदि आप उन पर विचार करेंगे तो। छियासठ पुस्तकों का दिव्य पुस्तकालय बुद्धि और ज्ञान का खज़ाना है।

तथाकथित उन्नत राष्ट्रों में संपत्ति कर भरना अनिवार्य होता है। जितना अधिक आप कमाते हैं, उतना अधिक आपको आयकर और संपत्ति कर भरना पड़ता है, और वह भी अधिक प्रतिशत के साथ। क्या सफल धनवान लोगों पर सरकार द्वारा इतना बोझ डालना और उन्हें लूटना चालाकी और कुनियत है? बिल्कुल! लेकिन इससे यह सच्चाई नहीं बदलती। सम्राट आपकी बढ़ी हुई आय का एक बड़ा हिस्सा चाहता है।

इन देशों में, टैक्स लेनेवाला एक और आदमी आता है। केवल कुछ ही लोग इस चोर को देख पाते हैं, हालाँकि उन्होंने उसके बारे में सुन रखा है। वह लुटेरा है मुद्रास्फीति (inflation)। मुद्रास्फीति या महंगाई किसी अर्थव्यवस्था में समय के साथ विभिन्न माल और सेवाओं की कीमतों (मूल्यों) में होने वाली एक सामान्य बढ़ौतरी को कहा जाता है। जब मांग और आपूर्ति में असंतुलन पैदा होता है तो वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ जाती हैं। कीमतों में इस वृद्धि को मुद्रास्फीति कहते हैं। मुद्रास्फीति जो केंद्रीय बैंक द्वारा देश की धन आपूर्ति में वृद्धि करना होता है, चुपचाप और कुशलता से अपने घाटे के खर्च को पूरा करने के लिए आपकी संपत्ति से एक और बड़ा हिस्सा लेती है।

आर्थिक कानूनों का क्या? उपभोग करने की प्रवृत्ति कहती है कि खर्च कम से कम उतनी ही तेजी से बढ़ता है जितनी तेजी से आय होती है (सभो 5:11)। आप अपने धन को दिखाना और उसका आनंद लेना चाहते हैं, इसलिए आप अमीरों की आदतों की नकल करने लग जाते हैं (नीतिवचन 21:17,20; 6:9-11; लूका 15:12-16)। लोग महंगाई को लेकर रोते हैं, लेकिन यह उनका उच्च जीवनशैली के कारण बढ़ता हुस खर्च है। जब आप अधिक कमाते हैं, तो आप अधिक खर्च करते हैं, इसलिए जो आपके पास पहले था उसे आपने छोड़ दिया है। आप इस खर्च की ज़िम्मेदारी लेने को “पैसा तो आएगा और जाएगा” कहकर टाल देते हैं, लेकिन यह कैसी मूर्खता और अपव्यय है!

मानव स्वभाव का क्या? धन अहंकार और अभिमान लाता है जो लोगों को मूर्खतापूर्ण और जल्दबाजी वाले व्यावसायिक निर्णयों और निवेशों में फँसा देता है जिसके चलते बड़ी हुई कमाई बर्बाद हो जाती है (नीतिवचन 10:15; 18:11; 26:12; 28:11,19)। थोड़ी सी सफलता खतरनाक होती है, क्योंकि यह अति-आत्मविश्वास को जन्म देती है, जो दर्दनाक पतन का कारण बन सकती है (नीतिवचन 16:18; 18:12)। सफलता को विवेक से लेना और खर्च में उतावली न करना कितना भला है!

यदि करों को भरने, मुद्रास्फीति की चालाकियों, आपके विलासितापूर्ण जीवन और फिजूलखर्ची के बाद कुछ भी बचता है, तो धनवान मनुष्य अपना पैसा निवेश बैंकरों को सौंप देता है, इस उम्मीद में कि उसने जो खोया है उसे वापस प्राप्त कर लेगा। लेकिन वे उसकी गिरती निधि को विभिन्न क्रूर बाज़ारों की अनिश्चितताओं में फंसा देते हैं और बार-बार व्यापार करके उसकी संपत्ति को तब तक जलाते और जलाते हैं जब तक कि वे लेनदेन शुल्क द्वारा उन्हें जब्त नहीं कर लेते!

उन बेटों और भतीजों को मत भूलों जो आपके जीवित रहते या मरने के बाद कानूनी या अवैध रूप से आपकी सब धन-संपत्ति और विरासत ले लेंगे, और अपनी मूर्खता में उसे कम से कम उतनी ही तेजी से तो बर्बाद कर ही देंगे जितनी तेजी से आपने इसे अपनी बुद्धि के उपयोग से हासिल किया है (सभो 2:18-21)। धनवानों, धन तो मूर्खता है, है न?

इसके आलावा इन लालचियों के ऐसे रिश्तेदार भी होते हैं जो खुशामदी करते हैं, और जो खुद को शुभचिंतक कहते हैं, लेकिन नकदी खत्म होने से ठीक एक दिन पहले वे नौ-दो-ग्यारह हो जाते हैं (नीतिवचन 14:20; 19:4-7)। जोंक और उसकी दो बेटियाँ के बारे में अगुर की टिप्पणियाँ देखें (नीतिवचन 30:15)। ओह, अकेले रहना भला है!

जब आप धन की व्यर्थता की इस संक्षिप्त समीक्षा के निष्कर्ष पर आते हैं, तो हमारे प्रभु यीशु मसीह की चेतावनी को न भूलें कि पृथ्वी पर जमाए किसी भी खज़ाने को, और यह शाब्दिक या आलंकारिक रूप से सभी सांसारिक निवेशों पर लागू होता है, निश्चित रूप से चोर, कीड़ें और काई भस्म कर देंगे (मत्ती 6: 19).

यह नीतिवचन धन की व्यर्थता के बारे में चेतावनी देता है, लेकिन धन आपकी आत्मा और जीवन के लिए भी खतरनाक है, क्योंकि धन आम तौर पर मनुष्य से उसकी संतुष्टि, भक्ति, दया और शांति जो सच्चे आनन्द और सच्ची सफलता की बुनियाद हैं, को चुरा लेता है (1 तीमु 6: 6-10; सभो 5:12).

जीवन में सबसे बड़ा धन और सुख यीशु मसीह का सुसमाचार और राज्य है, जो उन लोगों के लिए मुफ़्त है जो उस पर विश्वास करते हैं और उन महान और अनमोल प्रतिज्ञाओं को अपनाते हैं जो परमेश्वर ने अपनी वाचा में अपने बच्चों से की हैं (55:1-2; भजन 19: 10-11; 1 कुरिन्थ 2:9)। मनुष्य मरने के बाद अपना धन इस दुनिया में छोड़ देते हैं, लेकिन परमेश्वर के चुने हुए बच्चे यीशु मसीह के साथ एक नए विश्व को विरासत में प्राप्त करेंगे जब वह उनके लिए वापस आएगा (रोमियों 8:17-23; 1 पतरस 1:3-5)।

यह धन नहीं है जो अपने आप में पाप है; पाप है उसकी मूर्खतापूर्ण रीति से लालसा करना। परमेश्वर ने धन की नहीं, बल्कि धन के प्रति मानव-प्रेम की निंदा की (1 तीमु 6:9-10,17-19)। यदि परमेश्वर के आशीर्वाद से धन बढ़ता है, तो उसकी कचोट में मत फंसो (भजन 62:10)। इसके बजाए परमेश्वर को धन्यवाद दो, और उसका बुद्धिमानी से उपयोग करो (इफि 4:28)। मामूली प्रयासों से जो कुछ आपके पास है उसमें संतुष्ट रहना सीखें – संतुष्टि ही बड़ी सफलता है।

यदि इस नीतिवचन की सलाह और चेतावनी किसी निर्धन मनुष्य ने दी होती, तो आप पाठ की सत्यता और मूल्य पर सवाल उठा सकते थे, क्योंकि निर्धन गरीब आखिर अमीरी के बारे में जानते ही क्या हैं, है न? लेकिन इस नीतिवचन को उस मनुष्य ने लिखा जो इज़राइल के इतिहास में सबसे धनवान राजा, और एक धनवान बाप दाऊद का बेटा, सुलैमान था, और उसने इसे एकमात्र बुद्धिमान परमेश्वर की प्रेरणा से लिखा। धन-संपत्ति के बारे में मूर्खतापूर्ण रीति से सोचना बंद करें।

बुद्धिमान मनुष्य अगुर ने भी हमें चेतावनी दी जब उसने हमें परमेश्वर से यह प्रार्थना करना सिखाया कि मुझे न तो गरीबी दे, और न अमीरी (नीतिवचन 30:7-9)। दोनों घातक बातें हैं। इतिहास में अय्यूब, अब्राहम और दाऊद जैसे धर्मनिष्ठ धनवान मनुष्य हुए हैं, लेकिन बहुत से नहीं। यीशु मसीह ने सिखाया कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है (मत्ती 19:23-26)।

प्रिय पाठक, अपनी दृष्टि मसीह पर जिसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं (कुलिस्सियों 2:1-3), परमेश्वर की सारी भरपूरी की परिपूर्णता पर (इफि 3:16-19), उसके अनुग्रह के असीम धन पर (इफि 2:7), उसके वचन (भजन 19:10), और स्वर्ग में आपकी अनंत विरासत के धन पर (इफि 1:18) लगाएं। यीशु धनवान होकर भी अपने चुने हुए लोगों के लिए कंगाल बन गया, ताकि उसके कंगाल हो जाने से वे धनी हो जाए, जो उसके जीवन और मृत्यु के अकथनीय वरदान से प्राप्त होता है (2 कुरिन्थ 8:9; 9:15)।

मूसा के समान, बुद्धिमान और लाभदायक आदान-प्रदान करें, और प्रभु आपके विश्वास का उतना ही सम्मान करेगा – मिस्र के खज़ाने के ऊपर मसीह के धन को चुनें (इब्रानियों 11:24-26)। ऐसी आत्मिक संपदा कभी नहीं उड़ेगी, और यह सच्ची संपत्ति इस जीवन में और आनेवाले जीवन में शांति और आनंद देंगी, न कि आत्मा का घमंड और पछतावा जिसका अनुभव स्वयं सुलैमान ने किया, और यह सच्चा धन आने वाले उस समय के लिए एक अच्छी नींव देगा, जब आप सबके धर्मपरायण न्यायाधीश परमेश्वर के सामने खड़े होंगे।

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