नीतिवचन की व्याख्या

2. यदि तू पेटू है तो अपने गले पर छूरी लगा।

3. उसकी स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की लालसा न करना, क्योंकि वह धोखे का भोजन है।

5. धन-सम्पत्ति चंचल होती है, पलक झपकते वह हाथ से निकल जाती है; मानो उसको पंख उग आते हैं, और वह गरुड़ के समान तीव्र गति से आकाश की ओर उड़ जाती है।

6. जो डाह से देखता है, उसकी रोटी न खाना, और न उसकी स्वादिष्ट भोजनवस्तुओं की लालसा करना;

7. क्योंकि जैसा वह अपने मन में विचार करता है, वैसा वह आप है। वह तुझ से कहता तो है, खा पी, परन्तु उसका मन तुझ से लगा नहीं।

8. जो कौर तू ने खाया है उसे तू उगल देगा, और अपनी मीठी बातें गवांएगा। (केजेवी)

9. मूर्ख के कान में न बोलना, नहीं तो वह तेरे बुद्धि के वचनों को तुच्छ जानेगा।

10. पुरानी सीमाओं को न बढ़ाना, और न अनाथों के खेत में घुसना,

11. क्योंकि उनका छुड़ानेवाला सामर्थी है; उनका मुक़द्दमा तेरे संग वही लड़ेगा।

12. अपना हृदय शिक्षा की ओर, और अपने कान ज्ञान की बातों की ओर लगाना।

13. लड़के की ताड़ना न छोड़ना; क्योंकि यदि तू उसको छड़ी से मारे, तो वह न मरेगा।

14. तू उसको छड़ी से मारकर उसका प्राण अधोलोक से बचाएगा।

16. और जब तू सीधी बातें बोले, तब मेरा मन प्रसन्न होगा।

17. तेरा मन पापियों से डाह करने न पाए, परन्तु तू सारे दिन परमेश्वर से डरता रह।

18. क्योंकि अन्त में फल होगा, और तेरी आशा न टूटेगी।

19. हे मेरे पुत्र, तू सुनकर बुद्धिमान हो, और अपना मन सुमार्ग में सीधा चला।

22. अपने जन्मानेवाले पिता की सुनना, और जब तेरी माता बूढ़ी हो जाए, तब भी उसे तुच्छ न जानना।

23. सत्य को मोल लेना, बेचना नहीं; और बुद्धि और शिक्षा और समझ को भी मोल लेना।

24. धर्मी का पिता बहुत मगन होता है; और बुद्धिमान का जन्मानेवाला उसके कारण आनन्दित होता है।

25. तेरे कारण तेरे माता–पिता आनन्दित, और तेरी जननी मगन हो।

26. मेरे बेटे अपना मन मुझे दे और तेरी आँखे मेरे मार्गों का चिंतन करे। (केजेवी)

28. वह डाकू के समान घात लगाती है, और बहुत से मनुष्यों को विश्वासघाती कर देती है।

29. कौन कहता है हाय, कौन कहता है हाय हाय, कौन झगड़ों में पड़ता है, कौन बकबक करता है, किसके अकारण घाव होते हैं, किसकी आँखें लाल हो जाती हैं?

30. उनकी जो दाखमधु देर तक पीते हैं, और जो मसाला मिला हुआ दाखमधु ढूँढ़ने को जाते हैं।

32. क्योंकि अन्त में वह सर्प के समान डसता है, और करैत के समान काटता है।

35. तू कहेगा कि मैं ने मार तो खाई, परन्तु दु:खित न हुआ; मैं पिट तो गया, परन्तु मुझे कुछ सुधि न थी। मैं होश में कब आऊँ? मैं तो फिर मदिरा ढूँढ़ूँगा।

नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।

↑