नीतिवचन 23:32
क्योंकि अन्त में वह सर्प के समान डसता है, और करैत के समान काटता है।
क्या है जो साँप के समान डसता है और करैत के समान काटता या डंक मारता है? बहुत अधिक दाखमधु या अन्य प्रकार की कोई भी मदिरा का अति सेवन (नीतिवचन 23:30)! नशा उन लोगों को डसता और काटता है जो बहुत ज्यादा दाखमधु पीते हैं। नशे के परिणाम दुखद होते हैं, और कभी भी नशा न करना बुद्धि का नियम है।
यह छोटा नीतिवचन सुलैमान द्वारा नशे के खिलाफ दी जा रही चेतावनी के बिलकुल बीचोबीच है (नीतिवचन 23:29-35)। परमेश्वर ने दाखमधु इसलिए बनाया ताकि जो उदास मनवाला या दुखी है वह इसे सीमित मात्र में पीकर अपने मन को तसल्ली दे और प्रसन्नता का आनंद ले सके (नीतिवचन 31: 4-7; भजन 104: 14-15)। परन्तु जब इसे मूर्खतापूर्वक बेक़ाबू मात्रा में पी लिया जाता है, तो दाखमधु उन पीनेवालों को डसेगा और और कई तरह से ज़ख़्मी कर देगा।
जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं, उनके लिए यह जानना बहुत महत्वपूर्ण है कि सुलैमान ने दाखमधु या मदिरा के मध्यम सेवन की कभी भर्त्सना नहीं की (पढ़ें, नीतिवचन 3:10; 9:2,5; 31:4-7; सभो 9:7; 10: 19; श्रेष्ठगीत 1:2,4; 4:10; 5:1; 7:9; 8:2)। सुलैमान के साथ सहमत, पुराने नियम के पवित्रजन और खुद प्रभु यीशु मसीह दाखमधु पीया करते थें (उत्पत्ति 14:18; व्यवस्था 14:26; 2 शमू 6:19; लूका 7:33-34; यूहन्ना 2:1-11)।
समस्त बाइबल की कुल शिक्षा की पुष्टि करते हुए, सुलैमान ने नशे की भर्त्सना की, क्योंकि नशा करने का अर्थ है अत्यधिक दाखमधु या मदिरा पीना और आत्म-नियंत्रण खो देना, जिसका नतीजा लड़खड़ाती चाल और लड़खड़ाती जुबान है (नीतिवचन 20:1; 23:21; गला 5:21; इफि 5:18; 1 कुरिन्थ 6:10)। इस नीतिवचन का संदर्भ स्पष्ट रूप से दाखमधु के ऐसे दुरुपयोग से सम्बंधित है जिसके पीछे का असली मकसद नशा करना और मदमस्त होना होता है (नीतिवचन 23:29-35)। लेकिन दाखमधु का संयमित सेवन रोटी या तेल के संयमित सेवन जितना ही शुद्ध और लाभकारी है (भजन 104:14-15)। दाखमधु का दुरुपयोग करना एक ऐसा पाप है जिसे बाइबल में पियक्कड़पन कहा गया है, ठीक वैसे ही जैसे रोटी और तेल के दुरुपयोग को बाइबल में लोलुपता या पेटूपन कहा गया है।
वे लोग जो बाइबल को पढ़ते तो हैं, परन्तु किसी बात के मूल संदर्भ या कहावतों की भाषा को नहीं जानते उया नहीं समझते, सोचते हैं कि यह नीतिवचन दाखमधु और मदिरा के हर प्रमाण के सेवन की निंदा कर रहा है, या दाखमधु और मदिरा को बिलकुल भी नहीं पीने का समर्थन कर रहा है। उनका कहना है कि इस नीतिवचन में प्रयुक्त शब्दों “डसता” और “काटता” का इशारा शैंपेन के कार्बोनेटीकरण से होनेवाली झुनझुनी, सूखी वाइन के कड़वे स्वाद या सीधे व्हिस्की की जलन की ओर है। लेकिन वास्तव में यह नीतिवचन नशे के दुष्परिणामों की ओर संकेत कर रहा है, न कि मादक पेय के स्वाद की ओर।
“डसता” और “काटता” नशे के दुष्परिणाम हैं – “क्योंकि अन्त में,” जैसा कि नीतिवचन है। दाखमधु गिलास में तो बहुत अच्छा दिखाई देता है (नीतिवचन 23:31), लेकिन इसका दुरुपयोग अन्त में पीड़ा और विपत्ति को ले आ सकता है (नीतिवचन 23:29-35)। इस अर्थ में, जैसा की प्रयुक्त रूपकों से समझ में आता है, यह किसी जहरीले सांप के डसने या जहरीले करैत के डंक मारने जितना ही खतरनाक है। आपको न तो सर्प के साथ और न ही करैत के साथ खेलना चाहिए।
नशे के डसने और काटने पर विचार करें। आप नूह और लूत के समान, अनियोजित मूर्खता के कारण अपनी प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला देंगे (नीतिवचन 20:1; 23:33; 31:4-5; उत्पत्ति 9:20-22; 19:30-38; सभोपदेशक 10:1)। आप उड़ाऊ पुत्र के समान कंगाली और दरिद्रता में गिर जायेंगे (नीतिवचन 21:17; 23:21; लूका 15:13-14)। आपको तत्काल कोई गंभीर बीमारी हो जाएगी और अंत में लीवर ख़राब होकर मृत्यु आपको डंस लेगी (नीतिवचन 23:29,34-35; यशायाह 19:14)।
यह नीतिवचन मूड बदलने वाले किसी भी नशीले पदार्थ के दुरुपयोग पर लागू होता है। ख्रिश्चन विश्वासियों को उलाहना दी गई है कि वे उदासी और दुःख में नशे की मनोदशा में मस्त होने के बजाय पवित्र आत्मा की भरपूरी को चुनें (इफि 5:18-19)। पवित्र आत्मा में कोई दंश नहीं है: यीशु मसीह पर विश्वास करनेवालों में आनंद और शांति निवास करती है: वे अपने–अपने मन में प्रभु के सामने गाते और कीर्तन करते हैं (रोम 14:17; 15:13; इफि 5:19)।
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