नीतिवचन 23:26
मेरे बेटे अपना मन मुझे दे और तेरी आँखे मेरे मार्गों का चिंतन करे। (केजेवी)
महान पिताओं, खड़े हो जाओ। अपने बेटों को तुम्हारा दृढ़ विश्वास और साहस दिखा दो। उनकी सिद्धता को अपना सर्वोच्च लक्ष्य मानकर उनसे उनका हृदय मांगो। उन्हें अपना उदाहरण और शिक्षा का पालन करने के लिए कहो, और उन्हें वचन दो कि ऐसा करने से वे जीवित रहेंगे, और उन्हें परमेश्वर की शुद्ध बुद्धि और ज्ञान की शिक्षा दो।
आप एक ऐसी पीढ़ी में हैं जहां कोई ऐसा आधिकारयुक्त पौरुष्यवाला मनुष्य नहीं है जो इस ज़िम्मेदारी उठाने का साहस करें (अवश्य पढ़ें यशा 3:1-15)। पुरुष अपने महान कर्तव्यों और अवसरों से तथा अगली पीढ़ी के लिए परमेश्वर का भय मानने वाले मनुष्य तैयार करने प्रशिक्षण देने से भाग रहे हैं। कुछ तो अपने ही जीवनों में अति व्यस्त हैं, इतने स्वार्थी हैं कि दूसरों का खयाल नहीं कर सकते, इतने आलसी हैं कि दूसरों को प्रशिक्षण नहीं दे सकते, इतने दुर्बल कि अगुवाई नहीं कर सकते, इतने भ्रष्ट हैं कि उनका अनुसरण नहीं किया जा सकता, इतने डरपोक कि सामना नहीं कर सकते। दुर्बल और कायरों की एक पीढ़ी एक और दुर्बल और कायरों की पीढ़ी को जन्म देती है।
परंतु तुम जो मर्द हो, जो परमेश्वर का भय मानते हो और अपने जिगरों में एक धधकती पवित्र आग लेकर चलते हो, यहां तुम्हारे लिए सुअवसर है। परमेश्वर ने तुम्हें जो पुत्र दिए हैं उन पर अपना अधिकार लो। उनके मन उनसे मांगो, और अपने स्वयं के आदर्श और शिक्षा के द्वारा उन्हें एक स्पष्ट, धर्मी, और नेक राह दो, और उसी पर चलने को कहो। उनके पिता के रूप में आप के पद का यही मकसद है, और यह सबसे मूल्यवान काम है जिसे आप उनके लिए कर सकते हैं। बाइबल यह कहकर ऐसी शिक्षा के प्रभाव को महिमान्वित करती है कि यह चार पीढ़ियों के लिए लाभदायक होगी (भजन 78:1-8; योएल 1:1-3)।
परमेश्वर ने पिताओं के माध्यम से अपने सत्य और बुद्धि को जारी रखने का चुनाव किया है (उत्पत्ति 18:19; निर्ग 10:1-2; 13:8, 14; व्यवस्था 4:9; 6:1-22, 6-7, 20-25; 29:29; यहोशू 4:6-7; 24:15; भजन 34:11; 71:18; 145:4; इफि 6:4)। सुलैमान द्वारा लिखित नीतिवचन की पुस्तक प्राथमिक रूप से उसके बेटे को सम्बोधित शिक्षा और निर्देश है (नीति 1:8, 10, 15; 2:1; आदि), जो शिक्षा और निर्देश देने की एक ऐसी भूमिका है जिसे उसने अपने पिता दाऊद से सीखा और विरासत में पाया (नीति 4:3-4)। दीर्घायु का यह सर्वोत्तम कारण है (यशा 38:19)। इस भूमिका को यदि ठीक-ठीक रीति से पूरा किया जाए, तो सफलता मिलेगी ही, और फलप्राप्ति होगी (नीति 22:6, 15; 29:15, 17)।
जो जो पिता परमेश्वर के सामने खराई से चलता है, और जो नियमित रूप से उसकी बुद्धि को व्यवहारिक रूप से काम में लाता है, केवल उसे ही ये शब्द कहने का अधिकार है, क्योंकि परमेश्वर देखता है कि आप एक ऐसा जीवन जीते हैं या नहीं जिस पर ध्यान देना चाहिए और आपके पास ऐसे वचन हैं या नहीं जिन पर अमल किया जाना चाहिए (इब्रा. 4:12-14)। सुलैमान ने इस पुस्तक में अपने पुत्र को बाईस बार “मेरे बेटे” कहकर सम्बोधित किया; हालांकि एक अवसर पर मां अपने बेटे को सम्बोधित कर रही है (नीति 31:2)। वह बड़े साहस से अपने बेटे से मांग करता है कि वह उसके खरे उपदेश का सम्मान करे, बिल्कुल वैसे ही जैसा उसके पिता दाऊद ने उससे की थी (नीति 4:1-4; 5:1; भजन 34:11)।
आपकी सब इच्छाएं और उद्देश्य आपके हृदय से निकलते हैं। वही विचारों और योजनाओं का मूल है, और यह मात्र बाहरी आज्ञापालन से अधिक बढ़कर महत्वपूर्ण है। बुद्धिमान पिता अपने बच्चों के मनों को चाहते हैं। उन्हें बुरे प्रभावों के स्थान पर शुद्ध प्रभाव देकर जीता जाता है; और परम-सुख, आनंद की प्रतिज्ञा दी जाती है, वास्तविक प्रेम को प्रमाणित किया जाता है, स्पष्ट ग़लतियों को मान लिया जाता है, उनके लिए प्रार्थना की जाती है, नियमित जीवन जिया जाता है, अपने सृष्टिकर्ता को ऊंचा उठाया जाता है, और जीवन में आनेवाली दुविधाओं में परमेश्वर से उत्तर की खोज की जाती है।
मसीही पिताओं, यह संसार तुम्हारे बच्चों को तुम से छीनना चाहता है। वह धन, सम्मान, सुख, सुविधा, और लोकप्रियता का वादा करता है। फेसबुक, व्हाट्स-एप, इंटरनेट, वेब सीरीज़ के इस दौर में वह लगातार उन्हें आवाज़ देता है। आपके बच्चें चारों तरफ से प्रलोभन से ललचाए जा रहे हैं। शैतान उनसे कहता है, “यदि तू मुझे दण्डवत् प्रणाम करे तो यह सब तेरा हो जाएगा” (लूका 4:7)। वे उसकी पुकार और प्रलोभन को रोज-रोज, बार-बार, ऊंचे स्वर में, और लालचपूर्ण लहजे में सुनते हैं।
फिर भी इन जवानों में से ज्यादातर ने उनके पिता की उस दर्दभरी पुकार को नहीं सुना है जिसमें वह उनका मन मांग रहा है। और यदि उन्होंने थोड़ी-बहुत पुकार सुन भी ली हो, तो वह अक्सर कमज़ोर होती है और उस पर उनके पिता के मूर्खतापूर्ण और नाखुश जीवन के दाग लगे होते हैं। आज कई बच्चें जब अपने पिता को एक “अच्छा पिता” कहते हैं तो यह प्रशंसा उसकी शैक्षणिक पदवी और खेलकूद के दायरे से बाहर नहीं होती है।
मसीही पिताओं, क्या आपके बच्चें जानते, समझते और विश्वास करते हैं कि आप उनसे सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं? इतना कि कोई और कर ही नहीं सकता? क्या वे जानते हैं कि आप उन्हें जीवन के मार्ग पर चलना, और मृत्यु के पथ से हट जाने की शिक्षा दे रहे हैं? आपको अपने होठों के शब्द और व्यवहारिक कर्म के बीच समानता को दिखाकर उन्हें इन बातों की प्रतीति देनी होगी, और आपको देनी ही चाहिए।
हमारी आंखें मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व को पढ़नेवाला अंगवाचक हैं, क्योंकि आप अपनी आंखों से देखकर ही किसी अगुवे को देखते और उसके पीछे चलते हैं। आपके पुत्र आपके घर में रहते हैं। आप जो जो करते हैं, वे सब देखते हैं, वे यह भी देखते हैं कि आपको क्या करना चाहिए; वे वह सब भी देखते हैं जो आप नहीं करते हैं। धर्मी पिताओं को चाहिए कि वे जो सत्य अपने बच्चों को सिखा रहे हैं, उसे वे पवित्र और अनुरूप उदाहरण के द्वारा स्वयं अपने जीवन से दिखाएं। एक बेटा अपने पिता के शब्दों से बढ़कर उसके द्वारा दिखाए गए और स्थापित किए गए आदर्शों पर चलेगा।
परमेश्वर की सामर्थ्य और बाइबल में दी गई बुद्धि के द्वारा हर एक मनुष्य महान हो सकता है। प्रत्येक मनुष्य ने एलिहू के उदाहरण का पालन करके महान बनना चाहिए (अय्यूब 32:1–37:24)। उसने कनिष्ठों को सिखाने के बजाय, बड़े साहस से चार उच्च प्राचीनों में सुधार किया और उन्हें सिखाया। एकमात्र कमी अगर कोई है तो वह है आपके अपने जीवन में एक धर्मपरायण, और गम्भीर भूमिका को पूरा करने की दृढ़ इच्छा —अपने पुत्रों के मन की रखवाली करना।
मसीही पिताओं, क्या तुम इस नीतिवचन के सन्दर्भ में निहित बुद्धि को जानते हो (नीति 23:15-35)? क्या आपने अपने बेटे को इस संसार की लालसा करने और आनेवाले न्याय को भुला देने के खतरे के विषय में चेतावनी दी है (नीति 23:17-18)? क्या आपने उसे पेटूपन और पियक्कड़पन के विरोध में स्पष्ट चेतावनी दी है (नीति 23:20-21, 29-35)? क्या आपने उसे पराई स्त्री और उसके छल-कपट के विषय में चेतावनी दी है (नीति 23:27-28)? क्या आपने उस से अनुरोध किया कि वह अपनी माता और अपने पिता की बुद्धि की शिक्षा पर विश्वास करें और उस पर विचार करें (नीति 23:15-16, 19, 22-25)?
धर्मी मनुष्य को महान पिता बनने के लिए वादा निभानेवाले (प्रॉमिस कीपर्स), या करोड़पति मनुष्य के रूप में प्रगति करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें पवित्र आत्मा से प्रतीति और परमेश्वर के वचन के सामने थरथरानेवाली दीनता की आवश्यकता है। उन्हें सिद्धता में बढ़ने के लिए उनकी स्थानीय कलीसिया और पास्टर पर्याप्त हैं (2 तिमु 3:16-17)। उन्हें महान बनने के लिए झूठी शिक्षा के सर्वसमावेशी मलकुण्ड की ज़रूरत नहीं है। उन्हें पश्चाताप करने तथा उन सरल कर्तव्यों को पूरा करने की ज़रूरत है जिन के विषय में पवित्रशास्त्र में स्पष्ट रूप से और बार-बार दोहराकर बताया गया है। उन्हें आज ही आरम्भ करने की ज़रूरत है।
उन्हें आदर्श व्यक्ति के रूप में किसी ढोंगी फिल्म अभिनेता या क्रिकेटर की ज़रूरत है। परमेश्वर का भय माननेवाला मनुष्य बाइबल में दी गई बुद्धि के द्वारा एक महान पिता बनने का अपना कर्तव्य पूरा कर सकता है। न तो अब्राहम को और न ही यहोशू को अपने पालकपन के कर्तव्यों को पूरा करने का प्रोत्साहन पाने के लिए अधर्मियों से भरे स्टेडियम की ज़रूरत नहीं थी – वे परमेश्वर का इतना भय मानते थे कि वे अपना कर्तव्य केवल उसकी आज्ञा तथा पारिवारिक समृद्धि की उसकी प्रतिज्ञा के बलबूते पर पूरा करते थे (नीति 29:17; उत्पत्ति 18:19; यहोशू 24:15)।
यीशु मसीह, जो सनातनकाल का पिता है (यशा 9:6), आपसे आपका शुद्ध मन मांगता है (इब्रा 10:22)। वह आपके मनों के प्रत्येक विचार और भावनाओं को देख सकता है (इब्रा 4:12), और वह हमें एक दूसरे को समझाने के लिए कहता है, ताकि हम यह सुनिश्चित कर लें कि किसी भी जीवन का नाश न हो (इब्रा 3:12-13)। यदि आप अपनी पूरी शक्ति से उसका अनुसरण करते हैं तो वह आपके बच्चों के खातिर और उनकी भलाई के लिए आपके सब परिश्रम को आशीष देगा।
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