नीतिवचन 23:22
अपने जन्मानेवाले पिता की सुनना, और जब तेरी माता बूढ़ी हो जाए, तब भी उसे तुच्छ न जानना।
अपने माता-पिता का आदर करें। आपका लम्बा जीवन इसी पर निर्भर है। आयु बढ़ने के साथ माता-पिता दुर्बल होते जाएँगे, फिर भी अवश्य है कि आप उनका आदर करें। परमेश्वर ने माता-पिता की व्यवस्था ठहराई है, और आपके माता-पिता को भी उसी ने स्वयं चुनकर आपको दिया है। जो माता-पिता का आदर करते हैं, उन्हें वह उदारतापूर्वक प्रतिफल देगा (इफिसियों 6:2-3), परन्तु जो विद्रोह करते हैं, उनका वह नाश कर देगा (नीतिवचन 20:20; 30:17)।
परमेश्वर ने यह ठहराया कि बच्चे जब इस दुनिया में आएँ, तो वे असहाय अवस्था में आएँ, और वे वैसे ही आते हैं। उसने यह भी ठहराया कि वे माता-पिता की स्नेहमयी देखभाल, शिक्षा और शासन के अधीन सफल परिपक्वता तक पहुँचें। परन्तु परिवार की यह बुद्धि और ज्ञान से पूर्ण व्यवस्था इस बात पर भी निर्भर करती है कि बच्चें अपने माता-पिता का आदर करे।
परमेश्वर ने पिता और माता के पदों की व्यवस्था बनाई, परन्तु, यहाँ बात ख़त्म नहीं होती, बल्कि उसने उन्हीं व्यक्तियों को भी चुना है, जो इस वक्त इस संसार आपके पिता और माता हैं। जब महान परमेश्वर ने आपको अस्तित्व में लाया, तब उसने न आपसे पूछा कि आपको कैसे और कौन-से माँ-बाप चाहिए, और न आपके माता-पिता से पूछा कि उन्हें कैसे और कौन-से बच्चे चाहिए। उसने सब परिस्थितियों और इस आपसी सम्बंधित व्यवस्था के सम्भावित परिणामों के अपने सिद्ध ज्ञान के आधार पर आप तीनों का यह मिलन स्वयं ठहराया और पूरा किया। इसलिए परमेश्वर द्वारा चुने गए अपने माता-पिता के सामने नम्र बने। उनकी आज्ञा माने। उनका आदर करें। उनसे प्रेम रखें।
परमेश्वर की व्यवस्था और प्रकृति का विधान, दोनों यही सिखाते हैं कि पिता का आदर किया जाए (निर्गमन 20:12; लैव्यव्यवस्था 19:3; मलाकी 1:6; इफिसियों 6:1-3; इब्रानियों 12:9)। यहोवा ने अपराधियों के लिए मृत्यु तक का दण्ड ठहराया, यहाँ तक कि उनके लिए भी, जो पिता के विषय में तुच्छता से बोलते थे या मुखमुद्रा से अनादर प्रकट करते थे (व्यवस्थाविवरण 27:16; नीतिवचन 30:17)। जीवन का सामना करने योग्य उचित वृद्धि और परिपक्वता, समाज की सुव्यवस्था और घरों की शान्ति, सब पिता के आदर पर निर्भर करती हैं। जब इस मूल मानदण्ड से समझौता होने लगता है, तब समय भयावह हो उठता है (यशायाह 3:5; 2 तीमुथियुस 3:1-2)।
20-30 वर्षों तक पिता के साथ प्रतिदिन का जीवन आपको उनके दोषों और दुर्बलताओं से परिचित करा देता है, और यह परिचय कई बार अनादर को जन्म दे सकता है। परन्तु स्वर्ग के परमेश्वर की आपके लिए यह चेतावनी है, जिस मनुष्य के द्वारा तुम अस्तित्व में आए, उसे मैंने चुना है, और मैं तुमसे अपेक्षा करता हूँ कि तुम उसकी सुनो और उसकी आज्ञा मानो, जैसे तुम आज्ञा मेरी मानते। घनिष्ठ परिचय के कारण उसके आदर को धुंधला मत पड़ने दो, क्योंकि मैंने उसे तुम्हारे जीवन के लिए ईश्वरतुल्य अधिकारी ठहराया है। यदि तुम उसका तिरस्कार करते हो, तो मेरा तिरस्कार करते हो। और ऐसे उपहासपूर्ण विद्रोह को मैं स्वीकार नहीं करूँगा।
जिस बात में आपको सबसे अधिक सन्तोष रखना चाहिए, वह आपके पिता हैं। परमेश्वर ने उन्हें चुना है। उनकी योग्यता, शिक्षा, धन, बुद्धि, रूप, स्वभाव, अवसर, सफलताएँ और असफलताएँ, इन सबको परमेश्वर ने अपनी महिमा और आपकी सिद्धि के लिए चुना है। कोई दूसरा कोई पिता आपके लिए इतना उपयुक्त सिद्ध न होता। स्वर्ग की सनातन सम्मति ने आप दोनों को आपस में जोड़ा है, और आपकी ओर से कोई भी असन्तोष या अनादर, कृपालु और सर्वसत्ताधारी परमेश्वर की योजना के विरुद्ध राजद्रोह है।
अपने पिता की सुनें। उनकी बात पर ध्यान दें, और उनकी सम्मति को मानें। वे जीवन के विषय में आपसे कहीं अधिक जानते हैं, इतना अधिक कि यदि वह सब आपको समझाया भी जाए, तो भी आप उसे पूरी तरह ग्रहण नहीं कर सकेंगे। वे आपको आपसे अधिक जानते हैं। वे आपकी और आपके भविष्य की चिन्ता आपसे अधिक करते हैं। वस्तुओं को देखने की आपकी अल्पदर्शी दृष्टि मूर्खतापूर्ण और व्यर्थ है। आपके प्रति उनका स्नेह, आपकी सफलता के लिए उनकी अभिलाषा, उनका उत्तरदायित्व-बोध, और उनका अनुभव तथा ज्ञान, ये सब मिलकर उनकी सम्मति को आकार देते हैं। इसलिए जीवन की बहुत-सी पीड़ा और परमेश्वर के न्याय से अपने आपको बचाए, अपने पिता की सुनें।
इसहाक अपने पिता के अधीन रहा, यहाँ तक कि उसने अपने आपको बलिदान के रूप में वेदी पर बंधे जाने दिया (उत्पत्ति 22:9)। याकूब ने अपने पिता की आज्ञा मानकर दूर देश की यात्रा की और अपने ही कुल-सम्बन्धियों में से पत्नी प्राप्त की (उत्पत्ति 28:1-5)। यूसुफ ने अपने पिता का आदर किया और अपने बच्चों के लिए उसका आशीर्वाद चाहा (उत्पत्ति 48:8-14)। इस्राएल का शासक मूसा भी अपने मिद्यानी ससुर का आदर करता था (निर्गमन 18:7-12)। और रेकाबियों ने भी अपने एक दूरवर्ती पूर्वज की आज्ञा सावधानी से मानी, यद्यपि वह उनसे 300 वर्ष पहले होकर गया था (यिर्मयाह 35:6-10)।
आयु के साथ साथ आपके पिता अपनी शक्ति और बुद्धि खोने लगेंगे, परन्तु वे तब भी वही व्यक्ति हैं जिन्हें परमेश्वर ने आपका जन्मदाता ठहराया है। उनकी क्षीण होती हुई सामर्थ्य आपके लिए उनका अनादर करने का कोई आधार नहीं है। सम्भव है, अब उनमें अपने शासन को लागू कराने की पूर्ववत् शक्ति न रही हो, परन्तु इस समय तक तो आपको पहले से कहीं अधिक उनके अधिकार और आप पर उनके हक़ का बोध होना चाहिए। उनकी वृद्धावस्था में उनका आदर बाल-सदृश्य भय, आदत या विवशता के कारण नहीं, बल्कि सिद्धान्त और कृतज्ञता के कारण कीजिए।
अन्धे और कठोर मूर्ख लोग अपने पिताओं की आज्ञा का उल्लंघन करते हैं, और इस पाप की तुलना सदोम के विकृत अधःपतन से की गई है (रोमियों 1:30)। ऐसी सन्तान माता-पिता के लिए भयंकर विपत्ति सिद्ध होती है (नीतिवचन 17:25; 19:26)। अन्तिम दिनों के वे संकटपूर्ण समय आ पहुँचे हैं, जब मसीही कहलाने वाले लोग भी बच्चों को अपने माता-पिता की अवज्ञा और अनादर करने देते हैं (2 तीमुथियुस 3:1-2)। जीवन और धर्म के विषय में उनका यह तुच्छ दृष्टिकोण, जो सिद्धान्त के स्थान पर गढ़ी हुई कथाओं को चुनता है, अन्ततः उन्हें नष्ट कर देगा (2 तीमुथियुस 4:3-4)।
आपकी माता से आपका परिचय उसके जीवन के उत्कर्षकाल में हुआ था। वह आकर्षक थी, ऊर्जवान थी, और बुद्धिमती थी। आपको गर्भ में धारण करने और आपका पालन-पोषण करने के कारण ही उन गुणों की चमक धुंधली हो गयी। आपके जन्म से पहले नौ महीनों तक, और जन्म के बाद भी नौ महीने या उससे अधिक समय तक, उसके शरीर ने आपकी वृद्धि के लिए हर आवश्यक पोषण दिया। जन्म से पहले एक जीवन-रेखा आपको उससे बाँधे हुए थी, और जन्म लेने के बाद भी आप उसी के लिए रोते थे, मानो आपको अब भी उसी जीवन-रेखा की आवश्यकता और लालसा हो।
उसने आपसे प्रेम किया, और आपके लिए इतना किया जितना दस पत्नियाँ मिलकर भी न कर पातीं, और न ही करना चाहतीं। उसने धैर्यपूर्वक आपको दुलारा, लाड़-प्यार किया, सराहा, और आप पर वैसा स्नेह उँडेला जैसा कोई पत्नी नहीं उँडेलती। आपके अस्तित्व के लिए भोजन, वस्त्र, बिछौना और असंख्य दूसरी सुविधाएँ जुटाने में वह आपकी अथक सेविका बनी रही, यद्यपि वर्षों तक आपने उसे एक साधारण “धन्यवाद” तक नहीं दिया। आपके तथाकथित प्रेम-प्रसंगों का बोझ भी उसने सहा, जबकि वे सब मिलकर और कई गुना बढ़कर भी आपके लिए उतना कभी न कर पातीं।
परमेश्वर की दृष्टि में वह अपने यौवनकाल में भी निर्बल पात्र थी (1 पतरस 3:7)। परन्तु जैसे-जैसे वह वृद्ध होती जाएगी, आपकी देखभाल करते-करते और फिर आपकी चिन्ता करते-करते, उसकी शक्ति और उसकी सूझ-बूझ और अधिक क्षीण होती जाएगी। जिन बातों पर वह कभी हँसती थी, उन्हीं से वह डरने लगेगी। वह नाम भूलने लगेगी, स्थान भूलने लगेगी, और साधारण काम कैसे किए जाते हैं, यह भी भूलने लगेगी। उसने अपने आपको आपकी देखभाल में खर्च कर दिया, और अब उसके पास बहुत थोड़ा शेष रह गया है। तब आप क्या करेंगे? उसकी दुर्बल दशा में उसे अनदेखा करेंगे, या उसे और अधिक मान, आदर देंगे और देखभाल करेंगे?
यदि आप उसकी वृद्धावस्था में किसी भी रीति से उसे दुःख पहुँचाते हैं, तो स्वर्ग का परमेश्वर इस वर्तमान समय में और आने वाले जगत में भी उसका बदला चुकाएगा (नीतिवचन 20:20; 30:17; प्रकाशितवाक्य 21:8)। यदि आप उसकी वृद्धावस्था में उसकी पूरी देखभाल नहीं करते, तो आपने यीशु मसीह के धर्म का इन्कार किया है, और आप एक अन्यजाति अविश्वासी से भी बदतर हैं, चाहे आप किसी भी कलीसिया में जाते हों, या बाइबल का कोई भी अनुवाद पढ़ते हों (1 तीमुथियुस 5:4,8)।
रूत ने अपनी सास नाओमी की वृद्धावस्था में उसकी आज्ञा मानी और बड़ी नम्रता से उसकी सेवा की (रूत 2:17-23)। सुलैमान, जो राजकीय अधिकार और महिमा में अनुपम था, उसने अपनी माता को अपने दाहिने हाथ बैठाकर उसका सम्मान किया और उसकी विनती को अस्वीकार न करने का आश्वासन दिया (1 राजा 2:19-20)। और प्रभु यीशु मसीह ने भी, यद्यपि वह क्रूस की यातनाओं और अपने लोगों के मेल-मिलाप के महान भार से दबे हुए थे, अपनी माता की कोमल देखभाल का दायित्व यूहन्ना को सौंपा (यूहन्ना 19:26-27)।
यदि आप सन्तान हैं, तो अपका कर्तव्य क्या है, यह आपने अभी-अभी पढ़ा है। इसे अपना बड़ा आनन्द बनाए कि आप अपने पिता की सम्मति पर सावधानी से ध्यान दें, चाहे वह आपके सामने उपस्थित हों या अपनी कब्र के पार जा चुके हों। अपनी वृद्ध होती माता का आदर करने के लिए आपको आज ही क्या करना चाहिए? उस पर शीघ्र ध्यान दीजिए। यदि आपके माता-पिता दूर हैं, तो आप उन्हें फोन कर सकते हैं, सन्देश भेज सकते हैं, ईमेल कर सकते हैं, पत्र भेज सकते हैं, या उनसे मिलने जा सकते हैं। यदि वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, तो अपने सास-ससुर के विषय में क्या? यदि आपने अपने माता-पिता का आदर किया है, तो आपके दादा-दादी या नाना-नानी के लिए क्या करना शेष है?
यदि आप माता-पिता हैं, और आपकी सन्तान आपको इस प्रकार का बहुत थोड़ा आदर या देखभाल देती है, या आपकी ओर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देती, तो स्वर्ग के परमेश्वर के सामने अपने आपको नम्र कीजिए, और अपनी पापमय छूट, लापरवाह परवरिश, भूमिकाओं के उलट जाने, बोझिल आलोचना, या उस शिथिल वातावरण को स्वीकार कीजिए, जिसके कारण प्रिय माता-पिता का आदरणीय स्थान आपके हाथ से निकल गया (नीतिवचन 22:6; 31:28)। यदि आप नम्रता से मन फिराएँ, तो स्वर्ग का दयालु परमेश्वर आपको खोए हुए वर्षों की भरपाई में सहायता करने में समर्थ है (योएल 2:12-27)।
यदि आप मसीही हैं, तो आपके पास अपने सांसारिक पिता से कहीं महान एक और पिता है, स्वयं सर्वशक्तिमान परमेश्वर। उसने आपके लिए इतना किया है, जितना सब सांसारिक पिता मिलकर भी नहीं कर सकते। जितना आदर और जितनी आज्ञाकारिता आप अपने भीतर से जुटा सकते हैं, उन सबके लिए आप उसी के ऋणी हैं। जब-जब आपको सहायता की आवश्यकता होती है या आप सहायता चाहते हैं, आप उसी को पुकारते हैं, और उसने एक बार भी आपको निराश नहीं किया है।
उसके विषय में पतरस के ये गम्भीर और सत्य वचन आपके लिए हैं, “और जब कि तुम ‘हे पिता’ कहकर उससे प्रार्थना करते हो, जो बिना पक्षपात हर एक के काम के अनुसार न्याय करता है, तो अपने परदेशी होने का समय भय से बिताओ।” (1 पतरस 1:17)। इसलिए आपको अपने सांसारिक पिता और माता से भी कहीं अधिक, परमेश्वर अपने पिता की बात भयपूर्वक सुननी है, और कभी उसका तिरस्कार नहीं करना है।
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