नीतिवचन 23:16

और जब तू सीधी बातें बोले, तब मेरा मन प्रसन्न होगा।

जब पुत्र कुलीन और बुद्धिमान निकलते हैं, तो पिताओं को बहुत आनंद होता है, और यह कुलीनता और बुद्धिमानी शांतचित्त और सीधी बातें बोलने के द्वारा प्रकट होती हैं, जो एक शुद्ध और धर्मी हृदय का संकेत देता है। सुलैमान ने अपने पुत्र को यह बताकर बुद्धि का उपदेश दिया कि वह उसके सदाचारी जीवन से कितना प्रसन्न होगा (नीतिवचन 23:15-16)। बेटों को यह समझना आवश्यक है कि उनका अपने जीवन में विवेकपूर्ण और सदाचारी होना उनके पिता के लिए कितना महत्वपूर्ण है। अपने पिता का आदर करने के द्वारा, ऐसे पुत्र परमेश्वर की आशीषों को भी प्राप्त करेंगे (इफिसियों 6:1-3)।

इस नीतिवचन का आरंभिक शब्द, “हाँ,” इसे पिछले नीतिवचन के शब्दों से जोड़ता है। एकमत और स्पष्टीकरण का यह शब्द इन दोनों पदों को एक साथ जोड़ता है। नीतिवचन 23:15 में सुलैमान ने लिखा, “हे मेरे पुत्र, यदि तेरा मन बुद्धिमान हो, तो मेरा, वरन मेरा ही मन आनन्दित होगा।” सुलैमान ने अपने बेटे से कहा कि उसके बेटे का मन बुद्धिमान और बोलने में सीधा हो यह उसके लिए कितना मायने रखता है (नीतिवचन 23:15-16)।

इस नीतिवचन में “मन” का अर्थ एक व्यक्ति की आंतरिक इच्छाओं और स्नेहों को दर्शाता है, जो “हृदय” के उपयोग के समान ही है। जब मन और हृदय ये दोनों शब्द एकसाथ प्रयुक्त किए जाते हैं, तो वे मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व के लिए एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति बन जाते हैं।

अंग्रेजी भाषा के किंग जेम्स बाइबल में इस नीतिवचन की तुलना इससे पहले वाले नीतिवचन से करें। सुलैमान ने पहले कहा कि उसका मन आनन्दित होगा, जिसे हम उसके प्रेम का स्थान समझते हैं (नीतिवचन 23:15)। फिर नीतिवचन 23:16 उसने कहा कि उसका अन्तर्याम (KJV Bible) आनन्दित होगा, जिसे हम उसी प्रकार समझ सकते हैं, क्योंकि यह शब्द आन्तरिक विचारों और भावनाओं का वर्णन करता है (नीतिवचन 23:16)। एक बुद्धिमान पुत्र मन और ह्रदय में आंतरिक आनंद देता है।

पवित्रशास्त्र शब्द “मन” का उपयोग आंतरिक स्नेह और इच्छाओं के लिए करता है; (अय्यूब 16:13; 19:27; भजन 7:9; 16:7; 26:2; 73:21; 139:13; यशायाह 11:5; यिर्मया 11:20; 12:2; 17:10; 20:12; विलाप 3:13; प्रकाशितवाक्य 2:23)।

पुत्र अपने पिता के मन – उसकी आत्मा, हृदय, इच्छाओं और स्नेह – को आनन्दित करने के लिए क्या कर सकता है? वह सीधी बातें बोल सकता है। मूर्खता नवयुवकों के मन में बन्धी हुई होती है, और वह अक्सर उनके होठों से निकल आती है। जब एक बेटा सावधानीपूर्वक, विवेकपूर्ण और बुद्धिमानी से बोलता है, तो एक पिता अंदर से जोश से भर जाता है, क्योंकि वह जान लेता है कि उसका बेटा अपने मन और जीभ पर क़ाबू रख पा रहा है।

मुँह की बातें व्यक्ति के चरित्र का एक बड़ा संकेतक है। मूर्ख अपनी अनियंत्रित या मूर्खतापूर्ण बातों से शीघ्र ही अपने चरित्र का भेद खोल देते हैं (नीतिवचन 15:2,28; 18:6-7; सभोपदेशक 10:12-14)। बुद्धिमान पुत्र अपनी वाणी में अनुग्रहकारी होते हैं (नीतिवचन 22:11; सभोपदेशक 10:12; कुल 4:6)। वे अपनी जीभ पर नियंत्रण रखते हैं, जो बड़े संयम और विवेक को दर्शाता है (याकूब 3:2-12)। वे प्रेम में होकर सत्य बोलते हैं (इफिसियों 4:15)।

एक पिता को कैसे पता चलेगा कि उसका एक महान पुत्र है? वह उसके मुँह से बुद्धिमान और धर्मी वचन, अनुग्रहपूर्ण और उपयुक्त वचन, और विश्वासयोग्य और सच्ची गवाही की ओर कान लगाता है। वह उसके मुँह से विवेकपूर्ण उत्तर को सुनना चाहता है, और जब वह उसके मुँह से ऐसी बातों को सुनता है तो अपने पुत्र को चूमना चाहता है (नीतिवचन 24:26; 25:11)। पिता जानता है कि अच्छी वाणी एक अच्छे ह्रदय को प्रकट करती है (मत्ती 12:35)। वह समझ जाता है कि उसका बेटा भविष्य में अच्छा ही करेगा।

पुत्र अपने पिताओं के सुख या दुःख का कारण बनते हैं। बुद्धिमान पुत्र एक बड़ी आशीष है और अपने पिता को आनन्दित करता है, परन्तु एक मूर्ख पुत्र विपत्ति है और अपने पिता को बहुत पीड़ा देता है (नीतिवचन 10:1; 15:20; 17:21,25; 19:23; 23:24-25; 29:3). परमेश्वर ने पिताओं को नियुक्त किया है, और वह पुत्रों को पुरस्कार देता है या दंड, यह इस बात पर निर्भर करता है कि वे उनके पिता को कितना आनन्द देते हैं या कितना दुःख देते हैं (इफिसियों 6:1-3)। मूर्ख पुत्र अपने पिता को शोकित करते हैं और अपने लिए परमेश्वर का केवल दण्ड ही कमाते हैं; बुद्धिमान पुत्र अपने पिता को रोमांचित करते हैं और परमेश्वर की आशीष अर्जित करते हैं।

नासरत का यीशु सिद्ध पुत्र था। वह यूसुफ और अपनी माता के अधीन रहा, और बुद्धि में बढ़ता गया, और परमेश्वर और मनुष्य दोनों को प्रसन्न करता था (लूका 2:51-52)। उसके माता-पिता क्या ही आनन्दित थें! वह हमेशा सीधी बातें बोलता था, क्योंकि मित्र और शत्रु दोनों ही उसके वचनों को सुनकर अचंभित होते थे, जिन्हें वह संयम और बुद्धिमानी से बोलता था (मत्ती 22:22; 27:14; यूहन्ना 7:15,46)। उसने हमेशा स्वर्ग में रहनेवाले अपने पिता को प्रसन्न किया, जिसने उसे विश्व के सिंहासन पर बिठाकर पुरस्कृत किया (यूहन्ना 8:29; फिलिप्पियों 2:5-11; इब्रानियों 1:8-9)।

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