नीतिवचन 21:3
धर्म और न्याय करना, यहोवा को बलिदान से अधिक अच्छा लगता है।
सबसे अद्भुत नीतिवचनों में से एक यहाँ दिया गया है। परमेश्वर को महिमा मिले! यह वचन मसीही नैतिकता का एक धार्मिक नियम सिखाता है जो जीवन के मार्गदर्शन में आपकी सहायता करता है। बुद्धि की इस प्राथमिकता को सीखने के लिए समय निकालें, और इसकी धार्मिकता के लिए स्वयं को विनम्र करें, ताकि आप परमेश्वर को प्रसन्न कर सकें और दुविधाओं में उसकी महान शांति महसूस कर सकें।
क्या आप बुद्धि की लालसा रखते हैं? इस नीतिवचन को सीखें, और कभी न भूलें। यह सीख कई अन्य विषयों से अधिक कठिन है और इसके लिए स्पष्टीकरण, चित्रण, और अनुप्रयोगों की आवश्यकता होती है, परंतु इसके द्वारा आपके पास उन परिस्थितियों के लिए सरल उत्तर होंगे जो अन्य लोगों को असंभव रूप से कठिन लगते हैं। आप अपनी आत्मा और दूसरों की आत्माओं के प्रति दया और स्वतंत्रता प्राप्त करेंगे। हे धन्य परमेश्वर, बुद्धि के लिए आपका धन्यवाद।
फरीसी इस सिद्धांत को समझ न सके, इसलिए यीशु ने कई बार इसका उपयोग उनका मुंह बंद करने के लिए किया (मत्ती 9:13; 12:7)। हालाँकि यहूदियों ने इसे पढ़ा था, याद किया था, इसके वचनों तक को गिन रखा था, इसे अपने माथे पर बाँधा लिया था, और प्राचीन पत्रों पर इसकी स्याही के निशानों को चूमा हुआ था (मत्ती 23:5; यूहन्ना 5:39; रोमियों 2:17), फिर भी वे परमेश्वर के हृदय से निकले इस नियम के सार को समझने में असफल रहे।
“धर्म और न्याय” का अर्थ वह करना है जो नैतिक रूप से उचित है। परमेश्वर के लिए, इसका अर्थ एक शुद्ध हृदय के साथ उसके वचनों का पालन करना है (1 शमूएल 15:22-23; भजन संहिता 51:16-17)। मनुष्यों के लिए, इसका अर्थ निष्पक्ष, सही, और दयालु होना है, जैसा कि परमेश्वर ने निर्धारित किया है (निर्गमन 18:21-22; व्यवस्थाविवरण 1:16-17; 16:18-19; 2 शमूएल 8:15; 15:4; भजन संहिता 82:1-4; सभोपदेशक 5:8; यशायाह 59:4,14; यिर्मयाह 22:15-16; यहेजकेल 45:9; यूहन्ना 7:24)। इसका अर्थ उन दो महान आज्ञाओं का पालन करना है, जो किसी भी बलिदान या बाहरी आराधना से अधिक मूल्यवान है (मरकुस 12:33)।
“बलिदान” का अर्थ है परमेश्वर के उपदेशों, आदेशों, और धर्म की बाहरी सेवकाई का पालन करना, जो प्राकृतिक रूप से विधि के अनुसार, औपचारिक, अनुष्ठानिक या बाहरी होते हैं। इसका अर्थ उन नियमों की या व्यक्तिगत दया की भावना या अभिप्राय की उपेक्षा या उल्लंघन करते हुए, परमेश्वर की आज्ञाओं या आराधना के वचनों का पालन करना भी है। भले ही स्वयं यहोवा ने ही इनका और इनके विवरणों का आदेश दिया हो, परंतु उन्हें मानने और उन्हें लागू करने का एक उचित या गलत समय और तरीका होता है।
एक सिद्ध व्यक्ति यह दोनों करता है, परंतु उसे पता होता है कि हृदय का नैतिक धर्म किसी भी सार्वजनिक आराधना के औपचारिक धर्म से अधिक महत्वपूर्ण है (मत्ती 23:23; 1 शमूएल 15:22-23; मीका 6:6-8)। कोई भी व्यक्ति परमेश्वर के लिए उतना प्यासा नहीं था जितना कि दाऊद, परंतु उसने भी एक शानदार मंदिर के लिए धन एकत्र किया। अपने पिता के समान, सुलैमान भी परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए आंतरिक बुद्धि की लालसा रखता था, परंतु उसने भी सार्वजनिक आराधना में हर राजा को पीछे छोड़ दिया। एक सिद्ध व्यक्ति दोनों कार्य करता है।
यशायाह ने इस्राएल को सदोम और अमोरा के समान दोषी ठहराए किया क्योंकि उन्होंने परमेश्वर के अनुष्ठानिक धर्म का पालन तो किया, परंतु व्यक्तिगत व्यवहार में दया और कृपा को त्याग दिया (यशायाह 1:10-20)। यशायाह ने एक और बार परमेश्वर की औपचारिक रूप से सेवकाई करने और धार्मिकता के बाहरी दिखावे के लिए इस्राएल की निंदा की, जिसमें वे व्यक्तिगत रूप से अपने आस-पास के लोगों, यहाँ तक कि अपने परिवार के लोगों के अधिकारों और उनकी आवश्यकताओं की उपेक्षा करते थे (यशायाह 58:1-10)। अनुष्ठानिक धर्म और सच्ची धार्मिकता के बीच के अंतर को समझें और उसे अपनाएँ।
यशायाह ने आगे बताया है कि परमेश्वर इतना महान है कि उसे आपके सार्वजनिक चढ़ावे की कोई आवश्यकता नहीं है, और यह कि आपके हृदय या व्यक्तिगत जीवन का हर एक पाप आपकी बाहरी आराधना को भ्रष्ट कर देता है, भले ही वह कितना भी उचित हो (यशायाह 66:1-4)। बुद्धि कहती है: आपकी आंतरिक और व्यक्तिगत धार्मिकता, आपकी बाहरी और सार्वजनिक आराधना को पवित्र और अलंकृत करती है, परंतु बाहरी और सार्वजनिक आराधना कभी भी एक पापी हृदय या जीवन को ढाँप नहीं सकती और न ही कभी ढाँपेगी (नीतिवचन 15:8; 28:9; हाग्गै 2:10-14)।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि ये आज्ञाएँ परमेश्वर द्वारा दी गई हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप उनके हर विवरण का पूर्ण रूप से पालन कर रहे हैं। परमेश्वर औपचारिक शुद्धता से अधिक मनुष्यों के साथ निष्पक्ष, उचित, और दयालु व्यवहार रखने को महत्व देता है। वह अपनी धार्मिक सेवकाई के विवरणों पर भी ध्यान देता है, परंतु मनुष्यों की वैध आवश्यकताओं से अधिक नहीं। यह अंतर कितना अलौकिक है; क्या आप इसे समझ पा रहे हैं? हर पड़ाव में, सच्चा प्रेम सदैव उचित आराधना पर विजयी होता है।
सच्चा न्याय परमेश्वर की व्यवस्था के वचनों का पालन करने से अधिक, निष्पक्षता और दया को महत्व देता है। सच्चा धर्म परमेश्वर की विधियों या मनुष्य की कुशलता के लिए बनाए गए उसके नियमों से अधिक, मनुष्य की कुशलता को महत्व देता है। उदाहरण के लिए, पवित्र धर्म और न्याय यह जानते हैं कि असत्य कब स्वीकार्य होता है, भले ही परमेश्वर असत्य की कठोरता से निंदा करत हो (निर्गमन 1:15-21; न्यायियों 4:18-21; 1 शमूएल 16:1-2; 21:1-2,10-15; 2 शमूएल 15:31-37; 17:15-22; 1 राजाओंओं 3:16-28; 2 राजाओं 10:18-21; आदि, इत्यादि)।
उदाहरण के लिए, मूसा की व्यवस्था में सब्त के दिन विश्राम करना आवश्यक था। जो लोग बुद्धिहीन हैं और जो “बलिदान” के चढ़ावे को बढ़ावा देते हैं, वे स्वयं लोगों को हानि पहुंचाकर आज्ञाकारिता की बात करते हैं, भले ही सब्त का उद्देश्य मनुष्यों को विश्राम देने और उनकी सहायता करने के लिए था (निर्गमन 23:12)। इस तरह की भ्रष्ट और छली धार्मिकता के साथ जीना सदैव “धर्म और न्याय” की राह पर चलने से अधिक सरल होता है, क्योंकि इसके लिए एक ईमानदार और शुद्ध हृदय, दयालु व्यवहार, और उचित रूप से अंतर करने की ज्ञानपूर्ण बुद्धि की आवश्यकता होती है।
यहाँ आपके लिए बहुमूल्य बुद्धि और प्रेरित सीख दी गई है: परमेश्वर को अधिक प्रसन्नता उसके अनुष्ठानिक अध्यादेशों का पूर्ण रूप से पालन किए जाने से नहीं, बल्कि हृदय से उससे प्रेम करने, और वह करने से मिलती है जो दूसरों के लिए और स्वयं के लिए उचित, भला और दयालु होता है। दूसरों के प्रति सच्चा प्रेम और सेवा सहित एक शुद्ध हृदय का होना, औपचारिक आराधना के विवरणों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण होता है। इस अवधारणा का तिरस्कार करें कि विश्वास के साथ चर्च जाने से आपकी आत्मा उद्धार पाएगी, भले ही आप अपना जीवन कैसे भी व्यतीत करें। ज्ञान की इस बात को समझें कि किसी परिस्थिति को उचित तरीके से संभालने के लिए विस्तृत रूप से विशिष्ट आज्ञाओं तक को तोड़ा जा सकता है।
यह नियम औपचारिक आराधना का तिरस्कार नहीं करता है, क्योंकि सुलैमान स्वयं अनमोल बलिदान का एक महान उदाहरण था (1 राजाओं 3:4; 8:64-66; 2 इतिहास 7:5)। सच्चाई से आराधना करने वाले यह दोनों कार्य करते हैं (मत्ती 23:23)। परंतु जब आपको किसी व्यक्ति की दया के साथ सहायता करने और आराधना करने के कठोर कर्तव्य के बीच एक का चुनाव करना पड़े, तो दया और करुणा को अधिक महत्व दें। आपको अनुष्ठान या वचन को दया और आत्मा से अधिक महत्व नहीं देना चाहिए। आप प्रकल्पना या अनुमान के आधार पर न्याय नहीं कर सकते हैं, बल्कि केवल तभी कर सकते हैं जब आप औपचारिक आज्ञाओं और किसी व्यक्ति की सहायता करने के बीच एक विरोधाभास या दुविधा में पड़े हों।
पुराने नियम में इस नियम के लिए सिर्फ़ यही नीतिवचन नहीं दिया गया है। यह अन्य स्थानों पर भी वर्णित है (मीका 6:6-8)। होशे 6:6 मे यीशु मसीह द्वारा उद्धृत नीतिवचन कहता है,
क्योंकि मैं बलिदान से नहीं, स्थिर प्रेम ही से प्रसन्न होता हूँ, और होमबलियों से अधिक यह चाहता हूँ कि लोग परमेश्वर का ज्ञान रखें।
बाइबल इस नियम का वर्णन उदाहरणों के साथ करती है। यीशु ने यहूदियों को फटकारा क्योंकि उन्होंने सब्त के दिन खतेना करने को मनुष्य को चंगा करने से अधिक महत्व दिया (यूहन्ना 7:21-24; 5:1-16)। किसी व्यक्ति को चंगा करना सच्चा “धर्म और न्याय” होता है, भले ही उससे सब्त के महत्वपूर्ण नियम का उल्लंघन हो। सब्त के दिन को मनाने के लिए किसी व्यक्ति को एक दिन के लिए भी असहाय छोड़ना एक विकृत “बलिदान” था। ऐसे निर्दयी शैतानों ने सब्त के दिन किसी व्यक्ति का खतना तो कर दिया, परंतु सब्त के दिन यीशु को एक व्यक्ति को चंगा करने से रोकने लगे, जो 38 वर्षों से बिस्तर पर दुर्बल पड़ा था ।
यदि आपको लगता है कि ऐसे दुष्ट और घृणित लोग अब नहीं होते, तो आप गलत हैं। वे आज भी अस्तित्व में हैं। उनका दिमाग छोटा और हृदय उससे भी छोटा हृदय होता है। आप किसी आत्म-धर्मी, अहंकारी, फरीसी से बेहतर किसी भयंकार जानवर के समक्ष आना अधिक पसंद करेंगे। उनके कुरूप हृदय तब प्रकट होते हैं जब पश्चाताप करने वाले पापियों के लिए जश्न मनाया जाता है या व्यवस्था के विरुद्ध खड़े किसी व्यक्ति के लिए दया मांगी जाती है। आपको इस बात से आनंदित होना चाहिए कि प्रभु ने ऐसे लोगों को तुच्छ जाना, उनका उपहास किया, उनकी उपेक्षा की, और उन्हें पराजित किया था।
जब दाऊद भूखा था, तो उसने तम्बू से वह पवित्र रोटी खा ली जो केवल याजकों के लिए थी (1 शमूएल 21:1-6)। यहाँ तक कि लेवी जाती के लोग भी उस पवित्र रोटी को नहीं खा सकते थे। दाऊद ने परमेश्वर की स्पष्ट आज्ञा का उल्लंघन किया (निर्गमन 29:32; लैव्यव्यवस्था 24:9)। और यीशु ने उसे ऐसा करने के लिए पूर्ण रूप से निर्दोष ठहराया (मत्ती 12:3-4)। जिस व्यक्ति को परमेश्वर ने अपने मन के अनुसार ठहराया था, उसने ऐसा कार्य क्यों किया? दाऊद को याजकों की पवित्र रोटी खाने का आत्मविश्वास कहाँ से मिला? किसने उसे यह करने की स्वतंत्रता दी?
वह जानता था कि परमेश्वर ने कैन और उसकी आराधना का तिरस्कार कर दिया था क्योंकि वह उचित ढंग से नहीं किए थे (उत्पत्ति 4:3-5), और वह जानता था कि परमेश्वर ने नादाब और अबीहू (लैव्यव्यवस्था 10:1-2), मूसा (गिनती 20:7-13), और शाऊल (1 शमूएल 13:8-14) को अपनी आज्ञाओं में बदलाव लाने के लिए गंभीरता से दंडित किया था। दाऊद को कैसे पता था कि परमेश्वर मामूली भूख के कारण उसके द्वारा अपनी व्यवस्था के तोड़े जाने को स्वीकार कर लेगा, जबकि वह किसी और तरीके से भी भोजन प्राप्त कर सकता था? इस नीतिवचन के धर्म, न्याय, और दया के द्वारा! आमीन!
क्या दाऊद की बुद्धि आपको उत्साहित करती है? इस बात में कोई आश्चर्य नहीं कि वह परमेश्वर के मन के अनुसार था: वह उसी समान सोचता था जैसा कि परमेश्वर सोचते हैं। वह जानता था कि दया, पवित्र रोटी से अधिक महत्वपूर्ण है। वहीं दूसरी ओर राजा शाऊल ने दुष्टता से सोचा कि अमालेकियों की लूट का बलिदान उन्हें पूरी तरह से नष्ट करने के परमेश्वर के आदेश की उपेक्षा करने को उचित ठहराएगा (1 शमूएल 15:1-29)। जब ये फरिसी लोग बहुत उत्साह से परमेश्वर की आराधना करने की बात करते है, तो बहुत पवित्र दिखाई देते हैं, परंतु यही लोग उन धार्मिक सिद्धांतों की उपेक्षा करते हैं जिन्हें परमेश्वर अधिक महत्वपूर्ण मानता है। प्रिय पाठक, दाऊद के समान बनें, शाऊल के समान नहीं!!
जब प्रेरितों ने सब्त के दिन बालें तोड़कर खाया, तो फरीसियों ने उन्हें व्यवस्था तोड़ने के लिए दोषी ठहराया (मत्ती 12:1-2)। परंतु यीशु ने इन धार्मिक व्यवस्थावादियों को दाऊद की उस घटना के बारे में और सब्त के दिन याजकों के काम के बारे में याद दिलाया (मत्ती 12:3-5)। फिर उसने प्रेरितों का बचाव करने के लिए इससे संबंधित दया के सिद्धांत को बुद्धिमानी से अनुप्रयोग किया, और फरीसियों को अपने ही पवित्र शास्त्र के प्रति अनभिज्ञ होने के लिए फटकारा (मत्ती 12:3,5,7)। क्या आप यीशु की समान हैं या फिर फरीसियों के?
फरीसियों ने अपने वृद्ध माता-पिता की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए अपने विश्वास के वायदे के अनुरूप मंदिर में सुविधाजनक रूप से संपत्ति का दान दिया (मत्ती 15:3-6; मरकुस 7:9-13)। उन्होंने अपने माता-पिता के प्रति “धर्म और न्याय” का अनुप्रयोग करने से अधिक महत्व मंदिर के रख-रखाव के लिए भविष्य में चढ़ाने वाले “बलिदान” को दिया। यह नीतिवचन प्रेम और दया की कमी को छिपाने के लिए आज्ञाओं का उपयोग करने की निंदा करता है। यीशु ने धर्म और न्याय को बढ़ावा दिया, भले ही उसका अर्थ बाहरी आराधना को लेकर परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़ना था।
उदाहरण के लिए, यीशु ने सब्त के दिन एक महिला को चंगा किया, जो 18 वर्ष से दुर्बलता की दुष्ट आत्मा से ग्रसित थी। आराधनालय के प्रधान ने लोगों के समक्ष उसे फटकारा और कहा कि चंगा करने का कार्य सप्ताह के अन्य दिनों में ही होना चाहिए। इस दुष्ट व्यक्ति को परमेश्वर की व्यवस्था के वचनों का बचाव करते हुए सुनें। क्या हमें इस कठोरता के लिए उसकी सराहना करनी चाहिए? बिल्कुल नहीं! प्रभु के सुसमाचार के लेखे में यह एकमात्र ऐसी घटना नहीं है; ऐसी कई और घटनाएँ हैं।
यीशु ने उसे एक पाखंडी कहा, क्योंकि वह वास्तव में पाखंडी था; और उसने सभी उपस्थित लोगों से यह कहा कि सब्त के दिन हर फरीसी अपने बैल को पानी पिलाने में सहायता करता है, और फिर उसने उस स्त्री के लिए सब्त के दिन की व्यवस्था को तोड़े जाने को उचित ठहराया (लूका 13:10-17)। इसका परिणाम क्या हुआ? उसके शत्रु शर्मिंदा हो गए, और लोग उसकी दया और कृपा के कार्यों पर आनन्दित हुए। धार्मिक न्याय के इस बुद्धिमानी भरे अनुप्रयोग ने उसे सामान्य रूप से क्या दिया? केवल उनकी प्राणघाती घृणा!
फरीसी यह दिखावा करते हैं कि उन्हें परमेश्वर के वचन से प्रेम है, परंतु वे केवल उन काले और सफेद नियमों से प्रेम करते हैं जो उनके लिए सुविधाजनक होते हैं। वे बुद्धि के सिद्धांत का तिरस्कार करते हैं। (काले और सफेद नियमों का पालन करना कोई बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य नहीं है, क्योंकि यह अनुपालन केवल एक दिखावा है)। बुद्धि का अर्थ परमेश्वर के सिद्धांतों को उचित रूप से लागू करना, भले ही उससे नियमों की अवहेलना हो; और परमेश्वर की आज्ञाओं में उसकी प्राथमिकताओं को समझना होता है। फरीसी बहुत से चीज़ों में धर्मी भी होते हैं, जैसा कि सुलैमान ने कहा था (सभोपदेशक 7:16)। पर यीशु ने उन्हें दया जैसी अधिक महत्वपूर्ण चींज़ों को छोड़ देने, और पुदीने, सौंफ और ज़ीरे का सावधानीपूर्वक दसवाँ अंश देने के लिए उनकी निंदा की (मत्ती 23:23)।
कोढ़ से चंगाई पाकर जब नामान सीरिया वापस लौटा, तो उसके कर्तव्यों में से एक राजा को मूर्तिपूजन के लिए ले जाना भी था। परंपरा के अनुसार उसे राजा के साथ उसके स्वामी रिम्मोन की मूर्ति के समक्ष दंडवत करना था। तो एलीशा ने यहोवा के इस धर्मी विश्वासी को क्या सलाह दी, जिसे अपने कर्तव्य में मूर्तिपूजन भी शामिल था (2 राजाओं 5:18-19)? शांति से जाओ! इसके विषय में चिंता मत करो! ऐसी दयालु बुद्धि से सब फरीसी नीले पड़ जाते और दम घुटने से मर ही जाते, क्योंकि उन्होंने कभी इस नीतिवचन के सार को समझा ही नहीं।
तलाक और पुनर्विवाह अक्सर एक पास्टर के समक्ष आने वाले सबसे कठिन मुद्दों में से एक होते हैं। यदि पवित्रशास्त्र तलाक और पुनर्विवाह के लिए केवल व्यभिचार और परित्याग को आधार के रूप में उचित मानता है (मत्ती 5:32; 19:9; कुरिन्थियों 17:12-16,27-28), तो इस नीतिवचन को अभ्यास में लाने के लिए यह उनके लिए एक अच्छा अवसर हो सकता है। तब इनका आधार व्यभिचार या परित्याग नहीं होगा, परंतु जो होगा उसकी प्रवृति या प्रभाव उन्हीं के समान या उनसे भी बुराय होगा, जहां तलाक को इस नियम द्वारा और नए नियम में इसके समकक्ष द्वारा उचित ठहराया जाएगा (मत्ती 12:7)। एक बुद्धिमान पास्टर ऐसे सिद्धांतों को बहुमूल्य जानेगा। क्या कोई है जो दाऊद के समान हर्ष के साथ इसका अनुप्रयोग करे?
अधिकांश रूढ़िवादी पास्टर इस नियम का उपयोग करने से डरेंगे, क्योंकि उन्हें व्यवस्था के वचनों के प्रति अडिग रहने और आत्मा की उपेक्षा करने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। वे इस नीतिवचन को या नए नियम में इसके समकक्षों को नहीं समझ पाते। उन्हें फरीसियों की परंपरा को मानना ही होगा, अन्यथा उन्हें दया से घृणा करने वाले लोगों द्वारा अनैतिक माना जाएगा। हम प्रार्थना करते हैं कि परमेश्वर फरीसीवाद के बंधन का तिरस्कार करने और यीशु मसीह की स्वतंत्रता को बढ़ावा देने वाले लोगों को खड़ा करे, परंतु प्रकल्पना या सुविधा के लिए परमेश्वर की व्यवस्था से समझौता किए बिना। हे प्रभु, दाऊद के समान अनेक पास्टरों को खड़ा करें।
यदि आप विश्वास में कमज़ोर हैं और आपको और साहस की आवश्यकता है, तो यह जान लें कि प्रभु दया के ऐसे अनुप्रयोगों को और अधिक समर्थन देता है, उसने तो सब्त के दिन बालें तोड़ने के लिए अपने प्रेरितों का बचाव यह कहकर किया कि, “सब्त मनुष्य के लिए बनाया गया है, न कि मनुष्य सब्त के लिए” (मरकुस 2:23-28)। इससे उसका क्या अभिप्राय था? उसका अभिप्राय यह था कि सब्त का एक उद्देश्य और आशय होता है जो स्वयं उसकी आज्ञा से बढ़कर है। यदि आप सब्त के उद्देश्य और आशय को बनाए रख सकते हैं, वह भी सब्त की व्यवस्था के सख्त वचन को तोड़े बिना, तो आपको ऐसा करने के लिए धर्मी ठहराया जाएगा और प्रोत्साहित किया जाएगा।
आप सरलता से यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि विवाह मनुष्य के लिए बनाया गया था, न कि मनुष्य विवाह के लिए। यदि विवाह का प्रयोजन ही पूरी तरह से नष्ट हो चुका है, तो विवाह को बलपूर्वक बनाए रखने की क्या आवश्यकता है? ऐसा करने का एकमात्र कारण “धर्म और न्याय” के ऊपर “बलिदान” को बढ़ावा देना है, जो कि नीतिवचन का उल्लंघन करता है और वास्तव में फरीसी मानसिकता को दर्शाता है। उद्देश्य का यह नियम आपकी बुद्धि के लिए है; यही नीतिवचन का उद्देश्य है; यही नीतिवचन 21:3 का उद्देश्य है।
बुद्धि आज्ञा के आशय को समझती है ताकि उसके मूल भाव को बनाए रखा जा सके और साथ ही उसके वचनों को तोड़ा जा सके। फिर भी, यह स्वतंत्रता केवल उन लोगों के लिए है जो अपनी पूरी सामर्थ से विवाह को बनाए रखने का प्रयास करते हैं, क्योंकि मनुष्य को उन चीज़ों को इतनी सरलता से नहीं तोड़ना चाहिए जिसे स्वयं परमेश्वर ने जोड़ा है। क्या यहाँ एक विरोधाभास को बढ़ावा दिया जा रहा है? क्या यह विरोधी पदों का समर्थन करने के द्वारा पाखंडी होना कहलाता है? नहीं, यह सत्य के वचनों को उचित रूप से लागू करना और परमेश्वर की बुद्धि और संतुलन को पाना है। आमीन!
यह दाऊद और यीशु का उच्च ज्ञान है, परंतु यदि आप परमेश्वर के वचन पर भरोसा करेंगे तो यह आपको भी दिया जाएगा, जैसा कि यह नीतिवचन कहता है। यीशु उन लोगों की निंदा करते थे जो परिस्थितियों का आंकलन उनके तथ्यों और प्रभावों के बजाय उनके स्वरूप के आधार पर करते थे (यूहन्ना 7:24)। वह जानता था कि परिस्थितियों को देखने का एक भिन्न तरीका भी है, और वह तरीका सभी पहलुओं का सही मूल्यांकन करना है, अर्थात धर्म और न्याय kके द्वारा। क्या आप किसी परिस्थिति का आंकलन सरलता से और उसके सतही रूप के आधार पर करते हैं, या आप उस परिस्थिति का सही ढंग से मूल्यांकन करने के द्वारा गहनता से उसका सही आंकलन करते हैं ताकि उचित रूप से एक बुद्धिमत्तापूर्ण निष्कर्ष पर पहुँच सके?
कई परिस्थितियों में बुद्धिमत्तापूर्ण और धार्मिक न्याय की बहुत आवश्यकता होती है। कभी-कभी परमेश्वर की व्यवस्था और उपदेशों के बीच विरोधाभास, या स्पष्ट टकराव देखने को मिलता है। यहोशापात ने उन न्यायियों को नियुक्त किया जो धर्म और न्याय से एक धार्मिक समाधान निकालने के लिए विवादों के स्वरूप से परे देखकर न्याय करने में सक्षम थे। उनके कर्तव्यों को लेकर उसके निर्देश बहुत ही शिक्षाप्रद हैं (2 इतिहास 19:8-11)।
एक और उदाहरण पर विचार करें। यदि किसी व्यक्ति का व्यवसाय, स्वास्थ्य, या अवकाश की योजना उसे चर्च की सभाओं से दूर रखती है, तो आप इस नीतिवचन के अनुसार दया की प्राथमिकता को अपना लेते हैं, भले ही आप दूसरों की तुलना में चर्च में उपस्थित को अधिक महत्व देते हों (इब्रानियों 10:23-25)। आप उसे कम मसीही होने के लिए दोषी नहीं ठहराते; आप उसे एक दयालु बुद्धिमान व्यक्ति होने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। और आप इस सिद्धांत को स्वयं पर लागू करने से पीछे नहीं हटते और न ही उस पर कोई आपत्ति जताते हैं (नीतिवचन 11:17)।
इस नीतिवचन का प्रयोग मूर्खतापूर्ण तरीके से परमेश्वर की आज्ञाओं की उपेक्षा करने या उन्हें तोड़ने के लिए नहीं किया जा सकता। आपको पता होना चाहिए कि उस व्यक्ति के साथ क्या हुआ था जिसने सब्त के दिन हिंसा का चुनाव किया था (गिनती 15:30-36) ,और दाऊद के साथ क्या हुआ था जब उसने वाचा के सन्दूक को कहीं और पहुंचाना चाहा था (2 शमूएल 6:1-11)। जब आज्ञाओं के बीच टकराव हो या दया की आवश्यकता हो, केवल तब ही इस नीतिवचन की बुद्धि के सिद्धांतों पर पुन:विचार करने की आवश्यकता पड़ती है।
आपको परमेश्वर के सभी उपदेशों को उचित मानना चाहिए (भजन संहिता 119:128), और आपको यह पता होना चाहिए कि यीशु ने उन लोगों के बारे में क्या कहा है जो छोटी से छोटी आज्ञाएँ तोड़ते हैं (मत्ती 5:19)। परंतु आप मुश्किल या दर्दनाक परिस्थितियों में प्रेम और दया दर्शाने के लिए औपचारिक अध्यादेशों की उपेक्षा करने में भयप्रद या डरपोक नहीं हो सकते। यहोवा की दया सदा की है!
यीशु ने ऐसी दया सिखाई जो इस्राएल में पहले कभी नहीं देखी गई थी। उसने बुराई का बदला न लेने (मत्ती 5:38-42), शत्रुओं से प्रेम करने (मत्ती 5:43-48), पश्चाताप करने वाले पापियों के लिए आनन्दित होने (लूका 15:1-32), और दया दिखाने वालों को अत्यधिक आशीष देने (लूका 6:37-38) की सीख दी है। यह नियम यहाँ नीतिवचन के रूप में दिया गया था। क्या आप परमेश्वर के उपहार का लाभ उठाएँगे और सुलैमान की कलम के माध्यम से स्वर्ग के परमेश्वर से यह अनमोल बुद्धि प्राप्त करेंगे? क्या आप परमेश्वर के संतुलन और प्राथमिकता को प्राप्त कर सकेंगे और धर्म, दया, और विनम्रता को सर्वोच्च स्थान दे सकेंगे (मीका 6:6-8)?
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