नीतिवचन 21:23
जो मनुष्य अपने मुह में लगाम देता है, और जीभ को वश में रखता है, वह अपने प्राण को विपत्तियों से बचाता है।
यहाँ बहुमूल्य बुद्धि और ज्ञान है! अगर आप बोलने में संयम रखेंगे तो आप कई विपत्तियों से बच जाएंगे। आपके दो सबसे बड़े दुश्मन आपका मुंह और जीभ ही हैं। यदि आप उन्हें वश में रखेंगे और सही समय पर सही शब्द ही बोलेंगे तो आपका जीवन धन्य हो जाएगा। यह बेक़ाबू वाणी ही है जो मनुष्यों को हर प्रकार की विपत्ति में डाल देती है। यहाँ अच्छे जीवन के लिए बुद्धि और ज्ञान है।
गंदी बातें कहकर, मूर्खतापूर्ण बातें बोलकर और किसी से मज़ाक करके आप विपत्ति में पड़ सकते हैं। ऐसी बातों को बोलने से आप अपनी ही प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा सकते हैं, दूसरों की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं और समय बर्बाद कर सकते हैं। परमेश्वर ऐसे वाणी से घृणा करता है, पर फिर भी, इस वर्तमान पीढ़ी में इस तरह की बातें बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हैं। वह इन्हीं पापों के लिए इस संसार का न्याय करने के लिए जल्द ही आ रहा है (नीतिवचन 14:9; 26:18-19; सभो 7:6; इफि 4:29; 5:3-7)।
आप दूसरों के बारे में बुरी बातें कहने से विपत्ति में पड़ सकते हैं। लोग जान लेंगे कि आप एक दुष्ट व्यक्ति हैं, और आप के कारण बैर और झगड़ा उत्पन्न होगा। धन्य परमेश्वर को चुगली करने, बदनामी करने, पीठ पीछे बुराई करने और कानाफूसी से नफरत है, जो कि आज के समय में ये सब बातें बड़ी आसानी से की जाती हैं। ये बातें हत्या के समान हैं, क्योंकि ऐसा करने में वे दूसरे की प्रतिष्ठा को मिट्टी में मिला देते हैं (नीतिवचन 10:18; 11:13; 16:28; 18:8; 20:19; 25:23; 26:20-22)।
आप शिकायत करके से भी विपत्ति में पड़ सकते हैं। आखिर किसी शिकायतकर्ता को भला कौन पसंद करता है? यहोवा भी शिकायत से बैर रखता है, और वह इसके लिए कठोर दंड देता है (गिनती 11:1; भजन 106:24-27)। शिकायतकर्ताओं को दण्ड देने के लिए यीशु मसीह जल्द ही स्वर्गदूतों के साथ आ रहा है (यहूदा 1:14-16)। परमेश्वर की इच्छा यह है कि आप अपने मुँह और जीभ का उपयोग उसकी प्रशंसा करने और उसे धन्यवाद देने के लिए करें (फिल 2:14; कुल 3:17; 1 थिस्स 5:18)। यह पीढ़ी अहसान-फरामोश है, इसलिये परमेश्वर ने इस संसार को अँधा करके उसे समलैंगिकता जैसे घिनौने पापों के अधीन कर दिया है (रोमियों 1:20-27; 2 तीमु 3:2)।
आप ज़रूरत से वादें करने से भी विपत्ति में पड़ सकते हैं। सुलैमान ने अपने बेटे को ज़ामिन बनकर दूसरों के दायित्वों की ज़िम्मेदारी लेने के बारे में चेतावनी दी, जैसे कि आपके किसी पहचानवाले का बैंक से जल्दबाजी में या बड़ी रक़म का ऋण लेना, आप का ऋण-अग्रीमेंट पर दस्तखत करना (नीतिवचन 6:1-5; 22:26-27)। दूसरे के कर्ज़ के लिए अपनी गारंटी देना बहुत आसान और रोमांचकारी है, क्योंकि यह आपको उनके जीवन में एक महत्वपूर्ण भूमिका देता है। लेकिन अवश्य हैं कि इस नीतिवचन की बुद्धि और ज्ञान आपको अपने मुंह के द्वारा अनावश्यक और अत्यधिक दायित्व के बोल बोलने से बचाएं(नीतिवचन 22:3; 1 कुरिन्थ 7:32)।
आप परमेश्वर के लिये मन्नत मानने से विपत्ति में पड़ सकते हैं। संकट के समय की कठिनाइयों में, परमेश्वर को अपने छुटकारे के लिए राजी करने उसके लिये मन्नत मानना बड़ा आसान है। परन्तु परमेश्वर ऐसी शपथों के विरुद्ध चेतावनी देता है (सभो 5:1-3)। मन्नत मानने और न चुकाने से मन्नत न मानना ही उत्तम है (सभो 5:4-7)।
आप गाली-गलौच से विपत्ति में पड़ सकते हैं। यीशु मसीह ने सिखाया कि उचित कारण के बिना किसी को भला-बुरा कहना छठी आज्ञा, अर्थात् हत्या न करने की आज्ञा का उल्लंघन है (मत्ती 5:21-22)। गाली देने और निंदा करने, जो कि किसी को बेईज्ज़त करने के उद्देश्य से अपमानजनक भाषा का उपयोग करना है, की पवित्रशास्त्र में भर्त्सना कीं गई है (निर्ग 22:28; 1 कुरिन्थ 5:11; 6:10; 1 पतरस 3:9)। अगर कोई बेटा अपने माता-पिता को श्राप देता था, तो मूसा की व्यवस्था के तहत उसे मृत्युदंड दिया जाता था (नीतिवचन 20:20; निर्ग 21:17; लैव्य 20:9; व्यवस्था 27:16)। आज की फिल्मों में देखो कैसे माँ-बाप का मज़ाक उड़ाया जाता है!
आप झूठ बोलकर विपत्ति में पड़ सकते हैं। झूठ बोलने वाले से हर कोई नफरत करता है। झूठे व्यक्ति पर कोई भरोसा नहीं कर सकता। झूठ बोलनेवालों और झूठी गवाही देने वालों के लिए कठोर दंड का प्रावधान है। और सभी झूठे लोग आग की झील में अनंत काल के लिए डाल दियें जायेंगे (प्रकाशितवाक्य 21:8,27; 22:15)। सभी स्थितियों में ईमानदारी न केवल सर्वोत्तम नीति है, बल्कि सत्य का परमेश्वर इसकी आज्ञा देता है (नीतिवचन 12:22; निर्गमन 20:16; लैव्य 19:11; इफि 4:25)।
आप अपने अधिकारियों का अनादर करके विपत्ति में पड़ सकते हैं। अपने मन में या अपने शयन की कोठरी में भी राजा को शाप न देना (सभोपदेशक 10:20)। क्योंकि कोई आकाश का पक्षी आपकी उस दुष्ट बात को ले जाएगा, और कोई उड़नेवाला जन्तु उस बात को प्रगट कर देगा, और आप विपत्ति में पड़ जाओगे। परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है जो अपने शासकों की बुराई करते हैं (2 पतरस 2:10-12; यहूदा 1:8-10)। बच्चों को माता-पिता का, पत्नियों को अपने पतियों का, कर्मचारियों को अपने ऊपर नियुक्त अधिकारियों और मालिकों का, और चर्च के सदस्यों को अपने पास्टरों का सम्मान करना अवश्य है (इफि 5:33; 6:1-3; 1 थिस्स 5:12-13; तीतुस 2:9-10; 1 पतरस 3:5) -6)।
आप वाद-विवाद और बहस करने से विपत्ति में पड़ सकते हैं। बुद्धिमान लोग बात करने के बजाय सुनते हैं (नीतिवचन 17:27-28; सभोपदेशक 7:5)। खासकर स्त्रियों को वाद-विवाद और बहस करने से बचना चाहिए और अपनी वाणी को अनुग्रहपूर्ण बनाने पर ध्यान देना चाहिए (नीतिवचन 19:13; 21:19; 27:15; 31:26)। परमेश्वर के सेवक मूर्खतापूर्ण और गवारों जैसे प्रश्नों का उत्तर देने से इनकार करते हैं, क्योंकि ऐसे प्रश्न मूर्खों और ठट्ठा करनेवालों के लक्षण हैं (1 तीमुथियुस 1:4; 4:7; 6:3-5; 2 तीमुथियुस 2:14,16,23; तीतुस 3:9)। बुद्धिमान लोग बात करने से पहले मामले को समझते हैं (नीतिवचन 15:28), खासकर परमेश्वर के सेवक (2 तीमु 2:15)।
आप अपने आस-पास के लोगों को ठेस पहुँचाकर विपत्ति में पड़ सकते हैं। कड़वे शब्दों के कारण पति-पत्नी, बच्चे और दोस्त आसानी से आहत हो सकते हैं (नीतिवचन 12:18; इफि 6:4; कुलु 3:19)। कठोर शब्दों से गुस्सा भड़कता है और झगड़े बढ़ते हैं (नीतिवचन 15:1)। कठोर शब्दों के कारण रिश्ते टूट जाते हैं, कड़वाहट पैदा हो जाती है और आपका भविष्य ख़राब हो जाता है। अनुग्रहपूर्ण वाणी बोलनेवाले पुरुष और स्त्रियाँ सम्मान की ऊँचाई पाते हैं (नीतिवचन 11:16; 22:11)। अनुग्रहपूर्ण शब्दों का उपयोग करना एक आज्ञा है (कुलु 4:6)।
आप अपने मुँह और जीभ के कारण आनेवाली विपत्ति से कैसे बच सकते हैं? सबसे पहले, कम से कम शब्दों में बात करें, क्योंकि कई शब्दों के बोलने से हमेशा पाप होता है (नीतिवचन 10:19)। दूसरा, बोलने से पहले संयम रखें और सुनने पर ज्यादा ज़ोर दें (नीतिवचन 29:20; जस 1:19)। तीसरा, याद रखें कि आप को हररक निष्फल और व्यर्थ शब्द का हिसाब देना होगा और आपके मुंह के वचनों के अनुसार आपका न्याय किया जाएगा (मत्ती 12:34-37)। चौथा, दाऊद के समान प्रार्थना करो, “हे यहोवा, मेरे मुख पर पहरा बैठा, मेरे होठों के द्वार की रखवाली कर” (भजन 141:3)।
जो मनुष्य अपने मुह में लगाम देता है, और जीभ को वश में रखता है, वह न केवल अपने प्राण को विपत्तियों से बचाता है, बल्कि वह उस अच्छे जीवन का आनंद भी उठाएगा जिसके विषय परमेश्वर के अचूक वचन में निश्चयता दीं गई है : “वह कौन मनुष्य है जो जीवन की इच्छा रखता, और दीर्घायु चाहता है ताकि भलाई देखे? अपनी जीभ को बुराई से रोक रख, और अपने मुँह की चौकसी कर कि उससे छल की बात न निकले” (भजन 34:12-13)। पतरस ने भी प्रतिज्ञा के इन अद्भुत वचनों को अपनी पत्री में दोहराया (1 पतरस 3:10)।
प्रभु यीशु मसीह पर उसके मुँह और जीभ के कारण कभी कोई विपत्ति नहीं आई। विश्व-इतिहास में आज तक किसी भी मनुष्य ने उसके समान बातें नहीं की (भजन 45:2; यशायाह 50:4; लूका 4:22; यूहन्ना 7:46)। उसने किसी विधवा को उसके इकलौते बेटे की अंतिम यात्रा के दौरान सांत्वना दी, और वह अपने सुननेवालों के कल्याण के लिए फरिसियों के पाखण्ड को उजागर कर सकता था (लूका 7:11-18; मत्ती 7:28-29)। जब उस पर मुक़दमा चला तब उसमें कोई दोष नहीं पाया गया, इसलिए यहूदियों ने उसके शुद्ध शब्दों को विकृत करके उस पर झूठा आरोप लगाया (मत्ती 26:59-61)। परन्तु उसके न्यायपूर्ण और कठोर वचन शीघ्र ही तब प्रमाणित हुए जब उनके पापों के कारण येरूशलेम का विनाश हुआ (मत्ती 7:21-23)।
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