नीतिवचन 21:15

धर्मी के लिए न्याय करना आनंद की बात है, परन्तु कुकर्मियों का विनाश होगा। (केजेवी)

महान लोग वही करते हैं जो सही है – और वे यह काम बड़े आनंद के साथ और प्रसन्नता से करते हैं। सच्चे मसीही आवेशपूर्ण और जोशीले होते हैं। इसके विपरीत, दुष्टजन बुराई का मार्ग चुनते हैं, और इस कारण परमेश्वर उनका विनाश कर देता है। आप इन दोनों में से कौन हैं?

यदि आप परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए जो सही है वही करने का चुनाव करते हैं, तो क्यों न यह अपने सम्पूर्ण शक्ति से करें? हमारे लिए परमेश्वर की सबसे पहली आज्ञा यही है कि “तू अपने परमेश्वर से अपने सम्पूर्ण हृदय से, सम्पूर्ण प्राण से, सम्पूर्ण मन से, और अपनी सम्पूर्ण शक्ति से प्रेम कर” (व्यवस्था. 6:5)। और यह आज्ञा पूरी तरह से उचित है, क्योंकि परमेश्वर ऐसा प्रेम पाने के योग्य है।

इस नीतिवचन में उल्लेखित न्याय क्या है? यह जो कुछ न्यायसंगत, जो कुछ निष्पक्ष, जो कुछ भला, जो कुछ सही, और जो कुछ धर्मपरायण है, वही करना है। यह दण्ड देना नहीं है। यह किसी मसले का सही हल निकालना है जिससे परमेश्वर और मनुष्य दोनों ही प्रसन्न हो। न्याय करना एक कुलीन मनुष्य का धर्मी आचरण होता है, और वह केवल वही करेगा जो शुद्ध, पवित्र, और बुद्धिमानीपूर्ण है। न्याय करने का अर्थ है जो सही है वही करना (नीति 1:3; 2:9; 8:20; 18:5; 19:28; 21:3, 7; 24:23; 28:5; 29:4; 31:5)।

जो मनुष्य सचमुच धर्मी होता है, वह धार्मिकता का आचरण रखने में आनंदित होता है। धर्म या धार्मिकता उसके लिए बोझ या उबाऊ कर्मकांड नहीं है, बल्कि इसे वह इस पापी और दुष्ट जगत में भलाई, कल्याण और न्याय करने के उत्साह से भरे सुअवसर के रूप में लेता है। उसे परमेश्वर की महिमा, और मनुष्यों के साथ न्यायोचित आचरण करने के लिए किसी भी परिस्थिति पर बाइबल की बुद्धि का व्यवहारिक उपयोग करने में प्रसन्नता होती है (नीति 12:14; 15:23; 16:13, 20; 24:5, 26; 25:11)।

आप तीन प्रकार से मसीही बन सकते हैं। सर्व प्रथम, आप अनिच्छा से और कुडकुड़ाते हुए परमेश्वर की सेवा करें, और अपने ऊपर शाप ले आए (मलाकी 1:6-14)। दूसरा, आप इच्छा से उसकी सेवा करें और जीवित रहें (मत्ती 21:28-31)। तीसरा, आप दाऊद, यीशु, और पौलुस के समान एक ऐसे जोश से भरकर उसकी सेवा करें जिस में बड़ी प्रसन्नता है (प्रेरितों 13:22; युहन्ना 2:13-17; 1 कुरिं 15:10)।

कई लोग परमेश्वर को कुडकुड़ाते हुए देते हैं, वे या तो बाध्यकारिता के कारण देते हैं, या अनिवार्यता के कारण, और वे देने के हर्ष तथा परमेश्वर से प्रतिफल पाने से चूक जाते हैं। परंतु कुछ उदार और हर्ष से देनेवाले लोग होते हैं, जिन से हमारा प्रभु परमेश्वर प्रेम करता है, और वे परमेश्वर से आनंद और आशीष पाते हैं (2 कुरिं 9:6-9)।

कृपा करना न्याय करने का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है (याकूब 2:13), इसलिए परमेश्वर ने कृपा को बलिदानों और कर्मकाण्ड से बढ़कर, जिनके विषय में उसी ने आज्ञा दी है, महत्वपूर्ण माना (नीति 21:3; होशे 6:6; मत्ती 12:7)। परंतु कृपा का दिखावा करने या उसके उपयोग से कोई लाभ नहीं होगा, क्योंकि परमेश्वर चाहता है कि आप कृपा से प्रीति रखे (मीका 6:8; भजन 37:26)।

खोखली आज्ञाकारिता केवल एक गुलामी का प्रमाण है, क्योंकि लोग भय या बाध्यता के कारण ऐसा ही करते हैं। वे परमेश्वर को केवल एक स्वामी के रूप में देखते हैं, और इस कारण उनकी सेवा का गुणधर्म यांत्रिक या बनावटी है। महान पवित्रजन परमेश्वर से पिता के रूप में प्रेम करते हैं, और वे उसकी सेवा उसके बच्चों के रूप में उसे प्रसन्ना करने की उत्साही इच्छा से करते हैं।

आपने कभी राजा को नहीं देखा है, इसलिए आपने वास्तविक सम्मान क्या है और सेवा करना क्या है, कभी नहीं देखा है। राजा के समक्ष उदास या उतरा हुआ मुंह अपराध माना जाता था, और ऐसा उदास व्यक्ति मृत्युदंड के योग्य माना जाता (नहे. 2:1-2)। यदि मनुष्य अन्य मनुष्यों का बड़ी चौकसी से आदर करते हैं, तो क्या आपको राजाओं के राजा की सेवा करने में बड़ी प्रसन्नता नहीं होनी चाहिए (मलाकी 1:6-14)?

जो भी काम अच्छा है, वह अपनी पूरी शक्ति से किए जाने के योग्य होता है। यह सुलैमान का नियम था (सभो. 9:10)। यह येहू की ख्याति थी (2 राजा 9:20; 10:16)। पौलुस का भी यही नियम था “18परन्तु यह और भी अच्छा है कि भले उद्देश्य से उत्सुकतापूर्वक मित्र बनाने का प्रयत्न हर समय किया जाए” (गलातियों 4:18)। आप का क्या नियम है?

अगर ज्यादा से ज्यादा मसीही लोग न्याय करने में प्रसन्न होते हैं तो सुसमाचार कितनी तेजी से और कितनी दूर दूर तक फैल सकेगा? जोश का प्रचार होता है! अपना उजियाला चमकने दो कि लोग तुम्हारे स्वर्गीय पिता की महिमा करें (मत्ती5:16)। ऐसी पवित्र प्रसन्नता से भरे रहो कि लोग तुमसे तुम्हारी आशा के विषय में पूछे (1 पतरस 3:15)। मसीहियों को सब लोगों से बढ़कर प्रसन्न लोग होना चाहिए जो अनगिनत उद्देश्यों के लिए जीते हैं। क्या आप ऐसे मसीही हैं?

उन धर्मी जनों के विपरीत जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलते हैं, गैर-मसीही और सांसारिक मन के लोग लूचपन में लग जाते हैं कि सब प्रकार के गंदे काम लालसा से करें (इफि 4:17-19)। क्योंकि वे अज्ञानी और अंधेर बुद्धि के हैं, इस कारण परमेश्वर उनकी समझ को और भी अंधकारमय कर देता है कि वे आपस में ही एक दूसरे के साथ सब प्रकार के शर्मनाक काम करें (रोमि 1:18-32)।

विनाशकारी मनों के ये दुष्ट लोग परमेश्वर की सेवा करने में प्रसन्न नहीं होते। क्या आप परमेश्वर की सेवा में आनंद लेते हैं? वे स्वार्थ के अंधेपन में डूबे हैं और पाप से प्रेम रखते हैं। क्या आप पाप से प्रेम रखते हैं? जब वे न्याय के दिन मसीह के न्याय आसन के सामने खड़े होंगे, वे इन शब्दों को सुनेंगे “तब मैं उनसे स्पष्ट कहूँगा, ‘मैंने तुम को कभी नहीं जाना; हे कुकर्मियों, मुझ से दूर हटो” (मत्ती 7:23)।

मसीही माताओं और मसीही पिताओं, सुनो, आपके बच्चें 12 वर्ष के होते होते आपका सही-सही मनोविश्लेषण कर चुके होंगे। वे जान चुके होंगे कि आप परमेश्वर की सेवा कितनी खुशी से करते थे, कितनी भलाई का काम करते थे, कितना समय बाइबल पढ़ते थे, चर्च जाते थे या नहीं, कितनी प्रार्थना करते थे, और दूसरों की कितनी सेवा करते थे। आपका आचरण मसीही धर्म को लेकर उनके दृष्टिकोण और आचरण पर भारी प्रभाव डालेगा।

इसलिए तुम्हारा चाल-चलन अंदर और बाहर से प्रभु यीशु मसीह के चाल-चलन के समान रखो, उसने कहा “हे मेरे परमेश्वर, मैं तेरी इच्छा पूरी करने से प्रसन्न हूँ; और तेरी व्यवस्था मेरे अंतःकरण में बसी है” (भजन 40:8)। जो मनुष्य परमेश्वर का भय मानता है और जो उसकी आज्ञाओं से अति प्रसन्न होता है, परमेश्वर उसे निश्चित रूप से आशीष देगा (भजन 112:1)।

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