नीतिवचन 9:9
बुद्धिमान को शिक्षा दे, वह अधिक बुद्धिमान होगा; धर्मी को चिता दे, वह अपनी विद्या बढ़ाएगा।
महान व्यक्तित्व के लोग बुद्धि और विद्या में बढ़ते हैं। क्या आप बुद्धि और विद्या में बढ़ रहे हैं – या बस बूढ़े हो रहे हैं? चितावनी और शिक्षा परमेश्वर की देन हैं, और महान व्यक्तित्व के लोग ज्ञान और समझ बढ़ाने के लिए उनका लाभ उठाते हैं। किसी भी पुरुष या स्त्री के चरित्र-लक्षण को उनकी बुद्धि और विद्या में वृद्धि के परिमाण से आसानी से देखा जा सकता है। आपका चरित्र-लक्षण क्या है?
इस नीतिवचन और उसके संदर्भ के दो सबक हैं (नीतिवचन 9:7-9)। पहला, सुलैमान ने ठट्ठा करनेवालों को डांटने से मना किया, क्योंकि वे तुझ से और तेरी सम्मति से बैर रखेंगे। उसने बुद्धिमानों को चिताने के महत्व की बड़ाई की, क्योंकि वे तुमसे और उस सत्य और बुद्धि से प्रेम रखेंगे जो तुम उन्हें देते हो। क्या आप दोनों के बीच के फ़र्क को देख सकते हैं? आपका कर्तव्य यह है कि आपको बुद्धिमानीपूर्वक केवल ऐसे लोगों के लिए परिश्रम करना है और अपने ज्ञान को देना हैं जो नम्र और दीन मन से सुनते हैं।
दूसरा सबक यह है कि व्यक्ति के चरित्र को इस बात से पहचाना जाता है कि वह सुधार और शिक्षा को किस प्रवृत्ति या भाव से प्रतिक्रिया दे रहा है। सब मनुष्यों को ठट्ठा करने वालों, मूर्खो और बुद्धिमानों में वर्गीकृत किया जा सकता है। आप इनमें से कौन-से झुण्ड में आते हैं? मूर्ख मनुष्य असल में आलसी, स्वार्थी और बेवकूफ़ होता है। ठट्ठा करने वाला एक विद्रोही होता है जो चितावनी और सलाह देने वालों से नफरत करता है। बुद्धिमान मनुष्य सत्य और ज्ञान का एक उत्साही छात्र होता है जो शिक्षा और शिक्षकों से प्रेम रखता है।
आप सत्य, बुद्धि और ज्ञान के मामले में तटस्थ या बेजान भूमिका नहीं ले सकते। आप सत्य, बुद्धि और ज्ञान में या तो बढ़ेंगे, या इनमे आपकी घटती होगी। अपने दिल और दिमाग के मूर्खतापूर्ण आवेगों को आप या तो पराजित कर दें, या वे आपको पराजित कर देंगे। आप इस संसार के तत्वज्ञान और उसकी विचारधारा को या तो ठुकराते हैं, या फिर इस संसार का तत्वज्ञान और उसकी विचारधारा आपको बहकाकर विनाश में ले जा रहें हैं। परमेश्वर या तो आपको और सत्य के ज्ञान में ले जा रहा है, या वह आपसे सत्य को छिपा रहा है (लूका 8:18)।
आप इस दुनिया में बिना किसी ज्ञान के आएं थें। इसलिए अवश्य है कि आप शिक्षा और ज्ञान की लालसा रखें, ऐसा न हो कि आप अज्ञानी ही बने रहें। बुद्धि को प्राप्त करना आपके जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य होना चाहिए (नीतिवचन 4:7; 16:16)। क्या यह लक्ष्य आपके लिए इतना महत्वपूर्ण है? यदि हाँ, तो आप अपने शिक्षकों से परमेश्वर का सत्य और बुद्धि सीखने के हर अवसर का लाभ उठाने खुद को समर्पित करेंगे। क्या आप इस नीतिवचन को ध्यान से पढ़ रहे हैं?
इस दुनिया में ऐसे लोग विशेष होते हैं, क्योंकि वे सुधार और शिक्षा से प्रेम रखते हैं ताकि वे सीख सकें और बढ़ सकें (नीतिवचन 1:5; 15:14)। ये दुर्लभ लोग ध्यान भटकाने वाली किसी भी बात को आसानी से ठुकरा देते हैं ताकि अपना सारा ध्यान, समय और परिश्रम बुद्धि एवं ज्ञान को सीखने पर केंद्रित कर सकें (नीतिवचन 18:1-2)। एक बार एक पूरी सभा ने परमेश्वर के वचन को समझने पर जश्न मनाया (नेह 8:8-12), खोजे ने बड़े दीन मन से अपनी अज्ञानता मान ली और फिलिप्पुस से अनुरोध किया कि वह उसे शास्त्र-पाठ समझने में मदद करे (प्रेरितों के काम 8:30-34), और कुरनेलियुस में सीखने की उत्सुक भावना थी (प्रेरितों के काम 10:33)।
जव परमेश्वर आपको सीखने के अवसर देता है तो उन अवसरों को गँवाना बड़ी मूर्खता है (नीतिवचन 15:32)। उसने आज्ञा दी, “नये जन्मे हुए बच्चों के समान निर्मल आत्मिक दूध की लालसा करो, ताकि उसके द्वारा उद्धार पाने के लिये बढ़ते जाओ” (1 पतरस 2:2)। यह आदेश है कि अगर वचन में बढ़ना है तो उसे सीखने की लालसा रखों। परमेश्वर प्रत्येक मनुष्य को बुद्धि प्राप्त करने और ज्ञान को सीखने के जो जो अवसर देता है उनकी उपेक्षा करना या उन्हें ठुकरा देना आत्मिक आत्महत्या है (नीतिवचन 8:36)। यदि आपको इतना कुछ सिखाया जा चुका है कि आपको खुद अब शिक्षक बन जाना चाहिए, तौभी यह आवश्यक हो जाए है कि कोई आपको परमेश्वर के वचनों की आदि शिक्षा फिर से सिखाए, तो यह आपकी प्रतिष्ठा पर धब्बा है (इब्रानियों 5:12-14)।
लोग क्यों शिक्षकों और शिक्षा से बैर रखते हैं? कुछ कठोर मन के होते हैं (1 शमू 15:23)। कुछ लोग घमंडी होते हैं (नीतिवचन 26:12)। कुछ आलसी होते हैं (नीतिवचन 18:1-2)। कुछ शरीर और संसार की बातों से प्रेम रखनेवाले होते हैं (1 कुरिन्थ 3:1-3)। कुछ लोग खरा उपदेश के स्थान पर दंतकथाओं को सुनने को प्राथमिकता देते हैं (2 तीमु 4:3-4)। कुछ लोग ध्यान केंद्रित नहीं करते या मन की तैयारी नहीं करते; कुछ लोग उत्पीड़न से हौंसला खो देते हैं; कुछ लोगों की महत्वाकांक्षा उनके मन में से वचन उठा ले जाती है (लूका 8:11-14)।
परमेश्वर चाहता है कि आप बुद्धि में बढ़ें। वह उसे प्रतिदिन आपके ठीक सामने रखता है। बिना समझ के होना पाप है (नीतिवचन 14:8; 19:2; यिर्मयाह 5:21; रोमियों 1:31)। आपको यीशु मसीह के अनुग्रह और उसके ज्ञान में बढ़ना है (2 पतरस 3:18)। आप अपने शत्रुओं, शिक्षकों और पूर्वजों से आगे निकल सकते हैं। कैसे? परमेश्वर के वचनों को अपने पास रखें – उन पर चिंतन और मनन करें, और उनका पालन करें (भजन 119:98-100)।
नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।