नीतिवचन 8:3
फाटकों के पास, नगर के पैठाव में, और द्वारों ही में वह ऊँचे स्वर से कहती है:
एक स्त्री आपको पाना चाहती है। एक अद्भुत स्त्री! वह आपकी मदद करना चाहती है। वह आज ऊँचे स्वर से आपको पुकार रही है। उसे पाना कठिन नहीं है, वह आपके ठीक सामने खड़ी है। आप उसे अनदेखा नहीं कर सकते। वह आपको बुद्धि और समझ से भरा हृदय देना चाहती है, वह आपसे उत्तम और सीधी बातें कहेगी (नीति. 8:1-6)।
आज आप अत्यन्त धन्य हैं। मुबारक हो! जैसे ही आपने यह नीतिवचन पढ़ा, बुद्धिरूपी स्त्री ने स्वयं अपना परिचय आपको दे दिया। वह आपके सामने शुद्ध सत्य, शिक्षा, ज्ञान और बुद्धि रख रही है, जो चाँदी, सोने, हिरेजवारातों और उन सब वस्तुओं से बढ़कर हैं, जो आप कभी अपनी ज़िन्दगी में पाना चाहते थे (नीति. 8:7-11)।
वह आपका ध्यान पाने के लिए पुकारती है। यदि आप और वह जिगरी दोस्त और साथी न बनें, तो हानि उसकी नहीं होगी, आपकी होगी। आप मूर्खता और अज्ञानता में जन्मे हैं, और वैसे ही बने रहेंगे, वह आपको बिखते हुए, दर्द और पीड़ा से भरे जीवन से, और अनंतकाल की पीड़ा से बचाना चाहती है।
इस नीतिवचन से अपना मुँह न फेरे। क्या ये शब्द आपको नीरस और अर्थहीन प्रतीत होते हैं? परमेश्वर ने उन शब्दों में से प्रत्येक को प्रेरित किया है, और वे इस रीति से रचे गए हैं कि मूर्ख मनुष्य उनसे हतोत्साहित हों और उन्हें ठेस पहुँचे, परन्तु बुद्धिमान जन इस बात से आनन्दित होंगे कि उसने आज बुद्धिरूपी स्त्री को उनके पास भेजा है, और वे आगे पढ़ते जाएँगे।
सुलैमान ने नीतिवचन में आपका ध्यान खींचने और आपको बुद्धि सिखाने के लिए अनेक माध्यमों का प्रयोग किया। उसने धमकियों, प्रतिज्ञाओं, पीड़ा, प्रतिफल, छोटे नीतिवचनों, लम्बे दृष्टान्तों, निरीक्षणों, नियमों, उदाहरणों, सादृश्यों, तुलनाओं, सामाजिक घटनाओं, पशुओं से मिलने वाली शिक्षाओं, अपने पिता की सलाह, आगूर की शिक्षाओं, और यहाँ तक कि एक राजमाता द्वारा अपने पुत्र को लिखे गए पत्र तक का उपयोग किया।
और यहाँ, इस नीतिवचन में, उसने मानवीकरण का प्रयोग किया है, अर्थात् वह साहित्यिक उपकरण, जिसके द्वारा किसी अमूर्त वस्तु को व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, ताकि वह बुद्धि को आपके सामने एक कुलीन और अद्भुत स्त्री, बुद्धिरूपी स्त्री, के रूप में रख सके। उसने अपना परिचय दिया और आपसे उसे सुनने की विनती की (नीति. 8:1-10), उसने आपके लिए अपने लाभों का वर्णन किया (नीति. 8:11-21), उसने बताया कि परमेश्वर ने विश्व की सृष्टि करते समय उसका कैसे उपयोग किया (नीति. 8:22-31), और अन्त में उसने आपसे यह अनुरोध किया कि आप उसे ग्रहण करें, अन्यथा व्यर्थ ही मर जाइए (नीति. 8:32-36)।
आज आप धन्य हैं। सृष्टिकर्ता परमेश्वर ने आपको अपने ज्ञान, सत्य, समझ और बुद्धि में सहभागी करने के लिए आपके पास एक लिखित प्रस्ताव भेजा है। उसका धर्म व्यर्थ अनुष्ठानों, जपों, कर्मकाण्डी प्रार्थनाओं, अन्धविश्वासों, मानव-निर्मित परम्पराओं, अन्धकारमय रहस्यों, किसी महान आत्मा को भैंसे की अन्तड़ियाँ चढ़ाने, किसी मैली और दूषित नदी में स्नान करने, किसी आकाश-पिण्ड को चूमने, या किसी देवता की माता से माला जपकर प्रार्थना करने का धर्म नहीं है। यहाँ सनातन सत्य, ज्ञान और बुद्धि है!
बुद्धिरूपी कुलीन स्त्री आपके सामने है। वह चाहती है कि आप उसे देखें। वह नगर के प्रवेश पर, जहाँ से आप प्रतिदिन होकर जाते हैं, आपका ध्यान खींचने के लिए पुकारती है। वह गुहार लगाती है कि आपकी सहायता करें (नीति. 8:1-5)। वह उत्तम और सीधी बातें प्रस्तुत करती है, ऐसी बातें, जो इस मूर्ख और अन्धे जगत में केवल उसी के पास मिलेंगी (नीति. 8:6)। उसका प्रत्येक वचन सत्य और धर्ममय है (नीति. 8:7-8)। उसकी शिक्षा सहज ही समझ में आ जाती है (नीति. 8:9), और वह धन-सम्पत्ति तथा किसी भी चाहनेयोग्य वस्तु से बढ़कर है (नीति. 8:10-11)।
प्रकृति स्वयं हर भाषा में सब लोगों को स्पष्ट रीति से सत्य की शिक्षा देती है (भजन संहिता 19:1-6)। परन्तु मनुष्य ने सृष्टिकर्ता को मानने के बजाए, अपने ही भ्रम को अपना लिया है, अर्थात् यह कि आप और बाकी सब कुछ एक उद्देश्यहीन विश्व में आकाशीय गैसों के विस्फोट से उत्पन्न हुए, समुद्र की कीचड़ वृक्षों पर चढ़ने वाले मेंढकों में बदल गई, और बन्दर और लंगूर आपके पुरखे बन गए। जन्म के समय की पूर्ण अज्ञानता से मनुष्य तीव्र गति से नीचे उतरता हुआ विकासवाद की संस्थागत विक्षिप्तता तक पहुँच जाता है। इसलिए परमेश्वर उन पर कठोर न्याय ले आता है (रोमियों 1:18-32)!
सृष्टिकर्ता परमेश्वर उन प्रबन्धकारी आशीषों के द्वारा भी अपने अस्तित्व और अपनी भलाई की साक्षी देता है, जिन्हें वह भेजता है, विशेषकर धूप, वर्षा, फलवन्त ऋतुओं, भोजन और आनन्द के द्वारा (मत्ती 5:45; प्रेरितों के काम 14:17)। आपने जिन-जिन सुखों का कभी अनुभव किया है, और जिनकी जड़ धूप और वर्षा तक पहुँचती है, वे सब उसकी करुणा से भरी व्यवस्था से ही प्राप्त हुए हैं। जब आप उत्तम भोजन करते हैं या उन अन्य सुखों का आनन्द लेते हैं जिन्हें उसने रचा है, तब यह जानिए कि वह उचित ही आपसे धन्यवाद और आज्ञाकारिता की मांग करता है।
उसने अपनी दैवीय व्यवस्था मनुष्यों के विवेक में भी रोप दी है, ताकि यदि उन्होंने परमेश्वर की प्रकट की हुई इच्छा को जानने के लिए बाइबल न भी पढ़ी हो, तब भी वे प्रमुख नैतिक विषयों में उसकी व्यवस्था को जान सके (रोमियों 2:12-16)। यही कारण है कि अधिकांश संस्कृतियों और राष्ट्रों में झूठ, चोरी, हत्या, विवाह, बच्चों को सही शिक्षा, और ऐसी ही अन्य बातों के सम्बन्ध में उसकी व्यवस्था से मिलते-जुलते नियम प्राचीन समय से ही पाए जाते हैं।
परमेश्वर ने बाइबल के द्वारा अपने विषय में, मनुष्य की उत्पत्ति और उसके भविष्य के विषय में, और इस विषय में कि जीवन और अनन्तकाल में कैसे समृद्ध हुआ जाए, और भी बहुत अधिक सत्य भेजा (भजन संहिता 19:7-11; 2 तीमुथियुस 3:16-17)। परन्तु विद्रोही मनुष्य ने उसे जलाया, उसके प्रकाशकों को जलाया, उसे कलीसियाओं में जंजीरों से बाँध दिया, उसे लैटिन भाषा में पढ़ा, विद्यालयों में उस पर प्रतिबन्ध लगाया, सार्वजनिक पद के सन्दर्भ में उसका उपहास किया, न्यायालयों से उसे हटा दिया, नए संस्करणों के द्वारा उसे बिगाड़ दिया गया, और अन्ततः उसे बुकशेल्फ में रख दिया। इसलिए परमेश्वर उन का न्याय करता है (यूहन्ना 12:47-48; 2 थिस्सलुनीकियों 2:9-12)!
परमेश्वर ने अपने पास्टर सेवकों को भेजा कि वे आपको उसके वचन और उनका सही अर्थ सिखाएँ (यिर्मयाह 3:15; 23:28-32; प्रेरितों के काम 8:30-35; इफिसियों 4:11-14)। परन्तु जगत ने उन्हें सिंहों के आगे डाल दिया, यातना-यंत्रों पर खींच-खींचकर चीर डाला, कैथोलिक इन्क्विज़िशनों में खम्भों से बाँधकर जला दिया, निर्वासित किया, और आज भी उनका तिरस्कार किया जाता है। आज अधिकांश मसीहियों ने उन्हें छोड़कर ऐसे लोकप्रिय और चिकने-चुपड़े संचालकों को अपना लिया है, जो उन्हें खरी शिक्षा (शुद्ध सिद्धान्त) के स्थान पर मनोरंजन और गढ़ी हुई कथाएँ परोसते हैं (2 तीमुथियुस 3:1-7; 4:1-4)।
अधिकांश मनुष्य इस बुद्धिरूपी स्त्री को अस्वीकार कर देते हैं, जिससे उनका सामना सृष्टि में, परमेश्वर की प्रबन्धकारी व्यवस्था में, विवेक में, पवित्र शास्त्र में, और उसके प्रचारकों के द्वारा होता है। क्या आप सृष्टि को देखकर काँपते और आनन्दित होते हैं, यह जानते हुए कि वह ऐसे सृष्टिकर्ता की कारीगरी है जिसमें अनन्त सामर्थ्य और ईश्वरत्व है? क्या आप बाइबल में दिए गए परमेश्वर के बहुमूल्य और सत्य वचनों से प्रेम करते और उनका अध्ययन करते हैं? क्या आप निष्ठापूर्वक ऐसी कलीसिया में जाते हैं और उसका सहारा बनते हैं, जहाँ एक गम्भीर पुरुष-पास्टर बिना समझौता किए परमेश्वर के वचन का प्रचार करता है? आपको ऐसा ही करना चाहिए।
आज आप धन्य हैं। बुद्धिरूपी स्त्री फाटकों पर, नगर के प्रवेशद्वार पर, और द्वारों के भीतर आते समय आपसे मिली है। उससे प्रेम कीजिए, वह आपको समय और अनन्त जीवन, दोनों में अद्भुत लाभों और आशीषों से धनवान बनाएगी (नीतिवचन 8:17-21)। उसे अपनाने से इनकार करो, जब आपका जीवन आपके ही ऊपर ढहने लगेगा, तब वह आपका उपहास करेगी। चुनाव आपका है, परन्तु उसके परिणाम परमेश्वर के हैं। उसने प्रतिज्ञा की है। यदि आप उसके सत्य के प्रस्ताव की अनदेखी करेंगे, तो जब आपकी विपत्तियाँ आप पर आ पड़ेंगी, तब वह आपकी पुकार पर हँसेगी (नीतिवचन 1:20-33)।
क्या यह नीतिवचन आपको बहुत नीरस लगता है? क्या इसकी टीका आपको बहुत ही साधारण लग रही है? क्या आप अपनी मूर्खता और पापमयता से मन फिराने, बुद्धिरूपी स्त्री के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करने, और उससे यह विनती करने के लिए प्रेरित नहीं होते कि वह आपको अपना सत्य दिखाए? विद्रोह के कारण चूर्ण-चूर्ण किए जाने से कहीं अच्छा है कि मन-फिराव के द्वारा टूट जाएँ। यीशु मसीह ने अपने विषय में कहा, “जो इस पत्थर पर गिरेगा, वह चकनाचूर हो जाएगा; और जिस पर वह गिरेगा, उसको पीस डालेगा” (मत्ती 21:44)।
क्या आप इस टीका के खरे सिद्धान्त को सहन नहीं कर पा रहें? क्या आपकी कलीसिया ने मंच से वचन के उपदेश को हटाकर उसके स्थान पर बैंड-बाजेवाले स्तुति-आराधना के झुण्ड को बैठा दिया है (2 तीमुथियुस 4:3-4)? यदि आप परमेश्वर के सत्य के प्रस्ताव को दुत्कारते हैं, तो क्या होगा? यदि आप बुद्धिरूपी स्त्री से मुँह मोड़कर चले जाएँ, तो उसका परिणाम क्या होगा? “इसी कारण परमेश्वर उनमें एक भटका देनेवाली सामर्थ्य को भेजेगा कि वे झूठ की प्रतीति करें, 12ताकि जितने लोग सत्य की प्रतीति नहीं करते, वरन् अधर्म से प्रसन्न होते हैं, वे सब दण्ड पाएँ।” (2 थिस्सलुनीकियों 2:10-12)।
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