नीतिवचन 8:14

उत्तम युक्ति, और खरी बुद्धि मेरी ही है, मैं तो समझ हूँ, और पराक्रम भी मेरा है।

कौन सी बात राष्ट्रों को महान बनाती है? चूँकि सभी मनुष्य आदम और नूह से आए हैं और एक ही खून के हैं, तो राष्ट्रीय मतभेद इतने स्वाभाविक और इतने बड़े क्यों हैं (उत्पत्ति 3:20; 9:19; प्रेरितों 17:26)?

क्यों कुछ देश सलाह देने, खरी बुद्धि प्रकट करने, समझ और ताकत के लिए जाने जाते हैं? इन मापदंडों से उनकी श्रेष्ठता अन्य देशों के बीच की इतनी प्रतिष्ठित क्यों है?

इसका उत्तर बहुत सरल है, और इसका राष्ट्रीय शक्ति और समृद्धि पर उन सभी बातों की तुलना में अधिक प्रभाव पड़ता है जिनका सपना सब मनुष्य मिलकर देखते हैं। और उत्तर है कि कौन-सा देश परमेश्वर की बुद्धि का उपयोग करता है, और किस प्रमाण में करता है। और वह बुद्धि कहाँ पाई जाती है? बाइबल में, जो परमेश्वर-प्रेरित सिद्ध और ताया हुआ प्रकाशन है!

नीतिवचन का आठवा अध्याय एक स्त्री के रूप में बुद्धि का एक लंबा व्यक्तित्व-चित्रण है। बुद्धि रूपी स्त्री सबसे पहले अपना परिचय देती है (नीतिवचन 8:1-11), उसके बाद बुद्धि की आशिषों को सूचीबद्ध करती है (नीतिवचन 8:12-21), विश्व के निर्माण में कैसे परमेश्वर ने बुद्धि का उपयोग किया इसका वर्णन करती है (नीतिवचन 8:22-31), और अन्त में निष्कर्ष पर पहुंचती है (नीतिवचन 8:32-36)।

इस पुस्तक के सन्दर्भ और यहाँ प्रयुक्त रूपकों को नज़रअंदाज़ करना और यह सोचना कि सुलैमान ने यहाँ यीशु मसीह के बारे में एक रहस्यमय उपदेश लिखा है, सरासर ग़लत व्याख्या है। आप नीतिवचन के कुछ और पदों में भी देख सकते हैं कि कैसे उसने उन पदों में भी बुद्धि का व्यक्तित्वकरण किया है (नीतिवचन 1:20-33; 3:13-20; 4:13; 9:1-12)।

नीतिवचन 8:14 का संदर्भ राष्ट्रों की संपत्ति और उनकी शक्ति है, क्योंकि स्त्री रूपी बुद्धि आगे भी राजनीतिक समृद्धि और सफलता का स्पष्ट वर्णन जारी रखती है। वह पृथ्वी के राजाओं, अधिपतियों, कुलीनों और न्यायाधीशों को सम्बोधित करते हुए न्याय की आशिषों का वर्णन करती है (नीतिवचन 8:15-16)।

यहां जिस सम्मति, खरी बुद्धि, समझ-बूझ और सामर्थ्य का वर्णन किया जा रहा है वे विवेक, ज्ञान, निर्णय, चालाकी, स्वतंत्रता, मुक्ति, आविष्कार, प्रगति, ज्ञानोदय, दृढ़ विश्वास, प्रतिबद्धता, नेतृत्व-क्षमता और सरकारी अधिकार हैं जो कुछ देशों के पास हैं तो कुछ देशों के पास नहीं हैं। ये बौद्धिक, नैतिक और आध्यात्मिक गुण हैं।

सदियों से मानवजाति कुछ राष्ट्रों की महानता को देखकर और कुछ की अज्ञानता और गरीबी को देखकर अचम्भित होती आ रही है। एडम स्मिथ (1723-1790) ने सोचा कि उसने कुछ महत्वपूर्ण कारकों की पहचान की है, और उनकी पुस्तक, एन इंक्वायरी इनटू द नेचर एंड कॉजेज ऑफ द वेल्थ ऑफ नेशंस (राष्ट्रों का धन), जिसका प्रकाशन वर्ष 1776 में हुआ था जब लोग ज्ञान के लिए जिज्ञासु हुआ करते थें, आज भी एक महत्वपूर्ण प्रबंध मानी जाती है।

पर फिर भी, एडम स्मिथ खुद और आध्यात्मिक समझ से रहित पापों में मृत बाकि सब लोग उस सत्य को नहीं देख पाते जो राष्ट्रों की सफलताओं, समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य के लिए सबसे प्रभावशाली कारक हैं। सब सृष्ट मनुष्यों में, और यहाँ तक कि देशो-देशों में इन भिन्नताओं का प्राथमिक कारण यह है कि लोग और राष्ट्र किस अनुपात में सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आज्ञा का पालन करते हैं और किस अनुपात में उसके द्वारा प्रस्तुत प्रयोजन का उपयोग करते हैं (1 इति 29:10-13; भजन 33:12; 75:6-7; यशायाह 10:5-15; 45: 9-10; यिर्म 18:1-10; आमोस 3:2; दानि 2:20-22; 4:17; 5:18-21; रोमियों 9:21-24; 1 कुरिन्थ 4:7; प्रकाशितवाक्य 17:17 )।

परमेश्वर ही सभी बातों का मूल कारण और सबब है, और उसमें राष्ट्रों की नियति भी शामिल हैं। समस्त विश्व के संप्रभु सृष्टिकर्ता और अधिपति के रूप में, उनके लिए उसके पूर्वनियोजित फैसलें उन्हें और भी प्रभावित करते हैं। उसने अपनी महान आशीष के लिए एक ऐसे देश को चुना जो सभी देशों के बीच सबसे छोटा था (व्यवस्था 7:6-10), परन्तु बाकी सब बड़े बड़े देशों को उसने अपनी बुद्धि से वंचित रखा (भजन 147:19-20)। उसने एक महान राजा, फिरौन को केवल इसलिए खड़ा किया कि अन्त में उसका विनाश कर दे (निर्गमन 9:13-16)। उसने एक देश का उपयोग बाकी देशों को दंड देने के लिए किया, और फिर उसी के काम करने में उनके लालच के लिए उस देश को दण्ड दिया (यशायाह 10:5-19)।

इसके व्यावहारिक कारण भी हैं। जब कोई राष्ट्र परमेश्वर के वचन को नहीं मानता, तो वह उस राष्ट्र को नष्ट कर देगा (लैव्य 18:24-30; 22:20-26; 26:14-39; व्यवस्थाविवरण 28:15-68; भजन 9:17)। जब कोई राष्ट्र परमेश्वर का भय मानता है और बाइबल के आदेशों का पालन करता है , तो वह उस राष्ट्र को आशीर्वाद देगा (लैव्य 26:1-13,40-46; व्यवस्थाविवरण 28:1-14; भजन 33:12-22; 89:15-18; 144:11- 15)। इज़राइल और मिस्र के बीच प्राचीन भेद गहरा है, क्योंकि परमेश्वर ने अपने लोगों की रक्षा की और उन्हें समृद्ध किया, और अपने उत्पीड़कों को लूटने में उसने उनकी सहायता की।

मिस्र को उजाड़ और पतन की अवस्था में छोड़ने के बाद (निर्गमन 10:7; यहेज़केल 29:13-14), इस्राएल ने नगरों पर कब्ज़ा कर लिया, सुसज्जित घरों में रहने लगे, कुओं से पानी पीते थें, और कनान के सात राष्ट्रों के अंगूर की बारियों के मालिक बने (व्यवस्थाविवरण 6:10-12; यहोशू 24:11-13)। परमेश्वर ने सात देशों को नष्ट कर दिया और इस्राएल को अपना वचन मानने की शर्त पर उनका स्थान लेने का आशीर्वाद दिया। फिर भी इतना महत्वपूर्ण और गहन राजनीतिक ज्ञान दुनिया के किसी भी विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जाता है।

बाद में, कई अवसरों पर, और आखिरी बार सन 70 में, परमेश्वर ने इज़राइल, अर्थात् यहूदियों को राष्ट्रों में बिखेर दिया, और उनमें से अधिकांश आबादी आज भी उन्हीं देशों में कायम है। उन्होंने अपनी ज़मीन, चुने हुओं के रूप में परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता, अपना आत्मविश्वास और साहस, और वे लाभ जो उन्हें अन्य सभी देशों से स्पष्ट रूप से श्रेष्ठ बनाते थे, सब कुछ खो दिया। क्यों? क्योंकि उन्होंने अपने चारों ओर के राष्ट्रों के मूर्तिपूजक रीति-रिवाजों को अपनाने के लिए परमेश्वर का भय मानना छोड़ दिया और उसकी आज्ञाओं को, और विशेषकर सुसमाचार को नहीं माना!

परन्तु अमेरिका जो खानाबदोश असभ्य लोगों द्वारा बसाया गया एक जंगली महाद्वीप हुआ करता था, बड़ी तेजी से विकसित हुआ और एक प्रमुख कारण से पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान और सबसे शक्तिशाली राष्ट्र बन गया – कैसे? जब इस्राएल पर मूसा या दाऊद या हिजकिय्याह जैसे धर्मनिष्ठ राजा राज्य करते थें, उसके बाद से अगर किसी और देश ने अन्य किसी भी देश की तुलना में परमेश्वर के वचन का सबसे अधिक प्रचार और पालन किया, तो वह अमेरिका है। अमेरिकी चमत्कार के लिए इस कारण के अलावा किसी अन्य कारण की कल्पना करना मूर्खता है (भजन 33:12)।

मूर्तिपूजक और ग़ैर-ईसाई बाकि सब देश, जिन्होंने पढ़ना, लिखना, गणना करना, निर्माण या कोई आविष्कार नहीं किया था, वे केवल प्रगति को होता देख सकें, और वे अमेरिकी और यूरोपियन लोगों द्वारा किए आविष्कारों और जीवन को आसान बनानेवाले उपकरणों को समझने में भी असमर्थ थे। कौन-सी बात से यह भिन्नता है? हजारों वर्षों से अस्तित्व में रहें ग़ैर-ईसाई देशों ने कभी पहिये के बारे में क्यों नहीं सोचा? वे अपना सामान कुत्तों द्वारा खींचे जाने वाले ट्रैवोइस पर ले जाते थे। वे गाड़ी, रेल या हवाई जहाज के बारे में कभी सोच भी नहीं पाएं।

अमेरिका से पहले, इंग्लैंड था, जहां बाइबल का प्रकाशन, पठन, प्रचार और व्यापक रूप से पालन भी किया जाता था। ये दोनों राष्ट्र अंधकार के युग के बाद के चमत्कार थे। अंधकार का युग वह है जब रोमन कैथोलिक धर्म ने यूरोप को एक हजार वर्षों से भी अधिक समय तक अंधा और गुलाम बनाए रखा था। उनके घरों और सार्वजनिक विचार-विमर्शों में बुद्धि का परामर्श हुआ करता था, उनकी अदालतों और स्कूलों में बुद्धिमत्ता का बोलबाला था, सरकार और कानूनों में समझ थी, और उनकी अर्थव्यवस्थाओं और सेनाओं में किसी भी राष्ट्र की तुलना में अधिक ताकत थी।

विश्वव्यापी ब्रिटिश साम्राज्य में सूरज कभी डूबता नहीं था, जिसका शासन दुनिया के लगभग सभी देशों पर हुस करता था। अमेरिका ने कुछ दशकों में एक जंगल को पृथ्वी पर सबसे स्वतंत्र, उत्पादक, समृद्ध और शांतिपूर्ण राष्ट्र में बदल दिया, जो हार के किसी डर के बिना कई मोर्चों पर कई दुश्मनों के खिलाफ युद्ध लड़ने में पारंगत था। यह कोई किस्मत की बात या संयोगमात्र नहीं था, न ही मानवीय चालाकी थी, बल्कि परमेश्वर की महान कृपा थी।

लेकिन अब, जब दोनों राष्ट्र पूरी तरह से पतन की ओर अग्रसर हैं, तो इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है – उन्होंने अपने पूर्वजों के परमेश्वर और उनकी बाइबल को त्याग दिया है। दोनों राष्ट्र गर्भपात से लेकर समलैंगिक विवाह तक, श्रमिक संघों से लेकर दिवालियापन के संरक्षण तक, मूर्तिपूजक छुट्टियों से लेकर स्कूलों में प्रार्थना पर पाबंदी तक, गंदे मनोरंजन से लेकर परमेश्वरविहीन शिक्षा तक, और नपुंसक अधिकार से लेकर भ्रमित नागरिक अधिकारों तक सब प्रकार की दुष्टता को बढ़ावा दे रहे हैं।

जो चर्च बचे हैं उनमें से अधिकांश मर चुके हैं और केवल धार्मिक रीति-रिवाजों तक सीमित हैं। पिन्तेकुस्त और करिस्माटिक आन्दोलन की बकवास से पीड़ित हैं, और पापों में मरे हुए और सांसारिक लोगों को आकर्षित करने के लिए जितना सम्भव हो सके समझौता कर लेते हैं। दोनों राष्ट्र धार्मिक रूप से अंतिम दिनों के विनाशकारी समय की चपेट में हैं (2 तीमु 3:1 – 4:4)। पतन अभी तक पूरी तरह से नहीं हुआ है इसका कारण यह है कि उनमें अब भी धर्मीजनों का अंश और उनकी प्रार्थनायें बची हुई हैं (उत्पत्ति 18:23-33; यिर्मयाह 29:4-7; 1 तीमु 2:1-2)। बेबीलोन की शांति के लिए प्रार्थना करें!

प्रत्येक वर्ष और प्रत्येक चुनाव भ्रम, अज्ञानता, मूर्खता और नैतिक पतन की खाई में और भी अधिक गिरावट को प्रमाणित करता है। अब अमेरिका और इंग्लैंड में कोई दिव्य परामर्श, दिव्य बुद्धि और दिव्य समझ नहीं पाई जाती। वित्तीय शुद्धता और धन लगभग ख़त्म हो गए हैं। सैन्य शक्ति जो थी उसका केवल एक अंश मात्र बाकि है। पिछली पीढ़ियों की तुलना में घर और संस्थान मज़ाक बन कर रह गएँ हैं। आपके सामने जो नीतिवचन है वह बीते दिनों के इज़राइल, इंग्लैंड और अमेरिका का सबसे बेहतर चित्रण प्रस्तुत करता है।

राजनीतिक बुद्धि और ज्ञान के इस ईश्वर-प्रेरित नियम से और अधिक शिक्षा प्राप्त करने के लिए, किसी भी पीढ़ी के किसी भी राष्ट्र की तुलना करें। उनके सामान्य धार्मिक व्यवहार को बाइबल या उसके सिद्धांतों के प्रति निष्ठा से मापें, और फिर परमेश्वर द्वारा परिभाषित उनके समग्र परामर्श, खरी बुद्धि, समझ और ताकत की योग्यता को निर्धारित करें। देश देश के बीच परमेश्वर के संप्रभु चुनाव को भी न भूलें। अस्थायी पथभ्रष्टता केवल अपवाद हैं, क्योंकि वे अब भी इस नीतिवचन के सामान्य नियम की पुष्टि करते हैं।

कैथोलिक और प्रोटेस्टेंट राष्ट्रों की तुलना कैसे की जाती है? मुस्लिम और ईसाई राष्ट्रों की तुलना कैसे की जाती है? बौद्ध धर्म, हिंदू धर्म, जीववाद, पूर्वज पूजा, जादू-टोना आदि के पीछे चलनेवाले वाले राष्ट्रों के बारे में क्या? इस नीतिवचन में केवल परमेश्वर द्वारा दी गई चार लक्षणों की परिभाषा को याद रखें। परामर्श, बुद्धि, समझ और समर्थ में अंतर स्पष्ट नज़र आएगा।

ख्रिश्चन पाठक! आप स्वयं परमेश्वर के वचन पर ध्यान देकर व्यक्तिगत रूप से परामर्श, खरी बुद्धि, समझ और सामर्थ में प्रगति कर सकते हैं (भजन 1:1-6; 19:7-11; 119:1-176)। आपके पास उन लोगों को देने के लिए सत्य के कुछ निश्चित शब्द हो सकते हैं जो आपसे कोई प्रश्न पूछते हैं (नीतिवचन 22:17-21; 1 पतरस 3:15)। आप स्त्री रूपी बुद्धि के वचनों में अपने बच्चों प्रशिक्षित करके एक बुद्धिमान वंश का निर्माण भी कर सकते हैं (व्यवस्था 6:4-9; भजन 34:11; इफिसियों 6:4), जो उन्हें दूसरों से अलग करेगा (व्यवस्था 5:5-10)।

बाइबल परमेश्वर की ओर से अपने बच्चों के लिए बुद्धि और ज्ञान का उपहार है, और इसे पढ़ना, इस पर मनन करना, इसे याद रखना, इसका प्रचार करना, इसका बचाव करना और इसका पालन करना आपका सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्य और सबसे गौरवशाली सौभाग्य है। यह इस अंधेरी दुनिया में एकमात्र ज्योति है (भजन 119:128; यशा 8:20; 1 तीमु 6:3-5; 2 पतरस 1:19-21)। अगर आप इससे बुद्धि प्राप्त कर लेते हैं, तो आप आपके सामने आने वाले किसी भी शत्रु, धर्म-शिक्षक या प्राचीन को अभिभूत कर देंगे (भजन 119:98-100। यह आपको बुद्धिमान बना सकती है और बनाएगी ही, यदि आप इसे पढ़ेंगे और इसके विश्वासयोग्य उपदेश पर ध्यान देंगे।

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