नीतिवचन 6:7

उनके न तो कोई न्यायी होता है, न प्रधान, और न प्रभुता करनेवाला,

क्या आप अपना काम आत्म-प्रेरित होकर शुरू करते हैं? या क्या किसी को आपको यह बताने की आवश्यकता है कि क्या करना है? और फिर उसे करना याद दिलाया जाता है? आज आपको ऐसा क्या काम करना चाहिए जिसे आपको याद दिलाने की किसी और को ज़रूरत न पड़े? आज आपको ऐसा क्या करने की जरूरत है कि कोई और उसे करने के लिए आगे नहीं बढ़ेगा? क्या आप उस काम को करेंगे? और उसे अच्छी तरह से करेंगे? क्या आपको अपनी इस जिम्मेदारी का पर्याप्त बोध है कि आपको क्या करना है इस विषय में जानकारी ले लें?

इस नीतिवचन में सुलैमान आलसी लोगों की तुलना चींटियों से करते हुए उनकी निंदा करना और उन्हें चेतावनी देना जारी रखता है (नीतिवचन 6:6-11)। इन छोटे जीवों को यह बताने के लिए कि उन्हें आज क्या करना है और कैसे करना है, हर सुबह सभा बुलाने की जरूरत नहीं होती है। वे काम पर जाती हैं और काम पूरा करती हैं, उसे बख़ूबी करती हैं, और अभी! उन्हें शायद ही बाइबल के अर्थशास्त्र को समझने की आवश्यकता है, क्योंकि उन्होंने वर्षों पहले ही बाइबल के नियमों के प्रति खुद को प्रतिबद्ध कर लिया।

चींटियाँ कठोर परिश्रम, कमखर्ची और बचत में एक उत्कृष्ट सबक और उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। हार्वर्ड या ऑक्सफोर्ड में जाकर एमबीए करने के बजाय, आपको चींटियों के बाँबी के पास जाकर चींटियों का निरीक्षण करने की आवश्यकता है। वे पूरी गर्मियों में कड़ी मेहनत करती हैं ताकि पतझड़, सर्दी और वसंत के दौरान अपनी जरूरतों पहले से ही जमाकर रख सकें (नीतिवचन 6:8; 30:25)। वे कड़ी मेहनत करती हैं, कम खपत करती हैं और ज्यादा बचत करती हैं। ये तीनों चरित्र-लक्षण महान सद्गुण हैं।

और वे इसे बिना किसी से मार्गदर्शन के करती हैं। चींटियों को परिश्रम, मितव्ययिता और बचत की याद दिलाने के लिए उन पर कोई हाकिम या प्रबंधक नहीं होता है। वे ये सब काम ईश्वर की बुद्धिमान रचना से निर्मित स्वाभाविक बुद्धि से कर लेती हैं। यह शर्म की बात है कि अधिकांश युवा इन छोटे जीवों के गुणों की नकल तक नहीं कर पाते। सुलैमान ने अपने बेटे को ऐसे मानव-आलसियों के बारे में चेतावनी दी जो कटनी के दौरान काम नहीं करते (नीतिवचन 10:5; 20:4)।

बहुत से लोग ऐसे हैं जिन्हें काम करने के लिए मजबूर करना पड़ता है, काम करने के लिए याद दिलाना पड़ता है, किस काम को कैसे करना है यह बताना पड़ता है, खराब तरीके से किए गए कामों के लिए फटकार लगानी पड़ती है, काम को सही तरीके से कैसे करना है यह उन्हें याद दिलाना पड़ता है, और उनसे लगातार काम करवाने के लिए उनपर लगातार नज़र रखनी पड़ती है (नीतिवचन 6:9-11; 20:13)। वे हारे हुए हैं। वे दूसरों के लिए पीड़ा और समस्या हैं। सर्दी या सिरदर्द जैसी मामूली बातों के लिए वे पूरे एक दिन की छुट्टी लेंगे। अगर बॉस कही बाहर गया हो, तो वे टाइमपास करते हैं। ये आलसी लोग हैं।

तो वही कुछ लोग ऐसे हैं जो अपनी पूरी कमाई फिजूलखर्च में उड़ा देते हैं, ज्यादातर सुख-विलास में (नीतिवचन 21:17,20; 23:21)। वे आज मनोरंजन और गेम्स खेलने के लिए अपने क्रेडिट कार्ड का उपयोग कर अगले महीने की तनख्वाह खर्च कर देते हैं। उनके जैसे अन्य लोग मूर्खतापूर्ण योजनाओं में अपना धन निवेश कर बैठते हों जो उन्हें और उनके परिवार को लूट लेगी (नीतिवचन 28:19)। यह उनके दिमाग में कभी नहीं आया कि सारी आमदनी खर्च करने की कोई जरूरत नहीं है।

ये दोनों किस्म के लोग – आलसी और फिजूलखर्ची – मौसेरे भाई हैं। वे दोनों आर्थिक बर्बादी के परिवार से आते हैं (नीतिवचन 18:9)। वे चींटियों से बहुत कुछ सीख सकते हैं, लेकिन वे इतने घमंडी हैं कि ऐसे मामूली जीवों के सद्गुण पर विचार करने में खुद को छोटा महसूस करते हैं, हालाँकि राजा सुलैमान ने यह निरिक्षण किया! वे इतने घमण्डी और नींद के इतने आदी हैं कि कोई भी तर्क उन्हें विश्वास नहीं दिला पाएगा (नीतिवचन 26:16)।

बचत करना कोई सुझाव नहीं है। यह एक आज्ञा है (नीतिवचन 6:8; 30:25)। चींटियाँ यह बचन उस सहज प्रवृति या सहज ज्ञान के द्वारा करती हैं जिसे परमेश्वर ने उनमें डाला है। भले लोग इसे उस उस सत्य की कायलता के कारण करते हैं जो परमेश्वर ने उन्हें प्रकट किया है। परन्तु ज्यादातर मनुष्य, खासकर आज के समय में, बचत नहीं करते हैं। उनमें आर्थिक मामलों को लेकर कोई बुद्धि नहीं है।

यह शर्म की बात है कि अधिकांश देश अपने राजस्व से कहीं अधिक खर्च करते हैं। यह शर्म की बात है कि देनदारों का सम्मान किया जाता है और उनकी रक्षा कीं जाती है, जबकि लेनदारों को परेशान किया जाता है और उन्हें सताया जाता है। यह शर्म की बात है कि हमारे देश में अमीरों के कर्ज़ माफ किये जाते हैं, जबकि किसानों को कर्ज़ के बोझ तले आत्महत्याएँ करनी पड़ती है। फिर भी जो बुद्धिमान, कुलीन चरित्र और दृढ़ विश्वास वाले हैं उनपर ऐसी बातों का कोई असर नहीं पड़ता, वे बचत करना जानते हैं (नीतिवचन 11:16; 19:14; 21:20)।

माता-पिता, ये आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप अपने बच्चों को कड़ी मेहनत, बुद्धिमान दूरदर्शिता, खर्च करने में अनुशासन और निरंतर बचत करने जैसी बातें सिखाए। ये चार सरल सद्गुण उनके भविष्य की आर्थिक और व्यक्तिगत सफलता के लिए किसी भी अन्य प्राकृतिक निवेश की तुलना में अधिक परिणामकारक सिद्ध होंगे। केवल पढ़ाई में उनकी मदद करने तक अपने को सीमित न रखें – जिसका वे कभी उपयोग नहीं करेंगे और जो केवल उनके दिमाग को लाभदायक शिक्षा से विचलित करती है। उन्हें चींटी के बारे में सिखाओ!

आलसी और फिजूलखर्ची करनेवाले का इलाज सरल और स्पष्ट है। उन्हें भूखा रखो। और वे जल्द ही परिश्रम और बचत दोनों गुण सीख जाएंगे। यह परमेश्वर की बुद्धि है, और मानवतावादी शॉर्टकट रास्ते जैसे सरकारी स्कूलों की शिक्षा, बाल कल्याणकारी योजनाएं, रोजगार योजनाएं, और छात्रवृत्ति किसी काम नहीं आएगी (नीतिवचन 20:4; 2 थिस्स 3:6-14)। मसीही दान-धर्म केवल परमेश्वर के कार्यों तक ही सीमित होता है, आलसियों पर बर्बाद करने के लिए नहीं, और अगर किसी की आर्थिक सहायता करनी भी हो तो केवल आवश्यक चीजों लिए, खिलौनों या मनोरंजन के लिए नहीं।

नीतिवचन 30:27 में टिड्डियों की भी प्रशंसा की गई है जिनका कोई राजा या प्रधान नहीं होता, फिर भी उनमें सामाजिक सहयोग और मिलजुलकर काम करने का गुण होता है, क्योंकि टिड्डियां झुंड बनाकर आगे बढ़ती हैं। लेकिन चींटी को उसके महान परिश्रम और मितव्ययिता के कारण उसक दो बार उल्लेख किया गया है, जो भविष्य पर बुद्धिमानी से अपनी दृष्टि लगाकर वर्तमान में परिश्रम करती है (नीतिवचन 6:8; 30:25)। इस सरल पाठ को सीखें और दूसरों से आनेवाली आर्थिक परेशानी से बचें।

पौलुस ने चेतावनी दी कि हर एक मनुष्य अपना बोझ खुद ही उठाए (गला 6:5)। आप अपनी असफलता के लिए, चाहे आर्थिक रूप से हो या आध्यात्मिक, अपने माता-पिता, शिक्षकों या पास्टर को दोष नहीं दे सकते। यह विशेष रूप से सच है यदि आपके माता-पिता अच्छे थे और आपको एक सच्ची कलीसिया में शिक्षा और संस्कार दिए गए थे। जितने ज्यादा मौके आपको मिले थे, एक सिद्ध और निष्पक्ष परमेश्वर आपको उतना ही अधिक दण्ड देगा (लूका 12:47-48)।

प्रिय पाठक, क्या ऐसा कुछ है जो आज आपको करना चाहिए परन्तु आप नहीं कर रहे हैं? क्या किसी को आपको फिर से बताने की ज़रूरत है? क्या आपको उसे करने के लिए अधिकारियों या हालातों से दंडित किए जाने की आवश्यकता है? चींटी पर विचार करो, और वही करो जो तुम्हें करना चाहिए। आप अपने परिश्रम में स्वाभाविक और आध्यात्मिक दोनों ही रूप से वास्तव में आशीष पाएँगे। आपको अपने आत्मिक कर्तव्यों को पूरा करने के लिए विशेष रूप से सरगर्म होना चाहिए।

यीशु मसीह ही एकमात्र परम व्यक्ति है जो अपना काम खुद होकर शुरू करता था। वह शुरू से ही अपने पिता की आज्ञा मानने पर केंद्रित था, जिसे उसने मंदिर में बारह वर्ष की आयु में ही दिखाया। और उसने ऐसा तब किया जब उसकी माँ और यूसुफ उसे समझ नहीं पाएं, और जिन्होंने लक्ष्य की ओर उसका ध्यान खींचने में उसकी कोई मदद नहीं की (लूका 2:49; यूहन्ना 4:34)। अपने स्वर्ग के पिता की सेवा करने के अपने बोझ के बारे में वह क्या कहता है, सुनें: “जिसने मुझे भेजा है, हमें उसके काम दिन ही दिन में करना अवश्य है; वह रात आनेवाली है जिसमें कोई काम नहीं कर सकता” (यूहन्ना 9:4)।

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