नीतिवचन 4:25

तेरी आँखें सामने ही की ओर लगी रहें, और तेरी पलकें आगे की ओर खुली रहें।

आपकी दृष्टि कैसी है? विवरण, दूरी या गहराई को भूल जाइए। आपकी दिशात्मक दृष्टि कैसी है? क्या आप सीधा देखते हैं, या आपके पास परिधीय दृष्टि है, अर्थात दाएं-बाएँ, ऊपर-नीचे की सब चीजें दिखाई देती हैं? परिधीय दृष्टि, या अपनी आंख के कोने से आस-पास की चीजों को देखना, वाहन चलाते समय और खेल-क्षेत्र के लिए अच्छी बात है, लेकिन ख्रिश्चन व्यक्ति के लिए यह एक भयानक दुर्गुण है। तुम्हें केवल एक ही वस्तु देखनी चाहिए – परमेश्वर, उसका राज्य और उसकी धार्मिकता।

अपनी पूरी लगन से अपने मन की रक्षा करने की आज्ञा देने के बाद (नीतिवचन 4:23), उपदेशक और राजा सुलैमान ने बाएँ या दाएँ की ओर के परिधीय विचलनों के खिलाफ चेतावनी दी (नीतिवचन 4:26-27)। आपको अपनी दिशा सीधी ठहरानी होगी और उस रास्ते पर चलते रहना होगा – प्रभु परमेश्वर यहोवा और उसके पुत्र यीशु मसीह को प्रसन्न करने के एकमात्र लक्ष्य की ओर। अपना ध्यान सीधे आगे की ओर केंद्रित करें।

“आँखें” और “पलकें” अंगांगिवाचन हैं, जहां किसी चीज़ का एक हिस्सा संपूर्ण अंग का प्रतिनिधित्व करता है। सुलैमान हमारी आंखों की पुतलियों को ढकने वाली त्वचा की छोटी परत की बात नहीं कर रहा था। उसका तात्पर्य हमारे दिल और दिमाग और आत्मा से था। वह हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व की बात कर रहा था। इस अध्याय के अंतिम आठ वचनों में, उसने कान, आंखें, हृदय, मांस, मन, मुंह, होंठ, पलकें, पैर और हाथ को सूचीबद्ध किया है।

आपकी आंखें वस्तुओं की पहचान करती हैं और आपकी शारीरिक गतिविधियों को उनकी ओर तो ले जाती हैं या उनसे दूर करती हैं, लेकिन यह आपका दिल और दिमाग है जो आपकी आंखों से प्रतिक्रिया देता है और प्रतिक्रिया पाता है। मन और आँखों को अलग नहीं किया जा सकता। यह आपका समग्र व्यक्तित्व है, आँखें शामिल हैं, दिल और दिमाग शामिल हैं, जिसे आपको ज्ञान और सच्चाई के रास्ते पर रखना ज़रूरी है। अपना ध्यान सीधे आगे की ओर केंद्रित करें।

प्रभु यीशु ने बिलकुल सरल शब्दों में आत्मिक परिधीय दृष्टिकोण के विरुद्ध शिक्षा दी। और अवश्य है कि आप अपनी आत्मा के लिए उत्तम दृष्टिकोण के महान उदाहरण के रूप में उसकी ओर देखना देखें (इब्रानियों 12:1-4)। उनके वचनों का संदर्भ आपको उनका अर्थ और व्यावहारिक उपयोग सिखाएगा (मत्ती 6:19-24)।

“शरीर का दीया आँख है : इसलिये यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा। परन्तु यदि तेरी आँख बुरी हो, तो तेरा सारा शरीर भी अन्धियारा होगा; इस कारण वह उजियाला जो तुझ में है यदि अन्धकार हो तो वह अन्धकार कैसा बड़ा होगा” (मत्ती 6:22-23)।

संदर्भ पर ठीक ठीक विचार करें। उसने पृथ्वी पर धन जमा करने की भर्त्सना की, जबकि आप स्वर्ग में खजाना जमा कर सकते हैं, क्योंकि जहाँ आपका धन है आपका मन भी वही लगेगा (मत्ती 6:19-21)। और साथ ही उसने इस बात का खंडन किया कि कोई भी व्यक्ति दो स्वामियों – परमेश्वर और धन की सेवा कर सकता है (मत्ती 6:24)। चाहे आप परमेश्वर से प्रेम करें या धन से, जीतने के लिए आपको दोनों में से किसी एक के ही प्रति पूरी पूरी प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है। आप दोनों के प्रति समान प्रतिबद्धता नहीं रख सकते।

यीशु ने तर्क दिया, यदि किसी व्यक्ति की स्वाभाविक दृष्टि उसकी शारीरिक गतिविधियों को चलाती है, तो ऐसा अंधापन एक भयानक चीज़ है, क्योंकि शरीर नहीं जान सकता कि कहाँ जाना है। आध्यात्मिक रूप से विचार करने पर, एक ऐसी दृष्टि जो अविभाजित ईमानदारी और परमेश्वर के प्रति उत्साह से भरी है, वह पवित्रता की ओर ले जाएगी, लेकिन पाखंड और सांसारिक वासनाओं की दोहरी दृष्टि विनाश की ओर ले जाएगी। उद्धारकर्ता की चेतावनी पर ध्यान दें।

इतिहास की पुस्तक में सैनिकों के एक अस्पष्ट संदर्भ पर विचार करें। जबूलून 50,000 योद्धाओं को ले आया जो दाऊद के प्रति एक मन थे (1 इति. 12:33)। वे सभी मूल्यवान हथियारों के साथ युद्ध में विशेषज्ञ थे, और वे अनुशासित दर्जा रखने में सक्षम थें। उनमें कोई मिश्रित भावनाएँ नहीं थीं। वे घर जाने के बारे में नहीं सोच रहे थे। वे किसी और चीज़ के बारे में नहीं सोच रहे थे।

यीशु नतनएल को देखकर आनन्दित हुआ, क्योंकि उसका मन कपट, ढोंग और दुचित्ते मन से मुक्त था (यूहन्ना 1:47)। वह एक सच्चा इस्राएली था, जो अपने परमेश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित था। जीवन में यह अमिश्रित उद्देश्य एक समर्पित ख्रिश्चन मनुष्य का प्रतीक है जो यीशु मसीह की दृष्टि में बहुत मूल्यवान है।

ख्रिश्चन जीवन एक दौड़ है (1 कुरिन्थ 9:26; इब्रानियों 12:1)। जीतने के लिए, धावकों को प्रतिस्पर्धियों या अन्य चीजों से विचलित हुए बिना सीधे आगे देखना अवश्य होता है। पौलुस परमेश्वर की उच्च बुलाहट का पुरस्कार जीतने के लिए, इधर-उधर देखे बिना आगे की बातों की ओर बढ़ता हुए निशाने की ओर दौड़ा चला जाता था (फिल 3:13-14), और उसने सांसारिक चीजों के लिए परिधीय दृष्टि रखने वाले लोगों को पेट के पुजारियों के रूप में वर्णित किया (फिल 3:18-19)।

दुष्ट मनुष्य दुचित्ते होते हैं (भजन 12:1-2)। वे पूरी तरह से परमेश्वर और आध्यात्मिक चीज़ों के प्रति समर्पित नहीं रहते। उनके हृदय अभी भी इस संसार और इसकी चीज़ों के प्रति लालसा रखते हैं। वे दैहिक मानसिकता वाले हैं, और वे अपने दिलों में अनुग्रह का बहुत कम सबूत दिखाते हैं। आप उन्हें आसानी से पहचान सकते हैं, क्योंकि वे कभी भी परमेश्वर के बारे में उतने जुनून से बात नहीं करते हैं जितनी लगन से वे अपनी चीज़ों के बारे में बात करते हैं।

याकूब ने दुचित्ता होने या अपने जीवन के लिए एक से अधिक लक्ष्य रखने के खिलाफ दो बार चेतावनी दी (याकूब 1:8; 4:8)। उसने कहा कि दुचित्ता मनुष्य अपने सभी काम-काजों में चंचल और अस्थिर होता है, और वह हमें उपदेश और उलाहना देता है कि हम अपने उद्देश्यों को केवल एक लक्ष्य तक सीमित रखने में सिद्दत से यत्न करते रहें (याकूब 4:8-10)।

हव्वा अपनी भटकती आँखों के कारण बहक गई थी (उत्पत्ति 3:6)। लूत की पत्नी पीछे मुड़कर देखने से खुद को रोक नहीं सकी (उत्पत्ति 19:17,26)। आकान ने बेबीलोन का सामान और पैसा देखा जिससे उसकी जान चली गई (यहो 7:21)। और दाऊद ने एक रात अपनी छत से जिसे देखा उसे अपने शयनकक्ष में ले आया (2 शमू 11:2)। इन लोगों ने अपनी नज़र सीधे परमेश्वर और उसके उपदेशों पर केंद्रित नहीं रखी।

परमेश्वर से आपकी प्रार्थना यह होनी चाहिए कि वह आपकी आँखों को व्यर्थ की बातों को देखने से सुरक्षित रखे (भजन 119:37)। आँखों की अभिलाषा मनुष्य की बड़ी बड़ी परीक्षाओं में से एक है (1 यूहन्ना 2:15-17)। पवित्रता की खोज में अय्यूब इतना सावधान था कि उसने युवा, आकर्षक महिलाओं के बारे में न सोचने के प्रति अपनी आँखों से वाचा बाँधी (अय्यूब 31:1)। उसकी तुलना झूठे शिक्षकों से करें (2 पतरस 2:14)।

प्रथम कलीसिया, जो पवित्र आत्मा के सामर्थ्य से चलती थी, परमेश्वर और एक दूसरे के साथ एक ही मन रखती थी (प्रेरितों 2:46)। सब विश्वासी मसीह की सेवा करने की समर्पित और एकमात्र महत्वाकांक्षा में एक-चित्त थे। आसपास की चीज़ें उन्हें विचलित नहीं करतीं थीं। पौलुस ने यहूदियों और अन्यजातियों को, भले ही उनमें छोटे-मोटे मतभेद थें, एक ऐसा ही मन रखने का उपदेश दिया (रोमियों 15:5-6)।

धर्मपरायण मनुष्य एक-चित्त से अपने स्वामियों की सेवा करते हैं (इफिसियों 6:5; कुलुस्सियों 3:22)। काम करते वक्त उनका एकमात्र लक्ष्य परमेश्वर को प्रसन्न करना होता है, चाहे बाकि लोग कुछ भी सोचें या करें। वेतन-वृद्धि या पदोन्नति उनका मुख्य उद्देश्य नहीं होता है, क्योंकि वे परमेश्वर से पुरस्कार पाने को बहुत अधिक महत्व देते हैं। वे इस बात की कहीं अधिक परवाह करते हैं कि उनके नियोक्ता उन्हें अपनी आज्ञा का पालन करते हुए देख सके (इफिसियों 6:6)।

प्रिय ख्रिश्चन, आपकी दृष्टि और प्रगति को कौन-सी बात विचलित करती है? आपको केवल एक ही लक्ष्य की आवश्यकता है – पवित्र जीवन से परमेश्वर को प्रसन्न करना और स्वर्ग के लिए तैयारी करना। अपनी आंखों पर पट्टी बांध लें और अपनी आंखें और चाल बिलकुल सीधी रखें। केवल आगे की ओर देखें – केवल ऊपर की ओर – और केवल स्वर्ग की ओर। ऊपर देखो और मसीह के लिए पुनर्जीवित जीवन जियो जिसकी प्रतिज्ञा तुमने अपने बपतिस्मा के समय की थी (कुलुस्सियों 3:1-4)।

जब प्रभु यीशु पृथ्वी पर था तब क्या उसके जीवन में कोई अन्य लक्ष्य या उद्देश्य थे? बिलकुल नहीं! क्या उसके आस-पास की चीज़ें उसका ध्यान भटकाती थीं? कभी नहीँ! हालाँकि उसे शैतान द्वारा भोजन, सम्मान और महिमा प्रदान की गई थी, फिर भी वह अपने एक लक्ष्य के प्रति पूरी तरह से विश्वासयोग्य रहा – एक सिद्ध जीवन और मृत्यु के द्वारा अपने पिता को प्रसन्न करना। हालेलूयाह! इस महान आदर्श और उसकी एक-चित्त दृष्टि का अनुसरण करें।

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