नीतिवचन 4:24

टेढ़ी बात अपने मुँह से मत बोल, और चालबाज़ी की बातें कहना तुझ से दूर रहे।

अपने होठों के द्वार की रखवाली करें। अपनी ज़ुबान पर क़ाबू रखें। अपने शब्दों पर ध्यान दें। पूरी शिद्दत से अपने मन की रखवाली करने की आज्ञा के बाद, जिस में से जीवन के विचार-विषय निकल आते हैं, सुलैमान ने भक्तिहीन बातों से दूर रहने की चेतावनी दी (नीतिवचन 4:23)। मन के विचारों और उद्देश्यों के विषय में निर्देशों से आरम्भ करने के पश्चात्, बुद्धि की आज्ञा है कि आप अपने मुँह की बातों (नीतिवचन 4:24), अपनी आँखों (नीतिवचन 4:25), और अपने पावों (नीतिवचन 4:26-27) की रखवाली करें।

शुद्ध मन के बिना भक्तिपूर्ण और अनुग्रहपूर्ण वाणी का होना असंभव है, क्योंकि मन की भावनाएँ और विचारों की विषयवस्तु मुँह से प्रकट होती हैं (मत्ती 12:33-35)। आप किसी व्यक्ति के मन की अच्छाई को उसके मुँह के शुद्ध और अनुग्रहपूर्ण शब्दों से पहचान सकते हैं, और आप कठोर या कामुक शब्दों से एक बुरे मन को पहचान सकते हैं। यीशु ने कहा; इस पर विश्वास करो। जो शुद्ध मन से मनोहर बातें बोलता है, उस से राजा प्रेम रखता है (नीतिवचन 22:11)।

यह नीतिवचन आपको टेढ़े मुंह वालों और टेढ़े होंठ वालों से दूर रहने की चेतावनी नहीं दे रहा है, क्योंकि यह सम्मति अन्य वचनों में दी गई है (नीतिवचन 14:7; 19:27; 1 कुरिंथ 15:33)। यह नीतिवचन आपको चेतावनी देता है कि आप अपने खुद के टेढ़ी बातें बोलनेवाले मुंह और टेढ़े होठों से छुटकारा पा लें। इस नीतिवचन का सन्दर्भ यह है कि आप अपने मन, होठों, आँखों और पैरों पर शासन करें (नीतिवचन 4:23-27), यह उनसे बचने के विषय में नहीं है जो ऐसे पापों में लिप्त हैं।

सुलैमान ने अपने बेटे को शिक्षा दी और उससे कहा कि वह अपने पिता की शिक्षा को सुने और उसके अधीन रहे (नीतिवचन 4:20)। फिर उसने उसे उसके वचन याद रखने और अपने संकल्प में दृढ़ रहने के लिए प्रेरित किया (नीतिवचन 4:21)। और उसने यह कहकर उसे प्रोत्साहित किया कि यह उसे जीवन और स्वास्थ्य देगा (नीतिवचन 4:22)। और फिर उसने अपने पुत्र से कहा कि वह अपने मन, होठों, आंखों और पावों की रक्षा करे (नीतिवचन 4:23-27)।

एक मूर्ख मुँह आपकी प्रतिष्ठा को बर्बाद कर देगा (सभोपदेशक 5:3; 10:12-14)। एक घिनौनी बात मनुष्यों के लिए मुसीबत खड़ी कर देगी (नीतिवचन 12:13; 13:3; 14:7; 18:6-7; 22:10; 24:9)। और जब आपका न्याय होगा तब आपको अपने मुंह से लिकली एक एक निकम्मी बात का लेखा देना होगा (नीतिवचन 6:16-19; मत्ती 12:36-37; इफि 5:3-6)।

अनुग्रहपूर्ण और बुद्धिमानी से कहीं गई बातें आपकी प्रतिष्ठा का निर्माण करेगी (नीतिवचन 15:4; 18:20; 24:26)। उचित शब्द लोगों के साथ आपके संबंध को बढ़ाएंगे (नीतिवचन 10:32; 15:23; 16:13; 25:11)। और धन्य परमेश्वर निर्माण करनेवाले और कल्याणकारी वचनों से प्रसन्न होता है (नीतिवचन 12:22; इफि 4:29; कुल 4:6)।

यदि आप बहुत बोलते हैं तो अपने शब्दों को कम करके अपनी वाणी में सुधार करें (नीतिवचन 17:27; याकूब 1:19)। और फिर आपको अवश्य है कि आप अपनी भावनाओं पर क़ाबू रखें, क्योंकि भावनाएं नरक की-सी आग भड़का सकती हैं (नीतिवचन 16:32; याकूब 3:3-8)। और अंत में, आपको वाद-विवाद से बचना है (नीतिवचन 26:4-5; 2 तीमु 2:23)।

यदि आप अपने मन को प्रभु और मनुष्य के साथ मेल-मिलाप की स्थिति में बनाए रखते हैं, तो कठोर या पीड़ादायक बातें बोलना आपके लिए कठिन हो जाएगा। यदि आप अपने हृदय को प्रभु और मनुष्य के साथ शुद्ध रखते हैं, तो आपके लिए मूर्खतापूर्ण या कामुक वाणी में बातें करना कठिन हो जाएगा। यदि आप अपने मन (दिमाग) को भली बातों से भरते हैं, तो आपके पास दूसरों से वार्तालाप के लिए बहुमूल्य विषयवस्तु होगी (फिलि 4:8)। परमेश्वर आपके जीभ की रखवाली करे।

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