नीतिवचन 4:23
सबसे अधिक अपने मन की रक्षा कर; क्योंकि जीवन का मूल स्रोत वही है।
आपका मन तय करता है कि आपका जीवन कैसा होगा। यह नीतिवचन सबसे महत्वपूर्ण नीतिवचनों में से एक है। आपके जीवन में सुख-समृद्धि होगी या दुःख और मुसिबते यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप अपने मन की रक्षा करते हैं या उसे बेक़ाबू छोड़ देते हैं, उसे धर्म के मार्ग पर चलने प्रशिक्षित करते हैं या आप उसके निर्देशों पर चलते हैं। यदि आप परमेश्वर की व्यवस्था से अपने मन को प्रशिक्षित करते हैं और निर्देशित करते हैं, तो परमेश्वर और मनुष्यों के सामने आपकी संभावित सफलता की कोई सीमा नहीं होगी।
आपके जीवन का हर-एक पाप आपके मन से शुरू होता है, और आपका चरित्र और मुँह के शब्द आपके मन का प्रतिबिंब है। आप केवल थोड़े समय के लिए अपने मन से अलग होने का दिखावा कर सकते हैं, क्योंकि इसकी फितरत ही होती है कि वह आप पर तेज़ी से क़ाबू पा ले और आपके कामों को दिशा दे। आपकी जानकारी के सब लोग आपके शब्दों को सुनकर और आपके फैसलों को देखकर आपके मन को जान लेते हैं।
दाऊद परमेश्वर के मन के अनुसार मनुष्य था (प्रेरितों 13:22)। क्या ही शानदार पहचान है! आपका जीवन लक्ष्य यही होना चाहिए। कैसे? दाऊद सावधानीपूर्वक आत्म-परीक्षण करने, अपने पापों को मान लेने, प्रार्थना करने, मित्रों का चुनाव करने, भजन और गीत गाने आदि के द्वारा अपने मन की रक्षा करता था (पढ़ें, भजन 4:4; 9:1; 15:2; 17:3; 19:8,12,14; 24:4; 26:2; 27:3,8,14; 28:7; 32:11; 34;18; 37:31; 51:10,17; 57:7; 61:2; 62:8,10; 66:18; 77:6; 84:2; 86:11-12; 101:2-5; 108:1; 111:1; 112:7-8; 119:11,32,36,63,111; 139:23-24; 131:1; 141:4-5).
आपका मन आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है, क्योंकि यह आपके लिए इतना कुछ कर सकता है जितना कि बाकी चीजें नहीं कर सकती। यह आपके सीने में एक मिनट में 70 बार धड़कने वाली मांसपेशी नहीं है। आपको अपने भीतर के उस आतंरिक मनुष्यत्व पर विचार करने और उसे महत्व देने की ज़रूरत है जो कुछ चीज़ों से प्रेम रखता है और जिसे दूसरी चीज़ों के मुक़ाबले वही चीजें करना ज्यादा अच्छा लगता है। अपना मन अच्छी बातों पर लगाना सीखें (कुलुस्सियों 3:2; मत्ती 6:21)।
आप अपने मन को या तो नेक रख सकते हैं, या आप उसे बुरा बनने दे सकते हैं। आप इस उद्यम में या तो मेहनती हो सकते हैं, या आप आलसी हो सकते हैं। परमेश्वर की संतानों में एक पुराना मनुष्यत्व है जो उन्हें बुराई के लिए लुभाता है, लेकिन उनका नया मनुष्यत्व है जो उन्हें भक्ति और पवित्रता के लिए आव्हान करता है। आपके मन को अक्सर इन्हीं दो विकल्पों के बीच निर्णय लेना होता है। हर व्यक्ति हर दिन नाना प्रकार के निर्णय लेता है। आज आप क्या करने जा रहे हैं?
आपके मन में जो कुछ भी है वही आपके जीवन में प्रकट होता है। अगर आपका मन अच्छी चीज़ों से भरा है, तो आपका जीवन उस अच्छाई को दिखाएगा; अगर आपका मन पापी विचारों से भरा है, तो आपका जीवन उन्हें दिखाएगा। जीवन में कई बार आपके सामने आने वाली बड़ी परीक्षाएँ और निर्णय आपके मन पर निर्भर करते हैं, और इसी तरह वे छोटे-छोटे चुनाव भी जो आप दिन में सैकड़ों बार करते हैं।
क्या आपका मन शुद्ध है? क्या आप आज इसे शुद्ध रखने के लिए सतर्कता से परिश्रम कर रहे हैं? क्या आप जानते हैं कि इस मामले में लापरवाही आपके जीवन में गंभीर मुसीबत और पीड़ा को ले लाएगा? आपको अपने मन में नकारात्मक बातों को जाने देने से रोकना होगा जैसे कि बॉलीवुड-हॉलीवुड मनोरंजन, मूर्ख या पापी मित्र और आजकल का गन्दा संगीत। आपको अपने मन को बाइबल, प्रार्थना, भक्ति-गीत और धर्मी मित्रों से भरना चाहिए।
यीशु मसीह ने फरीसियों की निंदा की जो मनुष्य के बाहरी रूप पर ज़ोर देते थें; उसने मनुष्य के बाहरी रूप को महत्त्व देने बजाय मन को महत्व दिया। उसने दो अलग-अलग अवसरों पर निम्नलिखित वचन कहें :
हे साँप के बच्चो, तुम बुरे होकर कैसे अच्छी बातें कह सकते हो? क्योंकि जो मन में भरा है, वही मुँह पर आता है। 35भला मनुष्य मन के भले भण्डार से भली बातें निकालता है, और बुरा मनुष्य बुरे भण्डार से बुरी बातें निकालता है।
मत्ती 12:34-35
किन्तु जो मनुष्य के मुँह से बाहर आता है, वह उसके मन से निकलता है। यही उसको अपवित्र करता है। 19क्योंकि बुरे विचार, हत्या, व्यभिचार, दुराचार, चोरी, झूठ और निन्दा जैसी सभी बुराईयाँ मन से ही आती हैं।
मत्ती 15:18-19
पाप की शुरुआत मन में होती है। पाप की वासना आपके मन को आकर्षित करती है, इसलिए आप इसके बारे में सोचते हैं। यदि आप किसी पाप बारे में पर्याप्तरूप से सोच लेते हैं, तो आप उसे करेंगे भी। ऐसे फैसले का परिणाम मृत्यु है। अपने मन को पापपूर्ण विचारों से पूरी लगन से बचाकर स्वयं की रक्षा करें (याकूब 1:13-16)। परमेश्वर ने मनुष्य की दुष्ट कल्पनाओं के कारण ही पृथ्वी को जलप्रलय से डुबों कर विनाश कर दिया (उत्पत्ति 6:5), इसलिए हर एक बुरी कल्पना से बैर रखें।
बुरे मन के बारे में सोचें और देखें कि यह कैसे जीवन के विभिन्न मूल-स्रोतों को प्रभावित करता है। यौन कल्पनाएँ सिर्फ गंदगी, व्यभिचार, परस्त्रीगमन या अपने जीवनसाथी को धोखा देने की ओर ले जाएँगी – यह सब इसलिए क्योंकि आपने अपने मन में पापी विचारों को आने दिया। दूसरों के प्रति कड़वाहट, उन चीज़ों का लालच करना जो आपके पास नहीं हैं, घमंड, अत्यधिक महत्वाकांक्षा, ईर्ष्या और इन जैसे अन्य पापों के बारे में भी यही सच है।
यदि आप पाप के बारे में नहीं सोचते हैं, तो आप पाप नहीं करेंगे। यदि आप संभावनाओं पर विचार नहीं करते हैं, तो आप उन प्रलोभनों से दूर रहेंगे जो आपका विनाश कर सकते हैं। यह नियम सभी पापी वासनाओं और कार्यों पर लागू होता है, चाहे वह यौन कल्पनाएँ हों या किसी अन्य व्यक्ति के प्रति नाराज़गी। जितना कम आप अपने मन में पापी शब्दों या कार्यों पर विचार करेंगे, उतना ही आप उन पापों के खिलाफ प्रतिकारशक्ति को विकसित करेंगे। अपने मन पर क़ाबू रखना आपके आचरण को दिशा देगा।
यदि आप परमेश्वर और पवित्र पर विचार करते हैं, तो उसे प्रसन्न करने की लगनभरी और तत्पर इच्छा के साथ, आपका जीवन आपकी वाणी और कार्यों में अधिक से अधिक धार्मिकता को प्रकट करेगा। यदि आप किसी अन्य व्यक्ति के बारे में केवल दयालु और प्रेमपूर्ण बातें सोचते हैं, तो आप उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगे। यह आपके मन में कड़वाहट या नाराजगी को बढ़ने देने के विपरीत है। यदि आप अपना मन परमेश्वर, उसकी आराधना और उनके लोगों पर लगाते हैं, तो आपका आचरण बेहतर और बेहतर होता जाएगा।
आप अपना मन शुद्ध कैसे रख सकते हैं? इसे पाप की ओर ले जाने वाले प्रभावों से बचाएँ (भजन 101:3; 1 कुरिंथ 15:33), और इसे पवित्रता की ओर ले जाने वाले प्रभावों से भर दें (भजन 119:11,63; 101:6)। बुरी चीज़ों से दूर रहें, और अपना समय अच्छे विचारों और चीज़ों के साथ बिताएँ (फिलिप्पियों 4:8)। यह वास्तव में काफी सरल है, लेकिन इसे करने के लिए दृढ़ व्यक्तिगत समर्पण और अनुशासन की आवश्यकता होती है।
चूँकि मूर्खता के बारे में सोचना भी पाप है (नीतिवचन 24:9), और दूसरी स्त्री की इच्छा करना आपके मन में व्यभिचार करना है (मत्ती 5:28), इसलिए आपको अक्सर अपने मन की जाँच करनी चाहिए और प्रभु से सहयता की दुहाई देनी चाहिए (भजन 139:23-24)। वचन को पढ़ने, उस पर मनन करने और उसे याद करने के द्वारा उसे अपने मन में छिपाकर रखना आपको पापी विचारों से और भी अधिक सुरक्षित रखेगा (भजन 119:9,11,15,105)।
यीशु मसीह आपके मन को साफ़ साफ़ देख सकता है (इब्रानियों 4:12-13), इसलिए यदि वह एक विश्वासयोग्य मन देखता है तो वह परिश्रम को प्रतिफल देगा (2 इतिहास 16:9), और यदि वह एक मन में मूर्तियों को स्थापित देखता है तो वह ऐसी मूर्खता को दण्ड देगा (यहेजकेल 14:3-8)। यह सोचना मूर्खता है कि वह आपके मन के हर विचार और कल्पना को नहीं देखता (यिर्मयाह 17:9-10; प्रकाशितवाक्य 2:23)। वह आपको आपसे बेहतर जानता है।
जैसे दाऊद ने अपने मन की रक्षा कीं, वैसे ही आप भी अपने मन की रक्षा कर सकते हैं और उसे सिद्ध बना सकते हैं। याद रखें, वह अपन आत्म-परिक्षण करने, अपने पापों को स्वीकार करने, प्रार्थना करने, परमेश्वर के वचनों में आनंद लेने, केवल धर्मी मित्रों को चुनने, परमेश्वर को धन्यवाद देने और उसकी स्तुति के गीत गाने में बड़ा सावधान और विश्वासयोग्य था। मन को ऐसे अनुशासन में रखने की आदत आपके मन को नेक और धर्मी बनाए रखेगी, और उसकी रक्षा करने के लिए परमेश्वर से अनुग्रह मिलता रहेगा।
सुलैमान ने हमें सिखाया कि हम हर दिन अपने मन को परमेश्वर का भय मानने में प्रशिक्षित करें। उन्होंने एक स्थान पर लिखा, “तू अपने मन को पापपूर्ण व्यक्तियों से ईर्ष्या मत करने दे, किन्तु तू यहोवा से डरने का जितना प्रयत्न कर सके, कर” (नीतिवचन 23:17)। प्रेरित यहूदा ने इसे इस तरह से कहा: “….जो तुम्हें अनन्त जीवन तक ले जाएगी परमेश्वर की भक्ति में लीन रहो” (यहूदा 1:21)। यदि आप पाप को अपना मन कठोर बनाने देते हैं, तो आप परमेश्वर से प्रेम करना और उसका भय मानना छोड़ देंगे (इब्रानियों 3:12-13)। इस नीतिवचन को कभी न भूलें, और परमेश्वर की सहायता और सामर्थ्य से, पूरी शिद्दत से अपने मन की रक्षा करें।
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