नीतिवचन 4:21

इनको अपनी आँखों से ओझल न होने दे; वरन् अपने मन में धारण कर।

आप सुलैमान की इस सलाह बारे में क्या सोचते हैं? क्या आप इसे अपना लक्ष्य बनाएँगे? क्या आप इसे अपने मन में सब वस्तुओं से अधिक प्रिय समझेंगे? सुलैमान यहाँ अपने बेटे को गम्भीर शब्दों में यह सलाह और चेतावनी दे रहा है (नीतिवचन 4:20-22)। बचपन और जवानी चंचल हैं: युवा इतने मूर्ख होते हैं कि उनकी आंखें और मन कही भी और किधर भी बड़ी आसानी से भटक जाते हैं (नीतिवचन 17:24; सभो 11:10)। इस बुद्धिमान पिता ने पूरा पूरा यत्न किया की वह अपने बेटे का ध्यान बुद्धि, ज्ञान और समझ के महान लक्ष्यों पर केंद्रित कराए। छानबीन

आपकी आँखें वे माध्यम हैं जिनके ज़रिये आपका पूरा शरीर चीजों को देखता है। दृष्टि आपको वह क्षमता देती है जिससे आप आपके सामने जो है उसे देखते और उसके अनुसार अपने शरीर को चलाते हैं। लोग बड़ी जद्दोजहद करते हैं और यहाँ तक कि बड़ी क़ीमत भी चुकाते हैं सिर्फ़ इसलिए कि चीजों को स्पष्ट रूप से देख सकें, क्योंकि उनकी शारीरिक कुशलताएँ उतनी ही उपयोगी होती हैं जितनी कि उनकी आँखें उनके शरीर को चलाने में सक्षम होती हैं। हाथ और आँख का मिलकर काम करना सबसे कीमती वरदान है, और शारीरिक समर्थता का एक निश्चित संकेतक माना जाता है।

शारीरिक आँखों के महत्व का उदाहरण देकर, लोग अपने जीवन की प्राथमिकताएँ निर्धारित करने और सही फैसले लेने का वर्णन करने के लिहाज़ से मानसिक आँखों का आलंकारिक अर्थ से उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई परामर्शदाता या शिक्षक कहता है, “अपनी नज़र लक्ष्य पर रखो,” तो इसका मतलब यह समझा जाता है कि उस व्यक्ति ने अपने जीवन में जो जो ठान रखा है उसे उन्हीं लक्ष्यों पर अपना ध्यान लगाना है। उसके कहने का मतलब यह नहीं है कि उससे सलाह लेने आए व्यक्ति या छात्र को किसी दृश्य वस्तु को बिना पलक झपकाए घूरते रहना है। निर्धारित लक्ष्य पर अपनी दृष्टि केंद्रित करना, उस लक्ष्य की पूर्ति के लिए सभी फैसलों के साथ, किसी भी उद्दम में सफलता का मार्ग है (1 कुरिन्थ 9:24-27)।

आपकी मानसिक आँखें आपके जीवन की अगुवाई करती हैं और आपकी प्राथमिकताएँ निर्धारित करती हैं, इसलिए आपकी आँखें अपने लक्ष्य – बुद्धि – पर केंद्रित होनी चाहिए, अन्यथा आप जीवन में हार जायेंगे। यीशु मसीह ने इसे इन शब्दों द्वारा सिखाया: “शरीर का दीया आँख है : इसलिये यदि तेरी आँख निर्मल हो, तो तेरा सारा शरीर भी उजियाला होगा। 23परन्तु यदि तेरी आँख बुरी हो, तो तेरा सारा शरीर भी अन्धियारा होगा; इस कारण वह उजियाला जो तुझ में है यदि अन्धकार हो तो वह अन्धकार कैसा बड़ा होगा! कोई मनुष्य दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकता, क्योंकि वह एक से बैर और दूसरे से प्रेम रखेगा, या एक से मिला रहेगा और दूसरे को तुच्छ जानेगा। तुम परमेश्वर और धन दोनों की सेवा नहीं कर सकते” (मत्ती 6:22-24)।

इस नीतिवचन में एक और रूपक है. सुलैमान ने अपने पुत्र से कहा, कि वह उसके वचनों और सूक्तियों को अपने मन में धारण करे। आपका शारीरिक हृदय (मन) आपके शरीर को ज़िन्दा रखता है, क्योंकि हृदय शरीर के समस्त अंगों एवं कोशिकाओं में शुद्ध रक्त प्रवाहित करता है जो आपके शरीर का जीवन है (नीतिवचन 14:30; लैव्य 17:11)। जब हृदय (मन) का उल्लेख आलंकारिक भाषा में किया जाता है तब इसका तात्पर्य प्रेम या उस स्थान से होता है, जहाँ से आप अपने जीवन के फैसले लेते हैं और जहाँ आप उन चीजों को चुनते हैं जो आपको प्रिय हैं या जिन्हें आप मूल्यवान समझते हैं। जो मनुष्य बुद्धिमान है वह बुद्धि से प्रेम करता है और उसे अत्यधिक महत्व देता है (नीतिवचन 4:6; 8:17,21,36)।

आपकी आँखों के समान ही, आपका मन भी एकाग्र होना चाहिए – इसे एक लक्ष्य पर केंद्रित होना चाहिए। चूँकि बुद्धि और परमेश्वर को प्रसन्न करना इस संसार में जो कुछ भी है उसके ठीक विपरीत है, अत: आप दोनों लक्ष्यों को प्राप्त करने का प्रयास करने में सफल नहीं हो सकते। आपको अपने हृदय को दोहरे मन से हटाकर एक ही लक्ष्य पर लगाना अवश्य होता है (याकूब 4:8), क्योंकि दोहरे मन वाला व्यक्ति अपने सभी तरीकों में अस्थिर होता है (याकूब 1:8)। आप परमेश्वर को प्रसन्न करने के लिए अपनी आँखों और मन को कितना ध्यान-केंद्रित रखते हैं (व्यवस्थाविवरण 6:4-9; इब्रानियों 12:1-3)?

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