नीतिवचन 30:9

ऐसा न हो कि जब मेरा पेट भर जाए, तब मैं इन्कार करके कहूँ कि यहोवा कौन है? या अपना भाग खोकर चोरी करूँ, और अपने परमेश्वर का नाम अनुचित रीति से लूँ।

अमीरी और गरीबी दोनों ही हानिकारक हैं। धन इंसान को खुद पर भरोसा रखने और आत्म-सुरक्षा की ओर ले जाता है, जिसके कारण मनुष्य परमेश्वर यहोवा को भूल जाता है। तो एक ओर, दरिद्रता हताशा की ओर ले जाती है, जिसके कारण मनुष्य चोरी करने और परमेश्वर के नाम की निन्दा करने के बारे में सोचने लगता है। एक बुद्धिमान व्यक्ति इन दोनों खतरों से बचने के लिए परमेश्वर से सफलता का आवश्यकता नुसार एक मध्यम भाग मांगेगा। हे प्रभु ऐसी सद्बुद्धि दो!

यह वचन आगूर की उस प्रार्थना की व्याख्या करती है जिसमें वह जीवन में दो चीज़ें मांगता है (नीतिवचन 30:7-9)। उसने सबसे पहले पाप से मुक्ति के लिए प्रार्थना कीं – व्यर्थ और झूठी बात; फिर उसने प्रतिदिन की रोटी माँगी – न तो निर्धन कर और न धनी बना (न गरीबी, न अमीरी)। यहाँ एक बुद्धिमान मनुष्य का इस बात को लेकर एक सचेत प्रतिबिंब है कि उसे जीवन में किन बातों की ज़रूरत है। उसने उनके लिए परमेश्वर से प्रार्थना कीं। उसने यह आत्मिक बुद्धि सिख ली थी कि मध्यम सफलता ही उचित है।

उसे केवल एक ही बात का भय था – पाप! वह न तो अमीरी की मुसीबतों से डरता था, न ही गरीबी की कठिनाई और शर्म से। इस पर अच्छी तरह विचार करें। वह उन दोनों से डरता था कि कही दोनों के कारण वह पाप करने की परीक्षा में न पड़े। यहाँ व्यावहारिक पवित्रता है जो आपकी आत्मा को कायल और उत्तेजित करने पाए। दोनों चरम सीमाओं से मुक्ति पाने परमेश्वर का नाम और सेवा उसका प्राथमिक मुद्दा था। परमेश्वर के साथ उसका रिश्ता किसी भी आर्थिक स्थिति से कहीं अधिक महत्वपूर्ण मुद्दा था। प्रभु, यह व्यवस्था ऐसी ही रहने दो!

केवल मूर्ख ही सोचते हैं कि धन उन्हें परमेश्वर की सेवा करने में मदद करेगा। सारे साक्ष्य इसका खंडन करते हैं। फिरौन अपनी पीढ़ी का सबसे धनी व्यक्ति था, लेकिन उसने अक्षरशः कहा, “यहोवा कौन है?” जब परमेश्वर ने इस्राएल को आशीष दी, तो उन्होंने विद्रोह किया और उसे भूल गए। ” परन्तु यशूरून मोटा होकर लात मारने लगा; तू मोटा और हृष्ट–पुष्ट हो गया, और चर्बी से छा गया है; तब उसने अपने सृजनहार ईश्वर को तज दिया, और अपने उद्धारमूल चट्टान को तुच्छ जाना” (व्यव. 32:15)।

धन भयानक परीक्षा है और अक्सर उन मनुष्यों के लिए एक अभिशाप होता है जो परमेश्वर का भय मानते हैं और पवित्रता से प्रेम करते हैं (व्यव. 6:10-12; 8:10-14; 31:20; नहे 9:25-26; अय्यूब 31:24-28)। यीशु ने इस संसार की चिन्ताओं और धन के धोखे के विषय में साफ़ साफ़ चेतावनी दी कि वे किस प्रकार वचन को दबा देते हैं (मत्ती 13:22)।

धनवान युवा शासक, जब उसका सामना अपने धन या प्रभु दोनों में से किसी एक ही को चुनने से हुआ, यीशु से दूर चला गया (मत्ती 19:16-22)। कितना घोर चुनाव है! यीशु ने कहा कि परमेश्वर के राज्य में धनवान के प्रवेश करने से ऊँट का सूई के नाके में से निकल जाना सहज है (मत्ती 19:23-24)। परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको सफलता और धन से डरना, बिना किसी प्रलोभन में आये यीशु मसीह से प्रेम करना और उसके पीछे चलना सिखाए ।

आपके जीवन का एक पहलु आपका आर्थिक जीवन है। लेकिन जब आप कोई व्यवसाय करते हैं, तो उसकी ओर ऐसे देखें मानों आपके पास कुछ नहीं है; जब आपको रुपयों का उपयोग करना हो, तो खर्च पर संयम रखें (1 कुरिन्थियों 7:29-31)। जीवन में किसी भी बात की चिन्ता न करना आपका लक्ष्य होना चाहिए ताकि प्रभु को बेहतर ढंग से प्रसन्न कर सके (1 कुरिन्थियों 7:32)। आप दो स्वामियों की सेवा नहीं कर सकते, इसलिए एक धनवान क्रिश्चन बनने का लक्ष्य मूर्खता है (मत्ती 6:24; 1 तीमु 6:6-10)।

सन्तोषसहित भक्ति सच्ची सफलता है (1 तीमु 6:6)। सन्तोषसहित भक्ति सीखो! संतोषी व्यक्ति धनवान की तुलना में हमेशा अधिक आनंदी रहता है। और उसे उन बातों की चिंता नहीं है जिनकी चिंता धनवान करता है। यहोवा ने प्रतिज्ञा की है कि वह आपके साथ रहेगा, इसलिए आपके पास जो है उसी में संतुष्ट रहे (इब्रानियों 13:5)। अगर वह युगानुयुग के लिए आपका भाग है, पृथ्वी या स्वर्ग में ऐसा और कुछ भी नहीं है जो मायने रखता है, या जिसकी कोई कीमत हो (भजन 73: 25-26) पौलुस ने मसीह की सामर्थ से अपने जीवन के लिए यही संतोष सीखा (फिल 4:11-13)।

क्या आप अपनी ज़रूरतों की वस्तुएं पाकर संतुष्ट हैं? याकूब ने भोजन और वस्त्र के लिए प्रार्थना की (उत्पत्ति 28:20-22)। यीशु ने हमें प्रतिदिन की रोटी के लिए प्रार्थना करना सिखाया (मत्ती 6:11)। और पौलुस ने तीमुथियुस को प्रोत्साहित किया कि वह भोजन और वस्त्र से सन्तोष करे (1 तीमुथियुस 6:8)। बुद्धिमान वही है, जो आशीषित कहलाए जाने के लिए धन की खोज नहीं करता(1 राजा 3:10-13)। अपने लक्ष्य सही रखे; और बाकी सब परमेश्वर पर छोड़ दें।

एक पल के लिए भी यह मत सोचो कि आपने एक समर्पित मसीही बनने के लिए दुनिया की चीजों को त्याग कर बहुत बड़ी क़ुरबानी दी है, जैसा कि पतरस ने कभी किया था। यीशु ने प्रतिज्ञा की कि वह आपको इस संसार में 10,000% और आनेवाले जगत में अनन्तकाल का जीवन देगा (मरकुस 10:28-31)। यही वह वास्तविक चुनाव और इनाम है जिसके लिए जीना और मरना चाहिए। धनवान युवा शासक ने सबकुछ खो दिया। परन्तु आप विजेता हो सकते हैं।

आज के समय में अमेरिका में शायद ही किसी को गरीबी का डर है। परन्तु आप इस बात की भी लालसा करेंगे कि परमेश्वर आपको आर्थिक सिक्के के उस पहलू से बचाए, कहीं ऐसा न हो कि आप अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पाप करने की परीक्षा में पड़े। मसीही होने का दावा करनेवाले के रूप में ख्याति पाना और उसी समय अपनी जीविका के लिए चोरी करने या अन्य वित्तीय अपराध करने के लिए बदनाम हो जाना कितना शर्मनाक है। इस नीतिवचन में चोरी का आरोप लगने पर उससे इनकार करने के लिए झूठी शपथ खाने का डर भी शामिल है (नीतिवचन 29:24; निर्ग 22:10-12; लैव 5:1; 1 राजा 8:31-32)।

अगर आपके पास निर्वाह के लिए पर्याप्त साधन हैं, तो चोरी करने, लालच करने, गरीबों को देने से इंकार करने, चर्च में दान न देने, या अन्य वित्तीय पाप में पड़ने जिनसे परमेश्वर की निंदा होती है, की परीक्षाएं कम होंगी। कभी कभी कम सफलता के लिए प्रार्थना करना भी बुद्धिमानी है ताकि धर्मीजन परीक्षाओं में पड़ने से बच जाए (भजन 125:3)। भोजन और वस्त्र और अन्य बुनियादी आवश्यकताएं ही हमारी वास्तविक ज़रूरतें हैं ताकि आर्थिक भ्रष्टाचार के पाप से बच जाएँ।

प्रिय पाठक, आगुर की प्रार्थना के आत्मिक वज़न पर विचार करें। कई मसीही लोग गरीबी से छुटकारा पाने के लिए प्रार्थना करते हैं। लेकिन समृद्धि न मिले ऐसी प्रार्थना बहुत कम लोग करते हैं। क्या लालच और लोभ के इस युग में गरीबी और समृद्धि के खिलाफ प्रार्थना करना मनुष्य के लिए संभव है? क्या आप ऊपर की बातों से प्रेम रखते है (कुलुस्सियों 3:2)? या क्या आप सांसारिक चीजों पर ध्यान देते हैं (फिलिप्पियों 3:18-19)? क्या आप शुद्ध विवेक से प्रार्थना कर सकते हैं?

बुद्धिमान मनुष्य मसीह के छिपे हुए आत्मिक खज़ाने को खरीदने के लिए अपना सब कुछ बेच देगा (मत्ती 13:44-46)। वह मानता है कि ऐसा चुनाव पूरी तरह से उसके पक्ष में है। जब संसार के लोग उससे उसका सारा शापित धन छीन लेते हैं तो वे ही अपना सबकुछ खो देते हैं। वह इस सौदे में अपना प्राण बचा लेता है (मत्ती 16:26)। वह महिमा का सच्चा धन पाकर जीत जाता है, जो कि तुम में निवास करनेवाला मसीह है, जो महिमा की आशा है (कुलुस्सियों 1:27)।

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