नीतिवचन 30:4
कौन स्वर्ग पर चढ़कर गया अथवा उतर आया? किसने पवन को अपनी मुट्ठी में इकठ्ठा किया? किसने जलों को वस्त्र में बांधा? किसने पृथ्वी की सारी सीमाओं को स्थापित किया? यदि तू बता सके, उसका नाम क्या और उसके बेटे का नाम क्या?
बुद्धि को कौन ढूंढ सकता है? कोई मनुष्य नहीं ढूंढ सकता! कोई मनुष्य नहीं ढूंढेंगा! अवश्य है कि परमेश्वर बुद्धि को किसी मनुष्य पर प्रगट करे। पौलुस ने कहा, “मनुष्यों में से कौन किसी मनुष्य की बातें जानता है, केवल मनुष्य की आत्मा जो उस में है? वैसे ही परमेश्वर की बातें भी कोई नहीं जानता, केवल परमेश्वर का आत्मा” (1 कुरि. 2:11)।
बुद्धि या सत्य की तार्किक व्याख्या या वैज्ञानिक खोज-प्रणाली व्यर्थ है। सच्चा ज्ञान और समझ केवल ईश्वर-प्रेरित प्रकाशन के द्वारा हैं। जब तक कि परमेश्वर स्वयं प्रगट न करें, मनुष्य सार्थक रूप से कुछ भी नहीं जानता। मनुष्य पर भरोसा मत रखों। अपना पूरा भरोसा यहोवा पर रखों। गुप्त बुद्धि और विश्व के गुप्त भेदों को जानने के लिए उसके और उसके वचन के पास जाओं (1 कुरि. 2:6-10)।
नीतिवचन 30 सुलैमान के नीतिवचनों का एक परिशिष्ट है। आगूर, जो एक बुद्धिमान मनुष्य था, उसने ईतीएल और उक्काल को सिखाया (नीति. 30:1)। उसके पाठ ईश्वर-प्रेरित बुद्धि हैं, क्योंकि वे “भविष्यवाणी” कहलाते हैं (नीति. 30:1; 31:1)। उसने सबसे पहले अपनी स्वाभाविक बड़ी अज्ञानता का अंगीकार करके अपने पाठों का परिचय दिया (नीति. 30:2-3), उसके बाद परमेश्वर और बुद्धि को ढूंढने में मनुष्य की अक्षमता को प्रमाणित किया (नीति. 30:4), और अन्त में ‘पवित्रशास्त्र’ की परम अनिवार्यता और पर्याप्तता को परिभाषित किया (नीति. 30:5-6)।
इस नीतिवचन में सात आलंकारिक प्रश्न प्रमाणित करते हैं कि कोई भी मनुष्य मानवीय प्रयासों से परमेश्वर और बुद्धि को नहीं ढूंढ सकता। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर एक स्पष्ट नकारात्मक है। कोई भी मनुष्य स्वर्ग पर चढ़कर नहीं गया, अथवा उतर आया, या प्रारम्भिक ज्ञान पर विजय हासिल की, कि परमेश्वर के मार्गों व बुद्धि को सीखे। आगूर ने ईतीएल और उक्काल को मजबूर किया कि तर्क के आधार पर स्वीकार करें कि ऐसा कोई मनुष्य नहीं हुआ है। वे किसी मनुष्य का नाम नहीं बता सकें जिसने ऐसी उपलब्धि हासिल की हो, और न ही वे उसके पुत्र का नाम बता सकें।
आगूर ने आगे सिखाया कि परमेश्वर का प्रत्येक प्रेरित ‘वचन’ शुद्ध और आवश्यक है (नीति. 30:5)। उस में से एक शब्द को भी मिटाया नहीं जा सकता था, और न ही उसका दरजा घटाया जा सकता था। परमेश्वर और उसके वचनों में भरोसा रखना, इस जगत में या आनेवाले जगत में ख़तरों के विरुद्ध सबसे निश्चित सुरक्षा थी। साथ ही, उसमें मनुष्य के शब्द जोड़े नहीं जाने थे, क्योंकि यह परमेश्वर के वचनों को भ्रष्ट कर देता, और वह क्रोधित होता (नीति. 30:6)। यदि आपको एक ऐसे बाइबल में विश्वास नहीं है जिसका प्रत्येक शब्द ताया हुआ है, तो आप सचमुच अन्धे और खोए हुए हैं।
ये सात आलंकारिक प्रश्न एक युक्ति हैं, जो विश्व के वास्तविक सत्य और बुद्धि को खोजने में मनुष्य की अक्षमता की शिक्षा देते हैं। चूंकि ज्ञान और समझ परमेश्वर से हैं, अतः उन्हें सीखने के लिए कौन मनुष्य स्वर्ग में ऊपर चढ़ गया, अथवा उन्हें सिखाने के लिए पृथ्वी पर वापिस लौटा? कोई भी नहीं! उसकी अपनी अज्ञानता का अंगीकार करने के पश्चात् (नीति. 30:2-3), उसने इन प्रश्नों का उपयोग किया ताकि सभी मनुष्यों को अज्ञानी कहकर उनकी भर्त्सना करें (नीति. 30:4)। बुद्धि नाशमान मनुष्यों की पहुंच से परे है।
तीन अत्यंत समान प्रश्नों पर विचार करें। “आहा! परमेश्वर का धन और बुद्धि और ज्ञान क्या ही गम्भीर हैं! उसके विचार कैसे अथाह, और उसके मार्ग कैसे अगम हैं! प्रभु की बुद्धि को किस ने जाना? या उसका मंत्री कौन हुआ? या किस ने पहिले उसे कुछ दिया है जिसका बदला उसे दिया जाए। क्योंकि उसकी ओर से, और उसी के द्वारा, और उसी के लिए सब कुछ है : उसकी महिमा युगानुयुग होती रहे : आमीन” (रोमि. 11:33-36)।
इन सात प्रश्नों के उत्तर मात्र “परमेश्वर” के नाम का उल्लेख करके नहीं दिए गए हैं। प्रथम दो प्रश्न पूर्णकाल में हैं, जो उन्हें मसीह की एक भविष्यवाणी होने से प्रतिबाधित करता है। न ही वे परमेश्वर की ओर संकेत हो सकते हैं, क्योंकि वह स्वर्ग और पृथ्वी को भरता है (यिर्म. 23:24)। वह न तो ऊपर चढ़ा न ही उतरा, क्योंकि वह एकसाथ दोनों जगहों पर पूरी तरह उपस्थित है। और उस के ऊपर चढ़ने या उतर आने का ज्ञान, समझ, और बुद्धि से क्या लेना-देना? कुछ भी नहीं!
प्रथम दो प्रश्न समन्वयकारी समुच्चयबोधक “या” से जुड़े हुए हैं, जो निश्चित ही एक परिकल्पित विकल्प का संकेत देता है। क्या परमेश्वर ऊपर चढ़ा? अथवा क्या वह उतरा? प्रश्नों को परमेश्वर पर लागू करने से उलझन उत्पन्न होती है। बल्कि प्रश्न का पूछा जाना मनुष्य के विषय में आलंकारिक प्रश्न है। कोई मनुष्य बुद्धि पाने के लिए स्वर्ग नहीं गया था, न ही कोई मनुष्य स्वर्ग से इसे पाकर आया। आगूर ने ईतीएल व उक्काल को सिखाया कि मनुष्य बुद्धि के लिए परमेश्वर पर पूरी तरह निर्भर है।
वह आगे बढ़ता है और परमेश्वर की महिमामय सृष्टि के समक्ष मनुष्य को नीचा दिखाता है। परमेश्वर के समान किस के पास वायु को उसकी मुट्ठी में बान्धने व नियन्त्रित करने के लिए बुद्धि और सामर्थ है? किसी के पास नहीं! परमेश्वर ने वायु का उदाहरण देकर अय्यूब की निम्नतर बुद्धि और सामर्थ प्रमाणित की (अय्यूब 37:14-24)। और दाऊद व यिर्मयाह ने उसी असम्भवता का उपयोग किया (भजन 135:5-7; यिर्म. 10:13; 51:16)।
परमेश्वर के समान किस के पास बुद्धि और सामर्थ है कि बादलों में बड़ी मात्रा में जल एकत्र करे? किसी में नहीं! परमेश्वर ने बादलों में जल का उदाहरण देकर अय्यूब की बुद्धि और सामर्थ को निम्न प्रमाणित किया (अय्यूब 36:24-33; 37:11-24; 38:33-37)। और दाऊद और यिर्मयाह ने मनुष्यों में बुद्धि की कमी को दिखाने के लिए उसी असम्भवता का उपयोग किया (भजन 135:5-7; 147:7-8; यिर्म. 10:13; 51:16)।
परमेश्वर के समान किस के पास पृथ्वी के सभी छोरों को स्थापित करने के लिए बुद्धि और सामर्थ है, कि नींव को रखे और इस पर निर्माण करे? किसी के पास नहीं! परमेश्वर ने इन्हीं का उदाहरण देकर अय्यूब की निम्न बुद्धि और सामर्थ को प्रमाणित किया (अय्यूब 38:4-7)। और सुलैमान ने जगत की सृष्टि करने और पर्वतों को स्थिर करने के लिए परमेश्वर के इसके उपयोग के द्वारा बुद्धि के विशाल मूल्य के विषय में समझाया (नीति. 8:25-26)।
क्या ऐसा कोई मनुष्य है? नहीं, एक भी नहीं! आगूर ने आगे ज़ोर देकर बताया। यदि ऐसा मनुष्य है, उसके पुत्र का क्या नाम है? यदि एक मनुष्य स्वर्ग पर चढ़ा होता और बुद्धि को ढूंढ लिया होता, तब निश्चित रूप से उसका पुत्र भी ऐसा ही होगा। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर नकारात्मक ही होने चाहिए। न कोई मनुष्य है और न ही कोई पुत्र जो इन बातों को जानता या समझता है। वे मनुष्य के लिए बहुत ऊँचे और अद्भुत हैं (भजन 131:1)।
इन सात प्रश्नों के उत्तर मात्र “परमेश्वर” के नाम का उल्लेख करके नहीं दिए गए हैं। मध्य के तीन प्रश्न परमेश्वर के विषय में सच हैं, परन्तु यह उसका वाद-विवाद नहीं है। आप ऊपर देख सकते हैं कि प्रथम दो प्रश्न एक आलंकारिक विकल्प का उत्पन्न करते हैं। अन्तिम दो प्रश्न एक अनुत्तरित दुविधा का उत्पन्न करते हैं। इन प्रश्नों के उत्तरों में “परमेश्वर” और “यीशु” का उल्लेख करने से हम क्या सबक सीखते हैं? कुछ भी नहीं! आगूर ने सिखाया कि ऐसा कोई भी मनुष्य या पुत्र नहीं है जिसके पास धन्य परमेश्वर की बुद्धि हो, जिसने समझ के द्वारा सभी चीजों की सृष्टि की।
मनुष्य के पास उसका अपना कोई ज्ञान या बुद्धि नहीं है, और वह अपने बल पर परमेश्वर का ज्ञान या बुद्धि ढूंढ नहीं सकता (यशा. 8:20)। आगूर जानता था कि यह उसके स्वयं और सभी मनुष्यों के विषय में सच है, अतः उसने इन आलंकारिक प्रश्नों के द्वारा उसके छात्रों को यकीन दिलाया। बुद्धि एक प्रकाशना की बात है : अवश्य है कि परमेश्वर इसे प्रेरणा के द्वारा दे (व्यवस्था 29:29)। और आगूर उस सिद्ध बुद्धि को परमेश्वर के पवित्रशास्त्र के ईश्वर-प्रेरित वचनों में पहचानने के द्वारा उसके परिचय का समापन करेगा (नीति. 30:5-6)।
परमेश्वर की बुद्धि इतनी ऊँचाई पर है कि कोई मनुष्य वहा तक नहीं पहुँच सकता (अय्यूब 11:5-12)। भले ही वह बहुत-सी जगहों में देखे और ढूंढे, तौभी वह इसे किसी प्राकृतिक उपायों से नहीं पायेगा (अय्यूब 28:12-28)। परमेश्वर की बुद्धि प्रेरणा के माध्यम से अलौकिक रूप से प्रगट की जाती है, और तब इसके लिए मनुष्यों को स्वर्ग की या समुद्र पार की यात्राओं की कोई ज़रूरत नहीं है (व्यवस्था 30:11-14; रोमि. 10:6-8)। कोई आश्चर्य नहीं कि दाऊद ने परमेश्वर के वचन को उसके लिए इतना अधिक आनन्दप्रद और बहुमूल्य समझा (भजन 19:7-11)।
जो यहाँ पर एक सनातन पीढ़ी की ओर संकेत देखते हैं, उन्होंने यहाँ मात्र भ्रम ही पाया है। ‘ओरिजन’ नामक मनुष्य के मतिभ्रम का समर्थन करने के लिए उनके घोर प्रयास पुनः अपर्याप्त पाए जाते हैं। परमेश्वर का अब तक एक पुत्र नहीं था, क्योंकि ‘वचन’ ने अब तक देहधारण नहीं किया था (लूका 1:35; यूहन्ना 1:14)। दाऊद और यशायाह जानते थे कि परमेश्वर का पुत्र भविष्य था (भजन 89:19-37; यशा. 7:14; 9:6)। जैसा कि बुद्धि के मानवीकरण को “मसीह” माना जाता है (भजन 8:22-31), वैसे ही अनेक मनुष्य रहस्यात्मक या आत्मिक इशारों की खोज करते हैं, जबकि वहाँ एक भी नहीं है।
आलंकारिक प्रश्न निरर्थक हैं, यदि उनका उत्तर मात्र “परमेश्वर” दिया जाता हैं। परमेश्वर और उस का ‘यहोवा’ नाम उन तीनों पुरुषों को भलीभांति ज्ञात था (नीति. 30:5, 9)। आगूर ने ईतीएल और उक्काल को ये नहीं सिखाया कि परमेश्वर ने वायु, बादलों, और पृथ्वी की सृष्टि की। वे पहिले ही इसे जानते थे। उसने उन्हें सिखाया कि किसी मनुष्य के पास सृष्टिकर्ता परमेश्वर की बुद्धि के निकट की बुद्धि भी नहीं थी। ये हमारा सौभाग्य और कर्तव्य है कि यहाँ एक गूढ़ कथन को देखें (नीति. 1:6), एक बचकाना प्रश्न पूछना नहीं।
चूंकि केवल परमेश्वर के पास असीमित बुद्धि है, जो इस नीतिवचन से अभिव्यक्त होती है, विवेकशील मनुष्य उसके प्रेरित पवित्रशास्त्र के अंशों का मूल्य समझेगा और संजोएगा (नीति. 30:5-6; मत्ती 4:4)। चूंकि प्रत्येक वचन पवित्र है, अतः आप उन में से कोई भी निकाल नहीं सकते (नीति. 30:5)। और आप से कहा गया है कि उसमें अपने शब्द न जोड़ें (नीति. 30:6)। उन में से न तो हटायें, और न ही उनमें जोड़ें (व्यवस्था 4:2; 12:32; प्रका. 22:18-19)। बाइबल से लिपटे रहे जिसका एक एक वचन ताया हुआ है और इस में के प्रत्येक नियम/निर्देश का पालन करें (भजन 119:128)।
बुद्धि प्राप्त करने के लिए कोई मनुष्य मात्र स्वर्ग पर नहीं चढ़ सकता, न ही वहा से उतर आ सकता है। परन्तु यीशु उतरा और फिर चढ़ा कि परमेश्वर के दाहिने हाथ बैठे (यूहन्ना 3:13; इफि. 4:9)। उसने सभी चीजें अपनी सामर्थ के द्वारा बनायीं; उसके द्वारा सभी चीजें बनी हुई हैं; और वह सारी चीजों को उसके सामर्थ के वचन के द्वारा सम्भालता है (यूहन्ना 1:3; कुलु. 1:17; इब्रा. 1:3)। उसमें बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं, और वह प्रत्येक चुने हुए के लिए बुद्धि ठहराया गया है (कुलु. 2:3; 1 कुरि. 1:30-31)।
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