नीतिवचन 30:32

यदि तूने अपनी प्रशंसा करने की मूर्खता की है, यदि तूने दुष्कर्म करने का षडयंत्र रचा है, तो अपने मुंह पर हाथ रख।

जब तक आपके पास कहने के लिए कोई शांतिपूर्ण और लाभदायक बात न हो, तब तक कुछ न बोलें, क्योंकि अहंकार या पाप में कही गई बातों से और भी अधिक अंधेर और नुकसान पहुँचता है। अगर आप किसी बात में दोषी हैं तो अपने शब्दों को बहुत सावधानी से और बहुत ही धीरज के साथ निकलने दें। आपके मुंह का प्रत्येक शब्द भलाई ही का हो।

यदि आपका विवेक या अन्य लोग आपको आपके अहंकार या दुष्टता के लिए टोकते और फटकारते हैं, तो अपने पापों के लिए कोई स्पष्टीकरण देने या उन्हें उचित ठहराने का प्रयास न करें। अपने आप को नम्र करें, अपनी गलती मान लें और डांटने वाले को धन्यवाद दें। अपना मुंह खोलकर मामले को और भी बदतर बनाकर अपना अपराध या शर्मिंदगी को न बढ़ाएं।

आपका मुंह आपके दिल और दिमाग का सुराख़ है। यदि आप अपने विचारों को वश में नहीं रख पाते हैं, तो कम से कम अपने मुँह को तो भी वश में रखें ताकि आप अपनी मूर्खतापूर्ण या दुष्टतापूर्ण सोच को अपने तक ही रख सकें, ऐसा न हो कि यह आपके आस-पास के लोगों को नुकसान पहुँचाए और आपका अपराध और भी बढ़ जाए। यह नियम इतना मूल्यवान है कि अगर मूर्ख अपने शब्दों पर संयम रखता है और चुप रहता है तो उसे भी बुद्धिमान समझा जा सकता है (नीतिवचन 17:27-28)।

आपकी जीभ एक ज्वाला बन सकती है जो जीवन–गति में आग लगा देती है, और नरक कुण्ड की आग से जलती रहती है (याकूब 3:6)। शब्द प्राणनाशक विष से भरे हो सकते हैं (याकूब 3:8)। आप अपने मुंह में मृत्यु और जीवन की शक्ति रखते हैं (नीतिवचन 18:21)। जहाँ बातें ज्यादा होती है, वहां अपराध भी अधिक होता है (नीतिवचन 10:19)। आप को अपने मुँह से निकले हर एक व्यर्थ शब्द का हिसाब देना होगा (मत्ती 12:36), जिसमें गंदे, मूर्खतापूर्ण शब्द और दूसरों का मज़ाक उड़ानेवाले शब्द भी शामिल हैं (इफि 5:3-7)।

अपने आप को ऊँचा उठाने की मूर्खता करने हा अर्थ है घमंड से फूल जाना और खुद को अपने अधिकारियों और दूसरों से श्रेष्ठ समझना। जब आप अपनी मूर्खता में आकर इतनी हद तक गिर जाते हैं, तो सबसे अच्छा विकल्प यही है कि आप बात करना बंद कर दें, अन्यथा आपका मुंह घमण्ड के अन्धकार में ऐसी ऐसी भड़काऊ बातें कहेगा जिससे केवल बहुत अधिक लड़ाई-झगड़ा ही हो सकता है। झगड़े रगड़े केवल अहंकार ही से होते हैं, वही सब झगड़ों की जड़ है (नीतिवचन 13:10), इसलिए जितने कम अहंकारी शब्द बोले जाएं उतना बेहतर है।

बुरा सोचना आपकी वह कल्पना है जिसमे आप निषिद्ध चीजों की कल्पना करते हैं या उनकी लालसा करते हैं, किसी व्यक्ति के भलें कार्यों को बिगाड़ देने के बुरे इरादे रखना, अपने अधिकारीयों के खिलाफ विद्रोह का षडयंत्र करना, या वे सब पाप जिनकी आप अपने मन में कल्पना करते हैं। मूर्खता का विचार भी पाप है (नीतिवचन 24:9)। यदि आप अपने विचारों को वश में रखने में विफल रहे हैं, तो आप अपनी बुराई को सार्वजनिक होने से रोकने के लिए अभी भी अपने मुँह को वश में रख सकते हैं।

अपने मुंह पर हाथ रखना अपनी बात ख़त्म करने और चुप रहने के लिए बाइबल में प्रयुक्त एक अभिव्यक्ति है। अय्यूब ने अपने तीनों दोस्तों से कहा कि वे उसके विरुद्ध अपने आरोपों को जारी रखने के बजाय अपने मुंह पर हाथ रखें (अय्यूब 21:5)। परमेश्वर के सामने आने पर अय्यूब ने स्वयं ऐसा किया (अय्यूब 40:4)। काम पर ऑफिस या जहाँ भी आप काम करते हो, वहाँ जब आपके अंदर अहंकार उमड़ रहा हो या पापपूर्ण विचार आ रहे हों तो आपको भी अपने मुंह पर हाथ रखना चाहिए।

इस नीतिवचन का सन्दर्भ एक महान राजा के अधिकार का वर्णन करता है (नीतिवचन 30:31)। बुद्धिमान लोग उसे अपनी उकसानेवाली बातों से क्रोध नहीं दिलाएंगे, क्योंकि उसके पास विनाश करने का सामर्थ्य है (नीतिवचन 16:14; 19:12; 20:2; सभो 8:2-5; 10:4)। इस चेतावनी में आपके शयनकक्ष में पड़े पड़े विचार करना या निजी बातचीत भी शामिल है (सभो 10:20)। अधिकार को मुंहतोड़ जवाब देना मूर्खता है, परन्तु विशेषकर सरकारी शासकों को (तीतुस 2:9)।

इस नीतिवचन का सन्दर्भ यह भी बताता है कि यदि क्रोध को भड़काया जाता है तो नतीजा निश्चित ही लड़ाई या युद्ध में तब्दील होगा (नीतिवचन 30:33)। बुद्धिमान मनुष्य सुनने में तेज़ और बोलने में धीमा होता है, क्योंकि वह जानता है कि क्रोध से भक्ति उत्पन्न नहीं होती (याकूब 1:19-20)। वह जानता है कि दिल में कलह पनपना केवल भ्रम और हर बुरे काम का कारण बनता है, इसलिए वह इस आग में अपने कटुवचनो की घी को डालने से बचता है (नीतिवचन 15: 1; जा 3: 14-18)।

इस नीतिवचन का कुल पाठ मूल्यवान है। शब्द अभिमानी होते हैं और बुरी कल्पनाओं के नतीजे सोच से भी आगे ले जाते हैं, दूसरों के प्रति ‘जैसे को तैसा’ की मनोवृत्ति के लिए उकसाते हैं, पीछे हटना असंभव हो जाता है, और क्षति की भरपाई करना मुश्किल होता है, जैसा कि आहत हुएँ भाइयों के साथ होता है (नीतिवचन 18:19)। इसलिए, आपकी जीभ तब तक आपके मुंह में चुप रहनी चाहिए जब तक कि कहने के लिए कोई शांतिपूर्ण और शुद्ध बात न हो।

जब अभिमान या बुराई जीभ पर चढ़ती है, तो उसके तीखे शब्द दूसरों को छेदते हैं, उन्हें अनावश्यक रूप से काटते हैं और युद्ध शुरू करते हैं। बुद्धिमानों की भाषा को चुनना बहुत बेहतर है, जो सभी सुनने वालों को अनुग्रह और स्वास्थ्य प्रदान करती है (नीतिवचन 12:18; 10:20-21; 16:24; कुलुस्सियों 4:6; इफि 4:29)।

आप कितने बड़े शांतिदूत हो सकते हैं, यदि आप हमेशा सबसे पहले अपना हाथ अपने मुंह पर रखें (नीतिवचन 15:1; 25:15)। लेकिन अफ़सोस, जो आग अंदर जलती है वह अक्सर बाहर निकलने के लिए तड़पती है और अपनों को ही भस्म कर देती है (भजन 39:1-3)। अगर शांति स्थापित करनी है, तो सुनने में तत्पर रहें और बोलने में धीमे रहें (याकूब 1:19-20)।

अहंकारी या बुरी वाणी के स्थान पर, यीशु मसीह की अनुग्रहपूर्ण और ज्ञानपूर्ण वाणी को चुनें, जो अब तक के किसी भी मनुष्य से श्रेष्ठ बातें बोलता था (भजन 45:2; 50:4; लूक 4:22; युहन्ना 7:46)। यह अनुग्रहपूर्ण और विनम्र शब्द ही हैं जो राजाओं का भी दिल जीत लेते हैं (नीतिवचन 11:16; 22:11; सभो 10:12)।

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