नीतिवचन 30:19

आकाश में उकाब पक्षी का मार्ग, चट्टान पर सर्प की चाल, समुद्र में जहाज़ की चाल, और कन्या के संग पुरुष की चाल।

पृथ्वी पर चार ऐसी विशेष अजूबे हैं, जिन पर विचार करना मन को विस्मय से भर देता है। भविष्यद्वक्ता आगूर, जब वह अपने दो शिष्यों को यह बोध दे रहा था, उसने इन चारों बातों पर आश्चर्य जताया (नीतिवचन 30:1)। उसके दृष्टिकोण से ये चारों अजूबे अत्यन्त प्रभावशाली और रहस्यमयी थे (नीतिवचन 30:18)।

यहाँ बुद्धि का बोध इन चारों अजूबों में निहित परमेश्वर की महिमामय रचना है, और विशेष बल उस अन्तिम बात पर है, जिसमें पुरुष और स्त्री का सम्बन्ध आता है। साथ ही, उसने इन चार अजूबों का उपयोग व्यभिचारिणियों के चकित कर देने वाले दुस्साहस और विवेकहीनता को दोषी ठहराने के लिए भी किया (नीतिवचन 30:20)।

आकाश में उकाब पक्षी का मार्ग महिमामय रहस्य से भरा हुआ है। वायु की ऊर्ध्वगामी तप्त धाराओं पर तैरते और फिसलते हुए उकाब अपने लगभग 7 फुट फैले पंखों को बहुत कम हिलाकर भी किसी राजा के समान ऊँचा उठता और गोल-गोल चक्कर काटता है। हवा में, धरती पर, या जल में असावधान शिकार को पकड़ने के लिए जब वह पृथ्वी की ओर झपटता है, तब उसकी रफ़्तार 100 मील प्रति घंटे से भी अधिक हो सकती है। उकाब की प्रणय-क्रीड़ा भी अद्भुत आकाशीय प्रदर्शनों से भरी होती है, जिनमें ये पक्षी ऊँचाई पर एक-दूसरे के पंजे थाम लेते हैं और फिर पंखों और पैरों को फैलाए हुए, चक्राकार घूमते हुए पृथ्वी की ओर गिरते हैं। इसमें प्रकट परमेश्वर की बुद्धिमत्तापूर्ण रचना को कौन समझ सकता है?

चट्टान पर सर्प की चाल भी इसी प्रकार विस्मयकारी है। सर्प के पास न भुजाएँ हैं, न टाँगें, न पैर। घास या बालू में उसका लहराते और बल खाते हुए बढ़ना एक बात है, और वह भी अपने-आप में देखने योग्य है, परन्तु चिकनी चट्टान पर उसका चलना कैसी अद्भुत बात है! उसे सहारा कहाँ से मिलता है? बिना हाथ-पैर के वह उस फिसलन भरी सतह पर आगे और ऊपर कैसे बढ़ता है? क्रुद्ध हो या भयभीत, वह शत्रु की ओर या उससे दूर बड़ी तीव्रता और सीधाई से बढ़ता है। वह न पाँव टिकाने की किसी जगह का उपयोग करता है, न कोई पदचिह्न छोड़ता है, फिर भी उसकी गति अत्यन्त कुशल होती है। इसमें प्रकट परमेश्वर की बुद्धिमत्तापूर्ण रचना को कौन समझ सकता है?

समुद्र में जहाज़ की चाल भी उतनी ही आश्चर्यजनक है। एक पाल-जहाज़ के पास न चालक-पंखा होता है, न चप्पू, न उसे आगे बढ़ाने का कोई दूसरा प्रत्यक्ष साधन, फिर भी वह जल पर सहजता से सरकता चला जाता है। उसके विशाल आकार को एक अत्यन्त छोटे पतवार और रडार के द्वारा दिशा दी जाती है। उसके पीछे हल्की-सी तरंग-रेखा के अतिरिक्त कोई ऐसा मार्ग नहीं छूटता, जिसका कोई अनुसरण कर सके। वह अधिकांश आँधियों में उलटे बिना टिक सकता है, और बिना किसी संकेत-स्तम्भ या स्थल-चिह्न के जलराशि के बड़े-बड़े विस्तार पार करके अपने तय बन्दरगाह तक पहुँच जाता है। और उसे चलाने वाली शक्ति पाल के पीछे की हवा नहीं, बल्कि पाल के सामने की हवा होती है! इसमें प्रकट परमेश्वर की बुद्धिमत्तापूर्ण रचना को कौन समझ सकता है?

कन्या के संग पुरुष की चाल अद्भुत और रहस्यमयी है। एक कुँवारी युवती, अर्थात् कन्या, 12 से 20 वर्षों तक भली-भाँति सुरक्षित रखी जाती है। वह घर के कामों, शिक्षा, नौकरी, रुचियों, प्रकृति, मित्रों और परिवार के बीच प्रसन्नतापूर्वक सन्तुष्ट रह सकती है। प्रेम और यौनाकर्षण उसे प्रायः विचलित नहीं करते। परन्तु उस परिवर्तन पर विचार कीजिए, जब कोई पुरुष उसे मोहित कर लेता है! अपने ध्यान, शब्दों और प्रतिज्ञाओं से वह उसके भीतर ऐसी अग्निमय प्रतिक्रिया जगा देता है, जो पहले कभी दिखाई नहीं दी थी। कुछ आलिंगन और चुम्बन, और वह भावनात्मक रूप से उसी में डूब जाती है, तथा शारीरिक रूप से उसे अपना कुछ नहीं, सब कुछ दे देने को तत्पर हो जाती है। वह बिना भय के और सब चेतावनियों के बावजूद, उत्सुकतापूर्वक सब कुछ छोड़कर उसके पीछे चल पड़ती है। इसमें प्रकट परमेश्वर की बुद्धिमत्तापूर्ण रचना को कौन समझ सकता है?

चूँकि आगूर ने इस नीतिवचन में इन चारों बातों को अद्भुत और समझ से परे बताया है (नीतिवचन 30:18), इसलिए चौथी बात, अर्थात् किसी कन्या को जीत लेने की, निन्दा करने का न कोई कारण है और न कोई आवश्यकता। प्रत्येक विवाहित पुरुष इस बात के लिए कृतज्ञ होता है कि वह विवाह के लिए अपनी कन्या को जीत सका। और अधिकांश विवाहित दम्पति आरम्भिक प्रेम और आरम्भिक एकदेहसंबंध के परम आनन्द को बड़े प्यार से याद करते हैं।

ऐसा कहा जाता है कि यदि पुरुष केवल मित्र बने रहने में उतने ही सन्तुष्ट होते, जितनी स्त्रियाँ हो सकती हैं, तो आदम और हव्वा आज भी पृथ्वी पर केवल वही दो व्यक्ति होते, जो एदेन के बाहर छोटे-छोटे सुन्दर प्राणियों को निहारते हुए निष्काम भाव से बस एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े रहते। हे प्रभु, प्रणय की सुन्दरता और महिमा के लिए धन्यवाद। प्रेम, विवाह और दाम्पत्य-संबंध के लिए धन्यवाद। इस चौथी बात की बुद्धिमत्तापूर्ण रचना के लिए धन्यवाद।

पुरुष और कन्या के बीच जो “प्रणयाकर्षण” भडकता है, वह महिमामय है। उसकी भावनात्मक और दाम्पत्यगत प्रतिक्रिया अद्भुत होती है। सुलैमान ने अपने श्रेष्ठगीत में जिस प्रेम और दाम्पत्य प्रणयाकर्षण का वर्णन किया है, वह सुन्दर और अद्भुत काव्य है, और दम्पतियों के लिए एक उत्तम मार्गदर्शिका भी है। प्रणय अधिकांश वैवाहीक जीवन के आरम्भ का आधार होता है, और यह ऐसी रीति है, जिसका प्रत्येक विवाहीत जोड़ी को निरन्तर अभ्यास करते रहना चाहिए।

इस चौथी बात में अनेक शिक्षाएँ निहित हैं। पहली यह कि प्रत्येक पति को आरम्भ की भाँति अपनी पत्नी का मन जीतते रहना चाहिए। परमेश्वर ने इस कार्य के लिए एक पूरा वर्ष अलग रखने की आज्ञा दी थी (व्यवस्थाविवरण 24:5)। यदि किसी विवाह में प्रणय कमज़ोर और ठण्डा पड़ गया है, तो उसका दोष पति पर है। लगभग कोई भी पुरुष अधिकांश स्त्रियों का मन जीत सकता है, क्योंकि यही तो चौथा आश्चर्य है। यदि कोई नीरस पति फिर से अविवाहित हो जाए, तो उसे किसी दूसरी कन्या का हृदय जीतने के लिए किसी विशेष शिक्षा की आवश्यकता न पड़े। इसलिए प्रभु पुरुषों से यह अपेक्षा करता है कि वे अपनी पत्नियों का मन निरन्तर जीतते रहें (नीतिवचन 5:19; सभोपदेशक 9:9; 1 कुरिन्थियों 7:2-5; इफिसियों 5:25-29; कुलुस्सियों 3:19)।

दूसरी शिक्षा यह है कि प्रत्येक पिता को अपनी पुत्रियों को बहकावे से बचाना चाहिए। उनसे यह अपेक्षा करने के स्थान पर कि वे अपनी प्रकृति के प्रतिकूल आचरण करेंगी, उन्हें ऐसी परिस्थितियों में रखा ही न जाए, जहाँ बहकाया जाना सम्भव हो। लेआ की बेटी दीना की और अधिक सावधानी से रक्षा होनी चाहिए थी (उत्पत्ति 34:1-5)। याकूब और उसके पुत्रों ने उसके साथ कोई संरक्षक नहीं भेजा, और एक अन्यजाति कनानी ने उसे बहका लिया। पिता बाल्यावस्था में पुत्री का मार्गदर्शन करता है (नीतिवचन 5:7-13; 22:6,15; गिनती 30:3-5), और उसकी पवित्रता की रक्षा करना तथा वरों को स्वीकृति देना उसका कर्तव्य है (व्यवस्थाविवरण 22:14-17; निर्गमन 22:16-17)।

तीसरी शिक्षा यह है कि प्रत्येक स्त्री को स्वयं अपने आपको बहकावे से बचाना चाहिए। उसे पुरुषों के साथ अनावश्यक बातचीत और मेलजोल से बचना चाहिए। यदि उसे घर के बाहर अन्य पुरुषों के साथ काम करना ही पड़े, तो उसे बहुत सतर्क रहना चाहिए। यह चौथी बात एक आश्चर्य है, क्योंकि वह उसके प्रति संवेदनशील है। प्रत्येक स्त्री पवित्र, लज्जाशील और घर का ध्यान रखने वाली हो (नीतिवचन 7:11; तीतुस 2:3-5; 1 पतरस 3:1-6)।

पतियों को अपनी पत्नियों की हर प्रकार के पुरुषों से रक्षा करनी चाहिए। यदि आदम एक बेहतर पति होता, तो वह हव्वा को शैतान के शब्दों से बचा लेता (2 कुरिन्थियों 11:3; 1 तीमुथियुस 2:13-14)। पति और पत्नी, दोनों को यह पहचानना चाहिए कि झूठे शिक्षक, जो घरों में घुस आते हैं, उन मूर्ख अथवा निर्बल स्त्रियों को वश में कर लेते हैं जो अपने ही पापों और अभिलाषाओं से उलझी रहती हैं, और इस विषय में स्त्री की दुर्बलता वास्तविक है (2 तीमुथियुस 3:6-7)।

उकाब को विस्मय से देखिए, सर्प का आदर कीजिए, नौकायन की विलक्षणता को सराहिए, और भावनात्मक तथा दाम्पत्य-प्रणय के रहस्य पर विचार कीजिए। परमेश्वर ने सब बातों को उनके समय और स्थान में अद्भुत बनाया, परन्तु मनुष्यों ने उनमें अभक्तिपूर्ण विकृतियाँ और दुरुपयोग जोड़ दिए (सभोपदेशक 3:1-11; 7:29)। परमेश्वर ने सब कुछ अच्छा बनाया था, परन्तु मनुष्यों ने पृथ्वी पर उसकी व्यवस्था को बिगाड़ दिया और अपनी ही लज्जा और विनाश का कारण बनें (उत्पत्ति 6:11-12)।

सारी महिमा यीशु मसीह को मिले! मनुष्य का पुत्र इस पापी जगत में से एक कन्या को जीतने आया, ताकि वह उसकी पवित्र और निर्मल दुल्हन बने (यिर्मयाह 31:3; होशे 11:4)। उसकी खींच लेने वाली सामर्थ्य का प्रतिरोध नहीं किया जा सकता, और वह एक भी जन को बचाने में असफल नहीं होगा (यूहन्ना 6:37-39)। उसके सेवक पवित्र जलन के साथ प्रतिदिन परिश्रम करते हैं, ताकि उन्हें व्यावहारिक रूप से भी यीशु मसीह के लिए पवित्र कुँवारियों के समान प्रस्तुत करें (2 कुरिन्थियों 11:1-4)।

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