नीतिवचन 30:13
एक पीढ़ी के लोग ऐसे हैं – उनकी दृष्टि क्या ही घमण्ड से भरी रहती है, और उनकी आँखें कैसी चढ़ी हुई रहती हैं।
घमण्ड एक बहुत बड़ी समस्या है। यह आपको बर्बाद कर देगा। विनम्रता आपको ऊंचा उठाएगी। दोनों के बीच चुनाव आपको करना है। आपका भविष्य इस पर निर्भर करता है। यदि आप अपने आप को दीन करोगे, तो परमेश्वर आपको ऊंचा करेगा (याकूब 4:10)। यदि आप अपने आप को दीन नहीं करोगे, तो वह आपको कुचल डालेगा (नीतिवचन 16:18)। परमेश्वर को घमंड से चढ़ी हुई आँखों से नफरत है (नीतिवचन 6:16-17)। उसने घमण्ड के कारण शैतान को स्वर्ग से निचे गिरा दिया (1 तीमु 3:6; यशायाह 14:12-14)। आज ही विनम्रता की बुद्धि सीखें।
भविष्यवक्ता आगुर ने हमारे जीवन के लिए चार चीजों का उपयोग कर हमें परमेश्वर-प्रेरित ज्ञान सिखाया (नीतिवचन 30:11-31)। उसने चार प्रकार के लोगों के वर्णन से आरम्भ किया, जो कुछ ख़ास तरह के पापों के लिए जाने जाते हैं, जिनमें से यह नीतिवचन उन चार में से तीसरा बताता है। अधिकांश लोग अलग-अलग स्तर पर घमंडी होते हैं, लेकिन कुछ बहुत ज्यादा अहंकारी और अभिमानी होते हैं। उनके चेहरे पर बहुत अहंकारी और दूसरों को नीचा दिखानेवाला भाव होता है, अर्थात् उनकी आँखें चढ़ी हुई रहती हैं।
यहां प्रयुक्त शब्द ‘पीढ़ी’ का अर्थ एक ख़ास किस्म का व्यक्ति है, क्योंकि इस नीतिवचन में प्रदर्शनवाचक सर्वनाम या अन्य संशोधक नहीं है। यह भविष्य को लेकर की गई भविष्यवाणी नहीं है, जब मनुष्य घमंडी हो जायेंगे, क्योंकि ऐसा हर युग में होता आया है। यह मसीह के समय में बुरे लोगों की भविष्यवाणी नहीं है, क्योंकि इसका ऐसा अर्थ निकालना इस नीतिवचन में अद्वितीय होगा और हमारे व्यावहारिक जीवन के लिए इसमें कोई बुद्धि की सिक्षा नहीं रहेगी।
चार पीढ़ियाँ चार से अधिक स्वभाव के प्रकार हैं – उदास, निरुत्साही, रक्तपिपासु, और क्रोधी – हालाँकि प्रत्येक में पापी प्रवृत्ति होती है। यहां सबक स्वभाव से परे है: यह विशिष्ट पापों वाले चार प्रकार के लोग हैं। प्रत्येक पीढ़ी को एक स्वभाव का बताने के बजाय, इनमें से प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति पाप और सुधारात्मक ज्ञान सीखें जो आवश्यक है।
तीसरी पीढ़ी, या एक प्रकार का दुष्ट व्यक्ति, अपनी ताकत, चरित्र, उपलब्धियों, संपत्ति और हैसीयत के बारे में अहंकारी और घमंडी होता है। नम्रतापूर्वक अपनी आँखें भूमि पर लगाने के बजाय, वह उन्हें परमेश्वर की दृष्टि में भी ऊपर उठाता है (लूका 18:9-14)। वह आसानी से अपमान करनेवाला या चिड़चिड़ा हो सकता है, जब तक कि थोड़ा सा सम्मान दिखाना उसके हित में न हो।
उसका हृदय अहंकारी और अड़ियल होता है, वह अपने घमण्ड में आकर विश्वास करता है कि वह दूसरों से श्रेष्ठ है। वह सोचता है कि दुनिया उसके चारों ओर घूमती है; वह अपनी कमियों और कमज़ोरियों के प्रति अंधा है; अगर कोई उसकी उपेक्षा करे तो वह अत्यधिक आहत होता है, फिर भी वह शायद ही कभी दूसरों की सेवा करता है; उसे सुधार और डाँट-फटकार से चिढ़ आती है; वह दूसरों की उन्नति से ईर्ष्या करता है; और दूसरों की आलोचना करने और दोष ढूंढने में तेज़ होता है।
घमण्ड एक भयानक पाप है। फिर भी लोग आज इसे एक अच्छे शब्द के रूप में उपयोग करते हैं, जैसे कि, “मैंने जो किया है उस पर मुझे बहुत गर्व है।” आज घमण्ड का प्रचार खुद से प्रेम और आत्म-सम्मान के नाम आपकी सभी समस्याओं के व्यक्तिगत इलाज के रूप में किया जाता है। यह आपके विरुद्ध शैतान की तीन मुख्य युक्तियों में से एक है – जीवन का घमण्ड (1 यूहन्ना 2:16)। यह स्वार्थ, ईर्ष्या, तिरस्कार, अपराध को जन्म देता है और लड़ाई की ओर ले जाता है।
अपने बारे में सच सुनें। आप कुछ भी नहीं हैं। आप शून्य मात्र हैं। यदि सच कहा जाए, तो आपका चरित्र भ्रष्ट और अपवित्र है (यिर्म 17:9; रोमियों 3:9-18)। आपकी योग्यताएँ और क्षमताएँ इतनी दयनीय हालत में हैं कि आपकी नाक पकड़कर आपका पूरा जीवन ख़त्म कर दिया जा सकता है (यशायाह 2:22; भजन 146:3-4)। आप इस संसार में कुछ भी नहीं लाए; और आप कुछ भी साथ नहीं ले जा पाओगे (1 तीमु 6:7)।
आपकी उपलब्धियाँ और संपत्ति इतनी छोटी हैं कि आपके दफ़न होने के दो सप्ताह बाद ही हर कोई आपको भूल जाएगा (भजन 49:10-13)। गरीब वर्ग के लोग स्पष्ट रूप से कुछ भी नहीं हैं; उच्च वर्ग के लोग झूठ बोलते हैं; एक साथ मिलकर वे शून्य से भी कम हैं (भजन 62:9)। पवित्र आत्मा ने मनुष्य की गरिमा या मूल्य के बारे में कभी कुछ नहीं कहा। क्या आप अपने बारे में परमेश्वर की राय स्वीकार करने की ताकत और इच्छा हैं?
आप जब पैदा हुएं तो आप में कोई समझ और ज्ञान, या बुद्धि न थी, यहां तक कि आपका अपना अस्तित्व भी आपकी मर्ज़ी से नहीं है। आप में खुद को गन्दगी से बचाने की कोई क्षमता या विवेक नहीं था। आप चम्मच से खाना नहीं ले सकते थे और न गिलास से पानी पीना जानते थें। तिपहिया साइकिल को आगे बढ़ाना और वर्णमाला बोलना भी आपको सिखाना पड़ा। और अब आपको लगता है कि आप महान हैं?
आपके पास जो भी अच्छी वस्तु है वह परमेश्वर का उपहार है। आप अपनी किसी भी चीज पर कैसे घमण्ड कर सकते हैं? परमेश्वर ने यह सब आपको अपनी मर्ज़ी से दिया है। “तुझ में और दूसरे में कौन भेद करता है? और तेरे पास क्या है जो तू ने (दूसरे से) नहीं पाया? और जब कि तू ने (दूसरे से) पाया है, तो ऐसा घमण्ड क्यों करता है कि मानो नहीं पाया?” (1 कुरिन्थ 4:7)। आपका अभिमान परमेश्वर को क्रोध दिलाता है, और उसका क्रोध करना सही भी है!
जब तक आप स्वयं को विनम्र नहीं बनाते, आप विनाश के मार्ग पर हैं। परमेश्वर को घमंड से नफरत है, क्योंकि उसने केवल सुंदरता, महिमा, शक्ति, सच्चाई और बुद्धि को ही महत्व दिया है। वह केवल यह कहता है, “मैं जो हूँ, सो हूं”, और पांसे पलट जाते हैं। वास्तव में, वह उसका नाम है! नबूकदनेस्सर विश्व के इतिहास में सबसे महान राजा था, लेकिन उसने परमेश्वर से सात वर्ष का दण्ड सहने के बाद यह कहा, “जो लोग घमण्ड से चलते हैं, उन्हें वह नीचा कर सकता है” (दानि 4:37)।
सबक क्या है? सच्ची बुद्धि और सच्चा ज्ञान घमंड से बैर रखना है और उससे भागना है। मन की दीनता आपको बहुत पापों से बचाएगी और आप पर परमेश्वर और मनुष्य का अनुग्रह बढ़ाएगी। विनम्रता बड़ी आसानी से खुद को नीचे उतार सकती है और अपनी अज्ञानता और कमज़ोरी को मान सकती है, क्योंकि यह सत्य का पालन करती है। वह दयालु चरित्र जो परमेश्वर और मनुष्य दोनों की कृपा प्राप्त करता है, काफी हद तक एक विनम्र व्यक्ति की उत्तम आत्मा पर निर्भर करता है।
उस धनी और बुद्धिमान राजा पर विचार करें जिसने नीतिवचन की पुस्तक का अधिकांश भाग लिखा। सुलैमान अति प्रिय पुत्र था – और परमेश्वर और लोग उससे बहुत प्रेम रखते थें। उनमें राज घराने का खून था, अवसर थें और उस ने बहुत सी सफलताएँ प्राप्त की। वह दाऊद का पुत्र था (नीतिवचन 1:1)। परन्तु एक अति समृद्ध राष्ट्र का राजा होने पर भी, उसने कहा, “मैं छोटा लड़का–सा हूँ जो भीतर-बाहर आना जाना नहीं जानता” (1 राजा 3:7)।
क्या आप विनम्र हैं? यह जानना बिलकुल आसान है। जब आपको कोई सुधारता है तो क्या आपको अच्छा लगता है, या आप को दूसरों को सुधारना ज्यादा अच्छा लगता है? क्या आप आसानी से और बार बार दूसरों को महत्व देते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं? क्या आप सेवा करते हैं या सेवा करवाते हैं? क्या आप बिना किसी नाराजगी के उन लोगों के अधीन के पूरी तरह हो जाते हैं जिन्हें परमेश्वर ने आपके ऊपर रखा है? यदि आप एक औरत है, तो क्या आप जानती हैं कि आप एक कमजोर पात्र हैं और आपको अपने पति की सहायक होने के लिए बनाया गया था?
क्या आप दूसरे की तरक्की या लाभ के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देते हैं, या आप ईर्ष्यालु हैं? क्या आप सचमुच दूसरे की सफलता पर उत्साहित होते हैं? जब दूसरे आपको ठेस पहुँचाते हैं, तो क्या आप क्रोधित होते हैं, या आप उन्हें तुरंत माफ कर देते हैं? क्या आप चुप रहकर दूसरों की बातें सुनते हैं? क्या आप एक अच्छे श्रोता हैं, बस दूसरों को सिखाना चाहते हैं? क्या आप सुनने में तत्पर और बोलने में धीमें और संयमी हैं, या आप सबसे ज्यादा बातें करते हैं और दूसरों की कम सुनते हैं?
अगर कोई पुरुष या स्त्री यह सोचते हैं वह कुछ है, तो इससे परमेश्वर को कोई फ़र्क नहीं पड़त। वह उस दीन और टूटी हुई आत्मा वाले मनुष्य को आशीष देगा और उसकी सहायता करेगा, जो उसका वचन सुनकर कांपता है (यशायाह 66:1-2; 57:15)। सबसे पहले, अपने आप को परमेश्वर के सामने नम्र करें और उसके हर वचन का पालन करें। दूसरा, लोगों के सामने स्वयं को विनम्र करो और उनकी सेवा करो। परमेश्वर के राज्य में सबसे महान वह है जो सेवक हैं, न कि वह जो शासन करता है।
यदि आप अपने आप को नम्र करते हैं, तो परमेश्वर और मनुष्य आपको ऊंचा करेंगे (नीतिवचन 22:11; याकूब 4:10; 1 पतरस 5:6)। यदि आप ऐसा नहीं करोगे, तो परमेश्वर और मनुष्य आपको कुचल डालेंगे (नीतिवचन 15:25; 16:5,18; 21:24)। यीशु ने चेतावनी दी, “जो कोई अपने आप को बड़ा बनाएगा, वह छोटा किया जाएगा : और जो कोई अपने आपको छोटा बनाएगा, वह बड़ा किया जाएगा” (मत्ती 23:12)। सुलैमान ने बार बार यही लिखा (नीतिवचन 15:33; 18:12; 22:4; 29:23)।
घमंड का त्याग करने और विनम्र बनने के लिए आज आप क्या कर सकते हैं? क्या आपको किसी से क्षमा मांगने की ज़रूरत है? आप कहाँ नफ़रत को छोड़कर मेल और शांति स्थापित कर सकते हैं? क्या कोई है जो आपके मुँह से अपनी प्रशंसा सुनना चाहता है? क्या आप फल की अपेक्षा किए बिना किसी से प्रेम कर सकते हैं या सेवा कर सकते हैं? क्या किसी ने आपके लिए कुछ किया जिसे आपको धन्यवाद देना चाहिए? क्या आप शिक्षक बनने के बजाए एक अच्छे श्रोता बन सकते हैं?
यीशु मसीह ने अपने आओ को इतना छोटा किया कि उसने एक निर्धन स्त्री से जन्म लिया, कि गरीबी और सेवा का जीवन जीए और इतना नम्र हुआ कि दूसरों के लिए अन्यायपूर्ण मृत्यु तक मर गया। इस महान कार्य के लिए उनके पिता ने उसे स्वर्ग के सभी स्वर्गदूतों से कहीं ऊपर महिमान्वित किय (फिलि 2:5-11)। क्या आप थोड़ा सा भी उसके समान हैं?
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