नीतिवचन 30:12

ऐसी पीढ़ी है जो अपनी दृष्टि में शुद्ध है, तौभी उनका मैल धोया नहीं गया।

भविष्यवक्ता आगुर ने चार बातों के समूह देकर आपके जीवन के लिए परमेश्वर-प्रेरित ज्ञान सिखाया (नीतिवचन 30:11-31)। वह आरम्भ करते हुए ऐसे चार प्रकार के लोगों का वर्णन करता है जो कुछ खास पापों से पहचाने जाने हैं, और यह नीतिवचन उन चार में से दूसरा प्रकट करता है। ज्यादातर लोग अलग-अलग स्तर पर अपनी मूर्खता में आत्म-तुष्ट होते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जो व्यक्तिगत या धार्मिक अहंकार और आत्मविश्वास में इतने घमंडी होते हैं जिनका कोई तोड़ नहीं। वे अपनी दृष्टि में शुद्ध हैं, तौभी वे अपने पापों से धुले नहीं हैं।

यहां पीढ़ी का अर्थ एक प्रकार का व्यक्ति है, क्योंकि इसमें प्रदर्शनवाचक सर्वनाम का अभाव है। यह भविष्य की भविष्यवाणी नहीं है, जब मनुष्य घमंडी हो जायेंगे, क्योंकि ऐसा हर युग में होता आया है। यह मसीह के समय में बुरे लोगों की भविष्यवाणी नहीं है, क्योंकि ऐसा उपयोग नीतिवचन में अद्वितीय होगा और इसमें हमारे जीवन के लिए कोई व्यावहारिक ज्ञान न होगा।

यहाँ चार पीढ़ियाँ चार से अधिक स्वभाव के प्रकार हैं – उदासी, निरुत्साह, रक्त-पिपासु, और गुस्सैल – हालाँकि इन में से प्रत्येक में पापी प्रवृत्ति होती है। यहां सबक स्वभाव से परे है: यह विशिष्ट पापों वाले चार प्रकार के लोग हैं। यहाँ प्रत्येक पीढ़ी पर पाप का एक स्वभाव लागू करने के बजाय, प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के लिए आवश्यक पाप और सुधारात्मक ज्ञान सीखें।

दूसरी पीढ़ी, या उस प्रकार का व्यक्ति, शुद्धता के बारे में आत्म-तुष्ट है। ऐसे व्यक्ति का मन, चाहे स्त्री हो या पुरुष, परमेश्वर के वचन से बैर रखता है, यह मानता है कि उसका वचन शायद ही कभी उस पर लागू होता है। अपनी बुद्धि और पवित्रता के मानक में विश्वास रखते हुए, वह दूसरों को हीन दृष्टि से देखता है और विचारों, वाणी और आचरण में खुद को दूसरों से बड़ा समझता है। उसे लगता है कि परमेश्वर उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य है और वह निश्चित रूप से उसे अपनी उपस्थिति में आने देगा। उसे आत्म-परिक्षण या व्यक्तिगत पश्चाताप की कोई आवश्यकता दिखाई नहीं देती।

अपनी दृष्टि में शुद्ध होना क्या है? यह मानों एक ऐसी स्त्री है जो व्यावसायिक वेश्या से घृणा करती है, जबकि वह खुद सप्ताह में छह रातें अपने पति को धोखा देती है (1 कुरिन्थ 7:1-5)। यह सोचना मूर्खता है कि जीभ पर दिया गया उपदेश मेरे लिए नहीं, बल्कि दूसरों के लिए है (2 कुरिन्थ 13:5)। यह मानों एक ऐसा मोटा पुरुष है जो खुद तो भरभरकर मिठाइयाँ खाता है, फिर भी दूसरों को मदिरापान के लिए दोषी ठहराता है (लूका 21:34)। यह मानों एक ऐसी घृणित स्त्री है जो शालीनता सीखने से इंकार करती है (नीतिवचन 27:22)। यह एक घमंडी लड़का है जो सुधार और चेतावनी का मज़ाक उड़ाता है और उसके साथ कुछ बुरा हो सकता है इस बात से इनकार करता है (1 कुरिन्थ 10:12)।

यह शमौन नाम वह फरीसी है जो यीशु के पाओं को अपने आसुओं से धोनेवाली पापी स्त्री की निंदा करता है (लूका 7:36-50)। यह वह फरीसी है परमेश्वर को धन्यवाद देता है कि वह चुंगी लेने वाले जितना बुरा नहीं है (लूका 18:9-14)। यह वे यहूदी हैं जो कहते हैं कि जो मनुष्य जन्म से अँधा है वह उसके और उसके माता-पिता के पाप के कारण है (यूहन्ना 9:13-34)। यह एक ऐसा व्यक्ति है जो ग़लत साबित होने पर भी यह नहीं कहेगा कि उसे खेद है। यह वह व्यक्ति है जो घमंड करता है कि वह परमेश्वर को जानता है, लेकिन दूसरों के साथ भाईचारे से नहीं रह सकता। यह दावा करना है कि आत्मा आपको बाइबल के बिना सिखाता है।

इस नीतिवचन के अध्ययन से कुछ सबक सीखने को मिलते हैं (नीतिवचन 1:6)। दुनिया में हमेशा से ही घमंडी और अहंकारी लोग रहे हैं। आपको क्या सीखना चाहिए? यहाँ कम से कम पाँच सबक हैं: परमेश्वर अपनी दृष्टि में शुद्ध समझनेवालों से बैर रखता है; वह अपनी उपस्थिति में केवल से ग्रहण करता है जो मन का दीन है; ज़रूरी है कि आप खुद पर घमंड करने के इस पाप से घृणा करना सीखें; अवश्य है कि आप इस पाप के प्रति किसी भी प्रवृत्ति से बचें; आपको अपने बच्चों को भी इस पाठ में पूरी तरह से प्रशिक्षित करना है कि वे खुद को दूसरों से शुद्ध न समझें।

परमेश्वर स्व-धर्मी से घृणा रखता है। उसने उन घमंडी यहूदियों की निंदा कीं जो दूसरों से कहते थें, “हट जा, मेरे निकट मत आ, क्योंकि मैं तुझ से पवित्र हूँ” (यशायाह 65:1-7)। यीशु ने अपने समय के धार्मिक नेताओं को आत्म-धार्मिकता के लिए दोषी ठहराया (लूका 16:15; 18:9-14)। उन्होंने झूठी परिभाषाओं के द्वारा परमेश्वर की व्यवस्था को बिगाड़ दिया था (लूका 10:25-37), और वे पापियों को तुच्छ समझते थें (लूका 7:36-50)। यीशु उन लोगों के लिए नहीं आए थे जो अपनी ही दृष्टि में धर्मी या शुद्ध थें, इसलिए उन्होंने अपने शिष्यों से कहा कि “यदि तुम्हारी धार्मिकता शास्त्रियों और फरीसियों की धार्मिकता से बढ़कर न हो, तो तुम स्वर्ग के राज्य में कभी प्रवेश करने न पाओगे” (मत्ती 5:20; मरकुस 2:15-17)।

परमेश्वर उनसे प्रेम रखता है जो आत्मा में दीन हैं – जो अपने पापों और पापाचार के कारण टूटे हुए और निराश हैं (भजन 34:18; 51:16-17; 138:6; 57:15; 66:2)। यीशु पापियों को बचाने के लिए इस दुनिया में आए, और पौलुस ने माना कि वह पापियों का मुखिया था (1 तीमु 1:15)। परमेश्वर अभिमानियों का विरोध करता है, परन्तु दीनों पर अनुग्रह करता है (1 पतरस 5:5-6)। जो लोग आत्मा में दीन हैं वे स्वर्ग के धन्य उत्तराधिकारी बनेंगे (मत्ती 5:3)। यदि आप खुद को शुद्ध समझकर यीशु मसीह के पास आते हैं, तो वह आपको स्वीकार नहीं करेगा (मरकुस 2:17)।

अवश्य है कि आप स्व-धार्मिकता से घृणा करें, क्योंकि यह बहुत ही भयानक पाप है। एक बार आपकी सोच में शामिल हो जाने पर, आप परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाले आवश्यक सुधार और निर्देश को मानने से इंकार कर देंगे, क्योंकि आप में यह आत्म-विश्वास पनपता है कि आप सभी विनाशकारी दोषों से मुक्त हैं (नीतिवचन 26:12; गलातियों 6:3)। आप उन माता-पिता या पास्टर से नाराज़ रहेंगे जो आपको सुधारने, डांटने, सिखाने या चेतावनी देने की कोशिश करते हैं। ज़रूरी है कि आप अपनी मूर्खता को मान लें, स्वीकार करें कि आप कुछ भी नहीं हो, और ज़रूरी है कि आप अपने मन की न सुने, क्योंकि आपका मन सबसे बड़ा धोखेबाज है (यिर्मयाह 17:9; 1 कुरिन्थ 3:18; इफि 3:8)।

इस मामले में खुद को शुद्ध समझने का खतरा उठाना आपके लिए घटक है। आप ऐसे पापी हैं जिसकी अधर्मी इच्छायें और पापी प्रवृत्तियाँ हैं। इसलिए, जब भी आप उपदेशों और शिक्षाओं को सुनें तो उन्हें सबसे पहले स्वयं पर लागू करें, दूसरों पर नहीं। जो कपटी व्यक्ति अपनी आँख में लट्ठा होते हुए भी दूसरे की आँख से तिनका निकालना चाहता है, वह आत्म-धार्मिकता की गंभीर बिमारी से ग्रस्त है (मत्ती 7:3-5)। आपको इस शिक्षा के विरुद्ध अपने मन को कठोर करने के विचार से ही डरना चाहिए (नीतिवचन 28:14)।

अपने बच्चों को नम्र बनने, पाप करने पर टुटा हुआ मन रखने और गलतियों पर पश्चाताप करने की शिक्षा दें। यदि आप ऐसा नहीं करते हैं, तो वे स्व-धार्मिक दंभ के साथ ही वयस्क बन जाएंगे जो उन्हें नष्ट कर देगा। वे शिक्षा को अस्वीकार कर देंगे, दूसरों को नीची दृष्टि, और हीन भावना से देखेंगे, और परमेश्वर को अपना शत्रु बनने के लिए उकसाएंगे। अपने बच्चो के सामने परमेश्वर के पवित्र मानकों को ऊँचा उठाएँ और उनसे उन्हें आत्म-सम्मान से अधिक आत्म-आलोचना और आत्म-परिक्षण करना सिखाएँ। उन्हें सिखाएं कि अगर परमेश्वर यीशु मसीह के द्वारा उद्धार के निमित्त उन पर अनुग्रह न करे तो वे पूरी तरह से खोएं हुएं हैं।

नीतिवचन के इन शब्दों के विपरीत, एक ऐसी पीढ़ी है जो अपनी नज़रों में बहुत गंदी है, और फिर भी वे अपनी सारी गंदगी से पूरी तरह से शुद्ध हो गए हैं – जो प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास करते हैं – अर्थात् परमेश्वर के चुने हुए लोग। यीशु ने अपने लहू से उन्हें उनके पापों से धोया (प्रकाशितवाक्य 1:5; 7:14; 1 कुरिन्थ 6:11)। क्या आपको मलिनता से धोने के निमित्त वह बहता हुआ सोता मिल गया है, जिसमें आप नहाकर शुद्ध किएँ जाएं (ज़कर्याह 13:1)? वह सोता तो परमेश्वर के पुत्र यीशु में विश्वास से पाया जाता है (यूहन्ना 3:18)।

नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।