नीतिवचन 30:11

ऐसी एक पीढ़ी हैं, जो अपने पिता को शाप देती और अपनी माता को धन्य नहीं कहती।

भविष्यवक्ता अगूर ने चार-चार चीजों के समूह प्रस्तुत करके हमारे जीवन के लिए परमेश्वर-प्रेरित बुद्धि और ज्ञान सिखाया (नीतिवचन 30:11-31)। इसका आरम्भ वह चार प्रकार के लोगों का ज़िक्र करके करता है, जो कुछ ख़ास तरह के पापों के लिए जाने जाते हैं। बच्चे अपनी मूर्खता के कारण अपने माता-पिता का विभिन्न तरीकों से अपमान करते हैं, लेकिन कुछ बच्चें मानसिक रूप से विकृत और गिरे हुएं होते हैं। वे अपने पिता को शाप देते हैं, और अपनी माता को धन्य नहीं कहते। वे क्रूर राक्षस हैं।

यहाँ पीढ़ी का अर्थ एक विशिष्ट किस्म का व्यक्ति है, क्योंकि इस में संकेतवाचक सर्वनाम या अन्य परिभाषात्मक शब्दों का अभाव है। यह भविष्य में होनेवाली किसी बात की भविष्यवाणी नहीं है, जब बच्चे विद्रोही होंगे, क्योंकि हर युग में ऐसे पापी होते हैं। यह उन बुरे लोगों के विषय में भी भविष्यवाणी नहीं है जो यीशु मसीह के समय थें, क्योंकि ऐसा उपयोग नीतिवचन में अद्वितीय होगा और उसमें हमारे जीवन के लिए कोई व्यावहारिक ज्ञान न होगा।

यहाँ चार पीढ़ियों का अर्थ सिर्फ़ चार प्रकार की मनोदशायें – उदास, निरुत्साही, रक्तपिपासु, और क्रोधी – नहीं हैं, हालाँकि इनमे से प्रत्येक पापी प्रवृत्तियाँ हैं। यहाँ सबक स्वभाव से परे है: यह विशिष्ट पापों वाले चार प्रकार के लोग हैं। प्रत्येक पीढ़ी को एक अद्वितीय मनोदशा का समझने से बेहतर होगा, आप इनमें से प्रत्येक प्रकार के व्यक्ति के पाप और सुधारात्मक ज्ञान सीखें जो आवश्यक है।

पहली पीढ़ी, या दुष्ट व्यक्ति का प्रकार, माता-पिता के प्रति क्रूर और विद्रोही होती है। वह, अधिकार के प्रति, विशेष रूप से उस व्यक्ति के प्रति जो उसके जीवन में सबसे प्रथम स्थान रखता है, और सबसे कोमल व्यक्ति होता है, एक नीच हृदय दिखाता है। आपके माता-पिता एक ऐसे पद पर हैं जिसका सम्मान और आदर परमेश्वर आपसे चाहता है। यदि आप अधिकार का यह पहला, सरल पाठ नहीं सीख सकते, तो आपका जीवन निश्चित रूप से कठिन और दर्दनाक होगा।

इस तरह के व्यक्ति का नफरती विद्रोह उसे अपने पिता को शाप देने का कारण बनता है – उसे चोट पहुँचाने या मरने की इच्छा या इरादा। न ही वह उस महिला के प्रति कुछ भी अच्छा कहेगा या करेगा जिसने उसे जन्म दिया है। यह शैतान उस हवा में साँस लेने के योग्य नहीं है जिसे वह प्रदूषित करता है। पवित्र परमेश्वर ऐसे अपराधों को कठोर दंड के योग्य मानता है (नीतिवचन 20:20; 30:17; निर्गमन 21:17; लैव्यव्यवस्था 20:9; व्यवस्थाविवरण 27:16)।

आज बच्चे अपने माता-पिता का इतना कम सम्मान करते हैं और उनकी अवज्ञा करते हैं जितना पहले कभी न होता था। इस नीतिवचन की बुद्धि से दुनिया चेतावनी ले यह ज़रूरी है, लेकिन ज़्यादातर लोग यह जानने के लिए कभी समय नहीं निकालेंगे कि ऐसी कोई चेतावनी भी दी गई है। परमेश्वर और मनुष्यों के सामने आपकी भविष्य की समृद्धि और सफलता माता-पिता के प्रति सतर्क आज्ञाकारिता और सम्मान पर निर्भर करती है। क्या आप बुद्धि सीखेंगे और इस पीढ़ी को दोषी ठहराएंगे?

नीतिवचन की पुस्तक में अक्सर अस्पष्ट सबक होते हैं जिनकी खोज की जानी ज़रूरी है (नीतिवचन 1:6)। यहाँ सीखने के लिए पाँच सबक हैं: परमेश्वर माता-पिता का बहुत सम्मान करते हैं; बुद्धि इन बदमाशों का कठोर न्याय करके उन्हें दण्ड देती है; आपको इस पाप की किसी भी प्रवृत्ति से बचना ज़रूरी है; आपको अपने बच्चों को इस पाप से दूर रखना ज़रूरी है; और आपको परमेश्वर द्वारा निर्धारित मानव अधिकार के सभी क्षेत्रों में इस सबक का व्यावहारिक उपयोग करना ज़रूरी है।

परमेश्वर ने पुरुष और स्त्री को बनाया, उनमें यौन सम्बन्ध की इच्छा दी और प्रजनन का गुण दिया, उसने इन दोनों चीजों को विवाह तक सीमित कर दिया, माता-पिता के पद को निर्धारित किया, इसे पिता और माताओं के बीच विभाजित किया, उनके किए एकाधिकार अधिकार और सम्मान ठहराया, उसने आपके माता-पिता बनने के लिए विशिष्ट पुरुष और स्त्री को चुना, और आपको उन्हें ऐसी अवस्था में दिया जब आप असहाय और अज्ञानी थे।

उनके पास वर्षों तक आपके जीवन और मृत्यु पर अधिकार था, और आज आपका जीवन लगभग पूरी तरह से उनके आनुवंशिक संयोजन, उनके उदाहरण और प्रशिक्षण, और आपकी आवश्यकताओं और शिक्षा के लिए उनके प्रावधान का परिणाम है। आपके जीवन पर परमेश्वर की संप्रभुता आपके लिए माता-पिता के उसके चुनाव के परिणामों में दिखाई देती है। वह जानता है कि उसने आपके लिए एकदम सही चुनाव किया है। क्या आप जानते हैं?

परमेश्वर ने आपके माता-पिता को चुनने से पहले आपकी राय नहीं पूछी, और आज भी उसे इसकी परवाह नहीं है। माता-पिता का अधिकार परमेश्वर से है, और बाइबल इस बुनियादी तथ्य को स्पष्ट रूप से प्रकट करती है। चूँकि परमेश्वर ने आपके ऊपर माता-पिता के इस घनिष्ठ और व्यक्तिगत अधिकार को नियुक्त किया है, और चूँकि इसमें आज्ञाकारिता और सम्मान शामिल है जिसे आपको अपने शेष जीवन भर देना है, इसलिए यह एक गंभीर मामला है।

प्रजनन और माता-पिता आदिम किसी कीचड़ या पेड़ों पर झूलते बंदरों से विकसित नहीं हुए, जैसा कि आज परमेश्वर और बाइबल से घृणा करनेवाले शिक्षित मूर्ख अपनी कपोल-कल्पना से कहते हैं। माता-पिता का अधिकार पूर्ण दिव्य ज्ञान द्वारा है। यहोवा परमेश्वर ने माता-पिता का पद निर्धारित किया है, और उसने ऐसे सख्त कानून दिए हैं जिनके आधार पर उस अधिक्कर को परिभाषित किया जाना है, उसने इस नियम के उल्लंघन के लिए कठोर दंड और पालन के लिए बड़ा प्रतिफल ठहराया (नीतिवचन 20:20; 23:22; 30:17; निर्गमन 20:12; 21:15,17; लैव्यव्यवस्था 20:9; व्यवस्थाविवरण 21:18-21; 27:16; इफिसियों 6:1-3)।

अवश्य है कि आप अपने माता-पिता की आज्ञा माने और उनका सम्मान करें, चाहे उनकी उम्र कुछ भी हो (नीतिवचन 23:22)। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उन्होंने आपके साथ कैसा व्यवहार किया, क्योंकि सब अधिकार के पद और उसमें व्यक्तियों को परमेश्वर ने ठहराया (रोमियों 13:1-7; 1 पतरस 2:18-21)। सम्मान सिर्फ आज्ञाकारिता से कहीं अधिक व्यापक है, और इसका अर्थ है उनके साथ श्रद्धापूर्वक व्यवहार करना। चूँकि उन्होंने तब आपकी देखभाल की जब आप असहाय थे, इसलिए बुढ़ापे में भी आपका उनके प्रति वैसा ही दायित्व है (1 तीमुथियुस 5:4)। क्या आप अपने माता-पिता के साथ इस दुष्ट पीढ़ी से बिलकुल अलग व्यवहार करते हैं?

पालकों, अवश्य है कि आप अपने बच्चों को भी यह ज्ञान सिखाए और उनसे आज्ञापालन करवाएं, कहीं ऐसा न हो कि वे आपके जीवन से आपकी शांति छीन लें और खुद के अस्तव्यस्त जीवन पर परमेश्वर का श्राप ले आएं (नीतिवचन 13:24; 19:18; 22:6,15; 23:13-14; 29:15)। परमेश्वर ने उन्हें जब आपको दिया उस वक़्त वे पूरी तरह से अज्ञानी और नैतिक रूप से भ्रष्ट अवस्था में थें, और यह आपका कर्तव्य है कि आप परमेश्वर की इच्छा के अनुसार उसके द्वारा नियुक्त अधिकार के साथ एकरूप करें। यदि आप इस कर्तव्य की उपेक्षा करते हैं, तो आप अपने बच्चों और खुद से नफ़रत करते हैं (नीतिवचन 3:12; 10:1; 13:24; 17:21,25)।

बुद्धि कई प्रतिफलों से नवाज़ती है (नीतिवचन 3:13-18; 4:5-9)। बाइबल की व्यवस्था का पालन करने के पुरस्कार हैं (भजन 19:11; याकूब 1:25)। परमेश्वर आपके अच्छे कामों को कभी नहीं भूलता (भजन 112:1-3; इब्रानियों 6:10)। उसने माता-पिता का आदर करने के लिए पुरस्कार का वादा किया, और यह पहली आज्ञा है जिसके लिए उसने ऐसा वादा किया है (इफिसियों 6:1-3)। माता-पिता की अवज्ञा करना केवल विपति लाना है, क्योंकि आप परमेश्वर की आशिषें खो देंगे और दर्दनाक अंत से जा मिलेंगे।

इस नीतिवचन को पढ़ने और अपने माता-पिता का उचित रीति से सम्मान करने के लिए जिस प्रतिफल की प्रतिज्ञा की गई है वह प्रतिफल क्या है? परमेश्वर ने आपको लंबी उम्र का आशीर्वाद देने का वादा किया है और आपके लिए सब कुछ अच्छा होगा (इफिसियों 6:1-3)। यदि आप अच्छा स्वास्थ्य, विश्वासयोग्य जीवनसाथी, अच्छी नौकरी, आज्ञाकारी बच्चे, सुरक्षा आदि चाहते हैं, तो इस दुष्ट पीढ़ी के विपरीत जाएं और अपने माता-पिता का सम्मान करें। आपके निश्चित आशीर्वाद का यह नियम कितना सरल है!

यह सबक माता-पिता से आगे बढ़कर सब प्रक्कर के अधिकार व्याप्त करता है। दुष्ट अवज्ञाकारी जो अपने माता-पिता पर क्रोधित होता है और उनका विरोध करता है, उसे विवाह में, कार्यस्थल में, समाज में और चर्च में अधिकार के साथ समस्याएँ होंगी। परमेश्वर उसे एक पागल कुत्ते से बेहतर नहीं समझता (यहूदा 1:8-10; 2 पतरस 2:10-12)। डार्विनवादी अक्सर दुनिया में बढ़ रही वहशी क्रूरता से हैरान रह जाते हैं, लेकिन वे इतने अहंकारी और अज्ञानी हैं कि वे माता-पिता के सम्मान करने के परमेश्वर के नियमों का पालन करने में अपनी विफलता को स्वीकार नहीं करते।

आप अंतिम दिनों के विनाशकारी समय में हैं, जब ईसाई धर्म के एक स्त्रीलिंग ब्रांड ने बाइबल की ईश्वरीयता को भ्रष्ट कर दिया है, और इसके खतरनाक लक्षणों में से एक माता-पिता की अवज्ञा करना है (2 तीमुथियुस 3:1-7)। इसका हल क्या है? परमेश्वर के प्रेरित वचन का सही प्रचार (2 तीमुथियुस 3:14 – 4:4)। इसका प्रचार कैसे किया जाना चाहिए? गरजने वाली सामर्थ्य और पुरे अधिकार के साथ, जैसा कि यूहन्ना बैपटिस्ट ने अपनी पीढ़ी में माता-पिता और बच्चों के बीच सामंजस्य स्थापित करने के लिए किया था (मलाकी 4:5-6; लूका 1:17)।

नासरत का यीशु, यद्यपि अपने परमेश्वरत्व में सृष्टिकर्ता था, जो परमेश्वर का प्रिय पुत्र और पृथ्वी के राजाओं का राजा है, उसने अपने गरीब और सांसारिक माता-पिता, यूसुफ और मरियम के अधीन रहना चुना (लूका 2:51)। यहाँ तक कि जब वह कलवरी पर क्रूर रोमी क्रूस पर मर रहा था, तब भी उसने यूहन्ना को अपनी माँ की देखभाल करने के लिए नियुक्त किया (यूहन्ना 19:26-27)। उसका यह पवित्र उदाहरण आपको अपने माता-पिता दोनों को वचन और कर्म से धन्य कहने में प्रेरित और मार्गदर्शन करने पाए।

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