नीतिवचन 30:10

किसी दास की, उसके स्वामी से चुगली न करना, ऐसा न हो कि वह तुझे शाप दे, और तू दोषी ठहराया जाए।

किसी पर भी दोष लगाना न्यायसंगत और अनुग्रहसहित होना चाहिए, खास तौर पर पीड़ित या शोषित लोगों के खिलाफ, जो आसानी से अपना बचाव नहीं कर सकते। अनावश्यक कठोरता उन्हें आपको शाप देने का कारण बन सकती है, जो फिर आपके खिलाफ परमेश्वर का न्याय लाएगी। पुराना और नया दोनों ही नियमों में परमेश्वर के धर्म में दीन, गरीब, कमजोर या उत्पीड़ित लोगों के लिए बहुत करुणा और दया दिखाई गई है।

बाइबल के समयों में सेवा के लिए गुलाम ख़रीदें जाते थें, फिर भी बाइबल उनके स्वामियों को आदेश देती है कि वे अपने दासों के साथ न्यायपूर्ण और दयालु व्यवहार रखें और इस प्रकार नौकरों या दासों के हितों की रक्षा करती है। बाइबल बंधुआ मजदूरों और तनख्वाहों पर रखें नौकरों दोनों का समर्थन करती है और नियम देती है। जबकि कानूनन गुलामी कुछ लोगों के लिए आपत्तिजनक है, किन्तु भ्रम आमतौर पर किसी की सांस्कृतिक परवरिश, बाइबल और इतिहास को लेकर अज्ञानता, अन्य समाजों में दासता की अज्ञानता और संभावित पारस्परिक आर्थिक लाभों की अज्ञानता के कारण होता है।

बाइबल का परमेश्वर, जिसका नाम यहोवा है, दीन, गरीब, कमजोर और उत्पीड़ित लोगों की रक्षा करता है, और वह आज्ञा देता है कि अन्य सब लोग भी ऐसा ही करें। वह अनाथों और विधवाओं की रक्षा करता है (भजन 68:5; 82:1-4)। वह पशुओं की रक्षा करता है (नीतिवचन 12:10; व्यवस्थाविवरण 22:6; 25:4)। वह मांग करता है कि जब लोग उन लोगों की मदद करने में सक्षम हों जो खुद की रक्षा नहीं कर सकते हैं, तो वे उनके लिए अपनी आवाज़ उठाएँ (नीतिवचन 24:11-12; 31:8-9)।

नौकर या दास निम्न श्रेणी के लोग हुआ करते थे, जिनके स्वामी उनपर अत्याचार कर पाते थे, और न्यायप्रणाली या समाधान के आम तरीके भी उन्हें उतनी सुरक्षा नहीं दे पाते थें। वे अपने स्वामियों से निष्पक्षता और दयालुता पर निर्भर हुआ करते थे, इसलिए परमेश्वर उनके स्वामियों को विभिन्न प्रकार के कर्तव्य देकर उनकी रक्षा करता था (लैव्यव्यवस्था 25:39-46; व्यवस्थाविवरण 15:12-15; 23:15-16; 24:14-15; कुलुस्सियों 4:1; आदि)।

यह नीतिवचन नौकरों या दासों को उनके स्वामियों या मालिकों के अलावा अन्य लोगों से भी रक्षा करता है। नौकरों पर घर के अन्य लोगों या रिश्तेदारों और मित्रों द्वारा झूठे या कठोर दोष लगाने से उनके स्वामियों का गुस्सा भड़का सकता है और परिणामस्वरूप वे उन्हें तनख्वाह से वंचित रखने या उन्हें दंड दे सकते हैं। यह नीतिवचन उन आरोपों की भर्त्सना करता है जिनमें नौकरों पर झूठा लांछन (झूठा दोष), लगाया जाता है या उन्हें हीन भावना (अनावश्यक) महसूस कराते हैं, या जो कठोर (निर्दयी) आरोप हैं।

नौकर या दास का गरीब होने का अर्थ यह नहीं होता था कि उन्हें वास्तविक गलत काम के लिए या किसी बड़े अपराध के लिए, और बिना किसी पूर्वाग्रह या बिना किसी प्रतिशोध की भावना से भी दोषी नहीं ठहराया जा सकता था। न्याय में व्यक्तियों में पक्षपात करना, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, गलत है (निर्गमन 23:3; लैव्यव्यवस्था 19:15)। गरीब लोग अपराध करने पर सहानुभूति के पात्र नहीं होते (नीतिवचन 6:30-31; उत्पत्ति 21:25-26; लैव्यव्यवस्था 19:17; 1 शमूएल 26:19)।

यह मसला कितना महत्वपूर्ण है? परमेश्वर उन लोगों का बचाव करता है और उन्हें न्याय देता है जिनमें खुद की रक्षा करने की ताकत नहीं है, इसलिए सावधान रहें (नीतिवचन 22:22-23; 28:27; व्यवस्थाविवरण 10:18; 15:9; भजन संहिता 10:14,18; 146:9)। संयम से काम लें, दोष लगाने में धीमे रहें, और उदारता और दया के पक्ष में गलती करना चुनें, और परमेश्वर आपको आशीष देगा (नीतिवचन 19:17; 21:13; 22:16; यशायाह 58:6-11)। न्याय से काम करें, और कृपा से प्रीति रखें (मीका 6:8)।

एक उदाहरण पर विचार करें। याकूब अपने परिवार को मिस्र ले गया, जहाँ राजाओं के उत्तराधिकार के माध्यम से वे मिस्रियों के गुलाम बन गएँ थें। यह दोष लगाया गया कि यदि उन पर अत्याचार नहीं किया गया, तो वे संख्या में मिस्रियों से अधिक हो जाएँगे (निर्गमन 1:8-14)। इस्राएल ने यहोवा से प्रार्थना की, और उसने उनकी सुनी (निर्गमन 2:23-25)। दस विपत्तियों, पहिलौटे की मृत्यु, डूबी हुई सेना और लूटे गए और तबाह हुए राष्ट्र के बारे में सोचें। किसी दास को दोषी ठहराने से पहले सावधानी से विचार करें।

एक और उदाहरण पर विचार करें। शास्त्री और फरीसी, जो यहूदियों के धार्मिक कुलीन वर्ग की इकाई थें, उन्होंने यीशु के पास आकर उसके दीन प्रेरितों को दोषी ठहराया (मत्ती 15:1-2)। शास्त्री और फरीसियों के लिए भला होता कि वे उस दिन अपने घरों से बाहर न निकलते। यीशु ने तुरंत और सबके सामने उनके पाखंड और व्यर्थ धर्म के लिए उन्हें फटकार लगाई, और भीड़ के सामने उन्हें शर्मिंदा कर दिया (मत्ती 15:3-11)। जब यीशु को उसके चलों ने बताया गया कि फरीसी उनकी बात से आहत हुएं, तो उसने उनकी और भी भर्त्सना कीं (मत्ती 15:12-14)।

एक और उदाहरण पर विचार करें। यहूदा इस्करियोती एक चोर था (यूहन्ना 12:6), और उसने नौकर की तनख्वाह के बराबर कीमत लीं और यहूदियों के साथ मिलकर मानवजाति के महान सेवक यीशु के खिलाफ़ षडयंत्र रचा (मत्ती 26:15; निर्गमन 21:32)। यीशु ने यहूदा को शाप दिया (भजन 109:6-20; मत्ती 18:7; 26:24), और उसका रूपया धुल में मिल गया, वह अपराध-भावना और दुःख में डूब गया, और खेत में जाकर उसने आत्महत्या कर ली (मत्ती 27:3-10; प्रेरितों के काम 1:16-20)। किसी सेवक, विशेषकर परमेश्वर के पुत्र पर दोष लगाने में सावधानी बरतें।

एक और उदाहरण पर विचार करें। यहूदी यीशु से बैर रखते थे, और उन्होंने उसे तुच्छ जाना और उसे मानने से इनकार किया, उससे अपना चेहरा छिपाया, और परमेश्वर के सामने उस पर भयंकर अपराधों का दोष लगाया (यशायाह 53:3-4; मत्ती 9:34; 12:24; 26:65; यूहन्ना 8:48)। लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने यरूशलेम शहर को मिट्टी में मिला दिया क्योंकि उन्होंने अपने पवित्र सेवक और आगंतुक के साथ ऐसा व्यवहार किया था (लूका 19:43-44)। किसी सेवक, विशेषकर परमेश्वर के पुत्र पर दोष लगाने में सावधानी बरतें। इसके बजाय उसे चूमें (भजन 2:12)।

भक्तिपूर्ण जीवन का एक पहलु यह है कि, किसी को बदनाम न करें (तीतुस 3:2)। दूसरे की आँख के तिनके से ज़्यादा अपनी आँख के लट्ठे की चिंता करें (मत्ती 7:3-5)। दोष लगाने से ज़्यादा दया करने से प्रीति रखें (याकूब 2:13; मत्ती 7:1-2)। याद रखें कि जब परमेश्वर ने आपको सौ दीनार दिए, तब उसने आपको दस हजार तोड़े माफ कर दिए थे (मत्ती 18:21-35)। प्रेम को वह सब ढापने दो जो वह ढाप सकता है (नीतिवचन 10:12; 17:9)।

क्या आप मसीही धर्म की स्वतंत्रता को समझते हैं? परमेश्वर ने जीवन के कई प्रासंगीक मामलों को प्रत्येक विश्वासी के अपने अपने फैसले या अपनी अपनी वरीयता पर छोड़ दिया है। आपको उनके फैसलों को लेकर उनकी आलोचना करने या दोष लगाने का कोई अधिकार नहीं है। पौलुस ने लिखा, “तू कौन है जो दूसरे के सेवक पर दोष लगाता है? उसका स्थिर रहना या गिर जाना उसके स्वामी ही से सम्बन्ध रखता है; वरन् वह स्थिर ही कर दिया जाएगा, क्योंकि प्रभु उसे स्थिर रख सकता है” (रोमियों 14:4)। क्या सुलैमान का यह नीतिवचन आपके उन विचारों को बदल रहा है जो आप पहले सोचते थें? आमीन!

अधिकार के पद पर बैठे हर पुरुष या स्त्री इस नीतिवचन द्वारा सिखाई गई परमेश्वर की धार्मिकता को अपने जीवन में आत्मसात कर लें और निष्पक्षता और नम्रता का व्यवहार रखें। कोई भी शासक अपने अधीन किसी पर अत्याचार न करे (सभोपदेशक 5:8)। हर नियोक्ता निष्पक्ष व्यवहार करे (कुलुस्सियों 4:1)। हर पिता अपने बच्चों को न चिढाए (कुलुस्सियों 3:21)। हर पति अपनी पत्नी का सम्मान करे (1 पतरस 3:7)। हर पास्टर पक्षपात या सदस्यों में भादभाव को तुच्छ समझे (1 तीमुथियुस 5:21)।

ख्रिश्चन पाठक, आप प्रभु यीशु मसीह के सेवक हैं। यदि आप मसीह यीशु में पवित्रता का जीवन जीते हैं, तो आपको सताया जाएगा (2 तीमुथियुस 3:12), और कुछ लोग सोचेंगे कि वे परमेश्वर को प्रसन्न कर रहे हैं (यशायाह 66:5)। आपका प्रभु क्या कहता है, सुनें, “जितने हथियार तेरी हानि के लिये बनाए जाएँ, उन में से कोई सफल न होगा, और जितने लोग मुद्दई होकर तुझ पर नालिश करें उन सभों से तू जीत जाएगा। यहोवा के दासों का यही भाग होगा, और वे मेरे ही कारण धर्मी ठहरेंगे, यहोवा की यही वाणी है” (यशायाह 54:17)।

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