नीतिवचन 3:30
जिस मनुष्य ने तुझ से बुरा व्यवहार न किया हो, उससे अकारण मुक़द्दमा खड़ा न करना।
किसी से बहस करने, लड़ने या उसके ख़िलाफ़ मुक़द्दमा दायर करने के लिए आपके पास कोई अच्छा कारण होना चाहिए। अगर कोई वास्तविक नुकसान हुआ है तो आप अपना बचाव कर सकते हैं। लेकिन परमेश्वर ओछी, पाखंडी या प्रतिशोधी जवाबी कार्यवाही के लिए दोषी ठहराता है। किसी के भी ख़िलाफ़ मुक़द्दमा दायर करने के लिए कोई ठोस वजह, जैसे जानलेवा चोट, होनी चाहिए, अन्यथा वह आपको आपकी अकारण नफरती भावावेश की प्रतिक्रिया के लिए आपको दण्ड देगा (मत्ती 7:1-5)।
बिना किसी वैध कारण के बहस करने या लड़ने के परिणाम कितने गंभीर हो सकते हैं? स्वर्ग का महान परमेश्वर ऐसे विरोधी, दुष्ट, अप्रिय और नफरती लोगों से बैर रखता है (नीतिवचन 3:31-32)। वह उन लोगों के परिवारों को ही शापित घोषित कर देता है जो दूसरों के साथ मेल-मिलाप से नहीं रहते और जिन्हें सिर्फ़ कलह पैदा करना अच्छा लगता है (नीतिवचन 3:33)। ठट्ठा करनेवालों की वह निश्चय ठट्ठा करता है, और मूर्खों को लज्जित करता है (नीतिवचन 3:34-35)।
बेशक, झगड़ालू लोग हमेशा कहते हैं कि वे दूसरों से कभी बेवजह नहीं लड़ते। उनकी विकृत सोच के अनुसार, वे हर किसी से बहस करने, लड़ने या नुकसान के लिए मुक़द्दमा खड़ा करने के लिए न्यायोच्चित होते हैं। लेकिन परमेश्वर सब मनुष्यों के दिलों को जानता है, और वह उनके तुच्छ, व्यक्तिगत, पाखंडी या प्रतिशोधी विचारों को तुच्छ समझेगा। टेढ़े के साथ वह तिर्छा बनता है। (भजन 18:25-26)।
बुद्धि में दूसरों से जान-पहचान बनाने और उनके साथ मिलजुलकर रहने की क़ाबलियत शामिल है। बुद्धिमान लोग शानदार होते हैं, क्योंकि वे क्रोध को टालना जानते हैं और मामूली तू-तू-मैं-मैं को अनदेखा करते हैं (नीतिवचन 19:11)। वे जानते हैं कि यदि वे लोगों को उनकी मामूली तू-तू-मैं-मैं के लिए जवाबदेह ठहराने में निर्दयी होते हैं, तो परमेश्वर स्वयं भी उनके अपराधों को क्षमा नहीं करेगा (मत्ती 6:14-15; 18:21-35)।
ऐसा क्या है कुछ लोगों को वाद-विवाद करने उकसाता है? घमण्ड! केवल घमण्ड (नीतिवचन 13:10)! अहंकार ठीक ठीक न्याय करने या सच्चाई की सहज भावना नहीं है जो उन्हें दूसरों की आलोचना करने, बहस करने, लड़ने या विरोध करने के लिए प्रेरित करती है। यह उनके दुष्ट हृदय का अहंकार ही है जो दूसरों के प्रति दयालु होने से इनकार करता है, छोटे-मोटे अपराधों को अनदेखा करने से इनकार करता है, और दूसरों को पूरी तरह और आसानी से माफ़ करने से इनकार करता है। इन्सानी अहंकार विनाशकारी है। आप शायद तो इसे शान कहें, लेकिन परमेश्वर और सब अच्छे लोग जानते हैं कि यह केवल घमण्ड और अहंकार है।
उन औरतों के बारे में क्या जो झगड़ती हैं? वही बात! उनका अहंकार अपने पतियों को सुधारने में आनंद पाता है। उन्हें उनके द्वारा की गई हर गलती के बारे में याद दिलाना अच्छा लगता है। अपनी भूमिका से नाराज़ होकर, वे झगड़ा करके और विवाद करके अपना घमण्ड और स्वार्थ प्रकट करती हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि सुलैमान ने ऐसी महिलाओं के खिलाफ बार-बार चेतावनी दी (नीतिवचन 19:13; 21:9,19; 25:24; 27:15)।
शांति और एकता, जो बुद्धिमान लोगों के शुद्ध उद्देश्य होते हैं, बनाए रखने के लिए दूसरों के छोटे-मोटे अपराधों या गलतियों को अनदेखा करना ज़रूरी होता है। केवल तभी जब जीवन या घर को खतरा हो, लड़ाई का वैध कारण होता है। यीशु मसीह ने सिखाया कि आपके दिल में गुस्सा या बिना किसी कारण के गाली-गलौच भी हत्या ही है (मत्ती 5:21-22)। इस आरोप की गम्भीरता को समझें। और छोटे-मोटे अपराधों पर बलपूर्वक जवाब देना भी इसी प्रकार का है (मत्ती 5:38-42)। अगर कोई आपके गाल पर थप्पड़ मारें तो। तो क्या हुआ? अगर कोई आपके कोट के लिए आप पर मुक़द्दमा करता है, तो आगे बढ़कर उसे अपना लबादा भी दे दें। शांति बनाए रखें!
अमेरिका की बीती पीढ़ियों में, बच्चों के पास एक छोटी सी कविता होती थी जो 1862 के आसपास शुरू हुई थी, “लाठी और पत्थर मेरी हड्डियाँ तोड़ देंगे, लेकिन दुर्व्यवहार मुझे कभी चोट नहीं पहुँचाएँगे।” यह इस नीतिवचन की बुद्धिमत्ता के समान है। अगर आपको अपनी हड्डियाँ टूटने का खतरा है, जैसे कि रात में किसी चोर द्वारा, तो आप अपने घर, परिवार और खुद की रक्षा कर सकते हैं (निर्गमन 22:2)। लेकिन अगर आपको कोई गाली दें, तो आपको केवल दयालुता से जवाब देने का अवसर मिलता है (रोमियों 12:17-21)।
सुलैमान ने प्रतिशोध लेने के खिलाफ भी सबक दिया, “व्यर्थ अपने पड़ोसी के विरुद्ध साक्षी न देना, और न उसको फुसलाना। मत कह, “जैसा उसने मेरे साथ किया वैसा ही मैं भी उसके साथ करूँगा; और उसको उसके काम के अनुसार बदला दूँगा” (नीतिवचन 24:28-29)। यीशु मसीह द्वारा सिखाया गया सुनहरा नियम है कि जैसा तुम चाहते हो कि लोग तुम्हारे साथ करें, तुम भी उनके साथ वैसा ही करो, न कि जिस तरह से उन्होंने आपके साथ व्यवहार किया हो। क्या आप परमेश्वर की कृपा से बदला लेने की अपनी सब भावना को खत्म कर सकते हैं और अपने शत्रुओं से प्रेम करना चुन सकते हैं?
झगड़ालू आत्मा नरक से आती है, लेकिन कोमल और शांतिपूर्ण आत्मा स्वर्ग से आती है (याकूब 3:14-18)। कितना बड़ा अंतर! आपके लिए अपने चरित्र में बदलाव करने और दुनिया में बदलाव लाने का कितना शानदार अवसर है। परमेश्वर और मनुष्यों को प्रसन्न करने और जहाँ भी आप जाते हैं, शांति को बढ़ावा देने का कितना कीमती अवसर और विशेषाधिकार। आज आप क्या करेंगे? किसी भी बात पर लड़ेंगे? या सब कुछ माफ़ कर देंगे? मेल-मिलाप करने वाला बनें।
नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।