नीतिवचन 3:3

कृपा और सच्चाई तुझ से अलग न होने पाएँ; वरन् उनको अपने गले का हार बनाना, और अपनी हृदयरूपी पटिया पर लिखना।

कृपा और सच्चाई पूर्णता को चिन्हित करते हैं। जब वे आपस में मिलती हैं तो यह भेंट अद्भुत होती है (भजन 85:10)। वे दोनों मिलकर इन्सान को परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में और भली बातों की समझ में बढ़ाती हैं (नीतिवचन 3:4)। उनकी उपेक्षा करने और उनके खिलाफ पाप करने से आप कृपा और सच्चाई को खो जाते हैं, इसलिए अवश्य है कि आप बड़ी सावधानी से उन्हें अपने मन में रखें और उनके अनुसार चलें। कृपा और सच्चाई को अपने जीवन की व्यवस्था बनाएं।

आप अक्षरशः कृपा और सच्चाई को अपने गले का हार नहीं बना सकते। ये बुद्धि, ज्ञान और पवित्र आत्मा के चरित्र-लक्षण हैं और इन्हें डोरी, रस्सी या जंजीरों से नहीं जोड़ा जा सकता। यह एक रूपक है जो व्यक्ति के बाहरी जीवन के साथ कृपा और सच्चाई के घनिष्ठ लगाव का वर्णन करता है। न ही आप उन्हें सचमुच अपनी हृदयरूपी पटिया पर लिख सकते हैं। यह रूपक उन्हें अपना पहला प्रेम जानकर अपनी यादाश्त में रखने को दर्शाता है। बुद्धिमान लोग अपने अंदर और बाहर से कृपा और सच्चाई के प्रति समर्पित होते हैं।

कृपा और सच्चाई विपरीत प्रतीत होते हैं, लेकिन उनका संयोजन ही मनुष्य को सिद्ध पुरुष बनाता है। कृपा सज्जन लोगों का वह सौम्य, क्षमाशील, कृपालु और अनदेखी करने वाला गुण है, जो अपनी शक्ति का उपयोग कर किसी से लड़ने या उसे चोट पहुंचाने के बजाय ख़ुशी ख़ुशी व्यक्तिगत नुकसान सहता है। जो कुछ भी ईमानपूर्ण और सही है, कीमत की परवाह किए बिना उसके प्रति दृढ़ प्रतिबद्धता ही सच्चाई है। साथ में वे एक-दूसरे को शानदार ढंग से संतुलित करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप एक सच्चे संत का सौम्य और ईमानदारीपूर्ण जीवन बनता है।

माता-पिता, अपने बच्चों को कृपा से प्रेम करना सिखायें। यह आपका कर्तव्य है कि आप उन्हें क्षमा करने और उन्हें यह भी सिखाएँ अपने विरुद्ध किएँ किसी भी अपराध को नज़रअंदाज़ करना कितना गौरवपूर्ण है (नीतिवचन 19:11; मत्ती 5:38-42)। कृपालुता और कोमलता पर ज़ोर दें। तुम्हें उन्हें अपने शत्रुओं से प्रेम करना सिखाना चाहिए, जैसा प्रभु और स्तिफनुस ने किया था (नीतिवचन 24:17-18; 25:21-22)। भाई-बहन की प्रतिद्वंद्विता उन्हें यह शिक्षा देने आपके लिए लगभग दैनिक अवसर पैदा करेगी। कृपा अनुचित क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, द्वेष, निंदा, कानाफूसी और इसी तरह के पापों को बर्दाश्त नहीं करती है। सभी मनुष्यों के प्रति कोमल करुणा सिखाओ।

माता-पिता, अपने बच्चों को सच्चाई से प्रेम करना सिखायें। यह आपका कर्तव्य है कि आप उन्हें परमेश्वर के वचन का अंतिम अधिकार और उन्हें यह भी सिखाएँ कि सभी व्यवहारों में पूर्ण ईमानदारी और सत्यनिष्ठा रखना कितना गौरवपूर्ण है। पूर्ण ईमानदारी एक अद्भुत बात है (नीतिवचन 12:22; 16:11; 17:7; रोमियों 12:17)। किसी भी रूप में झूठ बोलने पर उन्हें कड़ी सजा दें। सच्चाई अतिशयोक्ति, पाखंड, झूठ, निंदा और अन्य सब संबंधित धोखे को बर्दाश्त नहीं करती है। यह अपने किएँ सभी वादों को पूरा करती है।

कृपा और सच्चाई बुद्धि के आवश्यक अंग हैं। वे वस्तुतः मनुष्यों का त्याग नहीं करते हैं, परन्तु मनुष्यों में आदम की अंतर्निहित भ्रष्टता आपको उन्हें त्यागने के लिए प्रेरित करती है। यहां बुद्धि का नियम सभी स्थितियों में शुद्ध आचरण के इन दो स्तंभों से प्रेम करना और उन्हें याद रखना है। लगभग सब प्रकार के पाप को अलग किया जा सकता है और उसकी पहचान कृपा या सच्चाई का उल्लंघन करने वाले के रूप में की जा सकती है। सावधान रहें, सतर्क रहें!

धन्य प्रभु यीशु में कृपा और सच्चाई का उत्तम संतुलन था। कोई भी मनुष्य उसके इतना कृपालु नहीं था, यहाँ तक कि शत्रुओं के प्रति भी; कोई भी व्यक्ति सच्चाई के प्रति इतना कठोर नहीं था, भले ही इसके लिए उसे अपनी जान गंवानी पड़ी थी। वह बड़ी सहज और बिना विलम्ब किए क्षमा कर देता था, फिर भी उसे विश्वासयोग्य और सच्चा कहा जाता है (प्रकाशितवाक्य 19:11)। अगर आप अपने जीवन को अंदर और बाहर से कृपा और सच्चाई के द्वारा अनुशाशित रखना चाहते हैं तो उसी को अपना पवित्र आदर्श बनाएं।

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