नीतिवचन 3:1

हे मेरे बेटे, मेरी व्यवस्था को मत भूल, परन्तु तेरा मन मेरी आज्ञाओं का पालन करे : (केजेवी)

बुद्धि को केवल सुनना काफी नहीं है। अवश्य है कि आप इसे स्मरण रखे, और अपने जीवन परिवर्तन के द्वारा इस का व्यवहारिक उपयोग करे, ताकि बुद्धि और आपके जीवन के बीच समानता दिखाई दे। किसी भी शिक्षा का मूल्य केवल तब होता है जब उसे स्मरण रखा जाता है और ज़रुरत के समय उसका व्यवहारिक उपयोग किया जाता है (नीति 3:2)।

सुनकर भूल जाना भयानक बर्बादी है, और यदि आप बुद्धि को सुनने के मूल्यवान अवसर को व्यर्थ में उड़ा देते हैं तो परमेश्वर आप को इस के लिए जवाबदेह ठहराएगा (नीति 1:24-32; लूका 12:48)। अवश्य है कि आप सीखी हुई बातों का स्मरण रखें; उन्हें आपको भुलाना नहीं है (नीति 3:3, 21; 4:4-6, 13, 21; 6:21; 7:1; 22:18)।

अपने हृदय की रक्षा करना एक प्राथमिकता है, क्योंकि आपके जीवन का आचरण वही से फुट निकालता है (नीति 4:23)। आपका मन आपकी चाल की अगुवाई करता है (लूका 6:45)। अवश्य है कि आप बुद्धि और उसकी आज्ञाओं को अपने मन में रखे, ताकि वह दिन-प्रतिदिन आपकी इच्छाओं और चुनाओं की अगुवाई कर सके (नीति 3:3; 4:21; भजन 37:31)।

यहां पर सुलैमान राजा अपने पुत्र से आग्रह कर रहा है, किन्तु ये नीतिवचन इसलिए लिखे गए थे, ताकि आप उन से लाभ पाएं। बाइबल की इस पुस्तक में जो बुद्धि पाई जाती है क्या आप उसके नियमों को सुनेंगे, उन्हें स्मरण रखेंगे, उनसे प्रीति रखेंगे, और उनके अनुसार करेंगे? यदि आप उन्हें स्मरण रखे, और उनके अनुसार करें तो केवल वे ही आप का उद्धार करेंगे और आप को समृद्ध बनाएंगे।

पौलुस ने सुनी हुई बातों से भटक जाने के विषय में बड़ी सख्ती से चेतावनी दी (इब्रा 2:1-4)। आप सृष्टिकर्ता स्वर्ग के परमेश्वर से व्यवहार कर रहे हैं, और भूल जाने के नतीजे गम्भीर होंगे। यदि वह अपनी बड़ी दया से आपको सत्य प्रकट करता है तो वह चाहता है कि आप उस सत्य के मूल्य को समझे और उसे अपना ले।

लोग उन बातों को याद रखते हैं जो उनके लिए महत्वपूर्ण होती हैं। यह स्मरणशक्ति का कार्य नहीं है, बल्कि प्राथमिकता का कार्य हैं, अर्थात् आप जिन बातों को प्राथमिकता देते हैं वे बातें आप को याद दिलाने की, या याद करने की आवश्यकता नहीं होती है। यह इतना भी कठिन नहीं है, क्योंकि इसमें धुन, लगन और तत्परता की आवश्यकता होती है। आप कौन-सी बातें याद रखते हैं? आप केवल उन बातों को याद रख सकते हैं, और रखेंगे जिन्हें आप लाभ या सुख के लिए मूल्यवान समझते हैं।

याकूब ने हमें चेतावनी दी कि हम परमेश्वर के वचन के केवल सुननेवाले बनकर स्वयं को धोखा न दे, बल्कि उसे करनेवाले भी बने (याकूब 1:21-25)। उद्धार करने वाले सत्य के लाभ केवल उनके लिए हैं जो उसे याद रखते हैं, और उसे करते हैं। अन्यथा आप उस मनुष्य के समान हैं जो परमेश्वर के वचन के आईने में अपनी ग़लतियों को देखता है, परन्तु कोई सुधार नहीं करता। परन्तु जो शिक्षा को देख पाते हैं, उसे याद रखते हैं, और उसके अनुसार करने में टिके रहते हैं वे निश्चित ही आशीषित होंगे।

पौलुस ने समझाया कि सुसमाचार केवल उनका उद्धार करता है जो उसे स्मरण रखते हैं (1 कुरिं 15:2), क्योंकि कुरिन्थ की कलीसिया के कुछ लोग मृतकों में से पुनरुत्थान की शिक्षा को भूल गए थे। उसने दिखाया कि इस धर्म-सिद्धांत पर विश्वास किए बिना, पाप से उद्धार नहीं मिल सकता और मसीही सभी मनुष्यों से बढ़कर अभागे हैं (1 कुरिं 15:19)।

प्रिय मसीही यह आपका कर्तव्य है कि आप शिक्षा को ध्यान से सुनें और उसके अनुसार फल को ले आए (लूका 8:18)। आप किस प्रकार की भूमि हैं? शैतान आपसे शिक्षा को छीन लेगा जब तक कि आप उसे ग्रहण न करें और अपने मन में उसे न रखें जहाँ वह धार्मिकता का फल ले आएगी (लूका 8:12)।

दाऊद ने परमेश्वर के वचन को अपने मन में छिपाकर रखने की शिक्षा दी (भजन 119:11)। इस का एक तरीका है उसे स्मरण रखना। वचनों को सीखने से वे आपके हृदय और मन में रहते हैं (भजन 1:2; 119:15, 23, 43, 78, 97, 99, 148) क्योंकि वही पर आप उन वचनों पर बड़ी आसानी से चिंतन कर सकते हैं और बड़ी तत्परता से उन का उपयोग कर सकते हैं (नीति 22:18; लूका 4:4, 8, 12)।

पतरस ने वचन को दोहराने के महत्त्व को भी सिखाया (2 पतरस 1:12-15)। यद्यपि उसके सुनने वाले पहले से ही सत्य को जानते थे, फिर भी वह उसे बार बार दोहराने के लिए प्रतिबद्ध था, ताकि याद रखने में उनकी सहायता कर सके। अगर किसी शिक्षा को बार बार दोहराया जाता है तो आप को कुढ़कुढ़ाना नहीं है, अन्यथा यह आप के विनाश का फन्दा बन जाएगा (यशा 28:9-13)।

आप की दो ज़रूरतें हैं। पहली, आपको बुद्धि और निर्देश के स्रोत की ज़रूरत है। दूसरी, आपको शिक्षक की ज़रूरत है, एक प्रचारक की, ताकि आपके जीवन पर परमेश्वर प्रेरित बुद्धि का प्रभाव डालने के लिए वह आप को इसकी शिक्षा दे सके। परमेश्वर ने ऐसे शिक्षकों को सच्ची कलीसियाओं में नियुक्त किया, ताकि वे आप को परमेश्वर का वचन बताएं (मलाकी 2:7; 2 तिमु 3:16-17)।

साथ ही, आप को व्यक्तिगत अनुशासन, तथा ऐसी आदतों की ज़रूरत है ताकि आप जो कुछ सुनते हैं उसे स्मरण रख सके, अपनी समझ के लिए उसकी समीक्षा कर सके, और अपने जीवन में उसका व्यवहारिक उपयोग कर सके (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्स 5:21)। यदि ये दो बातें अपनी जगह सही हो और कार्यरत हो तो कुलीन स्त्री नामक बुद्धि की शिक्षा आपके जीवन को उन्नति की नई ऊँचाई पर पहुंचाएगी।

प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर की व्यवस्था को अपने हृदय में रखता था, इस कारण वह परमेश्वर की इच्छा को पूरा करने आनंदित होता था, जो उसी व्यवस्था में प्रकट की गई है (भजन 40:6-8)। क्या आप प्रसन्न हैं कि उसने परमेश्वर की इच्छा पूरी की (इब्रा 10:9-10)? यह परमेश्वर की आप के लिए प्रकट इच्छा है कि आप अपने पापों से पश्चात्ताप करें और उस पर विश्वास रखें। क्या आप ने पश्चात्ताप और विश्वास किया है?

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