नीतिवचन 29:7

धर्मी पुरुष कंगालों के मुक़द्दमे में मन लगाता है; परन्तु दुष्ट जन उसे जानना भी नहीं चाहता।

जब गरीबों की बात आती है तो उनकी परिस्थिति से अनजान होना कोई ख़ुशी की बात नहीं है, न ही कोई बहाना है। जो मनुष्य दुष्ट होते हैं, वे ही उनके बारे में नहीं सोचते, और न ही उनकी हालातों या परेशानियों को जानने का कोई प्रयास करते हैं। लेकिन धर्मी मनुष्य गरीबों के बारें में सोचता है और उनकी परिस्थितियों का जायज़ा लेकर जान लेता है कि उन्हें क्या चाहिए और वह कैसे उनकी मदद कर सकता है। इस मामले में उनकी परिस्थिति से अनजान होना कोई ख़ुशी नहीं है, न ही कोई बहाना है, क्योंकि परमेश्वर उस स्वार्थी मनुष्य को दण्ड देगा जो गरीबों के बारे में सोचने और उनकी आवश्यकताओं का खयाल रखने की उपेक्षा करता है (नीतिवचन 21:13; 28:27)।

स्वार्थी और कंजूस लोग, जिन्हें यह नीतिवचन के दुष्ट कहता है, गरीबों के बारे में न तो सोचते हैं और न ही उनकी परवाह करते हैं। वे अपने स्वयं के बेकार जीवन से इतने ग्रस्त हैं कि उनके दिमाग या दिल में दूसरों के लिए कोई जगह नहीं है, यहाँ तक कि तब भी नहीं दूसरे लोग कमी-घटी या परेशानी में हों। यदि आप फटकारते हैं, तो वे कहेंगे, “मैं उनके व्यक्तिगत मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहता था,” या, “मैं अपने काम से काम रखता हूँ, और आप भी अपने काम से काम रखों” या, “अरेरे, मुझे नहीं पता था कि वे ऐसी बदहाली से गुज़र रहें हैं” या, यह कि “मैं किसी और की मदद करने का जोखिम नहीं उठा सकता, क्योंकि मैं खुद अपनी ही ज़रूरते पूरी नहीं कर पा रहा हूँ।”

अय्यूब पर विचार करें। परमेश्वर ने बड़े से शैतान से कहा कि अय्यूब एक खरा और सीधा मनुष्य था (अय्यूब 1:1-8)। क्या अय्यूब गरीबों पर मन लगाता था? क्या वह यह जानने के लिए गरीबों के बारें में पूछताछ किया करता था कि उन्हें कब किस चीज की ज़रूरत है? अय्यूब ने कहा, ” दरिद्र लोगों का मैं पिता ठहरता था, और जो मेरी पहिचान का न था उसके मुक़द्दमे का हाल मैं पूछताछ करके जान लेता था” (अय्यूब 29:16)। आमीन! अय्यूब ने यह भी कहा, “क्योंकि मैं दोहाई देनेवाले दीन जन को, और असहाय अनाथ को भी छुड़ाता था। जो नष्ट होने पर था मुझे आशीर्वाद देता था, और मेरे कारण विधवा आनन्द के मारे गाती थी” (अय्यूब 29:12-13)।

शुद्ध और निर्मल धर्म यह है कि कंगालों पर मन लगाए और उनके लिए कुछ करे (नीतिवचन 14:31; 17:5; भजन 112:9; लूका 19:8-9; याकूब 1:27; 1 यूहना 3:16-19)। यदि आप गरीबों की उपेक्षा करते हैं या उनके प्रति लापरवाह हैं, तो परमेश्वर को आपके उपवास, चर्च में उपस्थिति, बाइबल पढ़ने या दशमांश देने की कोई परवाह नहीं है (यशायाह 1:10-20; 58:3-7; मत्ती 23:23)। वह धर्म को वहां मापता है जहां यह मायने रखता है – दिल में और आपके बटुए से। आपने गरीबों के बारे में कितना सोचा है? क्या आपने उनका दर्द महसूस किया है? क्या आपने उनकी ज़रूरतों के बारे में पूछा? आपने इस बारे में क्या किया है? क्या आपने उनके लिए कभी परिश्रम किया या उन पर अपना धन खर्च किया है? यदि हाँ, तो कितना?

आपकी आर्थिक क़ामयाबी गरीबों को देने पर निर्भर करती है, लेकिन दुष्ट लोग नहीं देते, क्योंकि वे लालची हैं, और सोचते हैं कि अगर वे किसी को कुछ न दें तो वे तरक्की करेंगे। वे अंधे हैं। तुम गरीबों को दान देकर कंगाल कैसे हो सकते हो, जबकि परमेश्वर आप ही तुम्हें बहुतायत से प्रतिफल देगा, बल्कि तुम जो दोंगे उससे भी अधिक? इस पर अच्छी तरह से विचार करों (नीतिवचन 11:24-26; 19:17; 22:9; 28:8; लूका 6:38; 2 कुरिन्थ 9:6-11)।

जब आप देते हैं, तो निर्धन ख्रिश्चन पवित्र जनों को देना आपका प्राथमिक कर्तव्य हैं (व्यवस्था 15:7-11; कुलुस्सियों 2:42-45; 4:34-37; 6:1-7; 11:27-30; रोमियों 15:25-27; 1 कुरिन्थ 16: 1; 2 कुरिन्थ 9:1-2)। एकमात्र गैर-ख्रिश्चन गरीब-निर्धन जिन्हें देना आपका कर्तव्य बनता है वे वे हैं जिन्हें परमेश्वर संकट के समयों में सीधे आपके रास्ते में ले आता है (लूका 10:25-37)। परन्तु इन दोनों प्रकार के लोगों में आपकी मदद के पात्र केवल वे ही लोग हैं जो अपने लिए सब कुछ कर रहें हैं, परन्तु फिर भी उन्हें कमी-घटी है, वे नहीं जो आलसी हैं, और मुफ्त की रोटी खाने के आदि हैं। जब आप ख्रिश्चन गरीबों को देते हैं, तो दो बातें हैं जिनके विषय में आपको सचेत रहना है। पहली, यीशु मसीह न्याय के दिन आपकी दानशीलता को स्मरण रखेगा (मत्ती 10:41-42; 25:31-46), और दूसरा, कुछ लोगों ने अनजाने में स्वर्गदूतों का आदर-सत्कार किया है (इब्रानियों 13:2; उत्पत्ति 18:1-8; 19) :1-3; न्यायियों 13:2-23)।

अगर आप एक ख्रिश्चन स्त्री हैं तो दान देने का एक और कारण है। यदि आप एक विधवा और निराश्रित हैं, तो एक सच्चा चर्च आपकी भले कामों में आर्थिक सहायता करेगा (1 तीमु 5:3-16; कुलुस्सियों 6:1-6)। इन विशेष विधवाओं का विशेष चरित्र-लक्षण यह होता है कि वे भले कामों में परिश्रम के लिए बड़ी प्रतिष्ठित होती हैं, जिसमें अजनबियों के लिए आवास की व्यवस्था करना और पीड़ितों को राहत देना शामिल है (1 तीमु 5:10; नीतिवचन 31:20; कुलुस्सियों 9:36-43)। आप दूसरों की सेवा में अपना समय और श्रम देकर परमेश्वर की सेवानिवृत्ति-योजना और लोक-कल्याण योजना में पूरी तरह से व्यस्त हो सकती हैं।

सहानुभूति यह है कि दूसरों के दर्द को महसूस किया जाए। पौलुस ने लिखा, “कैदियों की ऐसी सुधि लो कि मानो उनके साथ तुम भी कैद हो, और जिनके साथ बुरा बर्ताव किया जाता है, उनकी भी यह समझकर सुधि लिया करो कि हमारी भी देह है” (इब्रानियों 13:3)। आप जब ऐसा करते हैं, आप अपने दिल और दिमाग से प्रभु यीशु के सुनहरे नियम का व्यवहारिक उपयोग करते हैं (लूका 6:31)। परमेश्वर के इस नियम के पालन के लिए एक ऐसी सहानुभूति की मांग की गई थी जिसमें उदारता से देने का मन-भाव हो (निर्गमन 22:21-27; व्यवस्थाविवरण 15:7-11; 24:12-22; भजन 41:1), और अय्यूब ऐसा ही किया करता था (अय्यूब 31:16-22)। आप अन्य जरूरतमंद लोगों के प्रति कितने विचारशील, और संवेदनशील हैं? आपका दिल कितना बड़ा है, और आप जरूरतमंद लोगों की सहायता के लिए अपना हाथ कितना फैला सकते हैं (व्यवस्थाविवरण 15:7-11)?

राजा लेमुएल की माँ ने उसे निर्देश दिएँ कि वह दीन दरिद्रों की सुधि ले (नीतिवचन 31:8-9), और इतना ही नहीं, उसने उसे ऐसे ही बड़े दिल वाली स्त्री से विवाह करने का आदेश भी दिया (नीतिवचन 31:20)। व्यक्ति में महान चरित्र को इस बात से मापा जाता है कि वह मुसीबत में पड़े दूसरों की मदद करने के लिए कितना उत्सुक है। लेकिन यह ज्ञान केवल पुराने नियम के लिए नहीं है; यही आज्ञा नए नियम में भी है (रोमियों 12:13)। आपका अपना सुख और आशीर्वाद इस बात पर निर्भर करते हैं कि आप गरीबों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं (नीतिवचन 14:21; भजन 41:1-3; कुलुस्सियों 20:35)।

इस नीतिवचन की शिक्षा का उपयोग आप कैसे करेंगे? क्या आप इसकी अनदेखी करेंगे? भूल जाएंगे? क्या कोई है जिसका आपको अभी ख़याल आ रहा है? आज आप रात भोजन के लिए अपने घर में किसे ले जाएँगे? या बाहर खाने के लिए किसे ले जाएँगे? क्या उन्हें जो बदले में आपको भी ले जा सकते हैं, या उन्हें जो बदले में आपको कुछ भी नहीं दे सकते (लूका 14:12-14)? दिखावटी बातें करना बेकार और क्रूरता है (याकूब 2:15-16)। सर्वज्ञ परमेश्वर आपके दिल, दिमाग और बटुए पर नजर रख रहा है (नीतिवचन 15:3; इब्रानियों 4:12-13)। सच्चा प्रेम जो अनन्त जीवन को प्रमाणित करता है, ऐसा ही करता है (1 यूहन्ना 3:14-19), जैसे यीशु मसीह ने अपने चुने हुए लोगों के प्रति उस प्रेम का पराक्रमपूर्वक प्रदर्शन किया (2 कुरिन्थ 8:9; 9:15)।

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