नीतिवचन 29:6

दुष्ट मनुष्य के अपराध में एक जाल है, परंतु धर्मी गाता है और मगन होता है। (केजेवी)

कुछ लोग किसी ना किसी संकट में पड़ जाते हैं, कभी इस मुसीबत में तो कभी उस मुसीबत में। तो वही कुछ लोग गाते-मुस्कुराते खुशियों भरा जीवन जीते हैं। क्या फर्क है? इस सवाल के जवाब की ओर आपको अवश्य ध्यान देना चाहिए। आपका जीवन या तो दुख और समस्याओं से भरा हो सकता है, या आनंद और सुख से भरा हो सकता है। इन में से आपका जीवन कौन-सा होगा?

दुष्ट मनुष्य परमेश्वर की आज्ञाओं को तोड़ने का चुनाव करता है। वह सब काम अपने तरीके से करना चाहता है। परमेश्वर के वचन के लिए उसके मन में कोई स्थान या सम्मान नहीं है। वह अपने ही विचारों से प्रेम रखता है। उसे यकीन होता है कि वह अपने पापों से बच निकलेगा। उसे प्रतीति होती है कि उसे पाप करने से खुशियां हासिल होगी। वह बड़े आत्मविश्वास से बुद्धि का तिरस्कार करता है ताकि मूर्खों का पथ चुन सके।

परंतु वह धोखा खा रहा है! प्रत्येक पाप में एक जाल या फंदा बिछाया होता है! परमेश्वर के विरोध में उसके विद्रोह के लिए उसे दण्ड देने एक अदृश्य जाल बिछाया होता है। जब वह पाप करने का चुनाव करता है, उस वक्त भले ही उसने उस जाल को देखा न हो, फिर भी जाल के जंग खाए हुए पंजे अचानक ही उछलकर उसके जीवन को दबोच लेंगे। तब उसे अपनी मूर्खतापूर्ण चुनावों के दर्दनाक परिणामों का एहसास होगा (भजन 36:2; नीति 4:19; 13:15; 28:14)। वह ऐसे जाल से बच निकलने के एकमात्र मार्ग का तिरस्कार करता है, अर्थात् पूरा-पूरा पश्चाताप, क्योंकि उसे लगता है कि पश्चाताप करना मतलब जाल में फंसे अपने पैरों को छोटे चाकू से जाल को काटकर निकालने जैसा है!

इसे समझने के लिए कुछ उदाहरणों पर विचार करें। एक पुरुष सुंदर स्त्री से विवाह करता है, जो परमेश्वर का कोई भय नहीं मानती। क्या इसमें कोई फंदा है? अब उसे मरते दम तक एक घिनौनी स्त्री के साथ रहना होगा। एक पत्नी अपने पति से विश्वासघात करती है। क्या इसमें कोई जाल बिछा हुआ है? अब उसे अपनी बाकी सारी जिंदगी एक कटु मन वाले पति के साथ गुजारनी होगी। एक पुरुष जानबूझकर किसी वेश्या से सम्बंध बनाता है। क्या यहां कोई फंदा बिछा हुआ है? उसे एड्स हो जाता है। एक आलसी पिता अपने बच्चों को प्रशिक्षण देने की उपेक्षा करता है। क्या कोई जाल या फंदा बिछा हुआ है? बाद में वही बच्चा आगे विद्रोही बनकर अपने पिता का दिल तोड़ देता है, और पूरे घराने की प्रतिष्ठा को धूल में मिला देता है।

अब कुछ और उदाहरणों पर विचार करें। एक बाप अपने बच्चों के सामने सरकार का उपहास करके उसे गाली-गलौच और शाप देता है (सभो 10:20)। क्या इसमें कोई जाल है? बाद में उसके ही बच्चे उसके विरुद्ध अहंकार से भरा विद्रोह करते हैं। एक उद्धट पुत्र अपने पिता की सलाह का तिरस्कार करता है। क्या इसमें कोई जाल है? वह एक व्यभिचारिणी लड़की से विवाह कर बैठता है, और किसी बर्बाद हो रही कंपनी में नौकरी करता है। एक मनुष्य को खर्चा करना अच्छा लगता है इसलिए वह बचाने की सलाह को ठुकरा देता है। क्या इसमें कोई जाल या फंदा है? वह अपने मित्रों के समान कभी कोई निवेश नहीं करता और जल्द ही बर्बाद हो जाता है। एक स्त्री अपने जीवन से नाखुश होकर शिकायत करती रहती है। क्या कोई जाल है? उसके बच्चे अपनी खुशियों और शांति को ढूंढने घर से भाग जाते हैं।

परंतु धर्मीजन पवित्र अर्थात् पापियों से अलग जीवन जीता है। वह परमेश्वर की सब आज्ञाओं का पालन करते हुए सावधानीपूर्वक रहता है। वह परमेश्वर के वचन के आगे थरथराता है। वह बिना कोई विलम्ब किए अपने सभी पाप मान लेता है, और उसका अनुग्रहकारी स्वर्गीय पिता उसकी आत्मा को फिर से नया कर देता है। उसका विवेक शुद्ध और विश्वास से भरा होता है। उसमें कोई भय, दोष-भावना या शर्मिंदगी नहीं होती है। वह रात में चैन की नींद सोता है, और बड़ी शान से संतुष्टि का जीवन जीता है। अब उसके प्राण में आनंद की भरपुरी होती है, और एक उज्वल भविष्य की आशा करता है। वह बड़े आनंद से गाता है। वह अपने जीवन के हर पहलू का आनंद लेता है, और अब उसे अपनी चारों और ऐसी बातें दिखाई देती हैं जिनके लिए अब वह परमेश्वर को एक कृतज्ञ मन से धन्यवाद देता है ।

सुख भक्ति का फल है, और संतोष सहित भक्ति बड़ा लाभ है (1 तिमु 6:6)। जब परमेश्वर कहता है कि वह लाभ है, तो वह लाभ ही है! पवित्र जीवन नुकसान से सुरक्षित, दोष-भावना से मुक्त, संकट और मुसीबतों से रहित होता है। सही करने में कोई फंदा नहीं होता है, न कोई मानसिक कष्ट देनेवाला पछतावा होता है, और न ही पीड़ादायक बुरे नतीजे होते हैं। अच्छा करने से विवेक में कोई पीड़ा या पाखंडपूर्ण घबराहट नहीं होती है। धर्मीजन प्रतिदिन दावत का आनंद लेता है (नीति 3:17; 15:15)। और वह जानता है कि मृत्यु के समय और भी बड़ी और महान आशीष आनेवाली है, अर्थात् मसीह यीशु में अनंतकाल का जीवन जो उस पर विश्वास करने से मिलता है।

परमेश्वर को पता है कि आप सुखी होना चाहते हैं, और इसलिए उसने इस नीतिवचन में और बाइबल के अन्य स्थानों में उसका तरीका बता दिया है (भजन 34:12-16; भजन 127:5; 128:2; 144:15; नीति 3:13, 18; 14:21; 16:20; 29:18)। वह सब मनुष्यों से बढ़कर जानता है कि सुख क्या है, सच्ची संतुष्टि क्या है, और परिपूर्णता क्या है। क्या आप उसकी नियमावली से मार्गदर्शन लेते हैं जिसमें उसने जीवन की व्यवस्था दे रखी है – अर्थात् बाइबल? क्या आप ऐसे किसी चर्च में जाते हैं जहां उसने आपके सुखी जीवन के लिए बाइबल से सत्य और बुद्धि की शिक्षा देने हेतु अपने विश्वासयोग्य प्रचारकों को नियुक्त किया है?

प्रिया मसीही, क्या आप समझते हैं? क्या आपने कष्टी और दुखी लोगों को देखा है? क्या आप स्वयं कभी किसी मुसीबत में पड़े हैं? यह आपका दोष है! आप ने परमेश्वर के विवेकपूर्ण नियमों को तोड़ा, और पाप के जाल में फंस गए। हर एक पाप एक जाल या फंदा लाता है। पाप करना रोक दो, और आप अपनी मन की शांति को फिर से पाएंगे (नीति 11:6; 12:13)। आप अपने जीवन के कौन से क्षेत्र में परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं? फंदा आपको कचोटने के लिए तैयार है। धर्मी जन आनंद से गाता है, क्योंकि उसका जीवन धन्य है, और भविष्य उससे भी बेहतर होगा। आज ही अपने पापों से पश्चाताप करें और अपने अनंतकाल के उद्धार के लिए प्रभु यीशु मसीह पर विश्वास रखें।

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