नीतिवचन 29:20

क्या तू बातें करने में उतावली करनेवाले मनुष्य को देखता है? उससे अधिक तो मूर्ख ही से आशा है।

शांत रहें। बोलने में उतावली न करें। बोलने से पहले सोचे। सुनिश्चित करें कि आप अपना मुँह खोलने से पहले ठीक ठीक जानते हैं कि किस बारे में बातें कर रहे हैं। जो बातें करने में उतावली करता है, बार-बार बोलता है और बड़ी तेज़ी से उत्तर देता है, वह मूर्ख से भी बुरा है। अज्ञानता के कारण मूर्ख पर मुसीबत आ पड़ती है, परन्तु जो व्यक्ति बिना सोचे-समझे जवाब देता है या बोलता है, उसे दंड दिया जाएगा। वह मूर्ख से भी बुरा है।

परमेश्वर की बुद्धि सरल है – “इस कारण, हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जान लो : हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो” (याकूब 1:19)। आपके दो कान और मुँह एक ही है; इस व्यवस्था को अपने सुनने और बोलने में प्रतिबिंबित होने दें। कई लोगों का दिमाग चलने से पहले उनका मुंह चल पड़ता है, और ऐसे लोग खुद के लिए तो खतरा होते ही हैं परन्तु दूसरों के लिए भी दुर्गन्ध बन जाते हैं।

धर्मी मनुष्य उत्तर देने से पहिले सब बातें परखता है; परन्तु दुष्ट लोग बिना परखे ही के व्यर्थ की बातें उगल देते हैं (नीतिवचन 15:28)। भला मनुष्य बोलने से पहले सतर्क हो जाता है, क्योंकि वह पहले यह सुनिश्चित करना चाहता है कि जब वह बोलेगा तो केवल सत्य ही बोलेगा (नीतिवचन 22:20-21)। अहंकारी मूर्ख को अपनी बातें दूसरों को सुनाना अच्छा लगता है, इसलिए जब भी संभव हो, वह सच्चाई की परवाह किए बिना बात करने में व्यस्त रहता है (सभोपदेशक 10:12-13)।

क्या आप कभी किसी ऐसे व्यक्ति से मिले हैं जो प्रश्नों के पूरी तरह सामने आने से पहले ही उत्तर दे देता है? क्या आपने खुद भी कभी ऐसा ही किया है? जिस दुविधा की विषयवस्तु को आपने अभी तक ठीक ठीक रीति से सुना ही नहीं है उसका हल निकलना मूर्खता और शर्म की बात है (नीतिवचन 18:13)। कोई व्यक्ति इतनी गुस्ताख़ी से जवाब देता है इसका क्या कारण है? अहंकार और खुद को ज्ञानी समझने का भ्रम! उसे अपने आप पर इतना यकीन होता है, कि वह बिना सोचे-समझे ही फट पड़ता है; उससे अधिक तो मूर्ख ही से आशा है (नीतिवचन 26:12)।

मूर्ख निर्बुद्धि होते हैं, परन्तु उतावले और आवेगपूर्ण बात करने वाले घमंडी होते हैं। एक मूर्ख को उसकी मूर्खता और हठ पर काबू पाने में मदद करने की कुछ उम्मीद होती है, परन्तु एक घमंडी व्यक्ति को अपने चरित्र और आचरण में विकृतियों को देखने में मदद करने की उम्मीद कम या बिल्कुल नहीं होती है। उसका आत्म-धार्मिक विश्वास, जो कि सबसे बड़ा पाप है, उसे सुधारने नहीं देगा। वह सुरक्षा पाने के लिए सम्मति देनेवालों की बहुतायत की तलाश नहीं करेगा, क्योंकि वह मानता है कि वह सही है (नीतिवचन 11:14; 15:22)।

मूर्ख मनुष्य सलाह की आवश्यकता या किसी से अनुरोध न होने के बावजूद अपने ‘मन की बात’ बक देता हैं, परन्तु एक बुद्धिमान व्यक्ति ध्यान से सुनता है ताकि देखे कि जो कुछ वह जानता है उसे वह बताना चाहिए या नहीं (नीतिवचन 29:11)। पाठक, यह बुद्धि है। जब तक कोई आपसे नहीं पूछता तब तक कोई भी आपकी राय या विचार या ‘मन की बात’ जानना नहीं चाहता, और जब वे पूछते हैं, वे चाहते हैं कि आप उस विषय पर बने रहें और केवल वही कहें जिसकी आपने सत्य के रूप में पहले ही पुष्टि की हैं।

परमेश्वर के भवन में उतावली से बोलने के कारण कितने लोग अपने ऊपर परमेश्वर का दण्ड ले आये हैं (सभोपदेशक 5:1-7)? मन्नत न मानना, मन्नत मानने और न चुकाने से अच्छा है। शांतचित्त मनन करना मूर्खों की चहचहाहट से उत्तम है (सभोपदेशक 7:2-6)। वे केवल अति शोर करते हैं। ऐसी उतावली लिखित रूप में भी हो सकती है, इसलिए जल्दबाजी में ईमेल या टेक्स्ट का जवाब देने से पहले सावधान रहें। धीमे मनुष्य तेज़ मनुष्यों से बेहतर हैं, और उतावली के विचार आपको मुसीबत में डालेंगे (नीतिवचन 14:29; 21:5)।

यदि आप अपने जीवन से परमेश्वर और मनुष्यों को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो बोलने में धीरजवान और हर एक शब्द के विषय में सावधान रहें, क्योंकि बहुत बातें अक्सर पाप की ओर ले जाती हैं (नीतिवचन 10:19)। आपके मुँह के वचन हमेशा अनुग्रहसहित हो, और कुछ आलोचना या फटकार के साथ सलोना हो (कुलुस्सियों 4: 6)। यदि आप मन की पवित्रता से प्रीति रखते हैं, तो आपकी बातें अनुग्रहसहित होगी, और आपको बड़े लोगों में उभारेगी (नीतिवचन 22:11)। यह प्रतिफल तेज-तर्रार मूर्ख के निराशाजनक विनाश के बिल्कुल विपरीत है।

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