नीतिवचन 29:18
जहाँ दर्शन की बात नहीं होती, वहाँ लोग नष्ट हो जाते हैं, और जो व्यवस्था को मानता है, वह धन्य होता है।
आपको परमेश्वर के वचन की आवश्यकता है। और यह नीतिवचन इसी बात का सबसे बड़ा अनुस्मारक है। बाइबल, जो एकमात्र सच्चे परमेश्वर, यहोवा की प्रेरणा से लिखा हुआ धर्मग्रंथ है, आपके लिए निर्णायक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। अगर परमेश्वर की इच्छा प्रकट न हो, तो उसके बिना मानवजाति अत्यंत अज्ञानी है और आत्म-विनाश के लिए छोड़ दी जाती है। दुष्क्रियाओं के विभिन्न उदाहरण आपके चारों ओर हैं। परमेश्वर जल्द ही इस जगत को उसके विकृत विद्रोह के कारण नाश कर देगा।
अगर आप विनाश पाना चाहते हैं तो अवश्य बाइबल की उपेक्षा करें। संतुष्टि और सुख केवल परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करने में हैं, और यह समझ केवल बाइबल पर ध्यान देने से ही आ सकती है। आपकी सफलता और समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि आपके पास परमेश्वर का संदेश है या नहीं। इस नीतिवचन का पाठ सरल है, लेकिन अधिकांश लोग इसकी गलत व्याख्या और मूर्खतापूर्ण लागूकरण के चलते बुरी तरह गुमराह हो जाते हैं।
आज के महत्वाकांक्षी पास्टर आत्म-संतुष्ट की खोज करनेवाले चर्च से कहते हैं, “एक बड़ा चर्च बनने के लिए, आपको बड़ा सोचने की ज़रूरत है। यदि तुम उन्नति करना चाहते हो तो तुम्हें हर समय “मैं उन्नत हूँ, मैं उन्नत हूँ” के बारे में सोचना होगा। यदि तुम अगले दो वर्षों में अपने चर्च में लोगों की संख्या तीन गुना बढ़ाना चाहते हो, तो अभी से उतना बड़ा सभागृह का निर्माण करना होगा। यदि तुम ऐसा सपना देख सकते हैं, तो इस पर विश्वास भी करो। यदि तुम इस पर विश्वास कर सकते हो, तो तुम इसे ज़रूर पाओगे भी।”
फिर वह अपनी अगली पावरप्वाइंट स्लाइड पर जाता है और जमकर घोषणाबाज़ी करता है, “परमेश्वर भी सहमत हैं। बाइबल कहती है, ‘जहाँ दर्शन की बात नहीं होती, वहाँ लोग नष्ट हो जाते हैं।’ दर्शन प्राप्त करो, भाईयों! अपने छोटे चर्च के आकार को तीन गुना करने का दर्शन प्राप्त करों! आज ही अपने प्रतिज्ञा कार्ड पर हस्ताक्षर करो, और अपने पास्टर को करोड़ों डॉलर का अग्रीमेंट बनाने में मदद करो! आपको एक दर्शन की आवश्यकता है, ताकि आपका चर्च मरा-सूखा बनकर लुप्त न हो जाए।”
“जहाँ दर्शन की बात नहीं होती, वहाँ लोग नष्ट हो जाते हैं” यह ‘आकर्षण खींचने वाली ध्वनि’ किसने नहीं सुनी है? इस नीतिवचन के शब्द तो सर्वविदित हैं, लेकिन इसका सही अर्थ कम ही लोग जानते हैं। यहाँ बाइबल में उन वचनों में से एक है जिनका लोग सबसे ज्यादा ग़लत अर्थ निकालते हैं। उनकी ऐसा रवैया सिर्फ़ ‘आकर्षण खींचने वाली ध्वनि’ है जिसका शब्दों के अर्थ से कोई संबंध नहीं है। परमेश्वर आपको उसके धर्मग्रंथ के ऐसे अज्ञानपूर्ण और बेतुके उपयोग से बचाए।
लालची पास्टर्स चर्च के भोले-भाले लोगों से बड़ा धन बटोरने के लिए इस नीतिवचन अक्सर दुरुपयोग करते हैं। उनकी दृष्टी में “दर्शन” का अर्थ है चर्च को संख्या और आकार में बढ़ाना, और ऐसा न करने का अर्थ है “नष्ट हो जाना”। यह बाइबल की व्याख्या का कैसा मज़ाक है! आप इस नीतिवचन के अर्थ को ठीक ठीक समझे ऐसी परमेश्वर आपको सदबुद्धि दे, जैसा कि एज्रा ने पढ़ा और इज़राइल को उसका सही अर्थ समझाया था (नेह 8:8)।
जैसा कि अक्सर नीतिवचनों में होता है, इस नीतिवचन में दो बातों की तुलना से हम समझ सकते हैं कि “दर्शन” का अर्थ परमेश्वर के वचन को सुनना और पढ़ना है। गौर करें, इसमें धन्य मनुष्य की तुलना नष्ट हो रहे लोगों से की गईं है, और परमेश्वर की व्यवस्था की तुलना “जहाँ दर्शन नहीं” से की गईं है। यहां सपने देखने उसके अनुसार योजना बनाने के बारे में कुछ भी नहीं है।
पाठ बिलकुल सरल किन्तु असरदार और शक्तिशाली है। परमेश्वर का वचन एक महान आशीष है, और इसका पालन करना सच्चे सुख की बुनियाद है। परन्तु जहां परमेश्वर के वचन का प्रचार नहीं किया जाता, वहां लोग ज्ञान के कुपोषण के कारण अपनी अज्ञानता और मूर्खता में मर जायेंगे। परमेश्वर से प्रार्थना करें कि वह आपको ऐसे कुपोषण से बचाए। इस नीतिवचन की यही शिक्षा है, और सावधान रहें कि कोई आपको इसका ग़लत अर्थ और व्याख्या बताकर फिर से भरमाने न पाए।
कभी-कभी ऐसा समय आता है जब परमेश्वर अपने लोगों से अपना वचन छीन सकता है। शमूएल के दिनों पर विचार करें, जिसने दाऊद को इस्राएल का राजा नियुक्त किया। प्रभु का वचन, या परमेश्वर का की इच्छा का प्रकाशन, उन दिनों दुर्लभ था, और तब इसे दर्शन कहा जाता था, जैसा कि इस नीतिवचन में है। परिस्थिति यह थी कि, शमूएल के आने तक परमेश्वर खुद को और अपनी इच्छा को इस्राएल के सामने प्रकट नहीं कर रहा था (1 शमू 3:1)।
परमेश्वर ने अन्य कई समयों पर भी अपना वचन ले लिया। आसा के राज्यकाल में, इस्राएल देश बहुत दिन बिना सत्य परमेश्वर के और बिना सिखानेवाले याजक के और बिना व्यवस्था के रहा (2 इतिहास 15:3)। और योशिय्याह के शासनकाल के दौरान, परमेश्वर की व्यवस्था, जो खो गई थी, मंदिर के नवीनीकरण के दौरान मिली (2 इतिहास 34:14)। बेबीलोन में रहते हुए, परमेश्वर ने इस्राएल से अपना वचन भी छीन लिया था (यहेज़केल 7:26; विलाप 2:9)। यीशु ने जब अपने लोगों को देखा, तो पाया कि वे ऐसी भेड़ों के समान थें जिनका न कोई विश्वासयोग्य उपदेशक था, न कोई चरवाह (मत्ती 9:36)।
परमेश्वर के उद्धारदायक वचन के बिना, मनुष्य अपने कुलदेवता की पूजा करेगा, बच्चों को अनुशासन करने फटके मारना छोड़ देगा, पुनर्जन्म के चक्र की शिक्षा देगा, विश्वास करेगा कि वह बंदरों से आया है, अपने बच्चों को बलि में जला देगा, पत्थर को चूम लेगा, गाय की पूजा करेगा, अंतिम संस्कार की चिताओं पर विधवाओं को जला देगा, शिशुओं का गर्भपात करते समय बेबी सील्स को बचाएगा, समलैंगिक विवाह को बढ़ावा देगा, और न जाने क्या क्या।
परमेश्वर के उद्धारदायक वचन के बिना, लोग समझ के रास्ते से भटक जाते हैं और मृतकों की मंडली में बने रहते हैं, कि शैतान द्वारा भ्रम में डालकर नष्ट किए जाएं (नीतिवचन 21:16; प्रेरितों 26:16-18; इफि 2:1-3)। आधुनिक इतिहास पर विचार करें और जहां सबसे अधिक मात्रा में मानव स्वतंत्रता, समृद्ध जीवन और खुशहाल लोग हुआ करते थें- अर्थात् उन देशों में जहां बाइबल का अभ्यास और पालन किया जाता था।
जब पौलुस ने लुस्त्रा और एथेंस में उपदेश दिया, तो उसने समझाया कि परमेश्वर ने कई पीढ़ियों तक सब जातियों को उसके वचन के बिना अज्ञानता में अपने–अपने मार्गों में चलने दिया, लेकिन अब वह मनुष्यों को आज्ञा दे रहा था कि वे अपनी अज्ञानता पर पश्चाताप करके परमेश्वर की ओर फिरें (प्रेरितों 14:11-18; 17: 22-31)। बाइबल के बिना, मनुष्य अपनी लालची महत्वाकांक्षा के कारण अनर्थ रीति पर चलते हैं (इफि 4:17-19)।
आज की दुनिया में, दुनिया के एक बड़े हिस्से में परमेश्वर के वचन को पढ़ने और उसका प्रचार करने पर पाबंदी है। यह आम तौर पर मुस्लिम, हिंदू, बौद्ध और अन्य देशों में प्रतिबंधित है। जहां परमेश्वर के वचन पढ़ा नहीं जाता और न उसका प्रचार किया जाता है, वहां लोग अज्ञानता और अनेक प्रकार की मूर्खताओं से पीड़ित होते हैं। परमेश्वर के वचन के बिना, ऐसे राष्ट्र उद्धार पाने की दृष्टि से “आशाहीन और जगत में ईश्वररहित” हैं (इफि 2:12; यूहन्ना 4:22; 1 थिस्स 4:13), और वे प्राकृतिक प्रगति भी नहीं कर पाते हैं (नीतिवचन 8:1-31)।
दुनिया का छठा हिस्सा कैथोलिक है, जहां अब तक चर्च के सदस्यों को बाइबल पढ़ने की अनुमति नहीं थी। उनके धार्मिक क्रियाकलाप जिसे वे मास कहते हैं – अर्थात् पवित्रशास्त्र से उनका एकमात्र परिचय – लैटिन भाषा में किया जाता था। कैसा अंधविश्वासी अज्ञान है! और यह सब ख्रिश्चन धर्म के नाम पर! किसी कैथोलिक देश की उसके आस-पास के देशों से तुलना करें, तो अज्ञानता के कारण विनाश स्पष्ट दिखाई देता है। चूँकि उन्हें सत्य से कोई प्रेम नहीं था, इसलिए परमेश्वर ने उन्हें शक्तिशाली भ्रम में डाल दिया (2 थिस्स 2:9-12)।
तर्क बिलकुल सरल है। धर्मान्धता से छुटकारा केवल प्रभु यीशु मसीह का नाम लेने में है (सावधान! यीशु मसीह का नाम लेने का अर्थ उसका नाम जपना नहीं है, बल्कि सुसमाचार की बातों, जो यीशु के विषय में हैं, पर विश्वास करना है)। लेकिन जिस पर उन्होंने विश्वास नहीं किया, वे उसका नाम कैसे लें? और जिसके विषय सुना नहीं उस पर कैसे विश्वास करें? और प्रचारक बिना कैसे सुनें? और यदि प्रचारक भेजे न जाएँ, तो कैसे प्रचार करें? परमेश्वर ने संसार के उस हिस्से से अपना वचन वापस ले लिया है जिसने उस पर विश्वास नहीं किया (रोमियों 10:13-17)।
यहोवा परमेश्वर ने चेतावनी दी कि जब वह इस संसार का न्याय करता है तब उस न्याय का एक पहलू यह भी है कि वह उससे अपने वचन को छीन लेगा और लोगों को ऐसी अवस्था में छोड़ देगा जहाँ वे उसके और उसके पवित्र वचन (दर्शन) के लिए तड़पेंगे। परमेश्वरने कहा, “मेरे ज्ञान के न होने से मेरी प्रजा नष्ट हो गई” (होशे 4:6)। वह उस अकाल की बात करता है जो वह देश पर लाएगा: रोटी का अकाल नहीं, बल्कि परमेश्वर का वचन सुनने का अकाल (आमोस 8:11-12)। परमेश्वर, रहम कर!
आज अमेरिका, इंग्लैंड और कई ख्रिश्चन राष्ट्रों की ऐसी ही हालत है। यह अंतिम दिनों के विनाशकारी समय का पूरा होना है, जिसकी भविष्यवाणी पौलुस ने तीमुथियुस को अपनी चेतावनी में की थी (2 तीमु 3:1-5)। यद्यपि आज सूचना-क्रान्ति का विस्फोट हुआ है और विश्वस्तर पर सीखना पहले से आसान हो गया है, और उसमें लगातार वृद्धि हो रही है, इसके बावजूद सत्य को पहचानने या उसे सीखने की कोई ताकत या क़ाबलियत नहीं बची है (2 तीमु 3:6-7)। अधिकांश ख्रिश्चन लोग और चर्च संसार के मूर्तिपूजकों की तरह सोचते, देखते और काम करते हैं।
हर जगह झूठे शिक्षकों का बोलबाला हैं, दूसरों को धोखा दे रहे हैं और खुद भी धोखा खा रहे हैं (2 तीमु 3:8-13)। अधिकांश ख्रिश्चन सच्चे सिद्धांत और सत्य के क्रुद्ध हो जाते हैं, और वे ऐसे शिक्षकों और मनोरंजन के माध्यमों का पालन-पोषण करते हैं जो अपनी दंतकथाओं को सुनाकर उनके कानों की खुजली को मिटाएं और वासनाओं की तृप्ति करें (2 तीमु 4:3-4)। खरे उपदेश को एक पुरानी, उबाऊ और नकारात्मक परम्परा के रूप में देखा और उसका तिरस्कार किया जाता है। मनोरंजन का बोलबाला है! अब कोई दर्शन नहीं है! आज अमेरिका, इंग्लैंड और कई ख्रिश्चन देश परमेश्वर के वचन के अकाल के शिकार बन चुके हैं। और भारत देश के चर्च और ख्रिश्चन लोग भी कोई अपवाद नहीं हैं। हमारे देश के ख्रिश्चन युवा भी “ख्रिश्चन बैंड” के पीछे भागकर, झूठे के “मोटिवेशनल” शिक्षकों के शिकार हो गएँ हैं।
ख्रिश्चन लोग दुष्क्रियता का और बिगाड़ा हुआ जीवन जी रहे हैं और मूर्खता और अज्ञानता में नष्ट हो रहे हैं। फिर भी देश भर में कुछ बचे हुएं ख्रिश्चन लोग हैं जो परमेश्वर के वचन को सुनने और समझने के लिए भूखे हैं, लेकिन उन्हें यह कहीं भी सिखाया नहीं जा रहा है। हर विषय पर सिर्फ़, गड़बड़ी, भ्रम और झूठ का बोलबाला है। लोग परमेश्वर के वचनों का तिरस्कार करते हैं, और विकास और कार्यक्रमों पर ज़ोर देते हैं।
इस बिमारी का इलाज क्या है? जिन्हें परमेश्वर ने अपने वचन का प्रचार करने बुलाया है उन्हें चाहिए कि वे परमेश्वर के वचन का विश्वासयोग्यता और खरी शिक्षा से प्रचार करें। पवित्रशास्त्र परमेश्वर के लोगों को उपदेश देने, और समझाने, और सुधारने, और धार्मिकता की शिक्षा देने विश्वासयोग्य उपदेशक को तत्पर और तैयार करने पूरी तरह से पर्याप्त है (2 तीमु 3:14 – 4:2; यिर्म 3:15)। जो भी उपदेशक बाइबल को अपने ज्ञान का स्त्रोत बनाता है, वह परमेश्वर का एक विश्वासयोग्य दास बनकर किसी भी व्यक्ति की झूठी शिक्षाओं और भ्रमों को नष्ट कर सकता है, क्योंकि परमेश्वर का वचन एक हथौड़ा और आग है (यिर्म 23:28-29)।
इस बिमारी का दूसरा इलाज क्या है? तैयार और ग्रहणशील मन के साथ उसके वचन के विश्वासयोग्य उपदेश का सम्मान करें, और बाइबल की पुराने ज़माने की शिक्षा का तिरस्कार न करें (प्रेरितों 17:11; 1 थिस्स 5:20; यिर्म 6:16; यहूदा 1:4)। वर्तमान समय की आराधना-शैली के किसी भी स्वरुप को ठुकरा दें, और केवल उन्हीं शिक्षकों के उपदेश को सुनें जिन्हें परमेश्वर और कलीसिया के वृद्ध प्राचीनों द्वारा नियुक्त किया गया है। इस्राएल के उस महान आनंद और राष्ट्रीय उत्सव की समीक्षा करें जिन्होंने उपदेश को सुना और समझा (नेह 8:1-12)।
तीसरा इलाज क्या है? उसके वचन को इस दुनिया में अपनी सबसे बड़ी संपत्ति के रूप में संजोकर रखें, और उसके उस गौरवशाली वचन में जो स्वर्ग से उतर आया था, भरपूरी से आनंद करें (यिर्म 15:16; अय्यूब 23:12; भजन 19:10; 119:72,103,111)। इस एमटीवी वाली पीढ़ी और दंतकथाओं और विलासिता के लिए उनके विक्षिप्त जुनून के प्रति सचेत और दूर रहकर, हर विषय पर पूर्ण और अंतिम अधिकार के रूप में केवल बाइबल का प्रचार करें। साथ ही, यह भी सुनिश्चित करें कि आपके पास बाइबल का एक ऐसा संस्करण है जिस पर आप परमेश्वर का सम्मान करने के लिए हर एक शब्द पर भरोसा कर सकते हैं, क्योंकि आज कईयों ने बाइबल के वचन को बिगाड़कर बहुत-से अपने अपने झूठे और विकृत संस्करण निकाले हैं।
इसके अलावा आप और क्या कर सकते हैं? आप बाइबल में जो भी पढ़ते और सुनते हैं, उसका टूटे मन से, ईमानदारी से, और सच्चाई से पालन करें, न कि केवल बाहरी तौर पर किसी धार्मिक अनुष्ठान और परम्परा का पालन करें (यहेज़केल 33:30-33; लूका 8:18)। आप पवित्रशास्त्र पर सच्चा विश्वास रखते हैं यह दूसरों को अपनी आज्ञाकारिता के द्वारा देखने दें।
इसके अलावा और क्या इलाज है? विश्वास करने में ऐसा सच्चा आनंद, सच्ची शांति और लज्जित न करनेवाली आशा प्रकट करें जिससे दूसरों को प्रोत्साहन मिले और आपको आपकी आशा के विषय पूछताछ कर सकें (रोमियों 15:13; 1 पतरस 3:15)। पिन्तेकुस्त के दिन जितने आत्मा से भर गएँ थें उतनों ने अपने दर्शन को हल्के में नहीं लिया (प्रेरितों 2:42-47)। बाइबल के वचनों पर चलकर एक धन्य जीवन के द्वारा आप उसके वचन को दूसरों तक पहुँचाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं।
परमेश्वर के वचन को मानने और उसका पालन करने में बड़ा प्रतिफल है (भजन 19:11)। मूसा ने इस्राएल को बताया कि उन्हें परमेश्वर से जो बहुमूल्य प्रगटीकरण मिला था, वह इसलिए था कि वे बाकी सब राष्ट्रों के मुकाबले सबसे अधिक बुद्धिमान और समझवाले बनें (व्यवस्था 4:5-10), और इसलिए कि उसके माध्यम से उन्हें धार्मिकता और समृद्धि का मार्ग दिखे (व्यवस्था 6:20-25), और यह कि वह उनका जीवन भी था। (व्यवस्था 32:46-67)। अगर आप अपने जीवन का निर्माण इस ठोस नींव पर करते हैं तो इससे आप जीवन के सब तूफानों का कौशल से मुक़ाबला करने तैयार हो जाएंगे जो निश्चित रूप से आएंगे ही (लूका 6:46-49)।
यीशु ने अपने उपदेश के विषय में कहा, “तुम ये बातें जानते हो, और यदि उन पर चलो तो धन्य हो” (यूहन्ना 13:17)। उसने किसी स्त्री से यहां भी कहा कि परमेश्वर का वचन सुनना और उसका पालन करना उसकी अपनी मां होने से भी बड़ी धन्यता है (लूका 8:21; 11:28)। और याकूब ने आगे कहा कि सफ़लता केवल उन्हें मिलती है जो वचन को सुनते तो हैं, परन्तु उसके अनुसार चलते भी हैं (याकूब 1:25)। सुनिश्चित करें कि आप वचन के सिर्फ़ सुननेवाले नहीं, बल्कि उसके अनुसार करनेवाले भी हैं!
पवित्र धर्मग्रंथ और उसका विश्वासपूर्ण उपदेश किसी भी अन्य आशीष की तुलना में लोगों को अधिक मूल्य प्रदान करता है। परमेश्वर के वचन का पालन करने से विनाशकारी अज्ञानता और संकटों से बचाव होता है, उसका वचन इस दुनिया में बड़ी शांति, समृद्धि और सुख को संभव बनाता है, और साथ ही इसमें आनेवाले नए जगत के लिए तैयार करने सभी आध्यात्मिक शिक्षा और निर्देश शामिल हैं। यह मनुष्यों को सिखाता है कि कैसे अनन्त जीवन के पूरे विश्वास और परमेश्वर के साथ अपनी व्यक्तिगत संगति में चलना है। परमेश्वर की महिमा हो!
प्रभु यीशु मसीह मृतकों में से जी उठा और परमेश्वर की दाहिने ओर महिमा में विराजमान हुआ। पाप और मृत्यु पर विजय पाने के कारण उसे स्वर्गीय स्थानों में महान वरदान और लूट दी गई, और बदले में उसने वही वरदान और अधिकार अपने सेवकों को दिया कि वे उसके लोगों और कलीसियाओं को उसके सुसमाचार के वचन का प्रचार करें। आनन्द मनाओ और बड़े उल्लासित हो जाओं कि तुम प्रचार करनेवाले के सुंदर पैर देख पाएं हो (रोमियों 10:15; अय्यूब 33:23-24) कि तुम उस बड़े आनन्द की घोषणा सुन पाएं हो (भजन 89:15; 68:11; रोमियों 10:18)।
प्रिय ख्रिश्चन पाठक, क्या आप बाइबल से प्रेम रखते हैं, उसके मूल्य को समझते हैं, उसे पढ़ते हैं और उसका पालन करते हैं जैसा कि आपको करना चाहिए? यह आपका जीवन है। इसके बिना, तुम नष्ट हो जाओगे। इसकी उपेक्षा करना आपके जीवन और प्राण के लिए जानलेवा है। उसी में आपका सब सुख है। अपने और अपने परिवार के जीवन के आनंदमय आशीष के रूप में उसकी बड़ाई करें। आपके सांसारिक और आध्यात्मिक दोनों जीवनों से सम्बंधित सब बातें में आपकी संतुष्टि और सुख इसी पर निर्भर करते हैं।
नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।