नीतिवचन 29:13

निर्धन और अंधेर करनेवाला पुरुष एक समान हैं; और यहोवा दोनों की आँखों में ज्योति देता है।

निर्धन लोगों और झूठे लोगों में एक बात समान होती है – परमेश्वर दोनों की रक्षा करता है और उन्हें राह दिखाता है। दूसरे लोग उन्हें अलग नज़र से देखते हैं, और वे अक्सर एक-दूसरे से घृणा करते हैं, परंतु वे दोनों ही इस जीवन में परमेश्वर के करुणामय प्रावधान और अनंत जीवन में उसके अनुग्रहपूर्ण उद्धार पर पूरी तरह से निर्भर हैं।

एक और नीतिवचन है जो समान बात कहता है, “धनी और निर्धन दोनों एक दूसरे से मिलते हैं: यहोवा उन दोनों का कर्ता है” (नीतिवचन 22:2)। ये दोनों विशेषण विपरीतार्थक हैं, बिल्कुल विपरीत। और इसका अर्थ बिलकुल स्पष्ट है: परमेश्वर ही ने दोनों प्रकार के लोगों को बनाया है, धनी और निर्धन।

नीतिवचन रहस्यमय वचन हैं, इसलिए यहाँ उपयोग किए गए शब्दों पर ध्यान दें (नीतिवचन 1:6)। जब निर्धन और अंधेर करनेवाले लोगों की तुलना की जाती है, जो कि दो बहुत ही भिन्न विशेषण हैं, तो जो उसमें कहीं गहराई में देखने की आवश्यकता होती है। यहाँ सुलैमान ने जो तुलना की है वह एक निर्धन ईमानदार व्यक्ति और एक धनी अंधेर करनेवाले व्यक्ति के बीच में है।

क्या बाइबल की सीख में और शब्द जोड़ना कभी भी सही होता है? यदि कोई न्यूनपद होता है, तो हाँ। न्यूनपद क्या होता है? यह रहस्य, अध्ययन, सौंदर्य या सामर्थ को बढ़ाने के लिए, जानबूझकर शब्दों का लोप करना होता है। इस अलंकार में वचन का पूरा अर्थ समझने के लिए शब्दों को वापस जोड़ना होता है।

इसका एक अच्छा उदाहरण नीतिवचन 18:22 है, जहाँ किसी आम पत्नी के विषय में बात नहीं की गई है; वहाँ विशेषण “उत्तम” शब्द का प्रयोग किया गया है। जैसे कि नीतिवचन 20:16 में उपयोग किया गया शब्द “उत्तरदायी”, नीतिवचन 22:1 में उपयोग किया गया शब्द “अधिक चाहने योग्य है” नीतिवचन 19:1 में उपयोग किया गया विशेषण “धनी”, जोड़े गए हैं। वास्तव में, इस नीतिवचन में “व्यक्ति” शब्द के पहले निर्धन विशेषण का उपयोग किया जाना चाहिए!

सुलैमान के नीतिवचनों के अनुसार, इस नीतिवचन को सुसंगत बनाने के लिए जिन दो समान व्यक्तियों का उदाहरण लिया गया है, वे किसी न किसी तरह एक दूसरे से विपरीत भी हैं। चूँकि एक व्यक्ति निर्धन है, और दूसरा व्यक्ति झूठा है, इसलिए पूरी तुलना एक निर्धन ईमानदार व्यक्ति और एक धनी झूठे व्यक्ति के बीच में की गई है।

नीतिवचन और बाइबल की अन्य पुस्तकों में, धन को अक्सर धोखे से जोड़ा गया है, क्योंकि वे लोगों को धोखा देते हैं और अक्सर धोखे से ही प्राप्त किए जाते हैं (नीतिवचन 23:1-5; मत्ती 13:22)। नीतिवचन में एक महत्वपूर्ण चेतावनी यह है कि धनी लोगों को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वे निर्धन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं (नीतिवचन 22:16, 22-23)।

यहाँ आपके सामने एक निर्धन ईमानदार व्यक्ति और एक धनी अंधेर करनेवाला व्यक्ति है। वे जीवन और व्यवसाय में एक समान होते हैं, क्योंकि संसार में दोनों की संख्या काफी है। हालाँकि वे इन दोनों मामलों में भिन्न हैं, परंतु ज्योतिर्मय होने के लिए वे दोनों ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर पर निर्भर होने में समान हैं।

परमेश्वर दोनों को कैसे ज्योतिर्मय करता है? सुलैमान ने ज्योति का उपयोग जीवन के लिए (नीतिवचन 13:9; 16:15; 20:20; 24:20; भजन संहिता 13:3), समझ के लिए (नीतिवचन 4:18; 6:23), और आशीषों (नीतिवचन 15:30) के लिए किया है। परमेश्वर ने दोनों को जीवन दिया (नीतिवचन 22:2), दोनों को देखने की सामर्थ्य दी (नीतिवचन 20:12), और दोनों पर सूर्य उदय किया (मत्ती 5:45)।

इस गूढ़ नीतिवचन में बुद्धि के लिए क्या सिद्धांत या सीख दी गई है? यहाँ केवल राजा सुलैमान द्वारा किया गया अवलोकन नहीं दिया गया है। यह पाठकों का कर्तव्य है कि वे ज्ञान और समझ के पाठ को सीखने के लिए, पवित्र शास्त्र के प्रकाश में प्रेरित ज्ञान का गहराई से मनन करें।

परमेश्वर सभी मनुष्यों पर पूरी तरह से प्रभुता रखता है, जिसमें निर्धन और उनके धनी आततायी भी शामिल हैं। याद रखें, “यहोवा ने सब वस्तुएं विशेष उद्देश्य के लिए बनाई हैं, वरन दुष्ट को भी विपत्ति भोगने के लिए बनाया है” (नीतिवचन 16:4)। यहाँ तक कि अंधेर करनेवाला व्यक्ति भी इसका अपवाद नहीं है, क्योंकि अय्यूब ने झूठ बोलने वालों के बारे में कुछ ऐसा कहा है, “धोखा देनेवाला और धोखा खानेवाला दोनों उसी के हैं” (अय्यूब 12:16)। परमेश्वर धनी और निर्धन, दोनों पर प्रभुता से राज करता है।

भले ही आप इनमे से किसी एक या दोनों ही का अनादर क्यों न करें, परंतु परमेश्वर का संसारिक शासन इन दोनों का उपयोग करता है। वह किसी का पक्ष नहीं करता, क्योंकि सांसारिक धन उसके लिए कोई मायने नहीं रखता, परंतु परमेश्वर का भय और धर्म के काम उसके लिए बहुत मायने रखते हैं, यहाँ तक कि निर्धनों द्वारा किए गए काम भी (प्रेरितों के काम 10:34-35)।

परमेश्वर एक निर्धन व्यक्ति को एक धनी व्यक्ति से अधिक बुद्धि देकर ज्योतिर्मय कर सकता है (नीतिवचन 28:11; 18:17; सभोपदेशक 9:13-16)। परमेश्वर का ज्ञान किसी आइवी लीग के उच्च स्तर के स्कूल में खरीदा नहीं जा सकता। जो व्यक्ति इस संसार की चीज़ों और आत्मा, दोनों में निर्धन होगा, परमेश्वर उसी पर दृष्टि करेगा (यशायाह 57:15; 66:1-2)।

परमेश्वर एक निर्धन व्यक्ति को बुद्धि देकर एक धनी व्यक्ति से अधिक सफल बना सकता है (नीतिवचन 19:1; 16:19; 28:6)। संसार को इस क्रम को उलटने न दें। बुद्धि, धन और संसार की किसी भी अन्य चीज़ से कहीं अधिक बेहतर होती है (नीतिवचन 3:13-17; 8:11; 15:16-17; 16:8,16; 17:1)।

धनी लोग निर्धनों पर आर्थिक लाभ के द्वारा शासन करते हैं, और उधारकर्ताओं को उधारदाताओं की सेवा करनी पड़ती है, फिर भी परमेश्वर एक की रक्षा करता है और दूसरे को दण्ड देता है (नीतिवचन 14:31; 17:5; 21:13; 22:7,9,16; 28:8)। परमेश्वर ने अहाब और ईज़ेबेल दोनों को मारकर निश्चित रूप से नाबोत के खून का बदला लिया (2 राजाओं 9:21-26)।

निर्धन या धनी होना, परमेश्वर के प्रेम को प्रमाणित नहीं करता (सभोपदेशक 9:1)। इस संसार के धनी लोग आम तौर पर निंदनीय होते हैं (भजन संहिता 17:14; 73:12), और परमेश्वर ने अपनी संतानों का एक बहुर बड़ा हिस्सा निर्धनों में से चुना है, कि वे उसके राज्य के अधिकारी हों (1 कुरिन्थियों 1:26-29; याकूब 2:5)।

यदि परमेश्वर का अनुग्रह सबसे निर्धन व्यक्ति तक पहुँच सकता है, जैसे कि भिखारी लाज़र; तो परमेश्वर न्यायोचित रूप से सबसे धनी व्यक्ति का तिरस्कार भी कर सकता है, जैसे कि विलासिता में रहने वाला धनवान व्यक्ति (लूका 16:19-23)। यह सर्वोच्च अनुग्रह है, यह एक पूर्ण राजा की दया है, जो मनुष्यों के बीच यह अनंत अंतर लाती है (रोमियों 9:21-24)।

यदि परमेश्वर जक्कई जैसे धनी चुंगी लेने वाले को अपना व्यवसाय छोड़ने और निर्धनों को दान देने के लिए ज्योतिर्मय कर सकता है (लूका 19:1-10), तो वह मत्ती या लेवी जैसे महसूल लेने वालों को प्रेरित बनने के लिए भी बुला सकता है (मत्ती 9:9), या मृत्यु के द्वारा एक अहंकारी धनी व्यक्ति को यह ज्ञान दे सकता है कि सांसारिक चीज़ें महत्वहीन होती हैं (लूका 12:15-21)।

निर्धनों को परमेश्वर के अनुग्रह से उतना ही लाभ होता है जितना कि धनी लोगों को। वे दोनों ही यीशु मसीह के सुसमाचार का तब तक तिरस्कार करते रहेंगे जब तक कि परमेश्वर उनका उद्धार न करे और उनकी आँखों को देखने और विश्वास करने के लिए ज्योतिर्मय न कर दे (यूहन्ना 3:3; 6:44; 8:45; 10:26; इफिसियों 2:1-3; तीतुस 3:5)।

धनी और निर्धन लोगों के बारे में अपने विचारों का आधार यीशु मसीह और उन पर विश्वास करने वालों को बनाएँ। पौलुस ने लिखा, “तुम हमारे प्रभु यीशु मसीह का अनुग्रह जानते हो कि वह धनी होकर भी तुम्हारे लिए कंगाल बन गया, ताकि उसके कंगाल हो जाने से तुम धनी हो जाओ” (2 कुरिन्थियों 8:9)। यहाँ परमेश्वर के चुने हुए बहुत से लोग निर्धन हैं, परंतु वे सदा के लिए असीम रूप से धनी रहेंगे।

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