नीतिवचन 28:9
जो अपना कान व्यवस्था सुनने से मोड़ लेता है, उसकी प्रार्थना घृणित ठहरती है।
आप उपदेश को कैसे सुनते हैं? इसका आपके जीवन पर असर पड़ेगा। यदि आप उपदेश की ओर ध्यान नहीं देते हैं या उसे अस्वीकार करते हैं, तो परमेश्वर को आपकी प्रार्थनाओं से घृणा है और वह उन्हें ठुकरा देगा। यह आपकी भविष्य की सफलता के लिए एक बहुत ही गंभीर चेतावनी है।
यह नीतिवचन सबसे महत्वपूर्ण नीतिवचनों में से एक है। इसमें एक ऐसा मुद्दा दिया गया है जिसका असर हर व्यक्ति के जीवन पर पड़ता है, नतिजे गंभीर हैं, और समाधान आसान और सरल है। आप किसी और अन्य वचन की तुलना में इस नीतिवचन के पालन से परमेश्वर की आशीषों को और अधिक तेजी से पाने के लिए खुद को उसकी दृष्टि में अलग कर सकते हैं।
क्या आप जितना संभव हो, प्रत्येक रविवार को चर्च जाते हैं? क्या आप चर्च पहुंचने से पहले प्रार्थना करते और अपने मन को तैयार करते हैं? क्या आप उपदेश पर केंद्रित रहते हैं और उसे जितना संभव हो उतना आत्मसात करते हैं? आपने जो सुना है क्या आप उसकी समीक्षा करते हैं? क्या आप उसकी विषयवस्तु पर चिन्तन करते हैं? क्या आप सुनने के बाद अपनी आत्मा का परिक्षण करते हैं, ताकि उपदेश में आपको जिस परिवर्तन के लिए आव्हान दिया गया है उसके अनुसार आप खुद में बदलाव ला सके?
बिरीया नगर के यहूदी पौलुस के उपदेश को बड़ी तत्परता से सुनने और जो उन्होंने सुना उसकी पुराने नियम के लेखों में जाँच करने में बड़े कुलीन थें (प्रेरितों के काम 17:11), लेकिन यरूशलेम के यहूदियों ने अपने कानों को बंद कर लिया और स्तिफनुस और उसके उपदेश को न माना (प्रेरितों के काम 7: 51-60)। आप इन दो चरम सीमाओं की किस ओर खड़े हैं?
क्या आप हर रविवार को आदतन चर्च में भाग लेते हैं? जब भी आप चर्च में की उपसना को याद करते हैं तो आप कैसा महसूस करते हैं? क्या आप शनिवार की रात को रविवार के चर्च के लिए तैयारी करने के बजाय टेलीविजन देखते हैं? क्या आप उपदेश के दौरान झपकी लेते हैं? क्या आप अपने दिमाग को इधर-उधर की सोच में भटकने देते हैं? क्या आप उपदेश सुनने के बजाय अपनी बाइबल या गीतों की पुस्तक में भजनों को पढ़ते हैं? क्या आप फ़ोन में व्हाट्सएप्प या फेसबुक देखते रहते हैं, यह जताते हुए कि आप ऑनलाइन बाइबल में पास्टर के बताए वचन को देख रहें हैं?
परमेश्वर खुद को और उसकी इच्छा को उपदेश के प्रचार के माध्यम से प्रकट करता है (मालकी 2: 7; 1 कुरिन्थ 1:21)। वह पुरुषों को चुनता है, उन्हें वचन का प्रचार करने की सामर्थ देता है, उनके मन को अपने सत्य की प्रतीति देकर उनकी अगुआई करता है और उन्हें अपनी विषयवस्तु देता है -जिसे वह बीते हुए प्राचीन समय में दर्शनों के द्वारा करता था, और आज अपने उन्हीं लिखित पवित्रशास्त्र के द्वारा करता है (2 तीमु 3: 16-17; 4: 2)।
प्रचारक परमेश्वर के राजदूत हैं (2 कुरिन्थ 5:20)। वह आप ही के लाभ के लिए उन्हें अपने संदेश के साथ भेजता है, बशर्ते आप उनके उपदेश को सुने और माने। यदि आप परमेश्वर के राजदूत और उसके द्वारा लाए हुए संदेश की उपेक्षा करते हैं, तो आप साक्षात् परमेश्वर के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, और इसकी क़ीमत आपको चुकानी पड़ेगी (निर्गमन 16: 8; भजन 105: 14-15; 1 शमू 8: 7)।
आपका ध्यान आकर्षित करने के लिए वह और क्या कह सकता है? यदि आप उसके उपदेश के शब्दों का अनादर करते हैं, तो वह भी आपकी प्रार्थना के शब्दों को ठुकरा देगा (नीति 1: 24-30)। यह एक महत्वपूर्ण मसला है, क्योंकि आपको अपनी सफलता के लिए उसकी बुद्धि की आवश्यकता है जो केवल उपदेश के माध्यम से आती है, और आपको अपनी प्रार्थना सुनने के लिए उसकी आवश्यकता है।
पुराने नियम के समय परमेश्वर अपने प्रचारकों को भेजता था जो लोगों को मौखिक आज्ञाओं और शिक्षा के द्वारा सिखाते थे (2 इतिहास 17: 8-9; एज्रा 7:10; नेहमाया 8: 1-12; योना 3: 1-2; मलाकी 2: 7)। इन नीतिवचनों के लेखक, सुलैमान को उपदेशक कहा जाता है (सभोपदेशक 1: 1-2,12; 7:27; 12: 8-10)। और आज नए नियम के प्रचारक हैं (रोम 10:14; 1 तीमु 2: 7; 2 तीमु 4: 2)।
परमेश्वर ने चेतावनी दी कि वह उन लोगों की प्रार्थनाओं को अस्वीकार कर देगा जो अपने मन को दीन करके नहीं सुनते हैं। वास्तव में, वह उनकी प्रार्थनाओं को घृणा के योग्य मानेगा! यहाँ परमेश्वर के वचन के उपदेश के प्रति आपके दृष्टिकोण को लेकर एक बहुत ही गंभीर चेतावनी है। उसने इकठ्ठा हुए यहूदियों को समझाया कि उसने यहूदियों को बेबीलोनियों द्वारा इसीलिए भयावह दण्ड दिया क्योंकि उन्होंने उसके वचन को नहीं माना था (ज़कराया 7: 7-14)!
कल्पना करें कि आपकी प्रार्थनायें परमेश्वर के लिए घृणित ठहरती हैं! जब आप उससे विनती करते हैं कि वह आपके जीवन को आशीषित करे और आप पर अनुग्रह करें, तब वह आपके इन परिश्रमों और शब्दों को तीव्रता से तुच्छ समझता है, उनसे घृणा करता है, नफरत करता है। आपकी प्रार्थनाओं से उसे मिचली होती है! अपनी पत्नी की उपेक्षा करके अपनी प्रार्थनाओं को बाधित करना एक बात है, परन्तु परमेश्वर का आपकी प्रार्थनाओं से घृणा करना अति भयावह बात है (मलाकी 2: 13-14; 1 पतरस 3: 7)।
बिरीया के लोगों को कुलीन क्यों कहा गया? प्रेरितों 17:11 पर बारीकी से विचार करें। सबसे पहले, उन्होंने पौलुस के वचन को बड़ी लालसा से ग्रहण किया। उन्होंने उसके उपदेश को उपहास करने की मानसिकता से नहीं सुना, और न उसके खिलाफ अपनी राय, आपत्तियों, या मूर्खतापूर्ण सवाल खड़े किए। वे सुनना चाहते थे; वे विश्वास करना चाहते थे; उन्होंने मान लिया कि वह सही था; वे आभारी थे कि परमेश्वर का एक मनुष्य उन्हें सत्य की घोषणा करने के लिए आया था। उनका दिमाग भटक नहीं गया, और न ही उन्होंने यह सोचने का दुस्साहस किया कि शायद पौलुस ग़लत था।
दूसरा, वे उसके वचनों की पुष्टि करने के लिए प्रतिदिन पवित्रशास्त्रों में ढूँढ़ते रहते थे कि ये बातें योंहीं हैं कि नहीं। उन्होंने पौलुस के श्रेष्ठ ज्ञान का मज़ाक उड़ाने के उद्देश से पांच मिनट के लिए किसी शब्दानुक्रमणिका में समय नहीं बिताया ताकि उसके उपदेश को ठुकरा सके। कुछ लोग सोचते हैं कि वे एक उपदेशक के किसी विशेष विषय पर कई घंटों के अध्ययन की उपेक्षा कर सकते हैं और परमेश्वर के वचन में उसकी जीवन भर की कड़ी मेहनत को सप्ताहांत में कुछ मिनटों में सुनकर दुनिया में वापस लौट सकते हैं। मूर्खतापूर्ण और अज्ञानता से भरे प्रश्नों की ऐसी ही मानसिकता और प्रवृत्ति होती है, जिसे धर्मी सेवक अनदेखा करते हैं (2 तीमु 2:23; तीतुस 3: 9)।
मानव-अहंकार भयानक है, और आप के पाप के विरोध में दिया गया एक उपदेश इसे उजागर कर देगा। लेकिन पास्टरों को आपकी विचारधाराओं के खिलाफ एक युद्ध छेड़ना होता है (2 कुरिन्थ 10: 3-6)! उन्होंने किसी भी विषय का आप से 100 गुना अधिक अध्ययन किया है; आपका पास्टर कई लोगों की विविध जरूरतों के अनुसार प्रचार करता आ रहा है; उसे ईश्वरीय आदेश दिया गया है कि वह बिना किसी मनुष्य से डरे केवल पवित्रशास्त्र के प्रति विश्वासयोग्य बना रहे (यिर्म 1:17); वह अपनी ही बातों का प्रचार नहीं कर रहा है; वह केवल उस आदेश की घोषणा कर रहा है जो राजाओं के राजा की ओर से है। इन बातों को याद रखें।
पौलुस ने यह जानते हुए कि आप ऐसे उपदेश का विरोध करने की परीक्षा में पड़ सकते हैं, 1 थिस्सलुनीकियों 5:20 में चेतावनी दी, “भविष्यवाणियों को तुच्छ न जानो।” परमेश्वर ने दोनों नियमों में चेतावनी दी है कि उसके वचन को कान लगाकर और दीन मन से सुना जाए। प्रभु यीशु मसीह ने बोने वाले के अपने दृष्टांत को गंभीरता से यह कहते हुए निष्कर्ष पर पहुँचाया, “चौकस रहो कि तुम कैसे सुनते हो” (लूका 8:18)। उसका न्याय गंभीर है – जो हठीले मन से सुनता है परमेश्वर उससे उस मामूली ज्ञान को भी ले लेगा जो वह सोचता है कि उसके पास है।
कुरनेलियुस ने ग्रहणशील श्रोताओं का सबसे अच्छा आदर्श रखा है, जब उसने अपने परिवार और मित्रों को इकट्ठा किया “ताकि जो कुछ परमेश्वर ने तुझ से (पतरस से) कहा” वे सब उसे सुने (प्रेरितों के काम 10:33)। और इस्राएल ने एक उपदेश को समझने के बाद इसलिए एक बड़ा उत्सव मनाया क्योंकि उसमें उनके उन कर्तव्यों को बताया गया था जिन्हें उन्होंने अब तक अनदेखा कर दिया था (नहेम 8:1-18)। थिस्सलुनीकियों ने पौलुस के बाइबल के उपदेश को उसी रीति से सुना जिस रीति से सभी उपदेशों को सुना जाना चाहिए – अर्थात् परमेश्वर का वचन समझकर (1 थिस्स 2:13)।
कोई भी उपदेश परिपूर्ण नहीं होता, जैसा कि कोई भी ईमानदार उपदेशक आपको बताएगा। उपदेश में हमेशा छोटे-छोटे दोष होते ही हैं जिनकी आप आलोचना कर सकते हैं, और कर्तव्यनिष्ठ पास्टर उन पर शोकित होते हैं; परन्तु खामियों को पकड़ने पर ध्यान लगाने वाले श्रोता ठट्ठा करनेवाले दुष्ट लोग हैं (यशा 29:20-21)। पतरस ने ठट्ठा करनेवाले यहूदियों को एक अज्ञानी मछुआरे के रूप में प्रचार किया, लेकिन उसके पास यीशु मसीह की ओर से उद्धार देनेवाले ज्ञान के वचन थे (प्रेरितों के काम 4:12-13)।
परमेश्वर अपने प्रचारकों का पक्ष लेगा, जैसे कि परमेश्वर के नबी का अनादर करने वाले उन बयालीस बच्चों ने सिखा (2 राजा 2:23-25)। कोरह और उसके मित्रों ने कामना कीं कि कितना अच्छा होता अगर उन्होंने मूसा और उसके उपदेश का बेहतर आदर किया होता (गिनती 16:1-33)। परमेश्वर अपने राजदूतों के संदेश को अनदेखा करने या अस्वीकार करने वाले लोगों को नहीं बख्शता (व्यवस्था 1:41-44)। पौलुस ने ऐसे लोगों का तिरस्कार किया (1 कुरिन्थियों 14:36-38), और उसने मूर्खतापूर्ण विवादों की अनुमति नहीं दी, यहाँ तक कि बालों की लम्बाई जैसे मामूली मामलों के बारे में भी नहीं (1 कुरिन्थियों 11:16)।
सभी प्रचारक परमेश्वर के दूत नहीं हैं। ऐसे कई पास्टर हैं जो परमेश्वर के वचन का प्रचार नहीं करते, जैसा कि बाइबल चेतावनी देती है (आमोस 8:11-12)। अधिकांश मसीही लोग सत्य के बजाय दंतकथाओं को सुनना चाहते हैं (2 तीमुथियुस 4:3-4), इसलिए वे ऐसे नारीवत प्रचारकों को ढूंढते हैं जो अपनी झूठी मसीहियत (2 तीमुथियुस 3:1-5) का दिखावा करके कमजोर स्त्रियों का शिकार करते हैं (2 तीमुथियुस 3:6-7)। इसका समाधान सरल है – वचन का प्रचार करें (2 तीमुथियुस 4:2)।
आज एक ऐसी कलीसिया को खोजना कठिन है जहाँ परमेश्वर के वचन का प्रचार पूरी विश्वासयोग्यता से किया जाता है, पर फिर भी आपको ऐसी ही कलीसिया को ढूँढना अवश्य है, क्योंकि जोएल, बेनी या ज़ोइस जैसे समकालीन ढोंगियों को सुनना इस नीतिवचन का उल्लंघन करने का एक और तरीका है। आप ऐसे मनुष्यों को केवल बातें करते हुए, चुटकुले सुनाते हुए, कहानियाँ सुनाते हुए, दर्शनों का नाटक करते हुए, चहरे पर सचमुच सुंदर मुस्कान लाते हुए, या सफेद सूट पहनकर आपको भ्रम का प्रचार करते हुए सुनकर सुलैमान की इस चेतावनी पर अमल नहीं कर सकते।
मनुष्यों की भक्ति या व्यक्तित्व को ऊँचा उठानेवाले, चमत्कारों का ढोंग करनेवाले, धर्म का धंधा करनेवाले, या जिसमे महिला-पास्टर हो, ऐसे पंथों के पीछे मत भागो। प्रचारकों को उनके फलों (शिक्षाओं) से पहचानों (मत्ती 7:15-20)। देखो कि, उनके द्वारा किए गए वचन के प्रचार का प्रभाव या परिणाम क्या हुआ है? क्या वह उपदेश परमेश्वर के वचन का पालन करने में जीवन की अगुवाई कर रहा है? और हर तरह से बाइबल में उसकी जाँच करे (भजन 119:98-100,128; यशायाह 8:20; रोम 16:17-18; गला 1:16-17; 1 तीमु 6:3-5)।
एक सच्चा उपदेशक ढूँढ लेना परमेश्वर की ओर से एक बड़ी आशीष है, जैसा कि एलीहू ने अय्यूब से कहा (अय्यूब 33:23-26)। यह आपके लिए उसकी इच्छा को जानने का परमेश्वर का नियत तरीका है, और जहां कोई उपदेशक नहीं है, वहां लोग नाश हो जाते हैं (नीतिवचन 29:18; 1 शमूएल 3:1; 2 इतिहास 15:3)। जब परमेश्वर ने कहा कि प्रचारकों के चरण कितने सुहावने होते हैं तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं (यशा 52:7; रोमियों 10:15)। परमेश्वर के वचन को सुनने की आशीष की उपेक्षा मत करो।
इस नीतिवचन की चेतावनी गंभीर है, जो कि होनी भी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के वचन के खिलाफ विद्रोह जादू-टोने के समान है, और हठधर्मिता मूर्तिपूजा के समान है (1 शमूएल 15:22-23)। यदि स्वर्ग का यहोवा यह देखे कि तू अपने मन में मूर्ति को संजोकर बैठा है और उसके सन्देश को तुच्छ जानता है, तो वह अहाब की नाईं तुझ पर झूठा भ्रम भेजेगा कि तू उस भ्रम पर विश्वास करे और नाश हो जाए (यहेज 14:1-11; 1 राजा 22:8; 2 थिस्स 2:9) -12)।
जब यहोवा ने रात में शमूएल को पुकारा तब एली ने उसे जो सम्मति दी उस पर विचार करो। एली ने शमूएल से यह उत्तर देने को कहा, “बोल यहोवा; क्योंकि तेरा दास सुनता है” (1 शमूएल 3:39)। यही भक्तिपूर्ण और विनम्र रवैया है जिसे परमेश्वर आशीष देगा। जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले। और उसकी प्रार्थनाएं स्वर्ग के प्रतापी परमेश्वर के नथनों में मधुर सुगन्ध की नाईं उतरें। आमेन।
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