नीतिवचन 28:5

बुरे लोग न्याय को नहीं समझ सकते, परन्तु यहोवा को ढूँढ़नेवाले सब कुछ समझते हैं।

मनुष्यों-मनुष्यों के बीच कितना फ़र्क है! कुछ लोग तो मामूली बातों को भी समझ नहीं पाते हैं। तो वही कुछ ऐसे हैं, जो हर बात को पूरी तरह समझते हैं? इन में से आप कौन से मनुष्य है? क्या उन में से जिन्हें कुछ भी समझ नहीं आता? या उन में से जिन्हें सब बातें समझ में आती हैं?

शारीरिक मनुष्य दुष्ट और अंधा होता है। उसे सही या गलत का ज्ञान नहीं है, और न समझ है। पाप और शैतान से उसे इतना भ्रष्ट कर दिया है कि वह सीधे मार्ग को देख नहीं सकता और न उसके बारे में सोच सकता है। वह जिस किसी भी बात पर जब चिंतन करता है उसकी परिभाषा को विकृत कर देता है। आप अपने शारीरिक जन्म से एक देह-स्वभाव के व्यक्ति हैं, जो हर किसी के समान अंधकार में चल रहा है (इफिसियों 2:1-3)।

मनुष्य ने अपने सृष्टिकर्ता के स्थान पर लकड़ियों, साँपों और कीड़ों की आराधना की (यशायाह 44:9-20; रोमियों 1:23)। चूँकि ऐसी चीज़ें समझने में इस पीढ़ी के लिए बहुत ऊँची हैं और इस पीढ़ी के शिक्षकों के लिए देवताओं के समान लगती हैं, इस कारण मनुष्य इसके बजाय अपनी ही पूजा करता है, जो कि मूर्खता की चरम सीमा है (भजन 14:1-3)।

दुष्ट मनुष्य कठपुतलियाँ हैं। इस संसार का ईश्वर अपनी इच्छानुसार उन्हें नचाता है, और वे अपना सारा जीवन न्याय की समझ -यह जानना कि क्या उचित और सत्य है- के बिना गुज़ार देते हैं (2 कुरिन्थ 4: 4; इफिसियों 2: 2; 4: 17-19)। शैतान उन्हें इस जगत और आनेवाले अगले की समझ व ज्ञान के प्रति पूरा अंधा कर देता है। वे कुछ भी नहीं जानते।

यदि कोई व्यक्ति बाइबल के प्रतिकूल है, तो उसके पास कोई ज्योति नहीं (यशा 8:20; 1 तीमु 6:3-5)। यह परमेश्वर का विचार है, लेकिन बुद्धिमान लोग दिल से उसे मानते हैं (भजन 119:128)। दुष्ट लोग हमेशा सीखते तो रहते हैं – विशेष रूप से इस सूचना-युग में – परन्तु वे जीवन के वास्तविक विषयों की पहचान से सम्बंधित सत्य तक कभी नहीं पहुँच पाते (2 तीमु 3:7)।

बुरे लोग इसलिए बुरे होते हैं, क्योंकि वे परमेश्वर से नहीं डरते। वे सभी मनुष्य जो परमेश्वर से नहीं डरते, बुरे हैं। अपने निर्माणकर्ता परमेश्वर और उसके द्वारा दी गई नैतिकता की परम-अधिकृत व्यवस्था के बिना, वे सही या गलत के बीच के फ़र्क को नहीं जान सकते। बुरे मनुष्य इसलिए भी बुरे होते हैं, क्योंकि वे बुद्धि से चुनाव नहीं करते। वे अपनी मूर्खतापूर्वक वासनाओं, भावनाओं, व्यावहारिकता, लोकप्रिय विचारधाराओं, परंपराओं, या अन्य कपटपूर्ण मानदंडों के आधार पर चुनाव करते हैं।

ज्यादातर लोगों को लगता है कि एडॉल्फ हिटलर, चार्ल्स मैनसन, रासपुतिन और उनके जैसे केवल चरम अपराधी ही न्याय को नहीं समझ सकते और इसलिए यह नीतिवचन केवल उन जैसे दुष्टों पर ही लागू होता है। परन्तु शारीरिक मनुष्यों की इस दुष्ट दुनिया में ये केवल तीन ही हैं। जॉन लेनन, सिगमंड फ्रायड या अन्य अहिंसावादी लोग किस नैतिक आधार पर भिन्न थे? पाप में पड़े मनुष्यों का विशाल हिस्सा सच्चे न्याय को नहीं समझता है।

इस नीतिवचन में वर्णित दुष्ट लोगों को परमेश्वर का कोई डर नहीं है (भजन 36:1-2; रोमियों 3:18)। वे मूर्ख हैं (भजन 14:1; 53:1)। उन्होंने कभी ज्ञान और बुद्धि को सीखने का प्रयास भी नहीं किया है। वे अपनी अज्ञानता, वासना और अहंकार के अनुसार न्याय करते हैं, और निर्णय लेते हैं। वे सबसे बढ़कर अपने आप से प्रेम करते हैं, और जीवन मात्र एक प्रतियोगिता है कि देखें कौन सबसे अधिक सफलता हासिल कर सकता है। पुराने दिनों में वे बच्चे की बलि के लिए शैतान के फुर्तीले मोहरे हुआ करते थे और आज भी गर्भपात के जरिए उसके फुर्तीले मोहरे बने हुए हैं।

न्याय यह जानने की क्षमता है कि उचित और सही क्या है। क्योंकि बुरे लोगों ने परमेश्वर और बाइबल में प्रकाशित उसकी इच्छा को नहीं माना, इस कारण उन्हें शैतान और उनकी घिनौनी युक्तियों पर छोड़ दिया गया है (सभोपदेशक 7:29)। पाशविकता का आविष्कार पशुओं ने नहीं किया। यह उस मनुष्य की एक और महान सोच का परिणाम है जिसने परमेश्वर को परमेश्वर मानने से इनकार किया। और आज वे पाशविकता को कानूनी तौर पर केवल जानवरों के प्रति क्रूरता मानकर इससे भी बड़ी विकृति का परिचय देते हैं!

समझ का अर्थ है किसी चीज़ में मौजूद गुण या महत्व को समझना और बूझना। दुष्ट लोग सही और ग़लत को नहीं पाते – वे न्याय को नहीं समझ पाते हैं। वे वास्तव में यह नहीं देख सकते कि नैतिक और अन्य मामलों में क्या सही है और क्या ग़लत है, क्योंकि उनके मन अंधकारमय हो गये हैं। परमेश्वर और उसकी आज्ञाओं के प्रति उनकी सख्त नफरत सोचने-समझने की उनकी क़ाबलियत को विकृत कर देती है।

यहोवा को ढूँढ़नेवाले उससे डरते हैं, उसकी आज्ञाओं का पालन करते हैं, उसके वचन को पढ़ते हैं, और बुद्धि व ज्ञान के लिए प्रार्थना करते हैं। उनके अंदर बसनेवाला परमेश्वर का आत्मा उनके नए मनुष्य को नए जन्म के द्वारा सब बातों को जानने में सहायता करता है (अय्यूब 32:8; 1 यूहन्ना 2:20)। वे सारी बातें समझते हैं, इस जगत की और आने वाले नए जगत की भी। जो यहोवा को ढूँढ़ते हैं उनमें परमेश्वर का मन भी होता है (1 कुरिन्थ 2:15-16)।

परमेश्वर का भय बुद्धि और समझ का आरम्भ है (नीति 1:7; 9:10; भजन 111:10)। परमेश्वर को जानना सब प्रकार सही सोच की नींव है। एक पवित्र सृष्टिकर्ता के विश्व-दृष्टिकोण के बिना, भ्रष्ट मानव हृदय में अपनी स्वार्थी कल्पनाओं, शैतान द्वारा सुझाए गए विकृत मतिभ्रमों, हर दिन उन की ओर फेंके जाने वाले दुनिया के दुष्ट आविष्कारों, या बुराई के इन तीनों स्रोतों के अति विनाशकारी संयोजन को रोकने के लिए कोई सीमा नहीं है।

परमेश्वर का भय माने बिना मुद्दों को सुलझाना पागलपन है। आपकी युक्तियां कैसे क़ाबू में रहेगी? कौन सी सीमाएं आपका मार्गदर्शन करेंगी? निष्पक्षता के आपके विचार का आधार क्या होगा? आप कैसे जानेंगे कि क्या सही है या क्या गलत है? यदि आपसे कोई असहमत हो जाए तो कौन जीतता है? क्या इस बार यह पिछली बार से अलग हो सकता है? अगर सर्व-बुद्धिमान परमेश्वर द्वारा निर्धारित सीमाएं न हो, तो इन्सान की सोच से उत्पन्न संभावित आपदा कितनी भयावह है!

आपका विश्व-दृष्टिकोण क्या है? क्या आपको एक पवित्र सृष्टिकर्ता ने रचा था? या क्या आप शून्य से निकले अरबों वर्षों के विकास का परिणाम हैं? क्या आपके पूर्वज बन्दर और लंगूर हैं? क्या आपका मकसद विश्वविद्यालय की कक्षाओं और पबों में देखे जानेवाले सामाजिक कार्यक्रमों के माध्यम से मानव जाति में सुधार करना है? क्या आपके जीवन का उद्देश्य अपनी लक्ष्य-पूर्ति करना है? क्या आपकी नियति मृत्यु से भी बढ़कर कुछ है?

क्या जीवन के फैसलें इस बात से निर्धारित होते हैं कि कौन-सी बातें आपकी लालसाओं या घमण्ड को सबसे अधिक संतुष्ट करेंगीं? या क्या आपको असीम बुद्धिमान परमेश्वर की आज्ञा मानने के उद्देश्य से और उसे प्रसन्न करने के लिए चीजों के बीच चुनाव करना चाहिए? क्या परमेश्वर को प्रसन्न करने के बाद, इस बात पर भी विचार करने का आपका कोई दायित्व है कि आपके निर्णयों का दूसरों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यदि हां, तो आपने यह कहां से जाना, और आप किस निश्चित आधार पर दूसरों पर विचार करने के लिए विवश होते हैं।

परमेश्वर का भय माने बिना मनुष्य भ्रांतचित है। दिव्य बुद्धि की सीमा और प्रतिबन्ध के बिना, वह सही ढंग से नहीं सोचेगा। अदन की वाटिका में जब उसका पतन हुआ, उसने अपनी विवेकपूर्ण तर्क-शक्ति को खो दिया, क्योंकि वहां वह एक सिद्ध दुनिया में अपने भले मनुष्यत्व में असंतुष्ट था। वह परमेश्वर के समान बनना चाहता था, इसलिए उसने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया। उसने सब कुछ बर्बाद कर दिया। उस दिन वह सब बातों की अपनी आत्मिक समझ में मर गया (उत्पत्ति 2:17)।

हाल के वर्षों में, मनुष्य ने मान लिया है कि मृत्युदंड और शारीरिक दंड से कुछ हासिल नहीं होता, शिशुओं को गर्भ में ही मार दिया जाना चाहिए, और इंसान के बजाए चिड़ियों और जानवरों की किसी भी कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए, अपराध केवल एकतरफा होते हैं, महिलाएं पुरुषों के बराबर या उनसे भी श्रेष्ठ हैं, मानव-पूर्वज बंदर हैं, समलैंगिकता में कोई गुनाह नहीं है और वे अच्छे माता-पिता बन सकते हैं, और यह सूचि बढ़ती जायेगी।

वे तर्क देते हैं कि घाटे का सौदा समृद्धि की ओर ले जाता है, प्राथमिक विद्यालयों में यौन शिक्षा किशोरावस्था में गर्भधारण को कम कर देगी, और कहते हैं, बच्चों में बढती हिंसक-प्रवृत्ति और नशे की लत में फिल्मों और वीडियो गेम की कोई भूमिका नहीं है।

उनके दाहिने हाथ में मिथ्या है और वे उसे देख नहीं सकते (यशायाह 44:18-20)। आज मनुष्य अपने मूर्ति-पूजक पूर्वजों से भी बदतर बन गया है, क्योंकि कम से कम उन मूर्ति-पूजकों ने किसी प्रकार का दैवीय अस्तित्व तो मान लिया है, जिससे वे डरा करते थें। आधुनिक दुष्ट मनुष्यों के जीवन में किसी भी देवता के लिए कोई स्थान नहीं है। वे मानवतावादी मूर्तिपूजक हैं। इसलिए परमेश्वर उन्हें और अधिक अंधा कर देता है (रोमियों 1:18-32; 2 थिस्स 2:9-12)।

मानवतावाद मनुष्य की पूजा है। मानव-अस्तित्ववाद का प्रचलित तत्वज्ञान मानवतावादी अस्तित्व की पूजा है। इस संसार के विचारक अपनी बुद्धि में महान ऊंचाइयों तक पहुंच गए हैं। आओ, हम अपनी ही पूजा करें! वे कहते हैं, मैं मूल्यवान हूं क्योंकि मैं ‘प्रज्ञाशील’ और ‘चिंतनशील’ और ‘बुद्धिजीवी’ मनुष्य अर्थात् होमो सेपियन्स हूं, और ‘मैं हूँ’। इस कारण आपको मुझसे प्यार करना चाहिए, क्योंकि मैं भी इसी कारण से अपने आप से प्यार करता हूं। तुम्हें मुझसे बिना किसी शर्त के प्यार करना चाहिए, क्योंकि चरित्र या आचरण व्यर्थ है।

वे कहते हैं, “सबसे बड़ा प्रेम है ख़ुद से प्रेम करना।” कदापि नहीं! ख़ुद से प्रेम आत्ममुग्धता, स्वार्थ और अभिमान के लिए प्रयुक्त रूपक है। उस व्यक्ति में कितनी समझ है जो उन तीन पापों को सबसे बड़ा प्रेम कहता है? वे आत्म-सम्मान को बढ़ावा देते हैं जबकि यह जानते हैं कि जेल के कैदियों में इसकी चरम सीमा होती है। सुलैमान ने लिखा, “बुरे लोग न्याय को नहीं समझ सकते ।”

क्या आप यहोवा परमेश्वर को ढूंढते हैं? क्या आप उसके वचन और उसके शब्दों के सामने थरथराते हैं? क्या आप उससे याचना करते हैं कि वह आपको ज्योति और समझ दे? क्या आप हर प्रकार का निर्णय लेते समय उस पर और उसकी इच्छा पर विचार करते हैं? क्या वह आपका अनन्त भाग है? क्या स्वर्ग आपका पसंदीदा लक्ष्य है? क्या धार्मिकता, जैसा कि उसने परिभाषित किया है, आपकी नैतिक आचार संहिता है? क्या पवित्रता इस विश्व की महिमा और सुन्दरता है?

तब आपको सभी चीज़ों की समझ प्राप्त होगी। आप जानेंगे कि मनुष्य कहां से आया है, जीवन में उसका संपूर्ण कर्तव्य क्या है, अच्छे रिश्तों का आधार क्या है, समझ से परे शांति क्या है, यीशु मसीह द्वारा पापों की क्षमा क्या है, न्याय का आने वाला दिन और शाश्वत महिमा की आशा क्या है। यह सब और बाकी सब कुछ आपके लिए समझना आसान होगा।

सोचों। एक व्यक्ति जो परमेश्वर को खोजता है वह एक महान जीवनसाथी बनेगा, क्योंकि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर और बाइबल से जान जाता है कि वैवाहिक जीवन के लिए क्या उचित और सही है। एक व्यक्ति जो परमेश्वर की खोज करता है वह उन्हीं कारणों से एक महान कर्मचारी और एक महान नियोक्ता बनता है। यदि आपके पास विकल्प होता तो आप किसी अन्य प्रकार के व्यक्ति के आसपास नहीं रहना चाहेंगे, लेकिन इस दुनिया में ज्यादातर बुरे लोग ही हैं।

यदि आप पूरे मन से परमेश्वर को ढूँढ़ोगे तो उसे पाओगे भी (यिर्मयाह 29:13)। जब आप उसे पा लेंगे, तो वह आपकी आत्मा में सभी चीजों को समझने के लिए बुद्धि देगा। तुम इस जीवन की बातें जानोगे, और आने वाली अकथनीय बातें भी जान जाओगे। आप प्राकृतिक चीज़ों और आध्यात्मिक चीज़ों को समझेंगे। आप जीवन, मृत्यु और अनंत जीवन को समझ लेंगे। आप उस आनंद, शांति और आशा को समझेंगे और पाएंगेभी जिसे अन्य लोग नहीं जान सकते और न पा सकते हैं।

आज ही परमेश्वर को ढूँढ़ो। आज और अब से बेहतर कोई समय नहीं है। अपने आप को नम्र करने के लिए विश्वास और प्रार्थना के साथ उसके पास आओ और जैसा कि नीतिवचन में वर्णित है, उसे ढूँढ़ो। उसका नाम प्रभु यहोवा है। अब उसके पुत्र यीशु मसीह के पास जाओ और अपनी मूर्ख आत्मा पर दया के लिए उससे प्रार्थना करो। फिर जब तुम उसके शुद्ध वचन में खोज करते हो सभी चीजों की सही समझ प्राप्त करते हो, तो उसके लिए उसे सारी महिमा दें।

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