नीतिवचन 28:2

देश में पाप होने के कारण उसके हाकिम बदलते जाते हैं; परन्तु समझदार और ज्ञानी मनुष्य के द्वारा सुप्रबन्ध बहुत दिन के लिये बना रहेगा।

किसी भी देश की राजनीतिक अस्थिरता उस देश के पापों का नतीजा और परमेश्वर का दण्ड होता है। स्वर्ग के परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह देश में सरकार के भ्रष्टाचार, पतन, या नागरिकों की क्रांति को जन्म देता है। किसी भी देश के लिए सबसे बड़ा वरदान एक ऐसा नेता होता है जो परमेश्वर का भय मानता है, और सत्य की राह पर चलता है। ऐसे नेता का शासन उसके देश का वजूद बनाए रखेगा, उसे चिरायु बनाएगा, उसकी रक्षा करेगा और उसे समृद्ध बनाएगा। इज़राइल और यहूदा और उनके राजाओं के विसंगत इतिहासों की गाथाएं, जो हमारी शिक्षा के लिए बाइबल में सावधानीपूर्वक दर्ज किएँ गए हैं, इस राजनीतिक तथ्य की गवाही देते हैं।

सुलैमान, जो अब तक का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति था, इस्राएल का राजा था, जो एक समृद्ध और शक्तिशाली राष्ट्र था। उसकी बुद्धि दुनिया भर में प्रसिद्ध थी (1 राजा 4:29-34)। उसने 3,000 नीतिवचन और 1,005 गीत लिखे। उसने वनस्पति विज्ञान, प्राणीशास्त्र, राजनीति विज्ञान और अन्य कई क्षेत्रों के ज्ञान पर संशोधन किया। उसके समय की अंतरराष्ट्रीय हुकूमतें उसकी महान बुद्धि को परखने के उद्देश से प्रश्न पूछने के लिए अपने प्रतिनिधियों को भेजा करते थें। राजगद्दी उसे अपने पिता दाऊद से विरासत में मिली थी, और उसने अपने बेटे को राष्ट्र की रक्षा करने की नीतियाँ सिखाई।

उसने एक और नीतिवचन में सिखाया, “जाति की बढ़ती धर्म ही से होती है, परन्तु पाप से देश के लोगों की नामधराई होती है” (नीतिवचन 14:34)। हर सरकार और देश में प्राकृतिक और अलौकिक नियम क्रियाशील होते हैं। प्राकृतिक नियम किसी भी राष्ट्र के अच्छे या बुरे चरित्र, उसके आचरण और कानून के सामान्य और तार्किक परिणाम होते हैं। अलौकिक कानून वे हैं जो किसी सरकार या राष्ट्र के लिए उसकी नीतियों और प्रथाओं के कारण परमेश्वर के पुरस्कार या दंड हैं।

जब एक देश अधिकार के स्रोत, अर्थात् स्वयं परमेश्वर, और उस अधिकार की बुद्धि, अर्थात परमेश्वर का वचन, के विरुद्ध खड़ा होता है, तो वह एक ऐसी स्थिति में चला जाता जहाँ प्राकृतिक और अलौकिक दोनों नियम उन्हें दण्ड देंगे। भ्रष्टाचार भ्रष्टाचार को जन्म देता है। एक भ्रष्ट राष्ट्र में एक भ्रष्ट सरकार होगी, और एक भ्रष्ट सरकार सड़सड़ाहट, अविश्वास, उथल-पुथल, और जनता के विद्रोह का शिकार होगी। देश की कमान अपने हाथों में लेने की मंशा से नए नए राजनेताओं का उदय होगा क्योंकि इस तरह की उथल-पुथल से उत्पन्न अस्थिरता किसी भी स्थिरता को बाधित करती है। महान परमेश्वर अपने वचन की खराई को प्रमाणित करने के लिए उस देश को दण्ड देगा (यशा 3:1-7; होशे 13:11)।

इस नीतिवचन में वर्णित बदलते हाकिम उत्तराधिकार में बननेवाले कई हाकिम हैं। नागरिकों के मौलिक अधिकारों को कुचलकर अपनी ही मनमानी करनेवाली सरकार का घातीय और विनाशकारी विकास भयावह सिद्ध होता है। इस नीतिवचन की समानांतर वाक्य रचना के दो भागों की आपस में तुलना करें। बदलते हाकिमों का वर्णन देश के ‘बहुत दिन के लिये बने रहने’ के विपरीत किया गया है, उनके कारण होनेवाली देश की कुशलता के पक्ष में नहीं। अर्थात, एक अस्थिर देश में बदलते राजनेताओं के कारण देश का कल्याण नहीं होता, बल्कि कई नए राजनितिक दल बनने से जनता में एक स्थाई विचारधारा विचलित हो जाती है जिससे केवल असमंजस और उथल-पुथल ही बढ़ जाती है। इसलिए देश के नागरिकों की एक सत्यनिष्ठ विचारधारा से ही एक दीर्घायु और स्थिर सरकार बनती है, जो देशहित में काम करें, न कि केवल कुछ ‘खास वर्ग’के लोगों के लिए।

एक सरकार तब तक समृद्ध होती रहेगी जब तक देश के नागरिक और उसके नेता सत्यनिष्ठ हैं। एक समझदार और ज्ञानी व्यक्ति वह नहीं है जिसके पास शिक्षा की डिग्रियां तो हैं, परन्तु अब भी मूर्ख है, जो आधुनिक शिक्षा-प्रणाली की अज्ञानता का उत्पाद है। बल्कि वह एक ऐसा मनुष्य है जो परमेश्वर का भय मानता है और सत्य की राह पर चलता है- सत्य जो ज्ञान और समझ की एकमात्र बुनियाद है (नीतिवचन 1:7; 9:10; अय्यूब 28:28; भजन 111:10)। प्राकृतिक और अलौकिक दोनों प्रकार की आशीषें एक सत्यनिष्ठ अगुवे और राष्ट्र को पुरस्कृत करेंगी। धन्य और सुखी वे लोग हैं जिनका परमेश्वर यहोवा है, जो उद्धारकर्ता के रूप में प्रभु यीशु मसीह में प्रकट हुआ (भजन 33:12; 144:15, युहन्ना 1:1,14)।

आज पृथ्वी पर कोई राष्ट्र परमेश्वर और उसकी धार्मिकता का गुणगान नहीं करता; इसलिए दुनिया का राजनीतिक माहौल काफी अस्थिर है, चाहे वह अलग-अलग राष्ट्र हों या उनका संयोजन। जिन राष्ट्रों ने खुद को परमेश्वर और सत्य के खिलाफ बिलकुल खुलेआम स्थापित किया है, वे आम तौर पर सबसे अस्थिर राष्ट्र हैं। एक राष्ट्र में बार बार होनेवाले तख्तापलट, उथल-पुथल और क्रांतियां जैसी बातें अक्सर ईश्वरीय अधिकार और बाइबल की पवित्रता के खिलाफ विद्रोह की सीमा को दर्शाती हैं।

फ्रांसीसी क्रांति कोई दुर्घटना नहीं थी: यह उस नास्तिकता का परिणाम था जिसका प्रचार उस क्रांति से पहले किया गया था। जर्मनी, मार्क्स, नीत्शे, फ्रायड और उनके जैसे अन्य कई दो विनाशकारी विश्व युद्धों के आसपास राजनीतिक रूप से अस्थिर थें। उसी दौर में, नास्तिक रूस में दमनकारी शासन के तीन रूप फलफूल रहे थें। और आज कई देश जो ईसाई कहलाते हैं, पश्चातापरहित होकर इसी तरह की उथल-पुथल की ओर बढ़ रहे हैं, क्योंकि उनके अपराध बहुत बड़े हैं।

आप क्या कर सकते हैं? सत्य और धार्मिकता का जीवन जीएं जिसकी आज्ञा परमेश्वर अपने वचन में दीं है और अपने देश और देश नेताओं के लिए प्रार्थना करें (यिर्मयाह 29:4-7; 1 तीमु 2:1-2)। आप वह बन सकते हैं जिसे परमेश्वर यहोवा देश की शांति और दीर्घायु को बनाए रखने के लिए मध्यस्थ के रूप में देखता है (यहेज 22:29-31)। यह परमेश्वर का भय मानने वाले प्रत्येक मसीही नागरिक का कर्तव्य है कि वह अपने दुष्ट देश पर परमेश्वर की दया के लिए गिड़गिड़ाए (2 इतिहास 7:14)।

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