नीतिवचन 27:6

जो घाव मित्र के हाथ से लगें वह विश्वासयोग्य हैं, परन्तु बैरी के चुम्बन धोखा देनेवाले होते हैं।

सच्चा प्रेम घाव देता है। और चुम्बन अक्सर झूठे होते हैं। यहाँ सच्ची मित्रता और प्रेम का एक महान नीतिवचन दिया गया है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप क्या सोचते हैं, सच्चे मित्र एक-दूसरे को चोट पहुंचाते ही हैं, वे अपनी पारस्परिक उत्तमता के लिए एक-दूसरे को सुधारते हैं, डाँटते हैं और चेतावनी देते हैं। प्रेम के ये सच्चे भाव अनमोल होते हैं। दूसरी ओर, झूठे मित्र आसानी से अधिक बाहरी स्नेह या तवज्जो देते हैं, जो वास्तव में उनके स्वार्थी हृदयों के लिए एक झूठा आवरण होता है (नीतिवचन 27:5)। आपको परमेश्वर से उन मित्रों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए जो आपको चोट पहुंचाते हैं।

संसार के प्रेम के विचार को सुलैमान ने अस्वीकार किया था। यदि आप उनके प्रेम गीतों पर विश्वास करते हैं, तो वे सोचते हैं कि प्रेम किसी दूसरे व्यक्ति से प्राप्त किया हुआ आनंद है। इन शब्दों पर विचार करें – “यदि आप जिससे प्यार करते हैं उसके साथ एक न हो सके, तो उससे प्यार करें जिसके साथ आप एक हैं,” और “क्या आप कल भी मुझसे प्यार करेंगे?” कई लोगों के लिए ये शब्द कि “मैं तुमसे प्यार करता/करती हूँ”, दूसरे व्यक्ति से कुछ पाने के लिए मात्र एक झूठ होता है। बेशक, यदि दोनों व्यक्ति एक दूसरे से कुछ पाने के लिए एक ही समय पर झूठ बोलते हैं, तो वे इसे “अद्भुत केमिस्ट्रि” का नाम देते हैं।

प्रेम और वासना समान नहीं हैं। सुलैमान के दृष्टांत में वेश्या ने कहा था, “अब चल हम प्रेम से भोर तक जी बहलाते रहें; हम परस्पर की प्रीति से आनंदित रहें” (नीतिवचन 7:18)। परंतु वह जो कुछ भी कह रही थी वह व्यभिचार था, अर्थात दूसरे व्यक्ति की कीमत पर यौन वासना को संतुष्ट करना। और अम्नोन को लगा था कि वह अपनी सौतेली बहन तामार से प्यार करता है, परंतु वह केवल उसके शरीर के प्रति एक आकर्षण था, जिसके कारण उसे भ्रष्ट करने के बाद उससे अत्यंत बैर रखा गया (2 शमूएल 13:1-19)।

किसे फर्क पड़ता है यदि आप खत भेजते हैं, चुंबन करते हैं, या अपने प्रेम का इज़हार करते हैं? ये किसी भी मूल्यवान चीज़ का प्रमाण नहीं हैं। हो सकता है ये सब किसी अन्य व्यक्ति का लाभ उठाने की आपकी स्वार्थी महत्वाकांक्षा का एक झूठा आवरण हो। किसे फर्क पड़ता है यदि आप किसी से हाथ मिलाते हैं, खूब मुस्कुराते हैं और उसकी खूब प्रशंसा करते हैं? आपसी आत्म-प्रेम के लिए दूसरों की ओर से प्रतिक्रिया प्राप्त करने के लिए उनकी चापलूसी करना घृणित है। ये मित्रता या प्रेम के साक्ष्य नहीं हैं। केवल रचनात्मक घाव ही सच्ची मित्रता और प्रेम दर्शाते हैं।

यहूदा ने भी चापलूसी भरे शब्दों और चुंबन का प्रयोग किया था (मत्ती 26:49)। योआब ने अमासा को मारने के लिए इन्हीं का उपयोग किया था (2 शमूएल 20:9-10)। अबशालोम ने इस्राएल के लोगों को दाऊद के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए बहकाने के लिए किया इन्हीं का उपयोग किया था (2 शमूएल 15:5)। घृणा अक्सर झूठे शब्दों और स्नेहपूर्ण कार्यों के पीछे छिपी होती है (नीतिवचन 26:24-26)। दाऊद ऐसे शब्दों और ऐसे लोगों से हाथ मिलाने से डरता था, इसलिए उसने कलीसिया की और स्वयं की समृद्धि और सुरक्षा के लिए उन्हें परदेशियों से बचाने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना की (भजन संहिता 144:1-15)।

सच्ची मित्रता और प्रेम देते हैं। वे दूसरों की भलाई के लिए देते हैं। प्रेम निस्वार्थ होता है। वासना स्वार्थी होती है। दूसरे को देने में आशीष पाना ही सच्चा प्रेम है। चूँकि परमेश्वर को प्रसन्न करना और न्याय के दिन के लिए उत्तम लेखा होना, जीवन के सबसे बड़े लक्ष्य हैं, इसलिए दूसरों को उन लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करना प्रेम का उच्चतम माप है। भाई पौलुस ऐसे प्रेम का एक महान उदाहरण था (2 कुरिन्थियों 5:11; 11:1-2; 12:14-15; गलातियों 4:16; कुलुस्सियों 1:28-29; 1 थिस्सलुनीकियों 2:7-12)। क्या आप किसी को उस उच्चतम माप से प्रेम करते हैं? क्या आपका कोई ऐसा मित्र है जो आपसे इतना प्यार करता है?

यदि आप किसी अन्य व्यक्ति से सच्चा प्रेम करते हैं, तो उनके प्रति आपके सभी कार्य उन्हें परमेश्वर को प्रसन्न करने और न्याय के दिन के लिए तैयार करने में मदद करने के उद्देश्यों के अंतर्गत होंगे। अत: आप आवश्यकतानुसार उन्हें सुधारेंगे, डांटेंगे और चेतावनी देंगे। आप ऐसे कार्यों से लाड़-प्यार में, समझौते से, या नज़रअंदाज करके निपटेंगे, जो परमेश्वर के साथ उनके संबंध को हानि पहुँचाते हैं या उनके जीवन को पाप की ओर ले जाते हैं। ईश्वरीय प्रेम पाप को छुपाएगा नहीं; बल्कि वह पापों को सुधारेगा। वह बुराई को नज़रअंदाज़ नहीं करेगा; बल्कि बुराई की निंदा करेगा।

मित्रता और प्रेम की यह सच्चाई अधिकतर लोगों के लिए बहुत ऊंची ठहरती है। वे शैतान के इस झूठ पर विश्वास करते हैं कि मित्रता और प्रेम का अर्थ दूसरे के आचरण की परवाह किए बिना, आनंद की तलाश करना और अपने संबंधों में सब कुछ सुखद, खुश और शांतिपूर्ण रखना होता है। परंतु, यदि आप वास्तव में उस व्यक्ति की परवाह करते हैं, तो आप उन्हें सिद्ध बनने में मदद करना चाहेंगे (लूका 17:3; गलातियों 6:1-2; 1 थिस्सलुनीकियों 5:14; इब्रानियों 3:12-13; 10:24-25; याक़ूब 5) :19-20)। यदि आप उनके पापों पर उन्हें डाँटते नहीं हैं, तो आप उनसे घृणा करते हैं (लैव्यव्यवस्था 19:17)।

इस तरह का प्रेम सर्वोच्च मित्रता और संबंध उत्पन्न करता है (नीतिवचन 28:23)। सुलैमान ने लिखा, “बुद्धिमान को डाँट, वह तो तुझ से प्रेम रखेगा” (नीतिवचन 9:8)। सबसे स्नेही व्यक्तियों में से एक, दाऊद ने लिखा, “धर्मी मुझ को मारे तो यह कृपा मानी जाएगी: और वह मुझे ताड़ना दे; तो यह मेरे सिर पर का तेल ठहरेगा, मेरा सिर उससे इंकार न करेगा” (भजन संहिता 141:5)। पतरस ने पौलुस को प्रिय कहा, जबकि पौलुस ने उसे सार्वजनिक रूप से डांटा था (गलातियों 2:11-14; 2 पतरस 3:15)।

दाऊद और योनातान परम मित्र थे। वे एक दूसरे से अपने प्राण के समान प्रेम करते थे (1 शमूएल 18:1,3; 20:17; 2 शमूएल 1:26)। उनका रिश्ता कैसा था? वे परमेश्वर के सामने एक-दूसरे को सर्वश्रेष्ठ बनने में मदद करते थे। जब दाऊद शाऊल से छिप रहा था, तब “शाऊल का पुत्र योनातान उठकर उसके पास होरेश में गया और परमेश्वर की चर्चा करके उसको ढांढ़स दिलाया” (1 शमूएल 23:16)।

आप किस तरह का मित्र चाहते हैं? आप स्वयं किस तरह के मित्र हैं? क्या आप ऐसा मित्र चाहते हैं जो आपकी इच्छाओं को पूरा करे और आपके अभिमान को बढ़ाए? वह जो आपकी उपस्थिति में आनंदित हो, करुणा से आपका उत्साहवर्धन करता हो और आपकी सेवा करता हो? ऐसा मित्र आपकी कोई सहायता नहीं करेगा। आप पापी हो; आपको एक सच्चे मित्र की आवश्यकता है, जो आपकी आत्मा का ध्यान रखेगा और आवश्यकता पड़ने पर आपको सुधारेगा। पहले प्रकार का मित्र बहुत अयोग्य और बहुत छली होगा, और आवश्यकता के समय में आपको निराश कर देगा।

धर्मी जन अपने दोषों को उजागर करने के लिए उत्कंठित रहते हैं, और जब कोई दूसरा व्यक्ति निःस्वार्थ कार्य करता है तो वे बहुत कृतज्ञ होते हैं (भजन संहिता 141:5)। एक विश्वसनीय सुधारक को वास्तव में एक महान ख़ज़ाने के रूप में महत्व दिया जाना चाहिए। दाऊद, जो इस्राएल का राजा बनने के लिए अभिषिक्त था, अबीगैल की सच्ची मित्रता के लिए आभारी था, जो कि उसके प्रति उसकी सम्मानजनक ताड़ना से सिद्ध हुआ (1 शमूएल 25:32-34)। सभी पतियों और पत्नियों को इस उच्च स्तर के स्नेह और सहयोग को अपनाना चाहिए।

इस नीतिवचन में वर्णित और निहित धर्मी मित्रों को आप कहाँ पा सकते हैं? यीशु मसीह की सच्ची कलीसिया में, जहां मित्रता और प्रेम के कर्तव्यों और विशेषाधिकारों का उदाहरण दिया जाता है, सिखाया जाता है, प्रचारित किया जाता है और जहां यह सब आवश्यक होता है। आपको अपनी आत्मिक समृद्धि की बढ़ोत्तरी के लिए, परमेश्वर द्वारा चुने गए विशिष्ट सदस्यों से बने मसीह के देह की आवश्यकता है (1 कुरिन्थियों 12:12-27)।

कौन आपसे सबसे अधिक प्रेम करता है? वह जो आपके साथ सबसे अधिक पारस्परिक रूप से आनंदित होता है, या वह जो आपके लिए सबसे अधिक कार्य करता है? यदि आपने इस नीतिवचन से सीखा है, तो आप जानते हैं कि इसका उत्तर वह है जो आपके लिए सबसे अधिक कार्य करता है। यदि आप परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से एक हैं, तो यीशु मसीह ने आपके लिए अपना जीवन दिया है और आज भी आपके लिए जीवित है (रोमियों 5:6-11)। और वह पवित्रता में आपकी सिद्धता के लिए बुद्धिमानी से आपकी हर गलती पर आपको ताड़ना देता है (इब्रानियों 12:4-17)। वह आपका सबसे बढ़कर परम मित्र है।

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