नीतिवचन 27:22

चाहे तू मूर्ख को अनाज के बीच ओखली में डालकर मूसल से कूटे, तौभी उसकी मूर्खता नहीं जाने की।

क्या मूर्ख के लिए कोई आशा है? सच कहे तो, बिलकुल भी नहीं। कुछ अपवाद इस सामान्य नियम को नहीं बदलते। मूर्ख की मदद करने के लिए आप चाहे जो भी करें, वह मूर्ख ही बना रहेगा, क्योंकि उसके पास बुद्धि के लिए कोई दिल नहीं है। यहाँ खेती के रूपक पर आधारित एक गहन नीतिवचन है जो इस नीतिवचन पर और भी प्रकाश डालता है।

एक मूर्ख बच्चे या किसी ऐसे मूर्ख वयस्क के लिए जो कुछ समय के लिए मूर्खता करता है, आशा है, लेकिन एक ऐसा मूर्ख जो सुधार से परे है, उसके लिए कोई आशा नहीं है। वह जो है वही है; आप उसकी मदद नहीं कर सकते (नीतिवचन 17:10,12; 29:9)। आपको उससे बचना चाहिए, उसे सुधारने के प्रयासों में आपको अपनी शक्ति बर्बाद नहीं करनी चाहिए, और यह जान लेना चाहिए कि क्यों कुछ लोग कभी नहीं बदलते।

मूर्ख क्या है? मूर्ख वह व्यक्ति है जिसने शब्दों या कर्मों से परमेश्वर और सच्चे धर्म को मानने से इनकार कर दिया है (भजन 14:1; 53:1; तीतुस 1:16)। वह इतना घमंडी और जिद्दी है कि उसे सिखाया नहीं जा सकता, इसलिए उसे किसी जंगली जानवर की तरह सुधारा और सिखाया जाना चाहिए (नीतिवचन 10:8; 12:1; 14:16; 26:3)।

वह एक ऐसा हट्ठी है जिसे खुद पर बड़ा भरोसा होता है, इसलिए वह बिना किसी सावधानी या जांच-पड़ताल के अपने पागलपन में बना रहता है (नीतिवचन 10:23; 12:15; 15:5; 17:16; 26:11; 28:26)। वह आत्म-केंद्रित और घिनौना है, और केवल अपने विचारों में रुचि रखता है (नीतिवचन 14:9; 17:24; 18:2; 20:3; सभोपदेशक 10:2-3)।

बच्चे जब पैदा होते हैं तो वे मूर्ख होते हैं, और यदि उन्हें प्रशिक्षित नहीं किया जाता है, तो मूर्खता की गाँठ उनके मनों में बंधी रहती है। लेकिन शारीरिक दंड और डांट-फटकार इस मूर्खता को बच्चों से दूर कर देती है (नीतिवचन 19:18; 22:15; 29:15)। जो वयस्क मूर्ख हैं उनकी मूर्खता को शिक्षा, फटकार और चेतावनी से दूर किया जा सकता है (नीतिवचन 1:5; 9:8-9; 19:20,25; 21:11; 25:12; 26:3)। इन दोनों मामलों में आशा है, लेकिन मूर्खों के लिए कोई आशा नहीं है।

ओखली एक प्याले के आकार का पत्थर का बर्तन होता था जिसमें अनाज रखा जाता था, इसलिए उसमें अनाज को डालकर मूसल से कूटा जाता था, अर्थात् अनाज को पीसने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला एक गदा-नुमा उपकरण। अनाज को कूटने का मतलब था उसे पीटना, कुचलना और चूर्ण कर देना। यह रूपक शक्तिशाली है! यदि आप किसी मूर्ख को ओखल में डालकर मूसल से कूटते भी हैं, तौभी आप उसकी मूर्खता को दूर नहीं कर सकते और न उसे बुद्धिमान बना सकते हैं।

आप सुधार से परे मूर्ख बनने से कैसे बच सकते हैं? परमेश्वर का भय मानना आपका पहला कदम है, क्योंकि यही बुद्धि और समझ का आरम्भ है (नीतिवचन 1:7; 9:10)। आपको अपने विचारों को त्यागना होगा (नीतिवचन 16:25; 26:12)। फिर आपको बुद्धिमान होने के लिए शिक्षा और डांट से प्रेम करना होगा (नीतिवचन 9:8-9; 12:1)। और आपको मूर्खों से दूर रहना होगा, ताकि आप उनके जैसे न बन जाएँ (नीतिवचन 9:6; 13:20)।

बुद्धिमान मनुष्य मूर्खों को पहचान लेता है, याद रखता है कि वे मदद और आशा से परे हैं, और उन पर अपना समय या सांस बर्बाद नहीं करता (नीतिवचन 17:10,12; 29:9)। वे सम्मान के योग्य नहीं हैं, इसलिए उन्हें कोई सम्मान न दें (नीतिवचन 26:1,8)। उन्हें केवल जवाब दिया जाना चाहिए जब उन्हें अपना मुंह बंद करने के लिए कहना हो (नीतिवचन 26:4-5; मत्ती 7:6)। और यदि आपको किसी मूर्ख से निपटना ही है, तो बेरहम बनकर बलप्रयोग ही आपका सबसे अच्छा तरीका होगा (नीतिवचन 26:3; भजन 32:9)।

कुछ लोग कभी नहीं बदलते। जो पैदायशी मूर्ख हैं, उन्हें कभी प्रशिक्षित नहीं किया गया। हर तरह के जानवरों को प्रशिक्षित किया जा चूका है, लेकिन ये बेक़ाबू जानवर शिक्षा, सत्य और बुद्धि के विरोधी हैं। वे कभी भी उतने परिपक्व नहीं बन सकते जितना उन्हें होना चाहिए; वे कभी भी बुद्धि और समझ में नहीं बढ़ते; वे मूर्ख हैं। निराश न हों या समय बर्बाद न करें। इसके बजाय उनसे दूर रहें।

सब लोग स्वभाव से ही धर्मान्ध मूर्ख होते हैं, चाहे उनके माता-पिता ने उन्हें कैसी भी शिक्षा दीं हो (इफिसियों 2:1-3; 4:17-19; रोमियों 1:18-32)। यहाँ तक कि पौलुस, जो धर्म का विद्वान था, ने भी माना कि वह पहले मूर्ख था (तीतुस 3:3)। एक आत्मिक मूर्ख को कैसे बुद्धिमान बनाया जा सकता है? परमेश्वर की पुनर्जीवित करने वाली शक्ति से, जो उसे संप्रभुतापूर्वक फिर से जन्म देता है (यूहन्ना 1:13; 3:8; तीतुस 3:5)।

जिस सामर्थ्य से परमेश्वर ने सृष्टि की उत्पत्ति कीं उसी सामर्थ्य का यह कार्य मनुष्य को एक नया आत्मिक स्वभाव देता है ताकि वह देख सके, सुन सके, जान सके और परमेश्वर को प्रसन्न करनेवाले काम कर सके (यूहन्ना 3:3; 8:43,47; 1 कुरिन्थियों 2:14; रोमियों 8:7-8; फिलिप्पियों 2:12-13)। यह नया स्वभाव वास्तव में बुद्धिमान होता है (1 कुरिन्थियों 2:15)। सुसमाचार सुनने और उसका पालन करने के लिए अवश्य है कि मनुष्य पहले नया जन्म पाए (यूहन्ना 5:24; 10:26; 1 कुरिन्थियों 1:24; 2 कुरिन्थियों 4:3-4; प्रेरितों के काम 13:48)।

यह सोचना कि माहौल बदलने से मूर्ख बुद्धिमान बन जाएँगे, एक सरासर झूठ है (यशायाह 26:10)। यह सोचना कि सुसमाचार प्रचार के नए नए तौर-तरीके काम करेंगे, झूठ है (लूका 16:31)। भोजन, पानी या दवाएँ बांटकर यीशु पर विश्वास करने लोगों से उनका निर्णय खरीदना अधर्म है (2 कुरिन्थियों 2:14-17)। अवश्य है कि वे पहले नया जन्म पाएँ (यूहन्ना 3:7)! केवल परमेश्वर ही मूर्ख को बुद्धिमान बना सकता है (नीतिवचन 20:9; अय्यूब 14:4; यूहन्ना 3:6)।

परमेश्वर का भय मानना, शिक्षकों और सलाहकारों के सामने खुद को नम्र बनाना और मूर्खों के दिलों और दिमागों को गुलाम बनाने वाले घमंडी विद्रोह का त्याग करना आपका कर्तव्य और विशेषाधिकार है। इस तरह से सीखना, ओखली में मूसल से पीसे जाने से अधिक आसान है, जैसा कि प्रभु यीशु मसीह ने मूर्ख बच्चों और शत्रुओं दोनों के साथ किया है और करेगा (इब्रानियों 12:5-13; मत्ती 21:42-44)।

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