नीतिवचन 27:21

जिस रीति से चांदी के लिए घड़िया और सोने के लिए भट्ठी है, उसी रीति से मनुष्य के लिए उसकी बढ़ाई है।

चांदी और सोने को शुद्धिकरण के एक बर्तन या भट्टी में डालकर उनमें मौज़ूद अशुद्धियों को पहचाना जाता, उन्हें अलग किया जाता और शुद्ध किया जाता था। वहां की प्रचंड तपन में परीक्षण करके अशुद्ध धातुओं को मूल्यवान धातुओं से अलग कर दिया जाता था। तपन का अंतिम परिणाम केवल यह होता था कि अन्त में केवल शुद्ध धातुएँ बची रहती थीं जिनसे बेशकीमती गहने बनाए जाते थें।

मनुष्यों के लिए अपनी प्रशंसा सुनना एक अग्निपरीक्षा है (नीति 17:3)। यदि किसी व्यक्ति का चरित्र निकम्मा या कमज़ोर हो, तो प्रशंसा उसे घमंडी, अभिमानी और दबंग बना देगी। यदि किसी व्यक्ति का चरित्र मूल्यवान या मज़बूत हो, तो प्रशंसा का उस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। वह अपने सुशील और विनम्र मार्ग पर चलता रहेगा, परमेश्वर की महिमा करेगा और उसकी हर भलाई के लिए आभारी होगा जो वह दूसरों के प्रति करने में सक्षम हो सकता है।

मनुष्यों की ओर से प्रशंसा पाना आपकी आत्मा के लिए एक गंभीर परीक्षा उत्पन्न करती है। प्रशंसा से पता चलेगा कि आप किस चरित्र के व्यक्ति हैं। प्रशंसा साबित करेगी कि आप में एक भक्तिमान विनम्र आत्मा निवास करती है या शैतानी अभिमान की आत्मा। क्या आप मनुष्यों की प्रशंसा पाने के लिए तरसते हैं? क्या यह आपके प्राण को तपाती है? या क्या आप अच्छी तरह से जानते हैं कि यह बिल्कुल सच नहीं है? क्या आप प्रशंसा पाने से डरते हैं? क्या आप पूरी तरह से समझते हैं कि आप जो कुछ भी हैं या जो कुछ भी आपके पास है वह सब परमेश्वर की ओर से आपको मिला एक उपहार है?

पाठक, आपके पास ऐसा क्या है जो आपको नहीं दिया गया? यदि आपके पास जो कुछ है वह किसी और की ओर से उपहार है, तो आप उस पर गर्व कैसे कर सकते हैं या उसके लिए अपनी ही महिमा कैसे कर सकते हैं, कि मानो यह आपकी उपलब्धि है? आप के और दूसरों के बीच एकमात्र अंतर है परमेश्वर का आपको दिया गया उपहार (1 कुरिं 4:7)। उसकी महिमा करो!

पवित्र आत्मा द्वारा सिखाए गए लोग अपनी प्रशंसा सुनकर बड़े खतरे को पहचान लेते हैं। प्रशंसा की गर्मी या चिंगारी को दूर रखने के लिए आपको चेतावती का एक संकेत साथ लेकर चलना चाहिए जिस पर लिखा हो कि आप अत्यंत ज्वलनशील हैं। आपको डांट-फटकार से अधिक प्रशंसा से डरना चाहिए, क्योंकि डांट-फटकार का फल नम्रता और शिक्षा है, और प्रशंसा का फल सबसे सुखद जहर है जो आपका विनाश कर देगा। सबसे पवित्र किये गए व्यक्ति में भी गर्व का एक बीज सक्रिय होता है, और बस थोड़ी-सी प्रशंसा का जल इसे तेजी से और व्यापक रूप से बढ़ाने के लिए काफ़ी है जो आपकी फलदृपता को रोक देगा और दण्ड लाएगा।

इस अध्याय में हमें प्रशंसा के बारे में पहले ही चेतावनी दी जा चुकी है। सबसे पहले, हमें बताया गया कि अपनी प्रशंसा दूसरों को करने दो, स्वयं अपने ही मुँह से अपनी कोई प्रयास मत करो (नीति 27:2)। दूसरा, हमें यह भी बताया गया कि मित्रों की डांट और घाव, चापलूसी करने वाले शत्रुओं के दिखावटी प्रेम और चुम्बन से बेहतर हैं (नीति 27:5-6)। फिर हमें अत्यधिक प्रशंसा और चापलूसी से बचना सिखाया गया, क्योंकि यह आशीष नहीं, बल्कि अभिशाप के समान है (नीति 27:14)। क्या आप प्रशंसा के बारे में इनमें से प्रत्येक चेतावनियों को समझते हैं और उनका व्यावहारिक प्रयोंग करते हैं? क्या आप इसमें मौज़ूद खतरे और परीक्षा को समझते हैं?

गोलियत को मारने के बाद दाऊद अपनी महिमा का अध्याय खुद ही लिख सकता था। जनता की राय ने उसको सिंहासन पर विराजमान कर दिया होता; क्योंकि जो भी हो, उसका वह एक अभिषिक्त राजा हुआ (1 शमू 16:1-13)। परन्तु उसने शाऊल से कहा कि वह केवल शाऊल के दास, बेतलेहेम के यिशै का पुत्र है (1 शमू 17:58)। जब उसके सामने शाऊल की बेटियों से विवाह का प्रस्ताव रखा गया, तब दाऊद ने इस सम्मान को बहुत अधिक माना (1 शमू 18:17-24)। सार्वभौमिक प्रशंसा के बावजूद वह पूरी तरह से अनुग्रहपूर्ण रहा, और उसने योनातान का दिल जीत लिया (नीति 22:11)।

अधिकांश लोग दाऊद के समान नहीं हैं। शाऊल की ईर्ष्या ने उसका ही विनाश कर दिया क्योंकि इस्राएल ने उसकी प्रशंसा से अधिक दाऊद की प्रशंसा की (1 शमू 18:6-11)। अबशालोम ने अपने पूरे जीवनभर प्रशंसा सुनकर, प्रशंसा का इस्तेमाल इस्राएल में के कमज़ोर लोगों के मनों को चुराने के लिए किया (2 शमू 14:25; 15:1-6)। घमण्डी हेरोदेस सोर और सैदा के झूठ बोलनेवालों को फटकारने के लिए मुँह के बल गिर पड़ना चाहिए था (प्रेरितों के काम 12:20-23)। दियुत्रिफेस को कलीसिया में प्रधानता की चाहत के लिए यूहन्ना की कड़ी फटकार का सामना करना पड़ा (3 यूहन्ना 1:9)।

यूसुफ, दानिय्येल और प्रभु यीशु के प्रेरितों के सुनहरे चरित्र के बारे में लिखने में समय कम पड़ेगा। यूसुफ और दानिय्येल ने उच्च पदों पर रहते अपनी विनम्र और पवित्र कीं हुई आत्माओं को प्रभावित नहीं होने दिया। और प्रेरित, जिन्हें चंगाई और जी उठाने के काम करने की अद्भुत सामर्थ के कारण देवता माना गया था, उन्होंने इस तरह के किसी भी सम्मान को बड़ी कड़ाई से ठुकरा दिया (प्रेरितों 3:11-12; 10:25-26; 14:11-18; 28:1-6)।

बिशप के पद में जो गंभीरता है उसके कारण, बिशप के पद का उम्मीदवार एक नौसिखिया नहीं हो सकता है, ऐसा न हो कि इस पद का सार्वजनिक सम्मान उसके प्राण के लिए एक फंदा बन जाए (1 थिस्स 5:13; 1 तिमु 3:6)। शैतान अपने ऊँचे पद से फूला नहीं समाया और परमप्रधान के तुल्य बनने की आकांक्षा रखता था (यशा 14:9-15), इसलिए वह गर्व के खतरे और परमेश्वर द्वारा इसके लिए मिलनेवाले कठोर दण्ड का एक चिरस्थायी उदाहरण है।

बुद्धिमान मनुष्य अगुर, जिसका नाम नीतिवचन की इस पुस्तक में एक नबी के रूप में दर्ज है, उसने खुद को पशु सरीखा माना (नीति 30:1-3)। राजा सुलैमान ने परमेश्वर के साथ अपनी निजी बातचीत में अंगीकार किया कि वह राज्य करने की दृष्टि से एक बालक ही था (1 राजा 3:7)। और सबसे बड़ा प्रेरित अपने आप को सब पवित्र लोगों में सबसे छोटे से छोटा और पापियों में प्रधान समझता था (इफ़ि 3:8; 1 तीमु 1:15)।

प्रभु यीशु मसीह पर भी विचार करें, उसने महिमा के सिंहासन को छोड़ दिया और मनुष्यों के बीच एक दास बन गए (फिल 2:5-8)। उसने यह भी अनुरोध किया कि उसके अद्भुत चमत्कार विदेशों में न फैलाये जाए, क्योंकि उसे अपना प्रचार करने में कोई दिलचस्पी नहीं थी (मत्ती 12:15-21)। उसने अपने प्रेरितों से कहा कि वे प्रभु के रूप में उसके उदहारण का अनुसरण करने के बजाय सेवक होने के उसके उदाहरण का अनुसरण करें (मत्ती 20-25-28)।

उसने अपने प्रेरितों को धार्मिक उपाधियों की चापलूसी से बचने और भाइयों के रूप में संतुष्ट रहना भी सिखाया, जिसका उन्होंने पालन किया (मत्ती 23:5-12; 2 पतरस 3:15), रोमन कैथोलिकों और अधिकांश धार्मिक संगठनों जो उदात्त और दिखावटी उपाधियों के लिए भूखे हैं, इन के विपरीत एलीहू, जो युवा और बुद्धिमान व्यक्ति था, जिसने अय्यूब और उसके मित्रों की ग़लत विचारधारा को सुधारा, चापलूसी की उपाधियों से डरता था और उनसे घृणा करता था (अय्यूब 32:21-22)।

प्रिय पाठक, अपने आप को समय से पहले तैयार करो, ताकि जब प्रशंसा का घातक अमृत चढ़ाया जाए, तो आप विनम्रता और चतुराई से स्वर्ग की ओर ध्यान आकर्षित कर सकें, जहाँ से सभी आशिषें उतर आती हैं। आप उसके बिना कुछ भी नहीं हैं, और आपको उसे सारी महिमा देनी चाहिए। कोई भी ध्यान जो आप उसकी ओर नहीं लगाते हैं, उसे आप दूसरों की ओर लगाने के खतरे में हो सकते हैं ताकि वे आपको भटका सकें। सावधान!

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