नीतिवचन 27:2

तेरी प्रशंसा और लोग करें तो करें, परन्तु तू आप न करना; दूसरा तुझे सराहे तो सराहे, परन्तु तू अपनी सराहना न करना।

अपनी प्रशंसा खुद अपने मुँह से न करें। जितना हो सके इससे बचें। हालाँकि इसमें फंसना आसान है, लेकिन अपने बारे में खुद बातें करना या अपनी प्रशंसा खुद अपने मुँह से करना बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। ऐसी मानसिकता के चलते आप न तो परमेश्वर और न ही उन मनुष्यों की कृपा में बढ़ेंगे, जो आपकी प्रशंसा करना चाहते हैं।

अपनी नौकरी, अपने बिज़नेस, अपने स्वास्थ्य, अपने परिवार, अपने घर या अपनी किसी अन्य चीज़ के बारे में बातें न करें। दूसरों और उनकी बातों के बारे में सोचें और बातें करें। दूसरों को अपनी स्थिति, कठिनाइयों, क़ाबलियत, समृद्धि या सम्मान के बारे में बताने के बजाय उनके बारे में पूछताछ करें। जैसे बहुत अधिक मधु खाना व्यक्ति को बीमार कर देगा, वैसे ही आत्म-प्रचार या आत्म-प्रशंसा भी बीमार करने वाली होती है (नीतिवचन 25:27)।

यहाँ कृपालु और घिनौने लोगों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। एक घिनौनी स्त्री अपनी राय, अपना अनुभव, अपनी विशेषज्ञता और अपनी बुद्धि जो उसे लगता है कि उसके पास है, का दिखावा करने में माहिर होती है। लेकिन एक दयालु या कृपालु स्त्री कभी भी अपने बारे में बातें नहीं करती। वह हमेशा दूसरों के कल्याण के बारे में ईमानदारी से पूछताछ करती रहती है। आपकी प्रशंसा परमेश्वर की और से हो, तो ही यह मायने रखती है, आपकी प्रशंसा अपने ही मुँह से नहीं (2 कुरिन्थ 10:18)।

घिनौने लोगों को दुख होता है यदि आप उनकी पर्याप्त रूप से प्रशंसा नहीं करते हैं, उनके बारे में पर्याप्त पूछताछ नहीं करते हैं, और उन्हें ध्यान से नहीं सुनते हैं ताकि वे आपको उनके जीवन के बारे में बता सकें। यह अविश्वसनीय स्वार्थ थका देने वाला और विद्रोही है। लेकिन दयालु व्यक्ति, अपनी और अपनी चीज़ों की उपेक्षा करते हुए, हमेशा दूसरों के बारे में पूछताछ करते रहते हैं, हमेशा उनकी ध्यान देकर सुनते हैं, और हमेशा उनकी प्रशंसा करते हैं।

पौलुस ने इस मुद्दे को कुछ इस प्रकार रखा, “विरोध या झूठी बड़ाई के लिये कुछ न करो, पर दीनता से एक दूसरे को अपने से अच्छा समझो। 4हर एक अपने ही हित की नहीं, वरन् दूसरों के हित की भी चिन्ता करे” (फिलि 2:3-4)। फिर उसने मसीह यीशु का उदहारण देते हुए कहा कि कैसे उसने इस जगत के दुष्टों के हाथो मरने के लिए अपने को दीन और रिक्त किया और फिर कैसे परमेश्वर के द्वारा अंत में महान सम्मान पाकर ऊँचे पर महिमान्वित हुआ (फिलि 2:5-11)।

सच्चे प्रेम को 1 कुरिन्थ 13:4-7 में बड़ी सिद्धता से परिभाषित किया गया है, जहां पंद्रह अद्भुत वाक्यांश इस वरदान को परिभाषित करते हैं। उनमें से चार वाक्यांश इस नीतिवचन से संबंधित हैं: “प्रेम अपनी बड़ाई नहीं करता, और फूलता नहीं, वह अनरीति नहीं चलता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता।” अपनी प्रशंसा करना शेखी बघारना है; फूलता अभिमानी सोच है; अनरीति नहीं चलता का अर्थ कृपालु और विनम्र आचरण है; और अपनी भलाई नहीं चाहने का अर्थ है अपनी नहीं वरन दूसरों की चीज़ों में अधिक दिलचस्पी लेना।

यीशु ने सिखाया, ““जब कोई तुझे विवाह में बुलाए, तो मुख्य जगह में न बैठना, कहीं ऐसा न हो कि उसने तुझ से भी किसी बड़े को नेवता दिया हो, और जिसने तुझे और उसे दोनों को नेवता दिया है, आकर तुझ से कहे, ‘इसको जगह दे,’ और तब तुझे लज्जित होकर सबसे नीची जगह में बैठना पड़े। पर जब तू बुलाया जाए तो सबसे नीची जगह जा बैठ कि जब वह, जिसने तुझे नेवता दिया है आए, तो तुझ से कहे, ‘हे मित्र, आगे बढ़कर बैठ,’ तब तेरे साथ बैठनेवालों के सामने तेरी बड़ाई होगी।” (लूका 14:8-10; नीति 25:6-7)।

आत्म-प्रशंसा, या शेखी बघारना केवल तभी उचित है जब किसी पद या ख्रिश्चन सुसमाचार का बचाव करने की चरम स्थितियाँ उत्पन्न होती हैं। मूसा ने विद्रोही कोरह और इस्राएल के अधिकारीयों के खिलाफ अपना बचाव किया (गिनती 16:15)। जब इस्राएलियों ने अपने लिए राजा की माँग कीं तब शमूएल ने उन्हें दोषी ठहराने में खुद का बचाव किया (1 शमूएल 12:1-5), और पौलुस ने अपने प्रेरितिक पद की रक्षा के लिए कुरिन्थ के सामने बड़े पैमाने पर अपनी शेखी बघारी (2 कुरिन्थ 11:10-12; 12:11)। परन्तु अय्यूब अपनी प्रशंसा करने में गलत था, क्योंकि उसे इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी (अय्यूब 32:1-2)।

यह नीतिवचन अपने बायोडाटा या नौकरी के साक्षात्कार पर लागू नहीं होता है; नियोक्ताओं को आपकी योग्यताओं, शिक्षा और उपलब्धियों के बारे में जानना आवश्यक होता है। जब दाऊद ने राजा की सेवा में एक बड़ी नौकरी के लिए आवेदन किया, तो उसने अपने कारनामों के बारे में विस्तार से बताया (1 शमूएल 17:33-37)। एलीहू जानता था कि उसे परमेश्वर की महिमा के लिए अपने श्रेष्ठ ज्ञान के विषय में वृद्ध अय्यूब और उसके तीन दोस्तों को बताना ज़रूरी था (अय्यूब 32:6-14; 36:1-5)। दानिय्येल और उसके तीन दोस्तों का अपने साक्षात्कार में नबूकदनेस्सर को प्रभावित करना उचित ही था (दानिय्येल 1:17-21)।

अपने लिए अच्छा नाम कमाना एक महान लक्ष्य होना चाहिए, अगर उसे इसे सही उद्देश्यों के लिए कमाया जाए (नीतिवचन 22:1)। परन्तु अपनी बड़ाई मरना घृणित और लज्जाजनक कृत्य है। इस पाप से सुरक्षित रहने के लिए आपको यह देखकर खुद का आत्म-परिक्षण करने की आवश्यकता है कि दूसरों की आपके विषय में क्या धारणा और राय है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप सोचते हैं कि आप स्व-प्रवर्तक नहीं हैं, अगर दूसरे सोचते हैं कि आप हैं! और यह विशेष रूप से सच है, यदि प्रभु सोचता है कि आप हैं!

लोगों की प्रशंसा का पात्र होना एक बात है, लेकिन स्वयं की प्रशंसा करके इसे प्राप्त करने का प्रयास करना घिनौनी हरकत है। तीमुथियुस और दिमेत्रियुस की बड़ी प्रतिष्ठा हुई, और वे प्रशंसा के पात्र ठहरें (2 कुरिन्थ 8:18; 3 यूहन्ना 1:12)। लेकिन इन दोनों की एक विशेषता यह थी, और आप निश्चिंत हो सकते हैं, कि दोनों ने कभी भी अपनी प्रशंसा खुद नहीं की। आपको ऐसी महान प्रतिष्ठा की इच्छा करनी चाहिए, लेकिन दूसरों की प्रशंसा प्राप्त करने का एकमात्र सही तरीका है इसे अर्जित करना। यदि लोग आपकी प्रशंसा नहीं कर रहे हैं, तो इसका एक कारण है!

“अप्रत्यक्ष प्रशंसा” से बचें, जो आपकी क्षमताओं या उपलब्धियों के लिए परमेश्वर को श्रेय देने के कमजोर प्रयास हैं। इसमें ध्यान परमेश्वर से ज्यादा आप पर होता है। अमेरिकी खिलाड़ी इस बात के लिए मशहूर हैं, “मुझे इतनी क्षमताएं देने के लिए मैं परमेश्वर को धन्यवाद देना चाहता हूं!” मूल बात अप्रत्यक्ष आत्म-प्रशंसा है, जो न तो परमेश्वर की महिमा करती है और न ही मनुष्यों को प्रोत्साहित करती है।

क्या आप पत्राचार में यथासंभव “मैं” से बचना जानते हैं? क्या आपको आपकी नौकरी के शीर्षक या शैक्षिक शीर्षक से बुलाया जाना चाहिए, भले ही आपने अर्जित किया हो, जैसे कि डॉ. अलाना फलाना, या रेवरंट…..? यीशु और एलीहू ने ऐसे सार्वजनिक गौरव, विशेषकर धार्मिक उपाधियों के विरुद्ध चेतावनी दी (मत्ती 23:5-12; अय्यूब 32:21-22)। यदि सारी वाणी हृदय के विचारों से आती है, तो क्या आप अपने बारे में इतना सोचना छोड़ सकते हैं (मत्ती 12:34)?

क्या आप अपने बारे में बहुत ज़्यादा बात करते हैं? क्या आप दयालु हैं या घिनौने हैं? आप कैसे जान सकते हैं? आसान है! दूसरे आपके आसपास कितना रहना चाहते हैं? आपके कितने दोस्त हैं? लोग आपकी संगती की अपेक्षा करते हैं, या उपेक्षा करते हैं? यह तरीका आपको आहत कर सकता है, परंतु अचूक है। यदि आप अपने से कहीं अधिक दूसरों में सच्ची रुचि दिखाकर वास्तविक ख्रिश्चन धर्म दिखाते हैं, तो आपके आस-पास लोगों की भीड़ होगी।

माता-पिता, अपने बच्चों को अपने बारे में बात न करने की बुद्धिमत्ता और सद्गुण सिखाएं। जितना संभव हो सके उन्हें दूसरों के बारे में पूछताछ करने की कृपा सिखाएं। आप किसी भी शैक्षणिक पाठ्यक्रम में सर्वोच्च अंक प्राप्त करने की अपेक्षा परमेश्वर और मनुष्यों के सामने उनकी सफलता के लिए अधिक प्रयास करें। आप उन्हें आसानी से प्रश्न पूछने और दूसरों के बारे में जितना संभव हो उतना सीखने का कार्य दे सकते हैं।

परमेश्वर के धर्म में दो आज्ञाएँ हैं – परमेश्वर से प्रेम रख और अपने समान अपने पड़ोसी से प्रेम रख। यहाँ किस का ज़िक्र नहीं किया गया है? यहाँ आपका कोई ज़िक्र नहीं किया गया है! यदि आप दूसरों से वैसी ही मोहब्बत रखना सीख सकते हैं जितना आप खुद से रखते हैं, तो आप परमेश्वर और मनुष्यों के सामने महान होंगे। लेकिन यह पीढ़ी वास्तव में इतनी विकृत है कि लोग खुद से प्रेम रखने और आत्म-सम्मान के विनाशकारी पाखंड की शिक्षा देते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि वे स्वयं की प्रशंसा करते हैं!

यीशु ने कभी भी सड़कों पर अपनी आवाज़ नहीं उठाई, और उसने कभी दूसरों से उसकी प्रशंसा नहीं चाही, हालाँकि वह किसी भी मनुष्य से अधिक प्रशंसा के योग्य था (मत्ती 8:4; 12:19; 16:20)! यद्यपि वह परमेश्वर का पुत्र था, उसने आपके लिए एक आदर्श उदाहरण दिया। उसका जीवन पूरी तरह से परमेश्वर और दूसरों की सेवा के लिए समर्पित था, यही कारण है कि आपको हर समय अपनी वाणी और कार्यों पर नियंत्रण रखना चाहिए।

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