नीतिवचन 27:19
जैसे जल में मुख की परछाई मुख को प्रगट करती है, वैसे ही मनुष्य का मन मनुष्य को प्रगट करता है।
सब मनुष्यों के मन एक जैसे होते हैं। आपकी भावनाएँ, ज़रूरतें और प्रतिक्रियाएँ बाकी सब के जैसी होती हैं। अगर आप खुद को जान लेते हैं, तो आपको दूसरों को समझने में आसानी हो सकती है। अगर आप इन्सानी ज़रूरतों को जान लेते हैं, तो उससे आपको दूसरों की ज़रूरतें जानने में आसानी होगी। आप अपने आस-पास के लोगों को इतना ठीक ठीक जानते हैं जितना वे सोच भी नहीं सकते, और वे आपको इतना ठीक ठीक जानते हैं जितना आप सोच भी नहीं सकते।
जल एक प्राकृतिक दर्पण है। जल में देखने से हमें अपने चेहरे की छवि दिखाई देती है। पानी में झांककर देखने से इन्सान देख सकता है कि वह कैसा दिख रहा है, क्योंकि वह प्रतिबिंब काफी हद तक सटीक होता है। इंसानों के मन भी एक जैसे होते हैं, क्योंकि हमारे स्वभाव, भावनाएँ और कमजोरियां काफी हद तक एक जैसी होती हैं। हम अपने मन को जानकर दूसरे व्यक्ति के मन के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं, क्योंकि वे काफी हद तक एक जैसे होते हैं।
यहां एक उपमा है जो समझने में बिलकुल आसान है, अर्थात् ऐसी उपमा जो शब्द “जिस प्रकार” या “जैसा” को प्रयुक्त कर दो बातों के बीच तुलना करती हैं। जैसे कोई मनुष्य जल में अपना प्रतिबिम्ब देखक अपना चेहरा देख सकता है और उसकी विशेषताओं को जान सकता है, ठीक वैसे ही मनुष्य एक जैसे मन के माध्यम से दूसरें व्यक्तियों को जान और समझ सकता है। जीवन में आपके अनुभवों से आपको दूसरों की मदद करने का विवेक और समझ प्राप्त होनी चाहिए जब वे उन्हीं परिस्थितियों का सामना करते हैं जिनका आपने सामना किया होता है।
यद्यपि मनुष्य का मन अपने विवेक से स्वयं को उत्तर दे सकता है, वह आंतरिक ज्ञान इस नीतिवचन का पाठ नहीं है (नीतिवचन 14:10; 20:27; यूहन्ना 8:9; रोमियों 2:15)। यहां चुनी गई सादृश्यता और प्रतिबिम्बित सर्वनाम की कमी से संकेत मिलता है कि सुलैमान एक मनुष्य के मन की दूसरे मनुष्य के मन से समानता दिखाना चाहता है। इंसानों के मन एक जैसे होते हैं। इस ज्ञान को मान लें।
पक्षियों, जानवरों और मछलियों की विभिन्न प्रजातियों पर विचार करें। इनमें से प्रत्येक प्रजाति अद्वितीय है – कोई भी दो तोते, कुत्ते या बिल्लियाँ बिल्कुल एक जैसे नहीं हैं। नस्ल और व्यक्ति के आधार पर उनके आकार, रंग, स्वभाव और ताकत में थोड़ी भिन्नता होती है। एक जैसे जुड़वा बच्चों का मतलब है कि उनमें कम से कम भेदों के कारण उनका एक-दूसरे से अनोखा रिश्ता होता है।
लेकिन एक प्रजाति के भीतर, उन सभी की प्रकृति एक जैसी होती है। सभी तोते एक जैसे होते हैं – इस तरह आप जानते हैं कि वे तोते हैं! उनमें बाज का स्वभाव नहीं है, न ही उनमें शुतुरमुर्ग के लक्षण हैं। आप केवल एक तोते को अपने घर में पालते हैं तो आप उनके बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं। और यद्यपि आपके पास केवल एक मानव मन है, आप स्वयं को जानकर दूसरों के बारे में बहुत कुछ जान सकते हैं।
लोग शरीर के आकार, रंग, स्वभाव, बुद्धि और ताकत में भिन्नताएँ होती है। लेकिन सभी मनुष्यों का मन और मूल स्वभाव तब भी एक जैसा है। किसी भी मनुष्य में तोते, कुत्ते, बिल्ली या देवदूत जैसा स्वभाव नहीं है। वह एक इन्सान है, और एक इंसान का मन अन्य इन्सानों के मन जैसा होता है, और यही वह समानता है जो एक मनुष्य को वह आतंरिक शक्ति देती है जिससे वह खुद को दूसरे मनुष्य से जोड़ उसकी भावनाओं को समझ है।
किन्हीं दो व्यक्तियों के बीच स्वभाव की समानताएं भिन्न भिन्न शख्सियत द्वारा उत्पन्न भेदों से अधिक होती हैं। प्रत्येक बर्फ का टुकड़ा अलग-अलग होता है, लेकिन फिर भी सभी बर्फ के टुकड़े जमे हुए जलवाष्प ही होते हैं! यद्यपि अलग-अलग व्यक्ति अलग-अलग होते हैं, फिर भी उनका स्वभाव एक जैसा होता है। यद्यपि वे बौद्धिक क्षमता या शिक्षा में भिन्न हो, लेकिन जब बुनियादी मानवीय प्रतिक्रियाओं और सोचने के ढंग की बात आती है तो उनमें भिन्नताएं कम और समानताएं अधिक होती हैं।
परमेश्वर ने सभी मनुष्यों के मन एक जैसे बनाए (भजन 33:15), और सभी राष्ट्र और जातियाँ एक ही मानव रक्त से बनी हैं (प्रेरितों 17:26)। कुछ और सोचना इस नीतिवचन के पाठ को समझने से चूकना है। आदम से लेकर आपके पोते-पोतियों तक, मनुष्य हमेशा उसकी अपनी प्रतिमा में और उसकी समानता में अगली पीढ़ी को जन्म देता आया है (उत्पत्ति 5:3)। एक ही मन और स्वभाव एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक हस्तान्तरित होता है।
प्राकृतिक रूप से जन्में मनुष्यों के भ्रष्ट मन एक जैसे होते हैं – एक मनुष्य दूसरे मनुष्य जैसा ही होता है। वे सभी इस संसार की रीति और शैतान के निर्देश के अनुसार चलते हैं (इफि 2:1-3)। प्राकृतिक रूप से जन्में सब लोग स्वभाव ही से मूर्ख, सुख-विलासिता में पागल, ईर्ष्यालु और नफरती होते हैं (तीतुस 3:3)। ऐसा कोई नहीं जो परमेश्वर को समझता हो, उसे खोजता हो, या उसका भय मानता हो (रोमियों 3:9-18)। बाइबल में ऐसा लिखा है, “वे सब के सब भटक गए, वे सब भ्रष्ट हो गए; कोई सुकर्मी नहीं, एक भी नहीं” (भजन 14:3)।
जो व्यक्ति परमेश्वर से नया जन्म लेकर आध्यात्मिक मन पाता है, उसका मन भी दूसरे व्यक्ति की भावनाओं को समझता है। परमेश्वर से जन्मा प्रत्येक व्यक्ति अपने शरीर और आत्मा के बीच के भयानक संघर्ष को जानता है जिसका पौलुस रोमियों 7:14-24 में वर्णन करते हैं। वे सब जानते हैं कि कैसे पौलुस मसीह के साथ रहने के लिए इस दुनिया से प्रस्थान करने किन्तु उसी समय दूसरों से प्रेम करने और उनकी सेवा करने के लिए यहीं रहने के बीच संघर्ष कर रहे हैं (फिलि 1:23-24)।
परमेश्वर से नया जन्म पाएं हुएं उसके सब पुत्र विभिन्न प्रकार के भजनों से संबंधित हैं, जिसमें दाऊद ने प्रशंसा, प्रार्थना, संकट और आनन्द की आध्यात्मिक बातों को बिलकुल व्यक्तिगत रीति से लिखा। उनकी परिस्थितियों और इच्छाओं का वर्णन करने वाले उनके बहुत ही व्यक्तिगत शब्द उनके मन के गहरे विचारों को इतनी निकटता और सटीकता से संबोधित करते हैं, जितना लोग खुद भी नहीं कर सकते।
यहाँ बुद्धि का पाठ क्या है? दूसरों को देखकर आप खुद को बेहतर जान सकते हैं, क्योंकि आप अच्छाई (नए मनुष्य की), बुराई (पुराने मनुष्य की), और कुरूपता (नए और पुराने मनुष्यत्व के बीच का भारी संघर्ष) देखते हो। यह केवल मानवीय अहंकार है जो सोचता है कि आप अलग हैं – दूसरों से बेहतर हैं। एक बुद्धिमान व्यक्ति याद रखेगा, “जैसे जल में मुख की परछाई मुख को प्रगट करती है, वैसे ही मनुष्य का मन मनुष्य को प्रगट करता है।” जो मनुष्य बुद्धिमान है वह दरिद्रता और ग़रीबी से झुझ रहें लोगों के प्रति कृपालु होगा, क्योंकि वह जानता है कि यह उसकी अपनी सच्ची संपत्ति है (रोमियों 12:16)।
बुद्धि का पाठ क्या है? आप खुद को जानकर दूसरों को बेहतर तरीके से जान सकते हैं। क्योंकि आप अच्छा (पवित्र आत्मा में शांति और आनंद), बुरा (परीक्षाएं और पाप का अपराध और दर्द), और कुरूपता (दोहरे दिमागवाली अस्थिरता) को जानते हैं। आप दूसरों का बोझ उठाने में मदद कर सकते हैं, और जो आनन्दित आप उनके साथ आनन्दित हो सकते हैं और जो रो रहें हैं आप उनके साथ रो सकते हैं (गलातियों 6:2; रोमियों 12:15)। आप अपने मन में उस तरह की सहानुभूति रख सकते हैं जिस तरह से परमेश्वर आपसे सहानुभूति रखता है (इब्रानियों 13:3)।
बुद्धि का एक और पाठ क्या है? आप यह जान सकते हैं कि दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, अर्थात् इस बात से कि आप अपने साथ दूसरों से कैसा व्यवहार चाहते हैं। क्योंकि आप अच्छे (वे कर्म जो सराहनीय हैं), बुरे (वे कर्म जो घृणास्पद हैं), और कुरूपता (बेईमान आचरण का दर्द) को जानते हैं। बाइबल का सुनहरा नियम कहता है कि आप दूसरों के साथ वैसा ही आचरण रखें जैसा आप चाहते हैं कि दूसरें आपके साथ रखें (निर्गमन 23:19; लूका 6:31)।
क्या यहाँ और भी बुद्धि और ज्ञान है? हर बार जब आप सामाजिक और राजनीतिक भाषण के झांसे में आ जाते हैं, तो आप दूसरों और खुद को सच्चे लाभ से वंचित कर देते हैं। आपके मन की वास्तविकता ही दूसरों के मनों को एकमात्र सहायता प्रदान कर सकती है, और केवल उनके मन की वास्तविकता ही वास्तव में आपके मन से जुड़ सकती है। ज्यदातर लोग मूर्खतापूर्ण और सतही सामान्यताओं में कितना समय बर्बाद करते हैं!
इस पाठ को अपने जीवन में लागू करें। आप दूसरों के कार्यों को आपकी कल्पना से अधिक उनसे बेहतर समझ सकते हैं, क्योंकि वे वही करते हैं जो आपने भी किया है। आपको उन्हें आसानी से माफ कर देना चाहिए (सभोपदेशक 7:21-22)।
आप दूसरों की पीड़ा के प्रति भी सहानुभूति रख सकते हैं, क्योंकि आप उनके दर्द को जानते हैं, और यही सच्ची मित्रता और सच्चे चर्चों में अपेक्षित प्रेम है (रोमियों 12:15; 1 कुरिन्थ 12:26)।
आप संकट के समय अपने लिए दूसरों से सलाह और सांत्वना प्राप्त कर सकते हैं और वही आप दूसरों को भी उनके संकट के समय दे सकते हैं, क्योंकि आप जानते हैं कि जब ऐसी समान स्थिति आती हैं तो आपको क्या चाहते थे, क्या चाहिए था और क्या मिला था, इसलिए अब आपको इसका कर्ज़ चुकाना चाहिए (2 कुरिन्थ 1:3-4)।
आप सच्ची सहानुभूति के साथ एक-दूसरे के लिए प्रार्थना कर सकते हैं, क्योंकि आप जिन विलापों से गुज़रें हैं उनके लिए आप परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं कि जैसे उसने आपको छुड़ाया, वैसे वह उन्हें भी छुडाएं, ताकि वे अनुग्रह के सिंहासन से सामने याचना करने वाले अकेले न हों।
कोई भी ईमानदार व्यक्ति यह नहीं कह सकता, “मेरे जैसी पीड़ा किसी ने नहीं सही” या “मैं जिन हालातों से गुज़रा, कोई नहीं गुज़रा होगा।” परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से कह दिया है कि प्रत्येक व्यक्ति की परीक्षाएं एक जैसी होती है, अद्वितीय नहीं (1 कुरिन्थ 10:13)। वे अलग-अलग होने की तुलना में एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य में अधिक समान हैं। अपने ऊँचे घोड़े से उतरो, और अपने आप को परमेश्वर और सभी मनुष्यों के सामने विनम्र करो। आपसे पहले अन्य लोग पहले भी वहां रह चूंके हैं। आप अज्ञात क्षेत्र में नहीं हैं।
यीशु मसीह को सब बातों में उसी प्रकार परखा गया जैसे आपको परखा जाता है, और इन बातों से गुज़रने के कारण वह दयालु, विश्वासयोग्य, मददगार और कृपालु महायाजक बना है (इब्रानियों 2:17-18; 4:15-16; 5:1-2)। फिर भी उसने कभी पाप नहीं किया (इब्रानियों 4:15; 7:26)! जबकि वह दूसरों को जो परीक्षाओं में है क्षमा की अपनी प्रतिज्ञा से सांत्वना देता है, आप जो पाप के दुःख, अपराध और शर्म को जानते हैं, उनके प्रति आपको विनम्र भूमिकाएँ निभानी हैं जिन्हें आपको पश्चाताप की ओर ले आना है (गलातियों 6:2; इब्रानियों 13:3; 1 पतरस 3:8-) 9)।
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