नीतिवचन 25:8
झगड़ा करने में जल्दी न करना नहीं तो अन्त में जब तेरा पड़ोसी तेरा मुँह काला करे तब तू क्या कर सकेगा?
अपने गुस्से को शांत करों! जल्दबाजी से कुछ हासिल नहीं होता। और जल्दबाजी आपको शर्मसार कर सकती है। अगर आपका किसी से कोई विवाद हैं तो अपना क्रोध व्यक्त करने में जल्दबाजी न करें। कार्रवाई करने में जल्दबाजी न करें। बैठ जाएँ और अपना दिमाग ठंडा करें, तथा शांत हो जाएँ। मामले के प्रत्येक पहलू पर सावधानी से चिंतन करें, अन्यथा आप तथ्यों को समझने से चूक जाएंगे और आपका शत्रु आपकी बेइज्जती करेगा।
पाप से भरे इस संसार में झगड़ा और कलह जीवन के अंग हैं। उनसे शक्तिशाली भावनाएं जागकर वे मन को बेकाबू कर देती हैं, जिनसे मनुष्य तुरंत हरकत में आ जाते हैं और जो नहीं करना चाहिए वह कर बैठते हैं। जब झगड़ा भड़कता है, लोग एक स्थिति को तुरंत सुधारना चाहते हैं, लेकिन झगड़े में ऐसी जल्दबाजी मनुष्यों को आसानी से उनके प्रतिद्वंद्वी की समझदार प्रतिक्रिया से अवगत कराती है। मानव-हृदय और जल्दबाजी करने की उसकी प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखकर उसपर प्रतिरोध लगाना आवश्यक होता है (नीतिवचन 16:32)।
भावुक प्रतिक्रिया आमतौर पर एक खराब प्रतिक्रिया होती है। किसी भी कार्य की योजना बनाने से पहले अपनी भावना और आवेग पर लगाम लगाना हमेश बेहतर है। अक्सर जब भावनाएँ उग्र हो होती हैं तब दिमाग आमतौर पर सोचना-समझना बंद कर देता है। इससे पहले कि आप कुछ कर बैठें या कोई नापाक योजना बनाएं, पहले अपनी भावनाओं को शान्त करें। “हे मेरे प्रिय भाइयो, यह बात तुम जान लो : हर एक मनुष्य सुनने के लिये तत्पर और बोलने में धीर और क्रोध में धीमा हो, क्योंकि मनुष्य का क्रोध परमेश्वर के धर्म का निर्वाह नहीं कर सकता” (याकूब 1:19-20)।
बहुत से सलाहकारों की सम्मति से युद्ध युद्ध टल जाते हैं (नीतिवचन 20:18; 24:6)। बुद्धिमान होना क्या ही धन्य है! और परामर्शदाता कोई ऐरा-गैरा नहीं बन सकता; उसे बुद्धिमान, अनुभवी और शांतचित्तवाला होना अवश्य है। परामर्शदाता तीसरे पक्ष का वह मनुष्य होना चाहिए जो समस्या का भागी न हो और जो निष्पक्षता और बुद्धिमानी से मामले पर मंथन कर सके। उसे युद्ध में अनुभवी होना चाहिए, और वह किसी एक पक्ष का घनिष्ठ मित्र नहीं होना चाहिए। मित्रता आँखों को अंधा कर देती है और कानों को बंद कर देती है, इसलिए ऐसे सलाहकारों की तलाश करें जिनका आपके साथ कोई भावनात्मक रिश्ता न हो।
अगर आप पूरी तरह से सतर्क नहीं रहेंगे, तो छोटी-मोटी अनबन भी बड़ी तेज़ी से बड़ा झगड़ा बन जाती हैं (नीतिवचन 17:14)। उचित विचार-विमर्श के बिना मूर्खता से प्रतिक्रिया देना मूढ़ता की निशानी है, और ऐसी प्रतिक्रिया आमतौर पर सजा के योग्य होती है (नीतिवचन 18:6)। जैसे दूध के मथने से मक्खन निकलता है, वैसे ही क्रोध के बल से और भी झगड़े उत्पन्न होंगे (नीतिवचन 30:33)। इसलिए शान्त हो जाएँ।
राजा संयम से युद्ध में जाते हैं। यीशु ने कहा, “या कौन ऐसा राजा है जो दूसरे राजा से युद्ध करने जाता हो, और पहले बैठकर विचार न कर ले कि जो बीस हज़ार लेकर मुझ पर चढ़ा आता है, क्या मैं दस हज़ार लेकर उसका सामना कर सकता हूँ, या नहीं? 32नहीं तो उसके दूर रहते ही वह दूतों को भेजकर मिलाप करना चाहेगा ” (लूका 14:31-32)।
यदि आप ने कभी भी किसी झगड़े में पड़ने से पहले चिंतन किया है, और परमेश्वर का भय माननेवाला और ज्ञान से प्रेम करनेवाला मन रखते हैं, तो आप जिस दृष्टिकोण के साथ बिस्तर पर गए थे, उससे बहुत अलग दृष्टिकोण के साथ आप सुबह उठेंगे। यह बुद्धिमानी है। कुछ समय बीत जाने से, आपकी भावनाएं शांत हो जाती हैं, अपने दिमाग से मूर्खतापूर्ण भावनाओं को मिटा देने का आपको समय मिल जाता है, और पवित्र आत्मा आपकी अगुवाई करेगा।
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