नीतिवचन 25:28

जिसकी आत्मा वश में नहीं वह ऐसे नगर के समान है जिसकी शहरपनाह घेराव करके तोड़ दी गई हो।

आपकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि आप अपनी आत्मा को वश में रखते हैं या नहीं। महान पुरुष अपनी आत्माओं को वश में रखते हैं। वे प्रतिक्रिया देने या भावना में बहकर अति अनावश्यक प्रतिक्रिया देने की परीक्षा का विरोध करते हैं। वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखते हैं और भलाई के लिए उनका ठीक ठीक संचालन करते हैं। जब वे किसी अकस्मात घटनाओं के विषय में सुनते हैं, तब उनके प्रति अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने में और उनका संचालन करने में अपनी भावनाओं और आवेग को नियंत्रण में रखते हैं।

आप मुसीबतों से कितने सुरक्षित हैं? यदि आप अपनी आत्मा वश में नहीं रखते हैं, तो आप कमज़ोर पड़कर ऐसी बातें कहेंगे या ऐसे काम कर बैठेंगे जिनकी आपको भारी क़ीमत चुकानी पड़ सकती हैं। शायद आप पहले ही ऐसे कामों की की क़ीमत चूका चुकें हैं। आप अपनी भावनाओं को वश में रखना और उनका ठीक ठीक संचालन करना सीखें यह आपके लिए बुद्धिमानीपूर्ण होगा ताकि आप केवल वही करें जो सही है।

आपकी आत्मा आपका आंतरिक मनुष्यत्व है, जहाँ से आपके सब कामों का स्रोत है। जब आप अपनी आत्मा वश में नहीं रखते हैं, तो आप असुरक्षित हो जाते हैं और हर तरह की मूर्खता कर बैठने और अपने ऊपर संकट लाने की संभावनाओं को मौका देते हैं। ऐसा मनुष्य जो अपनी आत्मा वश में नहीं रखता और जो उसे सदाचार, सत्य और ज्ञान के मार्ग में रखने के लिए परिश्रम नहीं करता, वह प्राचीन समय में के एक ऐसे नगर के समान है जिसकी कोई शहरपनाह नहीं होती थी, और जिस कारण वह लूटमार करनेवालों के लिए भेद्य बन जाता था।

आपकी आत्मा में आपकी प्रेम-भावना, भूख और मनोभाव शामिल हैं। एक बुद्धिमान और कुलीन व्यक्ति अपने विवेक और दिमाग से अपनी आत्मा वश में रखता है। वह अपनी महत्वाकांक्षा, क्रोध, वासना, अभिमान या प्रतिशोध को फट पड़ने से सुरक्षित रखने के लिए अपनी आत्मा को आत्म-निषेध की जंजीरों से बांधकर रखता है। वह सम्मान, विनम्रता, धार्मिकता और सद्गुण को दृढ़ता से थामे रहने की मानसिक प्रतिबद्धता के द्वारा इसका संचालन करता है। वह अपने विचारों, अपनी इच्छाओं, अपने झुकावों, अपने क्रोध पर वश रखता है और इन सब भावनाओं को एक अनुशासित क्रम में रखता है।

मूर्ख अपनी आत्मा को अपने कार्यों पर नियंत्रण करने देता है। वह अपनी आत्मा के आवेगों का विरोध नहीं करता; वह अपनी आत्मा को उसका मार्गदर्शन करने देता है; वह चरित्र-निर्माण और पवित्रता के लिए अपना संघर्ष छोड़ देता है। वह उन चीजों को नहीं कर पाता जो उसे करनी चाहिए; वह उन चीजों को करने से खुद को रोक नहीं पाता है जो उसे नहीं करनी चाहिए। ऐसे मनुष्य अक्सर अन्य अपराधों और पापों में पड़ने के साथ साथ क्रोध, नियमित मूर्खता, हमेशा उदास-मिज़ाज, या काम में हमेशा टालमटोल करने वाले होते हैं। वे कभी बड़े नहीं होते, क्योंकि वे भ्रष्ट हृदय की बचकानी भावनाओं के वश में होते हैं।

सुलैमान के समय में, शहर मज़बूत किलेबंदी और फाटकों पर निर्भर हुआ करता था, जिसके चारों ओर बड़ी दीवारें होती थीं, ताकि गुरिल्लाओं या विदेशी सेनाओं के विनाशकारी दलों को घुसपैठ करने से रोका जा सके। यदि ये किलेबंदी, फाटक, या मीनारों को तोड़ दिया जाता और दीवारों को ढहा दिया जाता, तो शहर पूरी तरह से किसी भी दुश्मन के आक्रमण के लिए, जो इसे लूटना, नष्ट करना या जीतना चाहता था, खुला हो जाता था। यदि कोई शहर सुरक्षा की ऐसी व्यवस्था में पर्याप्त निवेश नहीं करता था, तो उस पर आसानी से कब्जा कर लिया जा सकता था।

जी व्यक्ति अपनी आत्मा वश में नहीं रखता वह एक असुरक्षित शहर के समान खुला और कमज़ोर बन जाता है। उसकी आत्मा को अगर थोडा-सा भी उकसा दो तो वह पाप करने के लिए तुरन्त तत्पर हो जाता है, और उसकी आत्मा किसी भी वास्तविक भलाई के लिए अपनी शक्ति का उपयोग नहीं कर पाती। वह असहाय, निराश, हमेशा अपने शत्रुओं – मूर्खता, वासना, और पाप – की दया पर निर्भर हो जाता है – जिनमें कोई ठहराव नज़र नहीं आता, बल्कि लगातार उसके जीवन को बर्बादी ही की ओर ले जाती हैं। परन्तु जो मनुष्य अपनी आत्मा पर प्रभुता करता है, वह उस मनुष्य से, जो किसी नगर को अकेले ही जीत लेता है, बड़ा है (नीतिवचन 16:32)।

प्रिय पाठक, आपकी आत्मा को कौन-सी बात परीक्षा में डालती है? क्या आप क्रोध करने में उतावली करते हैं, जो मूर्ख की पक्की निशानी है? क्या आपको लगातार बातें करना आवश्यक जान पड़ता है, जो मूर्ख की एक और निशानी है? आर्थिक मामलों, क्या आप आवेग में आकर व्यर्थ वस्तुओं पर रुपए उड़ा देते हैं? या आप एक जमाखोरी करनेवाले कंजूस हैं जो कभी किसी ज़रूरतमंद साथी-विश्वासी की मदद नहीं करता? क्या आप अविवेकपूर्ण जल्दबाजी को आशावाद के रूप में उचित ठहराते हैं? क्या आप अवसाद के भय को आत्म-प्रतिबिंब कहते हैं? आपके पास कौन-सी आत्मा है? क्या आप उसे वश में रखते हैं? शहर-पनाह को ऊँचा उठाओ! मीनारें खड़ी करों! दरवाजें बंद करो! दीवारें बनाओ! अपनी आत्मा पर शासन करो!

क्या आप बहुत ज्यादा बातें करते हैं? या आप उदास-उदास और चुप हैं? क्या आप आर्थिक फैसलें आवेग में आकर लेते हैं? क्या आप सभी की आलोचना करते-फिरते हैं? क्या आप अक्सर हँसी-मजाक करते और चुटकुलें सुनाते हैं? क्या आप आसानी से शिकायतें करते हैं? क्या आप जरूरत से ज्यादा खाते हैं? क्या आप प्रतिदिन पढ़ने और प्रार्थना करने में विफल रहते हैं? क्या आप निराशा से अपना विनाश होने दे रहे हैं? क्या डर आपको अपने कर्तव्यों से दूर रखता है?

क्या आप अधिकारिओं का अनादर करते हैं, विशेषकर सरकारी अफसरों का? क्या आप अपने परिवार या दोस्तों से दूर रहने और उनसे बचने के लिए जाने जाते हैं? क्या आप आसानी से क्षमा कर देते हैं, या क्षमा करना कठिन है? क्या आप अपने विवाहित बच्चे को हर बात में सुझाव देकर दबंग माँ बनना बंद कर सकती हैं? क्या आप धनवानों को ठट्ठों में उड़ाते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि आपको उन से अधिक ज्ञान है (सभोपदेशक 10:20)?

आपका जीवन तब तक लूटता और बर्बाद होता रहेगा, जब तक आप अपनी आत्मा को अपने वश में नहीं करते और खुद की सुरक्षा नहीं करते। आप कभी उन्नति नहीं कर पाएँगे। सब आपको छोड़ देंगे, क्योंकि एक बेलगाम आत्मा परमेश्वर या मनुष्य के लिए कोई भलाई उत्पन्न नहीं करती है। आप जानबूझकर किए जानेवाले और अनजाने में किए जानेवाले दोनों ही तरह के पापों में डूब जाएंगे। शहर-पनाह को ऊँचा उठाओ! मीनारें खड़ी करों! दरवाजें बंद करो! दीवारें बनाओ! अपनी आत्मा पर शासन करो!

सबसे बड़ी लड़ाई जो आप को लड़नी है, वह आपकी अपनी आत्मा के खिलाफ है। आपका सबसे बड़ा शत्रु आपके अंदर का भ्रष्ट और स्वार्थी इंसान है। वही है जो आपको सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाता है और आपको जीवन में सफल होने से दूर रखता है। सबसे शर्मनाक नुकसान वह है जब एक मनुष्य अपनी ही अनियंत्रित आत्मा का शिकार होकर जीता और मरता है। और सबसे महान और पुरस्कृत जीत आपकी अपनी आत्मा पर जीत है।

राजा शाऊल ने अपनी ईर्ष्यालु आत्मा को वश में नहीं रखा, जिसने अपने पुत्र को भी मारने का प्रयास किया (1 शमूएल 20:27-34)। दाऊद ने अपनी वासनापूर्ण आत्मा को वश में नहीं रखा, जो उसे एक दुस्साहसी व्यभिचार और हत्या की ओर ले गई (2 शमूएल 11:1-27)। और शिमशोन, अब तक का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति, सुंदर दलीला के लिए बेकाबू हो गया (न्यायियों 16:4-21)। प्रिय पाठक, ये जघन्य अपराध आपको अपने आप पर आत्मविश्वासी रखने वाला न बनाने पाए, क्योंकि कई छोटे पाप भी जीवन को बर्बाद कर सकते हैं।

अपनी आत्मा की कमजोरियों को पहचानें – जो हर मनुष्य में होती हैं। कौन-से पाप आपको सबसे ज्यादा परीक्षा में डालते हैं? किस वजह से आप सबसे जल्दी मूर्खता में गिर जाते हैं? अपनी कमज़ोरियों को प्रभु के सामने स्वीकार करो। उन्हें अपने परिवार या दोस्तों के सामने कबूल करो। जब वे आपकी सुरक्षा की किसी दीवार में दरार देखते हैं तो उन्हें बताने के लिए कहें। अपनी आत्मा को वश में करो, और जो जो कुछ वह मूर्खता चाहती है उसे चूर-चूर कर दो, और जिस बुद्धि से वह बचती है वही करो। आज से ही शुरुवात करो!

किलेबंदी या मीनार के ढहने का पहला संकेत पाते ही, राजकुमार यीशु की सामर्थी शक्ति के लिए प्रार्थना करो। अपनी ताकत पर भरोसा मत करो; आपको उसकी सामर्थ की ज़रूरत है। आप आराम नहीं कर सकते, क्योंकि जब तक आप अपनी आत्मा को वश में नहीं करेंगे, तब तक वह आप पर अपनी हुकूमत चलाएगी। प्रभु यीशु मसीह के अनुग्रह से आप उसे अपने क़ाबू में ला सकते हैं। एक मिनट की भी देरी क्यों करें? अभी उसके पास जाओ! एक सुशासित और पवित्र नगर की शहरपनाह का निर्माण करें!

अपने बच्चों को आत्म-अनुशासन सिखाएं, जिसे बाइबल में संयम कहा गया है। इससे वे परमेश्वर और मनुष्यों के सामने उनकी स्कुल-कॉलेज की शिक्षा की तुलना में अधिक बुद्धिमान और ज्ञानी साबित होंगे। यह उन्हें वैसा ही वीर योद्धा बना देगा जैसा कोई व्यक्ति अकेले ही किसी नगर को जीत लेता है (नीतिवचन 16:32)। जब वे बहुत छोटे ही होते हैं तभी से आप उन्हें वे छोटी-छोटी चीजे न देकर जिन्हें वे चाहते हैं, इस अनुशासन की धीरे-धीरे शुरूवात कर सकते हैं। इस वर्तमान संसार को यह सब करने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि वे खाना-पीना, खरीदारी, काम, बकवाद, क्रोध, निद्रा आदि बातों में तत्काल संतुष्टि पाने में विश्वास करते हैं।

यीशु मसीह ने अपनी आत्मा को वश में रखा और अपने क्रूस पर चढ़ाए जाने की उस आनेवाली घटना के ख़याल से अत्यन्त अधीर और व्याकुल होने के बावजूद भी परमेश्वर की इच्छा के प्रति समर्पित रहा (मरकुस 14:33)। हालाँकि कई बार शैतान द्वारा उसकी परीक्षा ली गई, उसने कभी भी शैतान के प्रस्ताओं पर विचार नहीं किया (मत्ती 4:1-11)। परन्तु इतना ही नहीं, वह उन्हें अनुग्रह और सामर्थ भी प्रदान करेगा जो उससे मांगते हैं (2 कुरिन्थियों 12:9-10; फिल 4:13)।

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