नीतिवचन 25:19
दुख में अविश्वस्त मनुष्य का भरोसा रखना टूटे दांत और उखड़े हुए पाओं के समान है। (केजेवी)
एक टूटा हुआ दांत या एक उखड़ा हुआ पांव पीड़ादायक, बेकार, और चिढ़ दिलानेवाला होता है। आप न तो चबा सकते हैं और न ही चल सकते हैं जैसा कि आपको चाहिए। दौड़ने का तो प्रश्न ही नहीं उठता! एक अविश्वस्त व्यक्ति पर भरोसा करना, जब आप को उसकी वास्तविक आवश्यकता है, उतना की पीड़ादायक, बेकार, और चिढ़ दिलानेवाला होता है। क्या आपके पास विश्वासयोग्य मित्र हैं? क्या आप एक भरोसेमंद मित्र हैं? क्या आप जानते हैं कि उन्हें कैसे पहचानें और कैसे मित्रता को कायम रखें?
यहाँ एक नीतिवचन है जिस में छिपे हुए सबक हैं। यह रूपक, अर्थात् शब्द “समान” को प्रयुक्त करके की गई तुलना, एक अविश्वस्त व्यक्ति के दर्द और संकट की तुलना एक टूटे हुए दांत या जोड़ से उखड़े हुए पांव से करता है। यहां पर सिखाएं गए सबक, बिना अभिव्यक्तिपूर्ण ढंग की घोषणा के, अन्तर्निहित या सांकेतिक हैं, क्योंकि नीतिवचन बुद्धिमान के कहे गए गूढ़ या अस्पष्ट कथन हैं जिन्हें व्याख्या की ज़रूरत होती है (नीति.1:8; यूहन्ना 16:29)।
विश्वासयोग्य मनुष्यों को ढूंढ पाना कठिन है, भले ही कई मनुष्य कहेंगे कि वे विश्वासयोग्य हैं (नीति.20:6; भजन 12:1)। अच्छे समयों में साथ रहनेवाले मित्र, और अस्थाई ईमानदारी, डरे हुए मनों, और स्वार्थपूर्ण दिलचस्पी रखनेवाले मनुष्य आम हैं। सच्चे मित्र विपत्ति के लिए जन्मे हैं, और वे मुश्किल के समय में कभी निराश नहीं करेंगे, परन्तु उन्हें ढूंढ पाना और मित्र बनाए रखना कठिन है (नीति.17:17; 18:24; 27:10)।
इस नीतिवचन में तीन विषय हैं जो सात सबकों की ओर ले जाते हैं। ऐसे अविश्वासयोग्य मनुष्य हैं जो उनके कर्तव्यों को पूरा नहीं करते। ऐसे मुश्किल के समय होते हैं, जब सभी मनुष्यों के चरित्र की परीक्षा की जाती है। और ऐसे भी हैं जो अविवेकी रीति से उनका भरोसा एक अविश्वस्त व्यक्ति पर रखते हैं। और ऐसे संयोजन के नतीजे निराशा, असफलता, और संकट के रूप में सामने आते हैं।
वे सात सबक कौन-कौन से हैं? (1) अविश्वस्त मनुष्य तकलीफ और परेशानी का कारण बनता है। (2) वे उन पर भरोसा रखने वालों के परिश्रमों और प्रतिष्ठाओं को बरबाद कर देते हैं। (3) जितना भी सम्भव हो उन से बचना चाहिए। (4) संकट के समय प्रमाणित करते हैं कि एक व्यक्ति विश्वासयोग्य है या नहीं। (5) बुद्धिमान मनुष्य उनका भरोसा विश्वासयोग्य मनुष्यों में ही रखते हैं। (6) विश्वासयोग्य मनुष्य प्रभु के भय के द्वारा पहचाने जाते हैं। (7) क्या आप प्रभु का भय रखते हुए एक विश्वासयोग्य मनुष्य और दूसरों के भरोसे के योग्य हैं?
प्रभु का भय वह मापदण्ड है जिसके द्वारा विश्वासयोग्य मनुष्य को ढूंढा जाता है। ये उस प्रकार के मनुष्य हैं जिन के विषय में परमेश्वर ने मूसा और दाऊद को बताया था कि वे अच्छे शासक बनेंगे (निर्ग.18:21; 2 शमू.23:3)। और यहोशापात ने ऐसे पुरुषों को न्यायी होने के लिए नियुक्त किया (2 इति.19:5-10)। एक मनुष्य जो परमेश्वर का भय मानता है, वह लोकप्रियता, पारिश्रमिक, या व्यक्तिगत लाभ पर ध्यान दिए बिना वही करेगा जो उचित है।
बाइबल अविश्वस्त मनुष्यों का वर्णन करती है। अय्यूब के तीन मित्र निकम्मे शान्तिदाता थे (अय्यूब 16:1-5), और उसकी पत्नी उन से भी बद्तर थी (अय्यूब 2:9)। दाऊद अपने भतीजे योआब या उसके पुत्रों पर भरोसा नहीं कर सका। यीशु को यहूदा ने पकडवा दिया, पतरस ने उसका इन्कार किया, और उसके सभी चेलों ने त्याग दिया। जब मूसा परमेश्वर के पर्वत पर था, हारून ने भयंकर रूप से समझौता किया (निर्ग.32:1-6, 21-28), और यूहन्ना मरकुस ने पौलुस का उसकी पहली सुसमाचार-प्रचार की यात्रा में साथ छोड़ दिया (प्रेरित.13:13; 15:36-41)।
सच्चे मित्र एक बड़ी आशीष हैं, और मुश्किल के समयों में वे शानदार रीति से उनकी भूमिका पूरी करते हैं (नीति.17:17; सभो. 4:9-12)। मनुष्यों का कोई भी समाज केवल उतना ही विशाल है जितनी कि इसकी दुर्बलतम कड़ी। इसलिए, एक समूह ने अपना भरोसा एक अविश्वस्त मनुष्य में नहीं रखना चाहिए। केवल योग्य मनुष्यों को ही अगुवे, शिक्षक, या शासक बनाया जाना चाहिए (1 तीमु.3:1-13)। एक व्यक्ति या समुदाय की महानता अविश्वस्त मनुष्यों में भरोसा रखने से बचकर रहने पर निर्भर होती है।
बुद्धिमान मनुष्य नीतिवचन की पुस्तक का अध्ययन करते और विश्वासयोग्य मनुष्यों, मूर्खों, निन्दकों और शत्रुओं को पहचानना सीखते हैं। वे प्रयत्नशील रहते हैं कि मूर्खों से बचकर रहें जो उन के लिए दुख का कारण बनेंगे और मुश्किल के समय में उन्हें नीचा दिखायेंगे (नीति.9:6, 13, 20; 14:7; भजन.101:3-8)। वे मित्र के रूप में केवल उन्हें चुनते हैं जो परमेश्वर का भय मानते और उसकी आज्ञाओं को मानते हैं (भजन.101:6; 119:63, 79, 115; तीतुस 1:8)।
क्या आप स्वयँ एक विश्वासयोग्य मनुष्य हैं? क्या आप अपने सभी वायदे पूरे करते हैं? क्या आप सदैव नियत समय से पूर्व तैयार रहते हैं? क्या आप बढ़ा-चढ़ाकर बोलने से बचते हैं? क्या आप अपने कर्तव्य पूरे करते हैं चाहे वे कितने भी कठिन या खर्चीले हों। क्या आप के शब्द सोने के समान अच्छे हैं? क्या आप कामों को पूरा करते हैं, तब भी जब आप उन में एकाग्रता व आनन्द खो देते हैं? जब एक मित्र को आप की ज़रूरत होती है, क्या सहायता करने के लिए आप वहाँ होते हैं, भले ही वे मांगते नहीं हैं? क्या आप उन समस्याओं से बच निकलते हैं जिन में मेहनत की ज़रूरत होती है?
क्या आप बिलों का भुगतान समय पर करते हैं? क्या आप पूर्व-सूचना देते हैं जैसे ही आप जान लेते हैं कि आप किसी ज़िम्मेदारी को निभा नहीं सकते? क्या आप उन छोटी छोटी बातों को स्मरण रखते हैं जिन्हें करने के लिए आप सहमत हुए थे। क्या आप ऐसे कामों की सूची बनाते हैं यदि आप की स्मरणशक्ति कमज़ोर या जीवन व्यस्त है? क्या विश्वासयोग्यता आपके लिए मित्रवत् होने से अधिक महत्वपूर्ण है? यदि आप बातूनी हैं, क्या आप स्वयँ को उन वायदों से बचाकर रखते हैं जो आप पूरा नहीं कर सकते या नहीं करेंगे? क्या आप प्रत्येक कार्य को उचित रीति से करते और इसे दूसरों की सन्तुष्टि तक समाप्त करते हैं?
आपको सबसे अधिक विश्वासयोग्य मित्र यीशु मसीह की कलीसिया में मिलेंगे, क्योंकि वहाँ आप उन्हें पायेंगे जो प्रभु का भय मानते, उसकी आज्ञाओं का पालन करते, और पवित्र आत्मा के द्वारा चुनाव करते हैं। बन्धन मात्र मित्रता या परिवार नहीं है, बल्कि मसीह का लहू है। वहाँ आप उन्हें पाते हैं जिन पर आप भरोसा कर सकते हैं, और जो आप के हित में काम करेंगे (इफि.4:16; 1 थिस्स.5:14; इब्रा.3:12-13)।
किसी भी पुरुष या स्त्री के लिए केवल एक वास्तविक विश्वासयोग्य मित्र है, स्वयँ प्रभु! वह संकट में अति सहज से मिलनेवाला सहायक है (भजन.46:1)। “मेरे माता-पिता ने तो मुझे छोड़ दिया है, परन्तु यहोवा मुझे सम्भाल लेगा” (भजन.27:10)। “इसलिए आओ, हम अनुग्रह के सिंहासन के निकट हियाव बान्धकर चलें, कि हम पर दया हो, और वह अनुग्रह पाएँ जो आवश्यकता के समय हमारी सहायता करें” (इब्रा.4:16)। “यहोवा की शरण लेना, मनुष्य पर भरोसा रखने से उत्तम है” (भजन.118:8)।
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