नीतिवचन 24:9

मूर्खता का विचार भी पाप है, और ठट्ठा करनेवाले से मनुष्य घृणा करते हैं।

यहाँ बुद्धि के दो नियम हैं। पहला, मूर्खतापूर्ण विचार परमेश्वर की दृष्टि में पाप हैं। मनुष्य सोचते हैं कि उनकी कल्पनाएँ उनकी अपनी हैं, परन्तु वे भूल जाते हैं कि ऐसे विचार परमेश्वर के विरुद्ध पाप हैं, जो उन सब को देखता है। दूसरा, करनेवाले व्यक्ति से, जो ताड़ना और उपदेशकों का तिरस्कार करता है, भले मनुष्य घृणा करते हैं, क्योंकि वह बहुत झगड़ा खड़ा करता है, और उसे दूर कर देने से ही आनन्द और शान्ति मिलती है (नीतिवचन 22:10)।

ये दोनों खंड आपस में किस प्रकार संबंधित हैं? बुद्धि आलसपूर्ण हठ करनेवाले मूर्ख की पहुँच से इतने ऊँचे पर है कि वह उसे पा नहीं सकता, इसलिए उसके पास दूसरों को देने के लिए कुछ भी मूल्यवान बात नहीं है (नीतिवचन 24:7)। परन्तु जो मनुष्य आगे बढ़कर बुराई की कल्पना करता है, वह केवल मूर्ख ही नहीं, अपितु दुष्ट भी है (नीतिवचन 24:8)। मूर्खता का विचार करना और उसकी योजना बनाना पाप है, परन्तु अधिकार और शिक्षा का तिरस्कार करना और भी बुरा है, इसलिए ठट्ठा करनेवालों से अधिकांश लोग घृणा करते हैं।

फरीसियों की दृष्टि में, बुरे विचारों से कोई फर्क नहीं पड़ता, जब तक कि व्यक्ति वास्तविक पाप नहीं करता, और इस प्रकार उन्होंने पाखंड को बढ़ावा दिया। उनके लिए, यदि वास्तविक हत्या या वास्तविक व्यभिचार से बचा जाता है, तो अपने मन में किसी व्यक्ति से घृणा करना या दूसरे की पत्नी के लिए वासना रखना ठीक था (मत्ती 5:21,27)। परन्तु यीशु ने कहा कि अनुचित क्रोध या दूसरी स्त्री पर वासना से भरी दृष्टि रखना भी उसकी दृष्टि में हत्या और व्यभिचार है (मत्ती 5:22,28)। वह पवित्र प्रभु परमेश्वर है। उसके सामने थरथराओ, यहाँ तक कि जब आप अपने मन में गुप्त विचारों को आने देते हैं तब भी।

मूर्खता वह हर प्रकार का आचरण है जिसमें परमेश्वर या बुद्धि की कोई परवाह नहीं कीं जाती, जो कि पाप है (नीतिवचन 19:3; 22:15; भजन 14:1)। यहां तक कि मूर्खतापूर्ण बातों – गंदी, तुच्छ, या ठट्ठापूर्ण बातें – की भी निंदा की गई हैं, और परमेश्वर इसके लिए इस जगत का न्याय करेगा (इफिसियों 5:3-7)। परमेश्वर को मूर्खता से घृणा है। वह जानता है कि मनुष्य का मन उसके चरित्र और आचरण का स्रोत है, इसलिए वह मनों को परखता है (मत्ती 12:34-35; 15:18-20)।

यौन कल्पनाएँ करना एक स्वाभाविक और सामान्य हैं, परन्तु परमेश्वर उनकी निन्दा करता है। यौनाचार के पाप मूर्खता है (उत्पत्ति 34:7; व्यवस्था 22:21; 2 शमूएल 13:12), और ऐसी मूर्खता के विचार करना पाप है। अय्यूब ने कहा कि वह किसी कुँवारी पर आँखें नहीं लगाएगा (अय्यूब 31:1), और सुलैमान ने चेतावनी दी कि पराई स्त्रियों की लालसा अपने मन में भी न करना (नीतिवचन 6:25)। परमेश्वर मनुष्य के चाल चलन पर ध्यान करता है, जिसमें यौन सम्बन्ध भी शामिल है (नीतिवचन 5:21)।

ईर्ष्या, घृणा और अभिमान भी बड़े लोकप्रिय विचार हैं। पुरुषों और स्त्रियों को अपने मनों में दूसरों को तुच्छ समझना और खुद को ऊँचा उठाना अच्छा लगता है। वास्तव में, ईर्ष्या, घृणा और घमण्ड के अधिकतर पाप हृदय तक ही सीमित रहते हैं (याकूब 3:14-16)। लेकिन प्रभु परमेश्वर इन बुरे और मूर्खतापूर्ण विचारों को शैतानी हत्या और विद्रोह कहकर उनकी निंदा करता है। हे दुचित्तों, अपने मन को शुद्ध करो (याकूब 4:8)।

एक ठट्ठा करनेवाला दूसरों के लिए पीड़ा और एक समस्या है। ताड़ना और शिक्षा का उनका अहंकापूर्ण इनकार उन्हें शिक्षा देना असंभव बना देता है (नीतिवचन 9:7-8)। शिक्षकों और विरोधियों के प्रति उनका घमण्ड भरा द्वेष मेलमिलाप को असम्भव बना देता है (नीतिवचन 22:10)। उनसे बचना या उन्हें भगा देना अवश्य है । लोगों का उनसे घृणा करना स्वाभाविक और सही है, क्योंकि वे किसी भी अधिकारी के विरुद्ध निरंतर संघर्ष करते हैं और उनकी परेशानी का कारण बनते हैं। वे मूर्ख से भी बदतर हैं, क्योंकि वे अपनी अज्ञानता पर घमण्ड करते हैं (नीतिवचन 26:12)।

पाठक, यहाँ बुद्धि के दो विषय हैं। पहला, सबसे बढ़कर अपने मन की रखवाली करो, क्योंकि पाप का आरम्भ मन के मूर्खता के विचारों से होता है (नीतिवचन 4:23; याकूब 1:13-16)। प्रार्थना के द्वारा अपने मन और विचारों की जाँच करो ताकि वहाँ कोई बुराई प्रकट हो सके (भजन 139:23-24)। दूसरा, ठट्ठा करनेवाला बनने से बचने के लिए शिक्षा और डाँट को प्रिय जानो। पाने को इस महान परमेश्वर, उसके वचन और उसके नियुक्त शिक्षकों के सामने दीन बनो।

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