नीतिवचन 24:7
बुद्धि मूर्ख के लिये अति उंची है, वह फाटक पर अपना मुंह नहीं खोलता।
बुद्धि एक अद्भुत और सुन्दर चीज़ है, और प्रत्येक व्यक्ति को इसका पीछा करना चाहिए (नीतिवचन 4:5-7)। बुद्धि रूपी स्त्री उन भोले-भाले लोगों को बुद्धि देना चाहती है जो उसकी पुकार को सुनकर उसे ग्रहण करेंगे (नीतिवचन 9:1-6)। लेकिन ज्यादातर मनुष्य मूर्ख हैं – वे अपनी मूर्खतापूर्ण सोच को लेकर इतने आश्वस्त हैं कि वे बुद्धि के सही मूल्य को समझना नहीं चाहते- और वे अपने दयनीय जीवन में इतने आलसी और आराम की ज़िन्दगी जी रहें हैं कि वे बुद्धि को प्राप्त करने के लिए कोई आवश्यक प्रयास नहीं करते।
बुद्धि की प्राप्ति के लिए अवश्य यह है कि आप खुद को कुछ भी न समझे – अर्थात् यह स्वीकार करने के लिए कि आप गलत हैं, आपको नम्र होना ज़रूरी है। इसके लिए साहस की आवश्यकता है – अर्थात् आज की लोकप्रिय भ्रमपूर्ण विचारधाराओं से बाहर निकलकर सोचने के लिए। उसे पाने के लिए सुधार करना आवश्यक होता है – अर्थात् अपनी आदतों और प्रवृत्तियों को बदलने की। मूर्ख इन शर्तों को पूरा नहीं कर सकते। इन सुधारों को करने के लिए उनमें कोई इच्छा नहीं है (नीतिवचन 17:16); उनकी आँखें और कल्पनाएँ इधर-उधर भटकती रहती हैं (नीतिवचन 17:24)। उन्हें सिर्फ़ अपने विचारों से प्रेम है (नीतिवचन 18:2)।
उपदेशक सुलैमान के अलावा, इस दुनिया में आए हर एक उपदेशक ने मूर्खों को बुद्धि से मिलते देखा है। बुद्धि ठीक उनके सिर के ऊपर से निकल जाती है। बुद्धि उनकी समझ से बिलकुल बाहर है। वे इसे पहचानते ही नहीं; उन्हें उसके प्रति कोई लगाव नहीं है; और यकीनन उनमें उसे थामे रहने की कोई मंशा नहीं है। किसी भी उपदेश, व्याख्यान या किसी व्यक्ति द्वारा निजी उपदेश मिलने के कुछ ही मिनटों के भीतर, यह देखा जा सकता है कि उनके दिमाग में कुछ भी नहीं गया है।
अपनी भावनाओं पर क़ाबू रखना, डांट-फटकार सुनना, मूर्ख मित्रों की संगती तोड़ना, दूसरों से सुधार की इच्छा करना, विनम्रता से सीखना, दुनियादारी को नकारना, परमेश्वर से प्रार्थना करना और उसके वचन का अध्ययन करना ये सब विचार मूर्ख को डराने वाले और बोझिल करने वाले होते हैं। इसलिए वह इन सब चीजों को शुरू करने से पहले ही हार मान लेता है। इसीलिए वह मूर्ख है और वह हमेशा मूर्ख ही रहेगा। प्रत्येक पाठक को अपने हृदय की जाँच करें कि वह इन कसौटियों पर कहाँ उतरता है।
आज हर जवान किसी कम्पनी का सीईओ बनना चाहता है, हर क्लर्क अध्यक्ष बनना चाहता है, और हर सैनिक जनरल बनना चाहता है। लेकिन वे ऐसे पदों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक क्षमताओं और कार्योंनितियों को नहीं समझते हैं, न ही वे उन पदों की जिम्मेदारियों को समझ सकते हैं। वे केवल महिमा, वेतन, विशेषाधिकार, वर्दी आदि देखते हैं। उनका मानना है कि वे भी उतने ही सम्मान के पात्र हैं जितना कोई और, लेकिन वे इसका 0.1 प्रतिशत भी हासिल नहीं कर सकते और न ही करेंगे। वे सभा में अपनी राय देना चाहते हैं, अपने विचार सबके सामने रखना चाहते हैं, और सोचते हैं कि जैसा बाकी सब बुद्धिमानों को सुना जाता है उन्हें भी उसी ही उत्सुकता से सुना जाना चाहिए, लेकिन कोई उनकी बात नहीं सुनेगा।
एक मूर्ख का दृष्टिकोण केवल क्षैतिज रूप से, उसकी आदतों, विचारों, भावनाओं और अनुभव के स्तर पर देखता है। वह यह महसूस करने के लिए अपने सिर के ऊपर से कुछ नहीं देख पाता कि बाइबल के परमेश्वर ने मनुष्यों के लिए जीवन जीने के लिए एक अलग मार्ग चिन्हित किया है। यह उसके लिए अति ऊँचा और समझ के बाहर है। वह खुद से ही बहुत अधिक प्रेम करता है, और वह दूसरों की राय को भी बहुत अधिक महत्व देता है। वह हमेशा मूर्ख ही रहेगा।
भला एक ऐसा व्यक्ति कैसे बुद्धिमान हो सकता है, जब उसका पेट ही उसका ईश्वर हो? अधिकांश लोग खेल, परिवार, कार, शौक, व्यवसाय या मौजमस्ती से ज्यादा कुछ नहीं सोच पाते। वे कभी भी बुद्धिमान नहीं होंगे, क्योंकि ये तुच्छ बातें चीजों को समझने की उनकी सोच को विकृत कर देती हैं और उनका ध्यान भटका देती हैं। अपने बच्चों में मोहग्रस्त माता-पिता उन्हें सही ढंग से प्रशिक्षित करने में असमर्थ रहते हैं। पैसा कमाने के जुनून में रहने वाले लोग चीजों को परख नहीं पाते। विलासिता का प्रेमी असल जीवन और परिश्रम की आवश्यकता के बारे में भ्रमपूर्ण सोच रखता है।
ठट्ठा करने वालों को बुद्धि प्राप्त नहीं हो सकती, परन्तु समझदार मनुष्यों के लिए उसे पाना आसान है (नीतिवचन 14:6)। क्यों? क्योंकि ठट्ठा करने वाले की अभिमानी आत्म-इच्छा उसे अंधा कर देती है (नीतिवचन 26:12; भजन 10:4-5)। सुधार से इंकार करना उसकी सतत मूर्खता, शर्मिंदगी और परेशानी की गारंटी देता है (नीतिवचन 9:7-8; 13:1; 15:12)। परन्तु समझदार व्यक्ति सुधार और शिक्षा का मूल्य जानता है, क्योंकि वह जानता है कि उसे दोनों की आवश्यकता है।
प्राचीन संस्कृति में व्यापारिक और व्यक्तिगत विवादों को शहर के फाटक पर हल किएँ जाते थें (नीतिवचन 22:22; 31:23; व्यवस्था 16:18; 21:18-21; रूत 4:1-12)। इसमें नगर परिषद के लोग, कानूनी सलाहकार और कानून के विशेषज्ञ मौजूद रहते थें। वहां न्यायाधीशों और तीसरे पक्ष के मध्यस्थों द्वारा विवादों का निपटारा किया जाता था। वहाँ नगर के बुद्धिमान लोग बैठते थे। वहाँ ईश्वरीय बुद्धि का अत्यधिक सम्मान किया जाता था।
मूर्खों को नगर के फाटक के पास भी भटकने नहीं दिया जाता था, क्योंकि वे साधारण मामलों में भी ठीक से निर्णय नहीं कर सकते थे, इस कारण उनका और उनकी राय का इन्कार किया जाता था। जिन विवादों में निर्णय की आवश्यकता होती है, उनमें मूर्खों को नजरअंदाज किया जाना चाहिए, क्योंकि उनके पास देने के लिए कुछ भी नहीं है। उनके पास विवादों या दुविधाओं को सुलझाने की बुद्धि या समझ नहीं होती है। आपने उन्हें देखा है। उनके समान मत बनो।
पाठक! क्या कभी किसी मसले के समाधान के लिए आपकी राय मांगी जाती है? या आपने अतीत में सही निर्णय और समझ की कमी साबित करके खुद को अयोग्य साबित कर दिया है? क्या आपने इस नीतिवचन के मूल तर्क के बारे में भी अपनी अज्ञानता दिखाई है? क्या सोचना और बोलना आपके लिए इतना कठिन है कि हर कोई आपकी राय को नजरअंदाज कर देता है? तो फिर बुद्धि की ख़ोज करें! वह मिल सकती है।
बुद्धि कठिन नहीं है। यदि आप उसकी ख़ोज करते हैं, उसके लिए प्रार्थना करते हैं और उसे पाने के लिए परिश्रम करते हैं, तो वह आपको मिल जायेगी। अगर इन कुछ सरल शर्तों को पूरा करते हैं, तो परमेश्वर और बुद्धि रूपी स्त्री आपको बुद्धि देंगे। आपके पास यह उतनी ही आसानी से हो सकती है जितनी आसानी से सुलैमान ने इसे प्राप्त कर लिया था (1 राजा 3:5; याकूब 1:5)। लेकिन क्या आप अपने मूर्खतापूर्ण मार्गों को त्यागने और केवल परमेश्वर और बुद्धि पर भरोसा करने को तैयार हैं (नीतिवचन 3:5-6; 9:6; 18:1; भजन 119:128)? अधिकांश ऐसा नहीं करेंगे।
बुद्धि तेज़ दिमाग से प्राप्त नहीं होती है। परमेश्वर का धन्यवाद हो कि तेज़ दिमागवालें कुछ प्रतिभाशाली लोग दुनिया के सबसे बड़े मूर्खों में से कुछ हैं। न ही बुद्धि शिक्षा से प्राप्त होती है, क्योंकि उसे विज्ञान की कक्षा में नहीं सीखा जा सकता है। यह केवल परमेश्वर का भय मानने और उसके अनुग्रह, उसकी कृपा और उसके वचन के माध्यम से प्राप्त की जाती है, जिसकी आज की आधुनिक शिक्षा प्रणाली में अनुमति नहीं है।
अय्यूब महान बुद्धि और प्रतिष्ठावाला मनुष्य था (अय्यूब 29:7-25)। परमेश्वर ने शैतान के सामने उसके बारे में बड़ी बड़ी बाते कीं। क्या आप अपने परिवार, चर्च और समुदाय में ऐसे अशिषित व्यक्ति हैं? परमेश्वर के वचन के सामने स्वयं को नम्र करें और बुद्धि को गले लगाएँ (भजन 19:7-14; 119:46,98-100,104,113,128,130; यशायाह 8:20; 2 तीमु 3:16-17; 2 पतरस 1:19-21)। वह बहुमूल्य बुद्धि जिसे दुनिया के विचारकों ने कभी नहीं चखा, वह आपका इंतजार कर रही है। उसे अपना लें। उसे नगर के फाटक, अर्थात् सभा में ले जाएँ और सत्पुरुषों को भ्रम और संकट से बचाएँ।
और अपनी शिक्षा में, याद रखें कि पवित्र बाइबल में पापों से अद्भुत उद्धार के विषय में समस्त बुद्धि और ज्ञान मसीह यीशु में समाहित है (2 तीमु 3:15), जिसके बिना आप झूठे शिक्षकों की चतुराई से, उन के भ्रम की युक्तियों के और उपदेश के हर एक झोंके से उछाले और इधर–उधर घुमाए से बच नहीं सकते ( 2 तीमु 4:1-4)।
यीशु में बुद्धि और ज्ञान के सारे भण्डार छिपे हुए हैं (कुलुस्सियों 2:3)। वह मात्र बारह वर्ष का था जब वह व्यवस्था के जानकारों को जवाब दे सकता था, और उसने बाद में कई बार उन्हें भ्रमित किया। वह बुद्धि और डील-डौल में, और परमेश्वर और मनुष्यों के अनुग्रह में बढ़ता गया (लूका 2:52)। क्या आप बढ़ रहें हैं?
एक घटना में बाप-दादाओं की मलकीयत के एक मामले में न्याय करने के लिए भी यीशु से राय ली गई थी (लूका 12:13)। स्वर्ग में और पृथ्वी पर उनका बुद्धि और करुणा का संयोजन अद्वितीय है (इब्रानियों 4:12-16)। और वह शीघ्र ही अपने महान सिंहासन पर सब स्वर्गदूतों और सब मनुष्यों का न्याय करने अपने न्याय-सिंहासन पर बैठेगा। क्या आपका जीवन उनकी बुद्धिमान शिक्षाओं को प्रतिबिंबित करता है?
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