नीतिवचन 24:18

कहीं ऐसा न हो कि यहोवा यह देखकर अप्रसन्न हो, और अपना क्रोध उस पर से हटा ले।

परमेश्वर देखता है कि आप अपने शत्रुओं के साथ कैसा आचरण करते हैं। अगर आप उनके साथ बुरा होने पर खुश होते हैं, तो वह उनकी सहायता करेगा और संभवतः आपको ही दण्ड देगा। परमेश्वर अपने बच्चों के शत्रुओं को खुद दंड देकर उनकी रक्षा करता है, लेकिन अगर वह आपको इसके बारे में खुश होते हुए देखता है, तो वह उस दंड को हटा लेगा।

यीशु मसीह ने अपने शत्रुओं से प्रेम करने की शिक्षा दीं (मत्ती 5:43-48), लेकिन यह नीति बहुत पहले से सिखाई जा चुकीं है, जिसमें इस नीतिवचन के साथ साथ एक और नीतिवचन शामिल है (निर्गमन 23:4-5; अय्यूब 31:29-30; नीतिवचन 25:21-22)। अगर आपका जीवन परमेश्वर को प्रसन्न करता है, तो वह आपके शत्रुओं से अपने तरीके से निपटेगा (नीतिवचन 16:7; रोमियों 12:19-21)। लेकिन अगर आप उनकी विपत्ति पर खुश होते हैं, तो वह अप्रसन्न होगा और आप पर अपना दण्ड ले आएगा।

सुलैमान ने परमेश्वर की प्रेरणा से अपने पुत्र और अपने राज्य के नागरिकों को बड़ें दिलवाले – सोच, मुँह का वचन और कर्म में महान और गुणी बनाने के लिए नीतिवचन लिखे। ऐसी महानता की एक कुंजी यह है : आपको अपने व्यक्तिगत शत्रुओं के जीवन में विपत्तियां आएँ ऐसा नहीं सोचना चाहिए। इसके लिए सर्वोच्च श्रेणी के चरित्र की आवश्यकता होती है, जो केवल असाधारण पुरुषों, सच्चे राजकुमारों में होता है।

इसकी पूरी समझ पाने के लिए, यह देखना ज़रूरी है कि यह नीतिवचन एक पूरे नीतिवचन का दूसरा भाग है। नीतिवचन का पहला भाग कुछ इस तरह है : “जब तेरा शत्रु गिर जाए तब तू आनन्दित न हो, और जब वह ठोकर खाए, तब तेरा मन मगन न हो” (नीतिवचन 24:17)। फिर दूसरा भाग कुछ इस प्रकार है, “कहीं ऐसा न हो कि यहोवा यह देखकर अप्रसन्न हो, और अपना क्रोध उस पर से हटा ले” (नीतिवचन 24:18)।

दाऊद ने सुलैमान को अपने शत्रुओं से प्रेम करने का यह अद्भुत चरित्र लक्षण सिखाया। “झूठे साक्षी खड़े होते हैं; और जो बात मैं नहीं जानता, वही मुझ से पूछते हैं। वे मुझ से भलाई के बदले बुराई करते हैं, यहाँ तक कि मेरा प्राण ऊब जाता है। जब वे रोगी थे तब तो मैं टाट पहिने रहा, और उपवास कर करके दु:ख उठाता रहा; और मेरी प्रार्थना का फल मेरी गोद में लौट आया। मैं ऐसी भावना रखता था कि मानो वे मेरे संगी या भाई हैं; जैसा कोई माता के लिये विलाप करता हो, वैसा ही मैं ने शोक का पहिरावा पहिने हुए सिर झुकाकर शोक किया। परन्तु जब मैं लँगड़ाने लगा तब वे लोग आनन्दित होकर इकट्ठे हुए” (भजन 35:11-15)।

राजा शाऊल कई वर्षों तक दाऊद का शत्रु रहा। उसने कई मौकों पर दाऊद को मारने की कोशिश की और उसके जीवन में बहुत बड़ी मुसीबतें खड़ी कीं। फिर भी दाऊद ने उसकी यथासंभव सेवा करने की कोशिश की। उसने शाऊल के क्रोध के विस्फोटों और उसे मारने के प्रयासों को पूरी तरह से क्षमा कर दिया। दाऊद ने कई बार शाऊल की जान बचाई जबकि वह उसे आसानी से मार सकता था, और जब शाऊल अंततः युद्ध के मैदान में मर गया तो वह फूट-फूट कर रोया और उसकी प्रशंसा की (2 शमूएल 1:17-27)।

लेकिन परमेश्वर स्वयं हर दिन महान उदाहरण है। कैसे? वह अपने दोस्तों और अपने शत्रुओं दोनों पर धूप और वर्षा भेजता है। आप अपने जीवन से परमेश्वर का चरित्र तब दिखाते हैं जब आप अपने शत्रुओं से प्रेम करना और उनके प्रति दयालुता दिखाना सीखते हैं, जो स्वभाव से मनुष्य के बुरे दिल के बिल्कुल विपरीत है। ऐसे विचार और कार्य साबित करते हैं कि आप परमेश्वर की सच्ची संतान हैं (मत्ती 5:43-48)।

परमेश्वर आपके शत्रुओं की विपत्तियों पर खुशी मनाने की स्वार्थी क्रूरता से घृणा करता है (नीतिवचन 17:5; जकर्याह 1:15)। पुराने नियम का ईश्वर-प्रेरित इतिहास ऐसे कई मामलों का ब्योरा देता है जहाँ राष्ट्रों को भी दूसरे राष्ट्रों की विपत्तियों में आग डालने का काम करने या उनकी खुशी मनाने के लिए दंडित किया गया (भजन 137:7-9; न्यायियों 16:25-30; मीका 7:10; यशायाह 10:5-15; विलाप 4:21-22; यहेजकेल 26:2-3; हब 1:5-11; आदि)।

फिर भी, परमेश्वर के शत्रुओं से घृणा करना अलग बात है। यदि आप व्यक्तिगत रूप से शामिल नहीं हैं, तो आपको परमेश्वर के शत्रुओं से घृणा करनी चाहिए। दाऊद ने परमेश्वर के शत्रुओं के बारे में यह लिखा, “हे यहोवा, क्या मैं तेरे बैरियों से बैर न रखूँ, और तेरे विरोधियों से रूठ न जाऊँ? हाँ, मैं उनसे पूर्ण बैर रखता हूँ; मैं उनको अपना शत्रु समझता हूँ” (भजन 139:21-22)। महान राजा यहोशापात को भविष्यवक्ता द्वारा फटकार लगाई गई थी क्योंकि उसने परमेश्वर के शत्रुओं से प्रेम रखा था (2 इतिहास 19:1-3)।

आप इस नीतिवचन के अनुसार बड़प्पन और सद्गुण को कैसे मापते हैं? क्या आप दाऊद के समान परमेश्वर के मन के अनुसार व्यक्ति हैं? क्या आप अपने शत्रुओं को संकट में देखकर दुखी होते हैं? आप किस मायने में नासरत के यीशु और कलीसिया के सेवक स्तिफनुस के समान हैं? यीशु ने अपने क्रूस पर चढ़ाने वालों के लिए प्रार्थना की, “हे पिता, इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये जानते नहीं कि क्या कर रहे हैं” (लूका 23:34)। स्तिफनुस ने अपने पत्थर मारने वालों के लिए प्रार्थना की, “हे प्रभु, यह पाप उन पर मत लगा” (प्रेरितों के काम 7:60)।

यदि आप स्वर्ग के धन्य परमेश्वर को प्रसन्न कर सकें ऐसा धर्मी और बुद्धिमान बनना चाहते हैं, तो आपका कर्तव्य और विशेषाधिकार स्पष्ट है (रोमियों 12:17-21)। अपने शत्रुओं को पहचानें और उनके लिए इसी समय प्रार्थना करें! अपने मन में यह संकल्प लें कि अगर आप उन्हें ज़रूरतमंद पाते हैं तो आप उनकी मदद करने के लिए हर संभव प्रयास करेंगे। अपने मन में संकल्प लें कि अगर आप उनसे मिलते हैं तो आप उनका गर्मजोशी से स्वागत करेंगे। यह परमेश्वर का चरित्र है, और यह उन सभी का चरित्र है जो सच में उसके बच्चे हैं।

नीतिवचन और उनकी व्याख्या हर दिन मुफ़्त पाएँ। चैनल खोलें, “फ़ॉलो करें” पर टैप करें और नोटिफ़िकेशन की घंटी चालू करें।