नीतिवचन 24:17
जब तेरा बैरी गिर पड़े तो आनन्दित मत हो, और जब वह ठोकर खाए तेरा मन मगन न होने पाए : (केजेवी)
यहाँ चरित्र की एक कठिन जाँच है। यहाँ एक मज़बूत प्रमाण है कि आप परमेश्वर की एक सन्तान है या नहीं। यहाँ भक्ति और बुद्धि की वास्तविक जाँच-पड़ताल है। यहाँ आपके विश्वास के लिए एक चुनौती है, फिर चाहे आप इस चुनौती को ले या नहीं। अभी सोचें। क्या आप आनंदित होते हैं जब आपके शत्रुओं के साथ कुछ बुरी घटनाएं होती हैं?
परमेश्वर आप को आदेश देता है कि आप अपने व्यक्तिगत शत्रुओं से प्रेम रखें, और ये एक सच्चे मसीही के प्रमुख प्रमाणों में से एक है। ऐसे प्रेम में तब दुखी होना शामिल है जब आपके शत्रु का पतन होता है या जब वह ठोकर खाकर गिरता है। जब उस पर विपत्ति आ पड़ती है तब यदि आप मगन होते हैं या आनन्दित होते हैं, आप ने पाप किया है। इस नीतिवचन में आपके जीवन में आत्मिक विजय के लिए प्रभु परमेश्वर एक सरल नियम प्रस्तुत करता है। आगे पढ़ते रहे।
यह नीतिवचन अपने आप में पूर्ण नहीं है, क्योंकि अगला वचन अपने शत्रुओं की विपत्तिओं पर आनन्दित होने के परिणामों को समझाता है, “कहीं ऐसा न हो कि यहोवा यह देखकर अप्रसन्न हो और अपना क्रोध उस पर से हटा ले” (नीति.24:18)। परमेश्वर आपका पक्ष छोड़कर आपके शत्रु का पक्ष ले सकता है, यदि वह देख ले की आप अपने शत्रु की जिन्दगी में पीड़ा या संकट को देखकर अपनी आँखें सेक रहे हो। सावधान!
जब बुरी चीजें आपके शत्रु के साथ घटित होती हैं तब यदि आप मगन होते हैं, प्रभु आपके स्वार्थी और प्रतिशोधी उल्लास को देखेगा; वह आपके दुष्ट मनोभाव पर क्रोधित होगा; और वह आपके शत्रु के दण्ड को उठा सकता है (नीति.24:18)। आप अपने शत्रु से भी अधिक नीचे गिर चुके होंगे, लगभग हत्यारे के हृदय के विचारों तक। एक पवित्र और धार्मिक परमेश्वर इसे सहन नहीं कर सकता।
प्रतिशोध पाप है; पलटा लेना तो परमेश्वर का है (रोमि.12:17-21)। परन्तु यह नीतिवचन इतना सरल नहीं है। उपदेशक आप को मात्र इसलिए बच निकलने नहीं देगा क्योंकि आप ने अपने शत्रु को कोई शारीरिक चोट नहीं पहुंचानी चाही। परमेश्वर की बुद्धि उस से अधिक व्यापक है (भजन.119:96)। सुलैमान आप के गुप्त द्वेषपूर्ण विचारों के पीछे है जो आप के शत्रुओं को दर्द या कष्ट में देखकर आनंदित होते हैं (नीति.24:9)।
क्या आप अपने विचारों में मगन होते हैं जब आप का शत्रु गिरता है? क्या आप आनंदित होते हैं -अपने गुप्त हृदय में- जब आपका शत्रु ठोकर खाता है? क्या आप उसके दुर्भाग्य के विषय में सुनकर, प्रतिशोध और सुख का एक बोध महसूस करते हैं? ये वो पाप हैं जिनकी सुलैमान ने निन्दा की। ओह, प्रिय मसीही, परमेश्वर के वचन का महिमामय प्रकाश गहराई से चमकता है – बिलकुल आपके भीतरी भावनाओं तक।
शत्रु कैसे गिरते और ठोकर खाते हैं? वे पाप में लड़खड़ाकर गिर सकते हैं, जो आपको आनन्द करने का कोई अधिकार नहीं देता, क्योंकि प्रेम “कुकर्म से आनन्दित नहीं होता, परन्तु सत्य से आनन्दित होता है” (1 कुरि.13:6)। यदि आप किसी के विषय में चिन्ता करते हैं, आप पाप में उसकी भागीदारी के विषय में सुनकर जरा भी मगन नहीं होंगे, क्योंकि सभी मनुष्य धार्मिकता का जीवन जिए ऐसी आपकी अभिलाषा होनी चाहिए।
शत्रु सांसारिक परेशानियों में गिरकर ठोकर खा सकते हैं। वे एक नौकरी खो सकते हैं, किसी का तलाक हो सकता है, उनके बच्चों के साथ उनकी अनबन हुई हो सकती है, किसी बीमारी से ग्रस्त हो सकते हैं, किसी वाहन से दुर्घटना हो सकती है, कोई अपने किसी पशु को खो बैठा हो सकता है, या जुकाम हो सकता है। दुष्ट लोग उनके कपटपूर्ण हृदयों में गुप्त में मुस्कुराते हैं, क्योंकि एक भ्रष्ट हृदयवाला व्यक्ति अपने शत्रु को संकटों में देखकर मधु से भी अधिक मीठास महसूस करता है।
आपके शत्रु पर पवित्र प्रतिशोध या पलटा लेने का एक उचित मार्ग है। क्या आप ईश्वर-प्रेरित बुद्धि के भेद को जानने के लिए तैयार हैं? अपने शत्रु से प्रेम और दयालुता का बर्ताव करें, यहाँ तक कि अपने विचारों में भी, और प्रभु को उसे निपटने दे (नीति.25:20-21; 20:22)। आप एक धर्मी हृदय प्रमाणित करते हैं; प्रभु आपके कार्यों से प्रसन्न होता है; और आपका शत्रु आप के क्रोधित पिता का सामना करेगा।
आप को सत्य के वचन को उचित रीति से विभाजित करना चाहिए (2 तीमु.2:15)। आप को पौरुषहीन रीति से इस नीतिवचन को परमेश्वर के शत्रुओं पर लागू नहीं करना चाहिए। यहाँ पर शत्रु एक व्यक्तिगत शत्रु है जिसने आप को ठोकर दिलाई या आपकी हानि करनी चाही। सावधानी से ध्यान दें कि वचन ‘तेरा बैरी’ कहता है। ये वो लोग हैं जिन्होंने विगत समय में आपको ठोकर खिलाई या चोट पहुंचायी है या जो वर्तमान में आपकी हानि करने के बुरे उद्देश्य रख रहे हैं।
पवित्रजन परमेश्वर के शत्रुओं से प्रेम नहीं रखते; वे ईश्वरीय व्यवस्था और उदाहरण से जानते हैं कि उन्हें उस के शत्रुओं से घृणा करनी है (नीति.11:10; 29:27; निर्ग.15:1-21; 2 इति.19:2; अय्यूब 22:19; भजन.15:4; 3:16; 58:10; 139:19-22; प्रका.6:9-11; 18:20; 19:1-6)। परमेश्वर के बैरियों से प्रेम करना पाप है, और जिन से वह घृणा करता है उन पर कृपा करने या उनसे मित्रता रखने से परमेश्वर आपको दण्ड करेगा (2 इति 19:2; याकूब 4:4; प्रका.2:6, 15)।
मनुष्य स्वभाव ही से उनके शत्रुओं से घृणा करते हैं। आप नैसर्गिक प्रवृत्ति से किसी से नाराज होते हैं जो आप से दुर्व्यवहार करता, आप को तुच्छ जानता, या आपका अपमान करता है; प्रतिशोध लेना आपकी इच्छा बन जाती है। फरीसियों ने इस प्रकार की घृणा को उचित ठहराने के एक प्रयास में परमेश्वर की व्यवस्था को तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत किया। परन्तु प्रभु यीशु ने व्यक्तिगत शत्रुओं के प्रति दयालुता की मांग करने के द्वारा, ताकि परमेश्वर के सच्चे सन्तानों को पहचाना जा सके, उनकी झूठी शिक्षा को सुधारा (मत्ती.5:43-48)।
फरीसियों ने परमेश्वर की व्यवस्था के प्रावधान “आंख के बदले आंख” को भी व्यक्तिगत अपराधों पर लागू करने के लिए बिगाड़ दिया था। यद्यपि परमेश्वर ने उस नियम को केवल नागरी-शासको के उपयोग के लिए लिखा, उन्होंने व्यक्तिगत शत्रुओं से बदला लेने को उचित ठहराने के लिए इसका दुरुपयोग किया। यदि कोई शत्रु आपको मारता है, तो अपना दूसरा ग़ाल फेर देने की बुद्धि की शिक्षा देकर यीशु ने उन में फिर एक बार सुधार किया (मत्ती 5:38-42)। परमेश्वर सच्चा ठहरे!
अय्यूब, जो एक सिद्ध मनुष्य था, जिस ने बुराई को ठुकराया, जिस पर परमेश्वर ने शैतान के सामने गर्व किया, वह उसके शत्रुओं के सम्बन्ध में बहुत विवेकशील था। उसने कहा कि वह परमेश्वर के न्याय के योग्य था, “यदि मैं अपने बैरी के नाश से आनन्दित होता, या जब उस पर विपत्ति पड़ी तब उस पर हंसा होता; परन्तु मैंने न तो उसको शाप देते हुए, और न उसके प्राणदण्ड की प्रार्थना करते हुए अपने मुंह से पाप किया है” (अयूब 31:29-30)। क्या ही धन्य मनुष्य!
दाऊद, जो परमेश्वर के मन के अनुसार मनुष्य था उसने अपने शत्रुओं के विषय में लिखा, “जब वे रोगी थे तब तो मैं टाट पहिने रहा, और उपवास कर करके दुख उठाता रहा और मेरी प्रार्थना का फल मेरी गोद में लौट आया। मैं ऐसा भाव रखता था कि मानो वे मेरे संगी वा भाई हैं; जैसा कोई माता के लिए विलाप करता हो, वैसा ही मैंने शोक का पहिरावा पहिने हुए सिर झुकाकर शोक किया” (भजन.35:13-14; 2 शमू.1:11-12, 17)। तौभी, उन्होंने उसकी विपत्ति पर आनन्द करने के द्वारा बड़ी दुष्टता दिखाई (भजन.35:15-16)।
यहाँ तक कि सबसे अच्छे पवित्रजनों के शत्रु होते हैं, क्योंकि आप का परिवार, पड़ोसी, सहकर्मी और चर्च के सदस्य, सभी पापी हैं, और यह संसार धर्मी का मित्र नहीं है। अपने जीवन पर विचार करें। आप के शत्रु कौन हैं? आपका पति या आपकी पत्नी भी इस अर्थ में कभी-कभी शत्रु हो सकता या सकती है।
क्या आप के कार्य स्थल पर कोई आपको गुस्सा दिलाता है? क्या चर्च में कोई ऐसा व्यक्ति है जो आप से घृणा करता प्रतीत होता है? क्या परिवार का कोई सदस्य आपको अनदेखा करता व तुच्छ जानता है? क्या स्कूल का कोई साथी है जो आप को चिढ़ाता है? क्या एक पड़ोसी ने आपकी सम्पत्ति रेखा पर अतिक्रमण किया है? क्या एक कर्मचारी आप के प्रति अनादर प्रदर्शित करता है? क्या आपके किसी पुराने मित्र ने अकारण आप की निन्दा की है? सावधानीपूर्वक छानबीन करें। उन सभी को पहचानिये।
आप कैसे प्रतिक्रिया देंगे। यद्यपि वे अकारण ही आप से घृणा करते हैं, आप को फिर भी उन से प्रेम रखना चाहिए। वे आपकी झूठी निन्दा और चुगली कर सकते हैं, परन्तु आपको उन्हें आशीष देना व उनकी प्रशंसा करनी चाहिए। वे आप को अनदेखा कर सकते और तुच्छ जान सकते हैं, परन्तु आपको उनका अभिवादन और प्रशंसा करनि चाहिए। वे आपको चोट पहुंचा सकते हैं, किन्तु आप को उनका भला करना चाहिए। यदि वे आपके विरोध में बुरा करते हैं, उनकी बुराई को भलाई से जीत लें (नीति.25:21-22; निर्ग.23:4-5; मत्ती.5:43-48; रोमि.12:14, 17-21; 1 थिस्स.5:15; 1 पतरस 3:9)।
यदि आज आप आत्मिक विजय चाहते हैं, कि आपके पिता को प्रसन्न करें और उस के समान सिद्ध हों, तो अपने शत्रुओं के लिए प्रार्थना करें। उनके लिए प्रार्थना करना आप को इस पवित्र नीतिवचन का उल्लंघन करने से बचायेगा। यदि आप इसे ईमानदारी से करते हैं, आप शान्ति और आनन्द से आशीषित होंगे, और आत्मा आपके जीवन पर भरपूरी से उंडेला जाएगा कि आपको सामर्थ्य दे और आपके नये मनुष्यत्व से फल उत्पन्न करे। आप व्यक्तिगत शत्रुओं के प्रति घृणा से भरे और कठोर विचारों के द्वारा उसे शोकित करते और बुझाते हैं (इफि.4:30; 1 थिस्स.5:19; याकूब 3:14-17)।
प्रिय चुने हुए पाठक, जबकि आप उस के बैरी ही थे क्या होता यदि आप के पिता ने यीशु मसीह के माध्यम से आप से प्रेम न रखा होता (रोमि.5:6-10)? क्या होता यदि उस ने उसका प्रेम केवल उन तक सीमित रखा होता जिन्होंने उससे प्रेम रखा? आप खो गये होते। क्या आप उस के उदाहरण का अनुसरण कर सकते हैं? वह इसके लिए आप को आशीष देगा।
यीशु मसीह ने उसके व्यक्तिगत शत्रुओं पर दया दिखायी और यरूशलेम और उसकी सन्तानों के विनाश के सम्बन्ध में उन पर मानवीय करुणा रखी (लूका 19:41-44)। उसने उसके पिता से उन सैनिकों को क्षमा करने की प्रार्थना करने के द्वारा दयालुता की भावना का प्रदर्शन भी किया, जो क्रूस के नीचे उसके वस्त्रों के लिए जुआ खेल रहे थे (लूका 23:34)। अनुसरण करने के लिए कैसा पवित्र उदाहरण!
कुलीन सेवक स्तिफनुस, जब उसके शरीर पर पत्थर बरसाएं जा रहे थे, और जो प्रभु यीशु को दर्शन में देख रहा था, उसने उसे पत्थरवाह करके जान से मारने वाले यहूदियों के लिए परमेश्वर से क्षमा की याचना की (प्रेरित.7:55-56)। यहाँ पर एक सेवक था, जो पवित्र आत्मा से भरा हुआ था और जो इस भरपूरी को सम्भवत: सर्वाधिक गम्भीर परीक्षा के दौरान जी रहा था। ये आपके पवित्र उदाहरण हैं : उन्हीं के समान सोचे, प्रार्थना करें, प्रचार करें, और कार्य करें।
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